मेरे यार से तुम मुखातिब करा दो | Mere Yaar Se

मेरे यार से तुम मुखातिब करा दो

मेरी कैफ़ियत को मुनासिब करा दो,
मुहब्बत का मसला है वाज़िब करा दो।

रहेगा ये अहसान मुझ पर हमेशा
मेरे यार से तुम मुखातिब करा दो।

दुआ ना दया को किसी से कहेंगे
सनम बस हमारे मुसाहिब करा दो !

रहेगी शिकायत न जग से कभी फिर,
ज़रा इक मुलाक़ात वाज़िब करा दो !

करे इल्तिजा हम सभी से यही बस,
मुहब्बत ‘धरम’ की मरातिब करा दो !!

डी के निवातिया

डी के निवातिया

यह भी पढ़ें:-

Similar Posts

  • बहाने कितने | Bahane Kitne

    बहाने कितने ( Bahane Kitne )    मुस्कुराने के बहाने कितने फर्क क्या,आएं रुलाने कितने ॥ अब यकीं रूठ किधर जा बैठा रंग बदले हैं ज़माने कितने ॥ बेअसर ख़ार भी है अब उसको सह लिया तल्ख़ व ताने कितने ॥ होती उस सम्त निगाहें सबकी कह गईं, उसके दिवाने कितने ॥ उसकी गैरहाज़िरी में…

  • मेरे भीतर | Rajni ki Ghazal

    मेरे भीतर ( Mere Bheetar ) चढ़ा अपने सनम के इश्क़ का पारा मेरे भीतरग़ज़ल कहने का मौज़ूं है बड़ा प्यारा मेरे भीतर रवानी बन गई है प्रेम की धारा मेरे भीतरहै ए’लान-ए-बहाराँ-सा ये इकतारा मेरे भीतर कहूँ कैसे मैं तुमसे दिल है बेचारा मेरे भीतरन जाने कबसे है पागल ये बंजारा मेरे भीतर तुम्हारे…

  • मोबाइल से | Mobile se

    मोबाइल से सारे रिश्ते ख़तम मोबाइल से,अच्छेअच्छे भसम मोबाइल से । देश भर के शरीफ़ज़ादे सब ,हो गयें बेशरम मोबाइल से । नाचती हैं हसीन बालाएं,बन गया घर हरम मोबाइल से। बैठ दिल्ली में बात गोवा की,खायें झूठी कसम मोबाइल से। भागवत आरती भजन कीर्तन,डीजिटल है धरम मोबाइल से । चिट्ठियों का गया ज़माना अब,भेजती…

  • जाने क्यों बेख़बर नहीं आती

    जाने क्यों बेख़बर नहीं आती जाने क्यों बेख़बर नहीं आतीढ़ाने मुझपर कहर नहीं आती ताकते क्यों हो तुम गली उसकीआजकल वो नजर नहीं आती मैं हूँ मजबूर आज जीने कोयाद वह इस कदर नहीं आती देखकर हार बैठा दिल जिसकोवो भी लेने ख़बर नहीं आती तू उसे खोजता है क्यों दर दरवो कभी इस डगर…

  • खून पसीना यार निकलता रहता है

    खून पसीना यार निकलता रहता है खून पसीना यार निकलता रहता हैपैसों से बाज़ार उछलता रहता है तुमने देखा है जिस उगते सूरज कोहमने देखा वो भी ढ़लता रहता है रोते रहते बच्चे मेरे दाने कोऔर पतीला चूल्हा जलता रहता है जश्न सियासी कूचों में होता रहताबेबस औ मजदूर कुचलता रहता है क्या उम्मीद लगायें…

  • साथ जिनके | Ghazal Saath Jinke

    साथ जिनके ( Saath Jinke ) हाँ वही खुशनसीब होते हैं साथ जिनके हबीब होते हैं अपनी हम क्या सुनाये अब तुमको हम से पैदा गरीब होते हैं तुमने देखा न ढंग से शायद किस तरह बदनसीब होते हैं पास जिनके हो रूप की दौलत उनके लाखों रक़ीब होते हैं प्यार जिनको हुआ नहीं दिल…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *