कविताएँ

  • इच्छा | Ichcha par kavita

    इच्छा ( Ichcha )  छोटी बड़ी पवित्र दूषित अधूरी पूरी मृत जीवित दबी तीव्र अल्पकालिक दीर्घकालिक व नाना प्रकार की होती है, सबको होती है। किसी की कम या ज्यादा होती है, किसी की पूरी तो किसी की अधूरी रह जाती है। यह कहां से आती है? जीवन से आती है, जीवनोपरांत समाप्त हो जाती…

  • मोबाइल फोन | Hindi Poem on Mobile

    मोबाइल फोन ( Mobile phone )  संचार क्रांति का द्योतक सूचनाओं का संसार, घर बैठे करें मनोरंजन और व्यापार । ज्ञान का यह पिटारा, लुटा रहा प्यार इस पर जग सारा। स्क्रीन पर उंगलियां घिसते, नेट स्लो होने पर हैं दांत पीसते। बच्चे व्यस्क या हों बूढ़े, रख हाथों में कुछ ना कुछ ढ़ूंढ़ें। पाकर…

  • चीख | Cheekh par kavita

    चीख ( Cheekh )    चीरती नीले गगन को हृदय विदारक चीख सी है। ले लिया सब कुछ हमारा देता हमको भीख सी है।‌।   छोड़कर घर द्वार तेरे पास आयी यहां मैं, सगे सम्बन्धी सब छूटे अब बता जाऊं कहां मैं‌, दो रोटी के बदले देता लम्बी लम्बी सीख सी है।।ले लिया ०  …

  • चुनाव आइल बा | Chunav Par Bhojpuri Geet

    चुनाव आइल बा ( Chunav aail ba )  आइल चुनाव बा… नेता घुमेलें, भर भर के गड़िया हो.. भर भर के गड़िया! सांझ सबेरे दुपहरिया!! नेता जी, नेता जी आवेले, हमके लुभावेलें। कह कह के बतिया हो, दीहें रोजगार आउर करीहें विकास हो। पूरा हो जाइ अबकी सभन के आस हो, लाचारी भटकी अब कबो#ना…

  • शरद वेदना (ककहरा) | Kahkara sharad vedna

    शरद वेदना (ककहरा) ( Sharad Vedna – Kahkara )    कंगरी सगरी लघु नीर भई बदरी छतरी बनि धावत है।   खटिया मचिया सब ढील भये हथिया बजरी पसरावत है।   गरवा हरवा जस बंध लगे बिछुवा पग चाल बढ़ावत है।   घुंघटा लटका छटका न टिका पवना सर से सरकावत है।।   चमकी चमके…

  • बेटी की अभिलाषा | Beti ki abhilasha par kavita

    बेटी की अभिलाषा ( Beti ki abhilasha )  मां! मुझे गुरूकुल से न हटा, साफ-साफ बता? बात है क्या? यूं आंखें न चुरा! मैं अभी पढ़ना चाहती हूं, आगे बढ़ना चाहती हूं। किसी से नहीं हूं कम, रोको न मेरे कदम; तू देखी हो मेरा दम। आरंभ से अभी तक सर्वप्रथम ही आई हूं, न…

  • और झनकन | Kavita jhanakan

    और झनकन ( Aur jhanakan )   तार वीणा के शिथिल इतनी स्पंदन और झनकन। बिना कंगन असह्य खनकन और झनकन।। शांत अन्तस्थल में कल कल की निनाद। चिरन्तन से अद्यतन तक वही संवाद। इतीक्षक कब होगा दरपन जैसा ये मन और झनकन।। बिना कंगन० करुण क्रंदन चीख बहती अश्रुधारा। जब विभू था सम्प्रभू था…

  • पग बढ़ाते चलो

    पग बढ़ाते चलो ***** कंकड़ी संकरी पथरीली, या हों रास्ते मखमली। हृदय में सदैव जली हो अग्नि, स्वार्थ हमें सब होगी तजनी। सेवाभाव की मंशा बड़ी, रास्ते में मुश्किलें भी होंगी खड़ी। पर जब करने की मंशा हो भली, बाधाएं दूर हो जातीं बड़ी से बड़ी। खुदा के वास्ते न देखो पीछे मुड़कर, बस तू…

  • अस्तीन के सांप | Poem aasteen ke saanp

     अस्तीन के सांप  ( Aasteen ka saanp )    मेरे अपनों ने मुझे,अपनों से दूर कर दिया || 1.कुछ अपने जो पराये हो गए,पराये मेरे अपने हो गए | अपनों को खो दिया पराया मान,वो अब सपने रह गए | कुछ खास अपनों को जी-जान से,अपना बनाना चाहा | सरेआम दगा दे गए दिखाबा किया,बस…

  • आप कहके मुकर जाइये। Poem on mukar jaiye

    आप कहके मुकर जाइये ( Aap kahke mukar jaiye )      अब इधर न उधर जाइये। आप दिल में उतर जाइये।।   आईना भी जले देखकर, इस कदर न संवर जाइये।।   हमको अच्छा लगेगा बहुत, आप कहके मुकर जाइये।।   आखिरी इल्तिजा आपसे, मेरे घर से गुज़र जाइये।।   गांव है शेष भोले…