जो ज़ख़्म बेनिशां थे वो नासूर हो गए

जो ज़ख़्म बेनिशां थे वो नासूर हो गए

जो ज़ख़्म बेनिशां थे वो नासूर हो गए

हम क्या ह़रीमे-नाज़ से कुछ दूर हो गए।
जो ज़ख़्म बेनिशां थे वो नासूर हो गए।

सब इ़ज्ज़ो-इन्किसार ही काफ़ूर हो गए।
मसनंद नशीं वो क्या हुए मग़रूर हो गए।

बेचैन उनके इ़श्क़ ने इतना किया के बस।
हम उनसे बात करने को मजबूर हो गए।

वो संग थे यूं करते रहे संग से जरह़।
हम मिस्ले-आईना थे यूं ही चूर हो गए।

अह़वाले-क़ल्ब फ़ोन पे ही पूछते हैं सब।
कितने अ़जीब आज के दस्तूर हो गए।

आंखों में अश्क दाब के बैठे हुए थे हम।
देखी झलक जो उनकी तो मसरूर हो गए।

लगता है धुंधला-धुंधला सा क्यों आसमां फ़राज़।
आंखें गयीं या तारे ही बेनूर हो गए।

सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़

पीपलसानवी

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