प्रदीप छाजेड़ जी की रचनायें

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ध्यान (Meditation) की शक्ति


भारतीय संस्कृति का दर्शन कहता है कि जीवन का सार अपने भीतर की सच्चाई को खोजना है । वह इसके लिए हमको दैनिक कार्यक्रम को भी उस ओर मोड़ना जरूरी है । आज हर कोई बाहर की दुनिया को आकर्षक बनाने में लगा है । वह तन से लेकर सदन सभी भौतिक वस्तुओं को सुंदर से सुंदर सजाने में आदि – आदि ।

वह आदमी यह भूल जाता है कि इन सबका कोई मायने नहीं है जब तक उसकी भीतर की दुनिया बिखरी पड़ी है । वह सच्ची शांति के राह में मन की अशांति रोड़ा बने खड़ी है । मनुष्य को स्वस्थ एवं बोधपूर्ण होने में संभवतः सही से ध्यान (Meditation ) की शक्ति ने अच्छी मदद की है।

वह पतंजलि, महावीर, बुद्ध व अन्य योगियों आदि ने ध्यान के प्रभाव को जाना और दूसरों को इसके सकारात्मक प्रभाव को भी बताया। हम आज कालांतर में देख रहे हैं । वह सारी दुनिया इसके आन्तरिक लाभ को समझ रही है। वह इस Mindful Meditation को अधिकाधिक अपनाना चाहती है ।

वह सारा खेल मन की मजबूती है । वह कितनी सघन है क्योंकि इच्छा शक्ति सहित सारी शक्तियों की जन्मस्थली हमारा मन है । वह संकल्पित धयान है जो मन को शक्तिशाली बनाने का साधन हैं । अतः हम नित्य नियमित कुछ समय ध्यान में मन लगाएँ जिससे हमारा जीवन सफल हो ।

वह यही हमारे सार्थक व सफल जीवन का संजीवन हैं । हम हम यह स्पष्ट समझ लें कि ध्यान केवल आँख मूँद कर बैठने का अभ्यास नहीं है अपितु यह मन और आत्मा के जुड़ने का सार्थक प्रयास है।

यह सोच व चिन्तन हमारे जीवन को नई ऊर्जा से भरता है और स्पष्ट करता है । अतः हम नित कुछ समय ध्यान करें और इसके लाभ का संज्ञान लें । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

रखें कृतज्ञता-भाव सदा


हम सृष्टि के कण-कण के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करें। वह स्नेहमयी मधुर मुस्कान के साथ हम एक सही से मौन संवाद स्थापित करें। वह हमारी जिन्दगी की सुखद बुनियाद हमारे अपने सात्विक कर्मों से जुङी है इसलिए हम हर पल को ही सही से सकारात्मक भावों से अपने आपको भावित करें।

हमारे पास आवश्यक-अनावश्यक अनेक तरह की चीजें हैं पर हम मानव स्वभावानुसार अमूमन हमारे सारे ध्यान को घूम फिर कर उन्हीं कुछेक चीजों पर केंद्रित होने से रोक नहीं पाते हैं जिन्हें हम चाह कर भी हासिल नहीं कर पाते हैं। हम अगर अपने मन को सही से उन चीजों की ओर लेकर जाएँ जो हमने हासिल की हैं और उनके होने के लिए कृतज्ञता भाव पैदा करें तो हमारा मन सदा प्रसन्न रहेगा।

वह हमको किसी चीज के न होने का अफसोस भी कभी छू न सकेगा। हमको उसके लिए तथाकथित कर्ता के प्रति कृतज्ञता के भाव से खुशियाँ मिलती हैं । वह न कि हमको मनोनुसार न मिलने पर आक्रोश से आदि – आदि ।

वह अगर कोई ऐसा है जो छोटे-मोटे सुखों के लिए भी मन से कृतज्ञता का भाव रखता है तो निश्चित ही वह सुख संतोष व शांति का आदि आनन्द चखता है। वह जो व्यक्ति सुख-सुविधाओं से लैस होने पर भी और-और की लालसा लिए रहता है उसके मन में निश्दिन असंतुष्टि का दरिया ही बहता है।

अतः हम सदा ही संतोष का स्वभाव, रखें । वह कृतज्ञता के भाव रखने से हमारे जीवन में कभी आनंद का अभाव नहीं होगा । अतः हम यह अपने जीवन में याद रखें कि कृतज्ञता भाव हमें तनाव से दूर रखता है और हमारे दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाता है। अतः हमारा जीवन भी सुख-शान्ति से बीतता है। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

