Kavita mere piya phase hain pradesh

मेरे पिया फंसे है परदेश | Kavita mere piya phase hain pradesh

मेरे पिया फंसे है परदेश

( Mere piya phase hain pradesh ) 

 

 

मेरे पिया फंसे है परदेश,

वहां से दिया है मुझे निर्देश।

बाहर का खाना नही खाना है,

भीड़ में बिलकुल नही जाना है।।

 

कहा है रहना तुम निवास,

और रखना प्रभु पर विश्वास।

धीरज बिलकुल नही खोना है,

सफाई का विशेष ध्यान रखना है।।

 

यह है महामारी का दौर,

आऐगी फिर नयी एक भोर।

जुड़ी हुई रहेंगी हमारी ये डोर,

चला जाऐगा ये कोरोना का शोर।।

 

यही है सब देशों का हाल,

ग़रीबो का हो रहा बुरा हाल।

बदल रही है प्रकृति भी माहौल,

दो गज दूरी से करना है बोलचाल।।

 

लिया हो तुमने चाहें दवाई,

ना करना आज कोई ढ़िलाई।

आई जो कोरोना की तीसरी लहर,

दिखा रही अपना भयंकर ये कहर।।

 

बंद है आनें-जाने के साधन,

निर्धन में देना धन व भोजन।

सदा रखना माँ की ऑकसीजन,

जकड़ रहा बच्चा बुड्ढा या जवान।।

 

रहना स्वयं पर निर्भर,

जल्दी आऊंगा अपने घर।

मास्क रखना सदैव मुंह पर,

मौत का छाया हर जगह ये मंजर।।

 

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

यह भी पढ़ें :-

ऊन का चोला | Ooni kapda par kavita

Similar Posts

  • माता की भूमिका | Kavita Mata ki Bhumika

    माता की भूमिका माता ही हमारी जान-प्राण-शक्ति, हम उनके जिगर के टुकड़े। माता की भूमिका अनुपम,अद्भुत। माता जी के बिना बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव नहीं जीवन में। मां की कारीगरी,कला-कौशल से बच्चे सफल ,जिंदगी में मुस्कान। बच्चों के लिए ही समर्पित जीवन। क्योंकि हम रहते एक मिट्टी का पुतला, माँ ही उसमें सार्गर्भित गुण…

  • पहला मिलन | Kavita Pahla Milan

    पहला मिलन ( Pahla milan )    मेंरे जीवन की अजीब कहानी मैं सपनों का राजा वह मेरी रानी आज भी याद मुझको वह आती वो भोली सी सूरत जो थी पुरानी याद आता मुझे उनसे पहला मिलन प्यारी-प्यारी वह सुहानी छुअन।। चोरी छुपके जब कभी हम मिलते बोल दो प्यार के वह होल्ले से…

  • संविधान का निर्माता | Samvidhan ka Nirmata

    संविधान का निर्माता ( Samvidhan ka nirmata )    ख़ुदा का नूर बनकर आया वह संविधान का निर्माता, सबको समान अधिकार मिले जिनका ये अरमां था। चुप-चाप गरल पीता रहा पर दिलाकर रहा समानता, ख़ुद पढ़ो फिर सबको-पढ़ाओ ऐसा जो कहता था।। तुम आज झुक जाओ कागज की पुस्तकों के सामने, फिर कल को देखना…

  • संसय | Kavita

    संसय ( Sansay )   मन को बाँध दो दाता मेरे,मेरा मन चंचल हो जाता है। ज्ञान ध्यान से भटक रहा मन,मोह जाल मे फंस जाता है।   साध्य असाध्य हो रहा ऐसे, मुझे प्रेम विवश कर देता है। बचना चाहूं मैं माया से पर, वो मुझे खींच के ले जाता है।   वश में…

  • जीने के लिए | Kavita jeene ke liye

    जीने के लिए  ( Jeene ke liye )    कक्षा में बिल्कुल पीछे पिछले सीट पर मैला कुचैला निराश उदास बैठा सबसे दूर, न कापी न कलम न पढ़ने का मन, मैंने डांटा धमकाया पर दबा दबा सा मुझे देखा देखता रहा अंततः कुछ न बोला, फिर प्यार से स्नेह और दुलार से पूछा, उसने…

  • पगडंडी | Hindi kavita

    पगडंडी ( Pagdandi )   पगडंडी वो रस्ता है, जो मंजिल को ले जाती है। उबड़ खाबड़ हो भले, मन को सुकून दिलाती है।   शहरों की सड़कों से ज्यादा, प्यारी लगे पगडंडी। प्रदूषण का नाम नहीं है, बहती हवा ठंडी ठंडी।   पगडंडी पर प्रेम बरसता, सद्भावो की धारा भी। हरी भरी हरियाली से,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *