मां | Maa Par Kavita

मां

( Maa )

 

मां सहेली भी है,
मां पहेली भी है,
इस जहां में वो,
बिल्कुल अकेली भी है।
दुःख में हंसती भी है,
सुख में पिसती भी है,
नेह की प्यास में ,
ममता रिसती भी है,
मां सुहानी भी है,
मां कहानी भी है,
मन को शीतल करे,
मीठी वाणी भी है।
भोर की धूप सी,
ओस की बूंद सी,
चांदनी में धुली,
मखमली रात सी,
मां चिरागों से फैले,
उजालों सी है।
मां गगन में टंके,
हर सितारों सी है।
अंधी ममता में है,
बंधी क्षमता में है,
मन को बांधे पड़ी,
बाहें खोले खड़ी,
मां जो मुस्काती है,
मन से चटक जाती है,
आंखे जल से भरी,
मौन फिर भी खड़ी,
बोलती जाती है,
कहती कुछ भी नहीं,
मां मेरी अजनबी,
जानती कुछ भी नहीं।।

रचना – सीमा मिश्रा ( शिक्षिका व कवयित्री )
स्वतंत्र लेखिका व स्तंभकार
उ.प्रा. वि.काजीखेड़ा, खजुहा, फतेहपुर

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