पहचानें सकारात्मकता की शक्ति को

मैंने यह मेरे जीवन में अनुभव किया है और मानो यह हमारे जीवन का संजीवन है । हर व्यक्ति को कुदरत ने कुछ न कुछ सकारात्मकता अवश्य दी है। हम अक्सर सांसारिक उलझनों के बीच में सही से इसकी और ध्यान ही नहीं देते है। हम यह समझें कि सकारात्मकता हमारे सोचने का तरीका बदल सकती है।

वह हमारे जीवन में नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है। यह हमारे जीवन के हर क्षेत्र में हमको सही से आगे से आगे नए-नए समाधान भी दे सकती है। वह हमको जीवन में किसी भी तरह की कोई भी समस्या के लिए सोच का सही सकारात्मक दृष्टिकोण हमको एक अलग ही नजरिए से देखने की शक्ति देता है।

हमारा जीवन एक बहती धारा है वह इसका कोई भी किनारा नहीं है । हमारे जीवन में अविरल उतार चढ़ाव है। वह
जीवन में निरंतर भाव अभाव है । वह जीवन में सतत प्रतिभाव स्वभाव है जो अनवरत प्रवाहमान है । हमको इन सभी अनुस्रोत प्रतिस्रोत से सही से सकारात्मकता के मैदान में रहकर आत्म स्वभाव में जाना है।

वह इससे हमको औरों की कमियाँ भी नजर नहीं आएगी। वह हम और न ही अतिरिक्त स्वयं को समझेंगे । अतः हम अपनी सकारात्मकता की शक्ति को पहचानें वह इसका उपयोग सुन्दर, सहज, सरल अपने जीवन को बनाने में करें । वह हम अपने इस संजीवन को व्यर्थ न जाने दें। वह हमारा ‘ नो हीणे नो अइरीत्ते ‘ का भाव भावित हो
जायेगा ।

मन

मन हमारी आत्मा का
वह दर्पण है जिससे
हमको सही गलत का
जीवन में अहसास होता
हैं मन के दर्पण में हम
जो जैसे चिन्तन होता
हैं उसको सही से देख
समझ सकतें हैं क्योंकि
आत्मा के साथ हमारे
मन का रिश्ता बहुत ही
गहरा है वह हमारी
आत्मा पर अच्छे-बुरे
कृतकर्मों का सख्त
पहरा है यह हमको
जो यहाँ से दिख और
प्रतिबिंबित हो रहा
है जीवन दर्पण में हर
पल वो किसी भी
दूसरे का ही नहीं
हमारा ही अपना
चेहरा है वह हमको
कषाय विजय आश्रव
निरोध क्षमा संतोष
स्वाध्याय ध्यान और
कायोत्सर्ग ये सभी ले
जाएंगे हमें आत्मदर्शन
की ओर वह अनुभूति
होगी एक सात्त्विक
आनंद की सात्त्विक
नएपन की जीवन का
हमको सही से आगे
वास्तविक आनंद भी
आएगा और हमारा
उन्माद भाग जाएगा
नश्वरता का आभास
हो जाएगा फिर कोई
चाह नहीं रहेगी और
हरदिन नया होगा
हर क्षण नवीनता लिए
होगा और हमारा हर
क्षण आनंदमय होगा
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

करुणा

जीवन में प्रेम चाहिए तो हमको समर्पण खर्च करना होगा | वह अगर हमको विश्वास चाहिए तो निष्ठा खर्च करनी होगी | वह हमको साथ चाहिए तो समय खर्च करना होगा ।वह समर्पण व आस्था के साथ अगर हम मंदिर जायेंगे तो उस मूर्ति में भी हम भगवान के दर्शन करेंगे इसीलिए हमारे को समर्पण व आस्था में विश्वास होना जरुरी है |

वह जो उदित होता है,वह निश्चित ही समय आने पर अस्त होता है। इस सच्चाई को आत्मसात करने वाला कभी पस्त नहीं होता है। यह सृष्टि का शाश्वत नियम जड़ चेतन दोनों पर लागू होता है । वह जन्म-मरण के रहस्य को जानने वाला कभी त्रस्त नहीं होता है। श्रेष्ठ वही है जिसमें द्रढता हो, जिद नही ।

