हम रोते हैं

हम रोते हैं | Hum Rote Hain

हम रोते हैं

( Hum Rote Hain )

दुख में तन्हा हम रोते हैं
सुख में शामिल सब होते हैं

खार ही खार दिखे हैं हर सू
हम हर सू जब गुल बोते हैं

फ़सलों पर हक़ ग़ैर जतायें
खेत तो जब हमने जोते हैं

लालच के रथ पर जो बैठें
अपना भी वो धन खोते हैं

उनके आँसू कौन पढ़ेगा
जो औरों का दुख ढोते हैं

आ जाते हैं और निखर कर
दाग़ों को जितना धोते हैं

सूरज कितना चीखा साग़र
लोग पड़े अब तक सोते हैं

Vinay

कवि व शायर: विनय साग़र जायसवाल बरेली
846, शाहबाद, गोंदनी चौक
बरेली 243003

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • आप सा कोई नहीं | Aap sa Koi Nahi

    आप सा कोई नहीं ( Aap sa Koi Nahi ) बेवफ़ा हैं बावफ़ा कोई नहीं इस जहां में आप सा कोई नहीं वक़्त आया जब बुरा तो यूँ लगा मुझसे जैसे आशना कोई नहीं मौत आयी तो कहा ये ज़ीस्त ने दूसरा तो रास्ता कोई नहीं एक माँ के सारे बच्चे मर गये इससे बढ़…

  • नमी | Sad Urdu Shayari in Hindi

    नमी ( Nami )    क्यों आँखों में अक्सर नमी रह गई जो नहीं मिला उसकी कमी रह गई। यूँ भीड़ में चलते रहे हज़ारों बस अपनों को ढूढ़ती ये नज़र रह गई। समंदर भर एहसास गुजरते देखे मगर कायम इक तिशनगी रह गई। सुधारा बहुत अपनी कमियों को फिर सुना वो बात नहीं रह…

  • तिरंगो से सज़ा देखो वतन है | Tirango se Saja

    तिरंगो से सज़ा देखो वतन है  ( Tirango se saja dekho vatan hai )    तिरंगो से सज़ा देखो वतन है गुलों से यूं भरा अपना चमन है सलामत ए ख़ुदा रखना हमेशा वतन का जो हसीं मेरे फ़बन है नहीं आये कभी कोई मुसीबत वतन में रब सदा रखना अमन है किसी में बू…

  • हमको कभी

    हमको कभी हमको कभी ख़ुशियों का भी मंज़र नहीं मिलतादिल को मिले सुकूँ वो मुकद्दर नहीं मिलता शिद्दत से जो चाहे वही दिलबर नहीं मिलताजो ज़ख़्म मेरे सी दे रफ़ूगर नहीं मिलता रहने को ग़रीबों को कभी घर नहीं मिलतादे दे उन्हें जो छाँव वो छप्पर नहीं मिलता जो राह दिखाते थे सदा ज़ीस्त में…

  • मुझको पसंद करते हैं लाखों हजार लोग

    मुझको पसंद करते हैं लाखों हजार लोग   मुझको पसंद करते हैं लाखों हजार लोग । अब वाह-वाह करके लुटाते हैं प्यार लोग ।। सुनकर ग़ज़ल पसंद उसे कर रहे सभी । मेरी नई ग़ज़ल का करें इंतजार लोग ।। कुछ ख़ास लोग याद रखेंगे मुझे सदा । गिनती में कम-से-कम वो रहेंगे हजार लोग…

  • जहां चाहता हूं | Jahan Chahta Hoon

    जहां चाहता हूं ( Jahan chahta hoon )   न नफ़रत का कोई जहां चाहता हूं! सियासत की मीठी जुबां चाहता हूं! मिटे जात मजहब के झगड़े वतन से मुल्क हो मुहब्बत का बागवा चाहता हूं! रहे मुसलसल आदमी मेरे अंदर लेकिन हो जाना मैं इक इंसा चाहता हूं! नुमाइश बहुत हो चुकी यारों अब…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *