लबों पर रोज़ ये चर्चा रहा है | Ghazal
लबों पर रोज़ ये चर्चा रहा है ( Labon par roz ye charcha raha hai ) लबों पर रोज़ ये चर्चा रहा है उसी से अब नहीं रिश्ता रहा है नहीं वो पास में ये ही सही अब ग़ज़ल मैं याद में सुनता रहा है मिली है कब वफ़ा सच्ची किसी…
लबों पर रोज़ ये चर्चा रहा है ( Labon par roz ye charcha raha hai ) लबों पर रोज़ ये चर्चा रहा है उसी से अब नहीं रिश्ता रहा है नहीं वो पास में ये ही सही अब ग़ज़ल मैं याद में सुनता रहा है मिली है कब वफ़ा सच्ची किसी…
क्रोध ( Krodh ) क्रोध की अपनी सीमा है और, क्रोध की भी मर्यादा है। सही समय पर किया क्रोध, परिणाम बदलता जाता है। राघव ने जब क्रोध किया तब, सागर भय से कांप उठा, स्वर्ग पधारे जटायु जब, क्रोधित हो रावण से युद्ध किया। समय पे क्रोधित ना होने का, दण्ड…
अभिव्यक्ति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संकलन मंदाकिनी एक काव्य तरंग में नवलगढ़ के कवि रमाकांत सोनी की साझा संकलन में रचनाएं प्रकाशित हुई। शुभचिंतकों व मित्रों ने हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी। डा मनीष शर्मा, डा मीनाक्षी शर्मा,डा अरविंद वशिष्ठ, सज्जन जोशी,संत कुमार सारथी, सुरेश कुमार जांगिड़, काशीनाथ मिश्रा, महेश कुमार मिश्रा, श्रीकांत पारीक, महेश कुमार…
शकुंतला ( Shakuntala ) गुमनाम हुआ इस तन से मन, बस ढूंढ रहा तुमको प्रियतम। चक्षु राह निहारे आ जाओ, निर्मोही बन गए क्यों प्रियतम। क्या प्रीत छलावा था तेरा, या मुझमें ही कुछ दोष रहा। क्यों शकुंतला को त्याग दिया, यह यौवन काल हुआ प्रियतम। क्यों भूल गए हे नाथ…
हवाओं में तेरी खुशबू है ( Hawaon mein teri khushboo hai ) तुम मेरे ख्वाबों में ही आती हो ख्यालों में मेरे लम्हें लम्हें को सजाती हो तेरे प्यार के एहसास से महकता रहता हूँ छूकर फूलों को तेरे डिम्पल का एहसास होता है नाजुक कलियों का स्पर्श लबों का स्पर्श लगता है धड़कते…
शहरों की ओर ( Shahro ki or ) छोड़ दिया घर बार गांव चल पड़े शहर की ओर चकाचौंध के पीछे दौड़े भूल गए सुहानी भोर भागदौड़ भरी जिंदगी फुर्सत का कोई नाम नहीं शहरों का जीवन ऐसा अपनेपन का काम नहीं फैशन के दीवाने होकर लोग चले शहर की ओर…
आज की शाम दोस्तों के नाम ( Aaj ki shaam dosto ke naam ) अल्फाजों के मोती बरसे हर्ष खुशियां आनंद आए खुशियों की घड़ियों में शाम मित्रों के नाम हो जाए सुख-दुख बांटे बड़े प्रेम से गीतों की लेकर लड़ियां सद्भावों की बहा दे सरिता बरसे सुंदर सी झड़ियां सारे…
दहेज ( Dahej ) सोना कहत सोनार से कि,गहना बना द, और उ गहनवा से, गोरी के सजा द। गोरी कहे बाबू से कि, सेनुरा दिला द, सेनुरा के भाव बढल, माहुर मगा द। दुल्हा बिकात बाटे, चौक चौराहा पे, कैसे खरीदे कोई, भीख के कटोरा के। खेतवा बिकाई बाबू ,भाई…
सुनो लड़कियों ( Suno ladkiyon ) हम मध्यम वर्गीय परिवार की लड़कियां नहीं भर सकती ऊचाईयों तक उड़ान अपनी इनके कांधे का वजह भारी होता है क्यूंकि इन्हें लेकर चलना पड़ता है लड़की होने की मर्यादा रिश्तों और समाज के तानों बानों का बोझ मगर हारती नहीं निरंतर जारी रखती हैं प्रयास…
कविता की हूंकार ( Kavita ki hunkar ) कलमकार कलम के पुजारी लोग कवि कहते हैं सुधारस बहाते कविता का छाये दिलों में रहते हैं लेखनी ले कवि हाथों में ओज भरती हुंकार लिखे मां भारती का वंदन भारतमाता की जयकार लिखें वंदे मातरम वंदे मातरम गीत लिखते हम वीरों के शीश…