बहादुरी हो जल्दबाजी नहीं हो । दया हो कमजोरी नहीं हो । ज्ञान हो अहंकार नहीं हो । करुणा हो प्रतिशोध नहीं हो । निर्णायकता हो असमंजस नहीं हो । वह मानव की इस अच्छाई को कोई उसकी कमजोरी समझने लगते है तो यह उनकी समस्या है उसकी नहीं हैं क्योंकि ऐसे व्यक्ति अपवाद होते हैं और वह अपनी मंजिल को पा लेते हैं।

वह अपवादस्वरूप व्यक्ति हमें अपने जीवन के आचरण से यह सिखाते है कि सच्चाई, सरलता, सेवा, और आत्मविश्वास आदि जैसे गुण हमारे जीवन में कितने महत्वपूर्ण हैं। यह हमको अपने जीवन से यह प्रेरणा भी देते है कि हम भी इन गुणों को अपने जीवन में सही से अपनाने का प्रयास करें। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

SLOW AND STEADY WINS THE RACE


आज हर किसी को त्वरित प्रगति के लिए दुनिया की तेज रफ्तार में दौड़ लगानी पड़ती है। वह अन्यथा उसकी तरक्की धीमी पड़ जाती है जो बहुत अखरती है। वह दूसरी तरफ ऐसा करके हम स्वयं नाना प्रकार की चिन्ता व अवसाद को आमंत्रित करते हैं।

ऐसी दौड़ में हम एक मुख्य बात को भूल जाते हैं कि बड़ी सफलता हमेशा धैर्य व छोटे कदमों की शक्ति से ही मिलती है। जैसे पहाड़ पर सीधे एकदम नहीं चढ़ा जाता है धीरे धीरे चलकर ही पहाड़ की चोटी पर पहुँचा जाता हैं । वह इस जग में सभी तरह से सहनशील मानव ही रहते हैं ।वे ही सच्चे ज्ञानी कहलाते हैं ।

वह आंधी, तूफान, दुख, घोर निराशा आदि में भी न घबराने वाले होते हैं । वह सागर की लहरें सब कुछ सहती हैं फिर भी शांत बनी रहती हैं । वह धरती सारे जगत का भार उठाकर हर मौसम में सुख देती हैं । वह सूरज खुद जलता हैं और फिर भी जगत को रोशनी से भर देता हैं ।

वह चंदा शीतल अमृत बरसता हैं और जग में अंधियारे को हर लेता हैं । वह पेड़ खड़े हैं जो धूप और मौसम आदि को सहकर स्वादिष्ट फल दे जाते हैं । वह पत्थर खाकर भी फल देते और जग में हरियाली से प्यार लुटाते हैं । वह सहनशीलता वही गुण है जो एक इंसान को फरिश्ता बनाता हैं ।

वह जो भी व्यक्ति इसको जीवन में अपनाता हैं वह सच्चा पथिक कहलाता हैं । बीज को पौधा बनने में समय लगता है वैसे ही छोटे प्रयासों के निरंतरता से ही लक्ष्य हासिल होता है। सारांश यह है कि छलाँग लगाने की बजाय हर दिन अगर हम थोड़ी-थोड़ी ही प्रगति करें तो समय के साथ बड़ी उपलब्धियाँ सहज ही पा सकते हैं।

कहावतें भी तो हैं SLOW AND STEADY WINS THE RACE और धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।

पहला सुख निरोगी काया


सही कहा है कि पहला सुख निरोगी काया का होता हैं । बिना स्वस्थ शरीर के माया क्या काम की हैं , तभी यह सही चिन्तन प्रतीत होता हैं कि घर में माया पहला नहीं दूजा सुख है । योग शास्त्र में भी माना गया है कि श्रेष्ठ धन-मन का होना सही हैं परन्तु साथ में स्वस्थ तन का संतुलन होना भी बहुत जरुरी हैं क्योंकि बिना स्वस्थ तन और मन के धन होते हुए भी आदमी अर्थहीन है ।

किसी ने बहुत श्रम किया खून-पसीना बहाकर बैंक बैलेंस बढ़ाया लेकिनअपने स्वास्थ्य की ओर उसने कभी भी ध्यान ही नहीं दिया और सदा नाना बीमारियों से वह घिरा रहा। यह तो हमारी सच्चाई है। प्रतिरोधात्मक शक्ति जब तक कार्य करती है तब तक स्वास्थ्य के प्रति किंचित लापरवाही से बचा जा सकता है।

