मधुरिम अहसास
मधुरिम अहसास

मधुरिम अहसास

तुम समझते हो मेरी इस पीर को क्या
वह सुखद अहसास बासन्ती सुमन वह
कूल कालिंदी कदम तरु का मिलन वह
कुछ अनकहे से अनछुये अहसास लेकर
आज फिर होगा मिलन आभास लेकर
मैं गयी थी तुम न आये
रोक पाओगे भला क्या आंख से छलका जो मेरे नीर को क्या।।
आज जाने दो, रुकूंगा कल परसों पुनः आउंंगा मैं
मिलके जो वादे किये थे साथ तेरे
उन अहसासों की मधुरिम जमीं पर
प्रेम की एक बेल बोने
पर नहीं आये
बेल बोई,बढ़ गयी,पल्लवित कुसुमित हुयी वह
पर न पहुंची गंध मुझ तक
खोल दूं यदि घ्रांण को मैं,कैसे रोकूंगी सुखद अहसास लेकर
हृदय पर मेरे लगेगा विरह के उस तीर को क्या।।
बांसुरी अब बेसुरी सी हो गयी है
डसती है अधरों पर काली नाग बनकर
केश कंधों से उतरकर आ रहे थे वक्ष तक जो
मूक भाषा बोलते थे तुम न समझे
तो भला समझाना है इस भीड़ को क्या।।

 

🍀

लेखक: स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती

प्रज्ञानं आश्रम कठिना तट महोली ,

जनपद सीतापुर ( उ०प्र० )

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