मन का डर | Man ka Dar
मन का डर ( Man ka Dar ) चलते चलते न जाने कहाँ तक आ गये हैं, कामयाबी की पहली सीढ़ी शायद पा गये हैं, कुछ पाने का जूनून आँखों में है बसा हुआ मगर पहला क़दम रखूं कैसे डर ये सता रहा, ख़ुद पर इतना यक़ीन कभी किया ही नहीं, कुछ जीत लेने…
मन का डर ( Man ka Dar ) चलते चलते न जाने कहाँ तक आ गये हैं, कामयाबी की पहली सीढ़ी शायद पा गये हैं, कुछ पाने का जूनून आँखों में है बसा हुआ मगर पहला क़दम रखूं कैसे डर ये सता रहा, ख़ुद पर इतना यक़ीन कभी किया ही नहीं, कुछ जीत लेने…
यही हाल इधर भी है ( Yahi Haal Idhar Bhi Hai ) बेताबी बेचैनी होती, धड़कनों में धक-धक सी है। घबराहट सी होती दिल में, यही हाल इधर भी है। दिल में धक-धक सी है इंतजार की वो घड़ियां, गीतों की सजती है कड़ियां। मन का सागर ले हिलोरें, सावन की बरसे झड़िया। प्रीत…
प्यार नीलाम हुआ ( Pyar Neelam Hua ) प्यार नीलाम हुआ अक्ल के दानाई में जीत का जश्न मनाता है वो हाराई में II चाल पे चाल चला शर्म निगाहों से गुम आज हम चौक गए सोच के तन्हाई में II यक-ब-यक तोड़ रहा आज मरासिम जो वो बेअसर वक्त भी होगा कभी भरपाई…
इंसानियत मर रही कितना क्रूर होता जा रहा अब मानव,मानवता क्रूरता में बदलती जा रही,अपने स्वार्थ की हर सीमा लांघ रहा,बुद्धिमत्ता, समझदारी क्षीण होती जा रही,रिश्ते – नाते,अपने – पराए,सब भूल रहा,इंसानियत भी अब शर्मसार हुए जा रही,दोष इन सबका हालातों को दिया जा रहा,मगर झांककर देखो ये नशे की लत हर घर अपना आतंक…
नारी प्रधान कहानियां डॉ सुमनधर्म वीर द्वारा लिखी गई किताब “स्त्री व नारी विमर्श” हमने पढ़ी । यह किताब बहुत ही अच्छी तरह से लिखी गई है। क्योंकि इस किताब में नारी प्रधान कहानियां हैं । किस तरह से हमारा समाज एक नारी को देखता है चाहे वह अपने मायके में रहे या ससुराल में…
उन्हुका दीया से नूर लेके का होई जमाना के बात रोजाना होता दरद ओरात ना गोताना होता लिपल बतकही सोहात नइखे सफर उन्हुकर सोहाना होता पत्तल सीके जीअल जाता जहाँ गरीबी कागज में खोजाना होता परगट सिसकत बिया जिनगी नजर के मूँद के जोहाना होता हाय लागी कइसे लील गइलन गटके के घटना रोजाना…
आम के आम गुठलियों के दाम ( Aam ke Aam guthliyon ke daam ) आम के आम हो जाए, गुठलियों के दाम हो जाए। अंगुली टेड़ी करनी ना पड़े, अपना काम हो जाए। कविता में रस आ जाए, श्रोताओं के मन भा जाए। कलमकार रच कुछ ऐसा, दुनिया में नाम हो जाए। आम वही…
जब इश्क का फूल खिलता है दिल के गुलशन जब इश्क का फूल खिलता है, बदन का अंग-अंग, रोम-रोम हिलने लगता है ! भटकता जब मन बैचेन होकर इधर उधर तब, महबूब की बांहो में जन्नत का सुकून मिलता है ! मुहब्बत की दुनिया के जलवे ही होते है निराले, इसकी आग में दिन…
पुस्तक समीक्षा पुस्तक: प्रकृति व स्त्री विमर्श लेखिका: डॉ सुमन धर्मवीर प्रकाशक: पुष्पांजलि दिल्ली 110053 मूल्य: 445 रुपए मात्र नाटक समीक्षक: डॉक्टर कश्मीरी बौद्ध (साहित्यकार एवं प्रोफेसर रोहतक) लेखिका परिचय: डॉ सुमन धर्मवीर का लेखन व सामाजिक क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है ।उनके द्वारा रचित अनेक कहानियां, कविताएं नाटक एवं लेख भी विभिन्न पत्र…
पदचिन्ह ( Padachinh ) पदचिन्हों का जमाना अब कहां पदलुपतों का जमाना अब जहां परमसत्ता को शब्द-सत्ता से च्युत करने की साजिश है जहा तिनका-तिनका जलेगा मनुज अपने ही कर्मों को ढोते-ढोते शब्द-पराक्रम की महिमा वशिष्ट ने राम को समझायी अंश मात्र जो आज हम अपनाते क्लेश नामों-निशान मिट जाता शेखर कुमार श्रीवास्तव दरभंगा(…