जब स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही का नतीजा सामने आता है तब health is wealth का स्वर स्वत : मुखर हो जाती है। सामान्य स्वास्थ्य की लापरवाही को देखकर यह लग सकता है कि क्या यह सही है health is wealth हमारा शरीर कचरे का डब्बा नहीं कि जो चाहा डाल दिया अच्छे आचार ,विचार के साथ अच्छा खानपान शरीर की जरूरत है ।

जैसे,गाड़ी पेट्रोल डीजल से चलती है अगर उसकी जगह हम उसमें कोल्ड ड्रिंक या चाय कॉफी डाल दे तो क्या गाड़ी सही चलेगी ? तो सही मायने में हमारे बॉडी के रिक्वायरमेंट जो है वही हम उसमें पहुंचाएं तभी हम स्वस्थ तन मन पाएंगे ।

जब हम स्वस्थ होंगे तो मन प्रसन्न रहेगा ही रहेगा अगर हम स्वस्थ ही नहीं रहेंगे तो फिर प्रसन्नता का कहीं सवाल ही नहीं होता क्योंकि पहला सुख निरोगी काया का होता हैं इसके बिना कहाँ कोई प्रसन्न रह पाया हैं ।

आसक्ति-अनासक्ति

सांसारिक पदार्थों एवं लोगों के प्रति आसक्ति ही हमारे दुखों की वजह बनती है।अतः सीधी सी बात हैं अगर हम मन:शांति चाहते हैं तो हमको आसक्ती से मुक्ति पानी होगी ।कहते हैं कि भगवान राम में अनासक्ति कीं भावना थीं जबकि राजा दशरथ की भावना आसक्ति में डूबें रहने की थी तभी तो राजा दशरथ ने इतनी कष्टदायक मृत्यु को प्राप्त किया ।

अब इस बात की गहराई को हमको समझ लेना हैं कि यदि छूटना ओर छेड़ना के अन्तर को स्वीकार करना हो तो छूटने की बजाय छोड़ने पर हमको हमारे मन को मनाना चाहिये । इससे जीवन में कभी भी वह दुःखी नहीं होता है चूँकि अनासक्ति कीं चेतना को सदैव सदा जागृत रखता हैं ।

आसक्ति ही तो राग द्वेष का कारण‌ है ।यही तो मोहनीय कर्म है जो कर्मों का राजा है और सबसे ज्यादा दुखदायो है।इसी आसक्ति के कारण भंवरा फूल मे बैठा रात होने से अपनी जान गंवा देता है ।अनासक्त वह संतोष का भाव ही जिंदगी में ऊंचाइयों को पाने का हकदार हो जाता है। मिटटी का गीले और सूखे गोलों का दीवार में न चिपकने व चिपकने की बात यहाँ आसक्ति और अनासक्ति का मात्र एक उदाहरण है |

पदार्थ बुरे नहीं हैं अपितु उनकी आसक्ति बुरी है। उनको इस प्रकार भोगे कि समय आने पर इन्हें छोड़ा भी जा सके। अनुरक्ती और आसक्ति से अनासक़्ती का भाव देखा श्री कृष्ण में जहाँ द्वारिका में राजसी सुखों में रहे तो वहीं जरुरत पड़ने पर अर्जुन का रथ भी हाँकने लगे।

कभी सुदामा के चरणों में बैठ गए तो कभी विदुर की झोंपड़ी में डेरा डाल दिया। इस दुनिया में जो भी अनासक्त भाव से कर्म में लिप्त रहते हैं उन्हें आनंद प्राप्ति से कोई नहीं रोक सकता हैं । अतः अनासक्त भाव विकसित होने पर हम अपनों की तो क्या जरूरत पड़ने पर अनजान की भी सेवा करेंगे ।

इस तरह वास्तविक अनासक्ति वह हैं जो अपने किए सुकर्मों के प्रति भी कोई चाह नहीं रखता हैं । वह ही असली कर्मयोगी बन सकता है ।

कहाँ से आता है अनुभव

आदमी खाली हाथ आता है पर अपने जीवन काल में वह अपने मस्तिष्क में बहुत कुछ अच्छी-अच्छी सामग्री भी बटोरता है,स्टोर आदि करता है ।उनमें से बहुत सें काफी अच्छी अच्छी सामग्री, अपने अच्छे अनुभव, अपना अच्छा ज्ञान जीवनकाल में बाँट-बाँट कर दूसरों को लाभान्वित करते हैं , खुद भी संतोष प्राप्त करते हैं।

