इंसान स्वयं को तू पहचान!
इंसान स्वयं को तू पहचान!

इंसान स्वयं को तू पहचान!

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ऐ इंसान स्वयं को तू पहचान!
जन्म हुआ किस हेतु तुम्हारा ?
इस दुनिया जहान में,
मानव खुद को तू पहचान रे।
पेश करो तू मानवता की मिशाल,
टिकते वही धरा पर जिनके होते हृदय विशाल।
ऐ इंसान स्वयं को तू पहचान,
विनम्रता क्षमा सहनशीलता है मानव की पहचान।
हृदय में जिनके करूणा दया है-
जग में वहीं महान ,
ऐ इंसान स्वयं को तू पहचान।
दुखियों की जो करता सेवा,
मिलता उसको सदा ही मेवा।
पीड़ितों को जो दे साहस संबल,
सच में मानव वही असल।
भेद न करे जो मानव मानव में,
जानो उसे सच्चा इंसान रे ।
जग में होती उसी की पूजा,
मानवता से बढ़कर काम न दूजा।
ऐसा करें व्यवहार सभी से,
झगड़ा बैर कभी न किसी से।
दान पुण्य भी करें खुशी से,
आशा रखते लोग उसी से।
सुन बात किसी की, कहो न कभी किसी से,
रहो मिलजुलकर सदा तू खुशी से।
इंसानियत की खूबी तू जान,
करो कुछ जग में ऐसा हो जाए तेरा भी नाम;
ऐ इंसान खुद को तू पहचान।

 

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नवाब मंजूर

लेखक– मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर

सलेमपुर, छपरा, बिहार ।

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