Kavita Jara Yaad karo Bharatwasi

जरा याद करो भारतवासी | Kavita Jara Yaad karo Bharatwasi

जरा याद करो भारतवासी

( Jara yaad karo bharatwasi ) 

 

जो शहीद हुए है उनको जरा याद करो भारतवासी,
आखिर में वह भी थें अपनें हिन्दुस्तान के निवासी।
चाहतें थें वो सबकी ज़िन्दगी हो आज़ादी की जैसी,
जिसके लिए उन सभी को बनना पड़ा यह प्रवासी।।

चाहतें थें वे सब ही अपनें जैसा मिलें जीवन-साथी,
प्रकृति की अनमोल धरती को मात समान मानती।
तमन्नाएं थी उन सबकी ख़ुशी से रहें हिन्द के वासी,
आस्था संस्कार रीति-रिवाज सब कुछ वह मानती।।

दूर-रहकर भी हमसे वो मर्यादाओं से जीवन जीती,
मां-बाप की सेवा कर अपनें बच्चों को वह पढ़ाती।
होली दिवाली ईद क्रिसमस यें पर्व कुछ ना मनाती,
जब हम छुट्टी पर आतें वह सारे उत्सव मना लेती।।

सांसों में सांसें आ जाती वह देखकर हमें मुस्काती,
आनें वाली १४ फरवरी को वे वैलेंटाइन डे मनाती।
दूर-भले ही रहें वो हमसे पर दिलों में हमारे बसती,
नाच उठता उसका मन मयूरा गाने वह गुनगुनाती।।

पर किस्मत ऐसी नही मित्रों चाहतें दफ़न हो जाती,
नही समय पर छुट्टी मिलती नही बातें उनसे होती।
कागज़ के पन्नें में केवल यादें बनकर ही रह जाती,
हमको पिता बनाकर वह जीवन सार्थक कर देती।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

 

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