मजे की बात है ऐसा करके वे खाली नहीं हो जाते हैं बल्कि वह अपना भंडार और समृद्ध करते हैं और जब जाते हैं तो इस वितरण का आत्मतोष और सुनाम युगों-युगों तक सौरभ फैलाते हैं।अब प्रश्न होता है कि जीवन में अनुभव कहाँ से आता है ? इसके भिन्न – भिन्न उतर हो सकते है कोई कहता है उम्र से , कोई कहता है खुद के द्वारा कार्य करने से , कोई कहता है गलती करने से आदि – आदि ।

परन्तु यह भी बड़ा सच है कि बहुत सा अनुभव गलत फैसलों से आता ही है । अगर हम गलत से नहीं टकराए तो सही कैसे पहचानेंगे। इसीलिए तो कहा जाता है कि भूल सिखाती है सुधार का उसूल। मानव जीवन में भूल होना स्वाभाविक है पर उसे स्वीकार करने का साहस पौरुष है।

माना की उसी वक्त अपनी भूल स्वीकारना कठिन होता है क्योंकि अपनी इसे मानने में बहुत साहस की जरूरत होती है। मगर इससे हम अपराध बोध की भावना से बच जाते है।

लोगों को एक भूल छुपाने के लिए बहुत सारे झूठ बोलने पड़ते हैं लेकिन यदि हम स्वीकार कर ले तो क्या जरूरत हैं , अपने द्वारा हुई भूलों को स्वीकार करने की काबिलियत और इनसे कुछ सीखने की ललक आदि हमको महान इंसान बना देगी और हम अतीत को भुलाकर वर्तमान समय पर फोकस कर आगे बढ पाएँगे।क्योंकि अनुभव की भट्ठी में तप कर जो जलते हैं दुनिया के बाज़ार में वही सिक्के चलते हैं।

संयोग का वियोग निश्चित

सृष्टि का यह शाश्वत नियम है कि जिसका संयोग होता है उसका एक समय के बाद वियोग जरूर होगा ही होगा ।ये नियम जङ और चेतन दोनों पर लागू होते है । जन्म-मरण के रहस्य को जानने वाला यह जानता है कि हम ख़ाली हाथ आयें हैं और यहाँ से जायेंगे तो कुछ भी साथ में नहीं ले जायेंगे फिर भी हमको पल भर भी सुकून का कोई काम नहीं हैं और – और की व्यर्थ लालसा से तृप्त होने का नाम हमारे नहीं हैं ।

अमीर-गरीब हर एक व्यक्ति संत्रस्त है । असंतोष और अतृप्ति के कारण पूरा अस्त-व्यस्त है ।समय-असमय हर वक्त काम कर रहा है । हम फिर भी यहाँ समयाभाव की त्रासदी का रोना रो रहे है । हमारा परिवार- स्वास्थ्य पर किसी का ध्यान नहीं है । जीवन के यथार्थ का ज्ञान होते हुए भी उसका हम भान नहीं रखते है ।

जब हमें सही से गलती का आभास होता है तब तक पछतावे के अतिरिक्त और कोई अहसास नहीं होता हैं । अतिथि जिसके आने की कोई तिथि नहीं होती हैं उसी तरह बुलावा आएगा तो हमको जाना पड़ेगा ,शोहरत आदि सभी यही धरी की धरी रह जाएगी ।

हमारे साथ कुछ भी नहीं जाएगा । हम सब ऐसा होते दिन रात देखते हैं पर अब आपाधापी की प्रवृति से अपने को सदैव दूर रखना का प्रयास अवश्य करे यही हमारे लिए काम्य है ।

कितना बड़ा मजाक है


हमने कभी क्या फुर्सत से सोचा है ? जिंदगी के साथ हम सभी प्रायः जो कर रहे हैं वह कितना बड़ा मजाक है क्योंकि हम खाली हाथ आते हैं पर दिन रात यह भी वह भी पाने के लिए खटते हैं । पर क्या हमने कभी गौर किया है कि अंत में खाली हाथ वह सभी यहीं छोड़कर जाते हैं ।

हमने बचपन में धर्म क्या है उसको जाना ही नहीं , जवानी में धर्म की जरूरत को माना ही नहीं , बुढापा आया तो शरीर ने साथ दिया ही नहीं और अब पछतावे के सिवाय कुछ बचा ही नहीं । क्या यह सही है ? सोचें जरा ! क्या हमारे हाथ हिंसा करते हुए कभी कांपे नहीं । क्या झूठ बोलते हुए हम कभी घबराए नहीं ।

