कविताएँ

  • इस दिल पर पहरा है | Is Dil Par Pahra Hai

    इस दिल पर पहरा है एक रंग एक रूप का इस दिल पर पहरा है उसी दिल का दिया हुआ यह उदासी सा चेहरा है पढ़ना दिल से इस कविता को दिखेगा उसकी दिल पर डेरा है उसने मानी की नहीं मानी मुझे हम सफर पता नहीं लेकिन मैंने माना कि वह सिर्फ मेरा है…

  • अर्थ जगत | Kavita Arth Jagat

    अर्थ जगत ( Arth Jagat )   अर्थ जगत अनुपमा, प्रेरणा पुंज मारवाड़ी समाज ************ उद्गम राजस्थानी मरुथल धरा, न्यून वृष्टि संसाधन विहीन । तज मातृभूमि आजीविका ध्येय अंतर्मन श्रम निष्ठ भाव कुलीन । प्रायः राष्ट्र हर क्षेत्र श्री गमन , लघु आरंभ बुलंद आर्थिक आवाज । अर्थ जगत अनुपमा, प्रेरणा पुंज मारवाड़ी समाज ।।…

  • गणेश स्तुति | Ganesh Stuti

    गणेश स्तुति ( Ganesh Stuti )   कवि जन की कलम हो तेजस्वी कुछ ज्ञान प्रकाश दो गणपति जी निज सेवक जान अनुग्रह का वरदान दो मेरे गणपति जी हम सबके नाव खेवैया हो तुम पालक सृष्टि रचैया हो हो मातु पिता गुरु स्वामी तुम कण- कण में तुम्हीं बसैया हो संताप कष्ट हो या…

  • काशी | Kavita Kashi

    काशी ( Kashi )   वसुधा का सिंगार है काशी ज्ञान ध्यान भंडार है काशी बहती जहां गंग की धारा जिसका पावन कूल किनारा अर्धचंद्र शिव के माथे पर बहती चंद्राकार है काशी गायन वादन नृत्य विहंगम सुर लय ताल छंद का संगम मन को मुग्ध करें स्वर लहरी बना हुआ रसधार है काशी गूंज…

  • इश्क दर्द है | Ishq Dard Hai

    इश्क दर्द है  ( Ishq Dard Hai )   इश्क दर्द है इश्क जवानी है इश्क में हो रहा …. पानी-पानी है इश्क जान है इश्क जहान है इश्क महसूस करो तो इश्वर, अल्लाह, भगवान है इश्क न काला है इश्क न गोरा है इश्क में ………. ने बेदर्दी से खुद को पाला है इश्क…

  • आइसक्रीम | Kavita Ice Cream

    आइसक्रीम ( Icecream ) आइसक्रीम तो सभी की पसंदीदा कहलाती है, सर्दी गर्मी बारिश हर मौसम में खायी जाती हैं। बचपन में मटका कुल्फी की टन टन हमें बुलाती थी, उसके पास पहले पहुँचने की होड़ हम में लग जाती थी। ऑरेंज, वनीला, रास्पबेरी मैंगो कितनी प्यारी लगती थी, सॉफ्टी कोन की तो फिर भी…

  • 21 वीं सदी का यथार्थ

    21 वीं सदी का यथार्थ देव संस्कृति देव भाषा देव लोक की विदाई मानव का प्रौद्योगिकीकरण जड-चेतन का निशचेतन छायावाद का प्रचलन चार्वाक का अनुकरण कृत्रिम इच्छा का सृजन कृत्रिम मेधा का उत्पादन बाजारों के बंजारें आत्ममुग्धता की उपभोक्तायें मानवता का स्खलन सभ्यता का यांत्रिकरण बिलगेटस,मस्क का खगोलीकरण अंबानी,अडानी का आरोहण मूल्यों-नीतियों का मर्दन रक्तबीजों…

  • बुद्ध हो गयें । Buddh ho Gaye

    बुद्ध हो गयें ( Buddh ho Gaye ) तन से मन से वचन से कर्म से मर्म से धर्म से जो शुद्ध हो गयें बुद्ध हो गयें। नरेन्द्र सोनकर ‘कुमार सोनकरन’ नरैना,रोकड़ी,खाईं,खाईं यमुनापार,करछना, प्रयागराज ( उत्तर प्रदेश ) यह भी पढ़ें :- माँ पर नरेन्द्र सोनकर की ४ कविताएँ

  • बचा रहे गणतंत्र | Kavita Bacha Rahe Gantantra

    बचा रहे गणतंत्र ( Bacha rahe gantantra )   अंतिम चरण बचा है अब तो, अपना मत दे डारो ! बिगड़ न जाए बात कहीं अब, अपनी भूल सुधारो !! रहे सुरक्षित गणतंत्र हमारा , लोभी नेताओं से ! देश बचाना है हम सबको , सेक्युलर मक्कारों से !! चूक गए तो, जिज्ञासु ‘जन’ ,…

  • तभी बचेगा लोकतंत्र

    तभी बचेगा लोकतंत्र   आओ हम संकल्प सभी लें , जन गण मन को जगानेका ! भारत मांता की गरिमा संग , लोकतंत्र बचाने का !! रावण ने की थी जो गल्ती , उसका क्या परिणाम हुआ ! धृतराष्ट्र में मोह के कारण , उसके कुल का नाश हुआ !! जयचंद की ईर्ष्या द्वेष के…