• कान्हा | kaanha

    कान्हा हे ! मेरे कान्हा तुम कहां बसने लगे सुना है तु जल में सुना है तु थल में तुम नज़र नहीं आते । हे ! मेरे कान्हा सभी तुम को कहते कृष्ण काला दिल से साफ हो तुम यह मैं कहता हूं आप महान हो इस जग में तुम नज़र नहीं आते ‌‌। हे…

  • रामजी के गाँव रे | Ram ji Ke Gaon

    रामजी के गाँव रे ( Ram ji ke gaon re )    चला चली धनिया ई माटी कै नाव रे, होई जाई बेड़ा पार रामजी के गाँव रे। फल,फूल,मेवा,नरियल,उहाँ हम चढ़ाईब, सरयू नदी में दूनों डुबकी लगाईब। जनम -जनम से उनसे आपन लगाव रे, होई जाई बेड़ा पार रामजी के गाँव रे। चला चली धनिया…

  • आस्था में ही विश्वास है | Aastha Mein Vishwas

    कंचन काया राम की , नयन कमल समान दर्शन करती दुनियां,करती प्रभु को प्रणाम ।। मूर्तिकार ने जब यह मूर्ति बनाई तब उसका स्वरूप उसे इस प्रकार का बिल्कुल नहीं लगा जैसे उसमें कोई ऊर्जा समाहित हो परंतु प्राण प्रतिष्ठा के बाद राम का स्वरूप और निखार एकदम से अलग हो गया हमारे वेद मन्त्रों…

  • प्रश्न | Prashn

    प्रश्न ( Prashn )   हर आदमी गलत नहीं होता किंतु ,घटी घटनाएं और मिलते-जुलते उदाहरण ही उसे गलत साबित कर देते हैं भिन्नता ही आदमी की विशेषता है किसी की किसी से समानता नहीं न सोच की ना व्यवहार की तब भी कर लिया जाता है शामिल उसे भ्रम और वहम की कतार में…

  • सकारात्मक सोच | Sakaratmak Soch

    सकारात्मक सोच (Sakaratmak soch )   प्रतिपल उत्सविक प्रभा, सकारात्मक सोच से असंभव कुछ भी नहीं, मनुज ताकत आगे । बस तब तक देर है , जब तक डर न भागे । यथार्थ आकलन उबारता, प्रगति प्रयास संकोच से । प्रतिपल उत्सविक प्रभा,सकारात्मक सोच से ।। कमजोरी ताकत बन, जब आगे बढ़ती है । कीर्तिमानी…

  • वृक्षमित्र श्रवण कुमार जाखड़ | Vrikshamitra

    वृक्षमित्र श्रवण कुमार जाखड़ ( Vrikshamitra Shravan Kumar Jakhar )   वृक्षमित्र संजीवनी संवाहक श्रवण कुमार जाखड़। धन्य आपका जुनून जज्बा मृदुवाणी मधुर भाषण। पेड़ लगाते पेड़ बांटते जब हरियाली धरा पर छाई। आओ वृक्ष लगाएं हम मिलकर मुहिम एक चलाई। शिक्षक सरल स्वभाव शांति के सदा रहे उपासक। आयोजन में धर्म निभाएं पेड़ों की…

  • माँ पर नज़्म | Maa par Nazm

    माँ पर नज़्म ( Maa par nazm )    पिलाकर अमृत का प्याला, क्यों तनाव में रहती है माँ। घर की सारी बला उठाकर फटी जिन्दगी सीती है माँ। क्यों अधिकार मिटा उसका, इतना दुःख सहती है माँ। जग की धुरी कहलाने वाली, क्यों वृद्धाश्रम जाती है माँ ? नभ-सी ऊँची, सागर-सी गहरी, जन्म सभी…

  • कोई शिकवा शिकायत ही नहीं | Shikwa Shikayat

    कोई शिकवा शिकायत ही नहीं ( Koi shikwa shikayat hi nahi )   کوئی شکوہ شکایت ہی نہیں ہے مجھے تم سے عداوت ہی نہیں ہے कोई शिक्वा शिकायत ही नहीं है मुझे तुम से अदावत ही नहीं है تمہارے بعد میں اۓ جان جاناں کسی سے اب محبت ہی نہیں ہے तुम्हारे बाद में…

  • ढलती साँझ | Dhalti Saanjh

    ढलती साँझ ( Dhalti saanjh )   ढलती साँझ के साये तले कदम हमारे हैं बढ़ चले गहराती रात का अंदेशा है कल के आगाज का यही संदेशा है बदली हुई धाराओं का शोर है एक अलग ही अंदाज चहुँओर है भूल चुके हैं दिन की तपिश को हम जाने कल आने वाली कैसी भोर…

  • बोले कोयलिया | Bole koyaliya

    बोले कोयलिया ( Bole koyaliya )   कोयलिया कुहू कुहू बोले। वन उपवन में लता कुंज में, मधुरस के घट खोले। पवन बह रही है बासंती, करती जनरुचि को रसवंती, बौराई अमराई सारी, मादकता सी घोले। हुई मंजरित डाली डाली, मुग्ध भाव से देखे माली, एक-एक तरु की फलता को, मन ही मन में तोले।…