क्या दूसरों की वस्तु अपनी बताते हुए कतराए नहीं। क्या पर पुरुष के प्रति गलत दृष्टि से देख पाए कभी । क्या परिग्रह का संचय कर मन ही मन स्वयं को कोसा नहीं आदि – आदि उपरोक्त बातें सबके जीवन में घटित होती हैं । माना कि हर एक दिल में कोई ना कोई अरमान जरुर होते हैं और अपने अरमानो को पूरा करने के लिए हर इंसान कोशिश करता हैं ।

कुछ अपने अरमानो को पूरा करने में सफल होते हैं और कुछ असफल होते है । अतः जो है, जो मिला है उसी में संतोष करें,खुश रहें, पश्चाताप न करें क्योंकि दुनिया को जितने वाला सिकंदर के भी अरमान पुरे नहीं हुए वो जो जब दुनिया से विदा हों के गया तो दोनों हाथ बाहर रखकर संदेश देकर गया ।

परन्तु वर्तमान में हम अपनी जिंदगी और – और पाने की धुन में व जिसे कण-कण इकट्ठा भी किया में बिता रहे हैं पर अफसोस एक भी तृण कोई भी साथ में लेजा नहीं पा रहे हैं ।यह हम सब जानते है जो जिंदगी के साथ कियें जा रहा है फिर भी अनजान बनकर किये जा रहे है यह सबसे बड़ा मजाक नहीं तो और क्या है?

बदलाव है स्वभाव


समय के साथ परिवर्तन सब तरफ में आता ही हैं । जीवन में बदलाव आयेंगा ही इस सच को हम स्वभाव में लायें । जीवन में सदैव परिवर्तन आता ही है । हम ईष्या और कलह को छोड़े , समता से हम नाता जोड़े जो मन में आनंद बिखेर सके जिससे जीवन के मधुरिम गीत हमको सुहाने लगते हैं ।

जीवन पथ में परिवर्तन आता ही हैं इसलिए हमारे भाव की धारा निर्मल होकर बहे ।हर क्षण हमारा आत्मा का किनारा नजदीक हो । आत्म ज्ञान के महा मार्ग में हर दिन हम नूतन दीप जलायें । जीवन पथ में बदलाव स्वभाव हैं । हमारे जीवन में परिवर्तन अवस्थाओं का, परिवर्तन व्यवस्थाओं का , परिवर्तन स्थितियों का, परिवर्तन परिस्थितियों का आदि होता ही है ।

बचपन के बाद जवानी और जवानी के बाद बुढ़ापा हर उम्र हमारी बरकरार रहे । अपना शौर्य व अपना आपा में हमारा विकास का मार्ग सदैव गतिमान रहे और चिंतन की धारा सदैव हर स्थिति में मतिमान रहे ।उम्र के साथ – साथ हमारी जीवन की शैली हम जरुर बदले , मन बदले, चिंतन बदले आदि जिससे जीवन के साथ जुड़ी हर पहेली हल हो जाय ।

इतने बड़े अतीत में भी जब हमारी ख्वाइशें अधूरी है तो बचे हुए थोड़े से अवशेष समय में वे कैसे पूरी हो सकेगी । इस संसार में जीवन की यात्रा में बदलाव का स्वभाव रहता ही है । कोई भी चीज, कोई भी स्थिति आदि कुछ समय बाद वही नहीं रहती हैं ।

मसलन एक नदी के पानी को भी एक ही जगह पर दो बार नहीं छुआ जा सकता हैं और तो और कुछ वर्षों के अन्तराल से अपनी दो फोटो भी हम मिलाएँ तो उसको बार-बार देखते रहेंगे और कह उठेंगे क्या यह हमारा चेहरा था ।

इस जगत में कुछ भी स्थिर नहीं रहता हैं निरंतर बदलाव के नियम से ही चलता है पर प्रायः हमको बदलाव दृष्टिगत नहीं होता हैं । अतः जरूरी है इस जीवन को हम एक ऐसा नया मोड़ दें और बंधन की श्रृंखला को एक झटके में ही तोड़ दें व आत्मा की मंजिल मोक्ष को प्राप्त करे ।

समता

धर्म हैं समता हमारा
कर्म समतमाय हमारा
मात पिता पूज्य जनों
और गुरुजनों आदि का
जो रखता हरदम मान
समता , करुणा, मैत्री
सेवा भाव आदि भरे हैं तन
मन में रहता वह सबसे
आगे और लेता है पहला
स्थान क्योंकि वह समता
में रहकर जीना जानता है
और वह कभी आगे वाले
जीवन में नहीं घबराएगा
प्रतिकूल परिस्थित से
सबका ले रहा आशीर्वाद
बना हुआ है सुरक्षा कवच
हमेशा रहेगा अनुकूल ही
स्थिति में है सही से बच्चों
व बड़ो में संस्कार के प्रति
सही से वपन की और प्रेम
करुणा ,मैत्री और समता
के भाव सींचन की अतः
समता के द्वारा ही आचार्य
भिक्षु आदि की तरह कोई
भी विवेकशील व्यक्ति
ही बन सकता है सबका
अजीज वह सोच समझ
कर बोलता हर चीज
बुद्धि और विवेक का
जहां होता मणि कांचन
योग मानवीय मूल्यों का
वहां होता हैं सुयोग वह
व्यक्ति में क्षमा सत्य
आर्जव मार्दव लाघव
समता सह अस्तित्त्व
समन्वय आदि गुण
होते सही से विकसित
वह उसके आस पास
का वातावरण रहता
हरदम प्रफुलित और
आलस्य प्रमाद क्रोध
मान माया लोभादि
रहते उससे दूर वह
व्यक्ति होता सच
में बुद्धि से भरपूर
लोगों में होता गण
मान्य अपनी आत्मा
का करता कल्याण
और वही पा सकता
एक दिन पद निर्वाण
यह है समता आदि
का जीवन में पड़ने
वाला प्रभाव ।

सामायिक : ध्रुव-1


हमारे में से किसी के मन में यह जिज्ञासा आ सकती है कि सामायिक क्या हैं? तो इसका बिना बोले प्रत्यक्ष प्रमाण में उतर पाँच महाव्रत धारी साधु है जिन्होंने जीवन भर की सामायिक ली है । इनको हम प्रत्यक्ष देख सामायिक क्या होती है उसको समझ सकतें है ।

सामायिक अड़तालीस मिनट के एक मुहूर्त के लिए साधुचर्या में होना व आत्मा में रमण करना है । वह अन्य शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि सामायिक एक मुहूर्त के लिए चिन्तन को सही से व्यवस्थित कर स्व-धर्म में अवस्थित होकर आध्यात्मिक उन्नयन की ओर अग्रसर होना हैं ।

सामायिक वीतरागता की साधना है । वह आध्यात्म की राह पर गतिमान होने का पहला सोपान सामायिक हैं । मानव जिंदगी भर दौड़-दौड़ कर धन को जोड़ता है । वह कमाने के चक्कर मे धर्म से मुख मोड़ता है । मानव जिंदगी भर पापों का collection करता है वह बाद में उसका reaction होता है ।

वह घर- घर में बढ़ती बीमारियाँ और सुख-शांति की कमी धर्म का अभाव और पाप आदि का प्रभाव है । वह जो छह काय के जीवों को सुख देता है, उसे सुख मिलता है ।

धन क्षणिक सुख दे पाये या न दे पाये, पर जीवों को अभयदान देने वाली सामायिक अनंत सुख देती है । वह 48 मिनिट की सामायिक से अठारह पापों का त्याग, आठ कर्मों का क्षय और समभाव की हमको प्राप्ति होती है । वह पूरे संसार का धन देवलोक के एक देव की जूती भी नहीं
क्रमशः आगे ।

सामायिक : ध्रुव-2

खरीद सकता हैं और ऐसे असंख्य देवता मिलकर भी एक सामायिक को नहीं खरीद सकते हैं । वह सामायिक में हमारे द्वारा स्वाध्याय, ज्ञान-ध्यान , माला फेरने या प्रवचन सुनने आदि – आदि से हमारा ज्ञान-दर्शन आदि बढ़ता है और ज्ञानावरणीय एवं दर्शनावरणीय कर्म का क्षय होता है ।

वह 48 मिनिट तक हमारे द्वारा सभी जीवों को अभयदान देने से सातावेदनीय कर्म का बंध और असातावेदनीय कर्मों का क्षय होता है । हमारे द्वारा समभावों में रमण करने से मोहनीय कर्म की निर्जरा होती है । वह सामायिक में मन में दया भाव रहता है ।

वह उस समय आयुष्य कर्म का बंध किसी जीव के हुआ तो वह जीव देवलोक में जाता है । वह सामायिक में मन की सरलता होती है इसलिए शुभ नाम कर्म का बंध होता है । वह सामायिक में उच्च गोत्र का बंध ही होता है । वह सामायिक में हम किसी को भी अंतराय नहीं देते हैं इसलिए अंतराय कर्म का क्षय होता है । वह आठों ही कर्मों का क्षय एक सामायिक से होता है ।

अतः इसलिए तो हजार रानियां और 32 हजार देशों के मालिक चक्रवर्ती सम्राट आदि भी सब कुछ छोड़कर 32 दोष रहित शुद्ध सामायिक को स्वीकार करते हैं तो उनका जीवन भी सार्थक हो जाता है ।

वह तीर्थंकर भगवान भी जब साधना क्षेत्र (दीक्षा) में प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले सामायिक ही ग्रहण करते हैं । वह जो जीव मोक्ष में गए हैं या जायेंगे वो सब सामायिक के प्रभाव से ही जायेंगे ।
क्रमशः आगे ।

सामायिक : ध्रुव-3

वह 400 किलो सोने की एक खंडी – ऐसी एक लाख खंडी का एक लाख वर्ष तक भी कोई व्यक्ति दान देवे फिर भी एक सामायिक की बराबरी नहीं कर सकता हैं । अतः हम इसलिए दिल में ठान लें कि चाहे कुछ भी मजबूरी हो एक सामायिक तो हमको प्रतिदिन जरूर ही करनी हैं ।

वह सामायिक हमारा बंधन नहीं हैं । वह हमारी बंधनों से मुक्ति है, भाग्यवान से भगवान बनने की युक्ति है ।हमारी अंतर्मुखी बनने की प्रेरणा सामायिक हैं । वह हमारी आत्मा को विभाव से स्व-भाव में शुद्ध सामायिक ले जाती है । वह हमारी सही शुद्ध अठारह पापों से दूर होने की साधना सामायिक है ।

सामायिक संवर है। वह सामायिक से हमारे कर्म आगमन के द्वार पर कम से कम एक मुहर्त के लिए ताला लगता है। वह इससे हमारी समता की आय होती है।वह हमारी मोक्षमार्ग की टिकट रिजर्व होती है। वह भौतिक सारे वैभव सामायिक की साधना के आगे अकिंचन है,नगण्य है।

हमारे साथ मृत्यु के बाद भी चलने वाला धर्म है । वह बाकी सब कुछ बदन पर पहने कपड़े आदि तक यही छूट जाता है,सिर्फ हमारी समता की कमाई हुई धर्मपूँजी भवों – भवों तक हमारा साथ देती है । वह हमारा भव सीमित कर हमें मुक्तिश्री के नजदीक सामायिक ले जाती है ।

वह शुद्ध भावों से की गई एक मुहर्त की सामायिक भी हमें भव बंधन से बचाकर कर्मनिर्जरा का महान् सोपान बनती है। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

दोस्ती

बदलता गिरगिट रंग,
ख़ुद को बचाने के लिए !
फूल का भी बदलता हैं रंग
खिजां के आने से !
पर क्यों बदल जाता रिश्ता
स्वार्थ पूरा हों जाने पर ?
रिश्ते, नाते , दोस्ती !
प्यार ,मोहोब्बत
भी बदल जाती
मान अपमान और अहम
की बात आने पर !
दिल का नाजुक रिश्ता क्यों
टूट जाता हैं छोटी छोटी बातों पर ?
क्योंकि सच्चा प्यार हीं नहीं था !
या मुक्कदर में हीं न था ।
डोर दोस्ती की !
न तोड़ो यूँ चटकाय !
थोड़ा ग़म खा लेना ,
थोड़ा सह लेना !
थोड़ा सहयोग कर ,
सही राह पर आगे बढा़ देना !
गिले – शिकवे माफ़ कर देना !
फिर देखो सभी दोस्ती का ये धागा !
बन जाएगा ज़िंदगी का सग़ा ।

कुछ खट्टी मीठी बातें


आम बोलचाल में यह हो गया हैं की आदमी अपनी जरुरत ( पैसा ) के हिसाब से अपने हाव – भाव आदि परिवर्तन करता रहता हैं । पैसा है तो ही सब कुछ हैं की संकीर्ण सोच हावी होती जा रही हैं जिसका परिणाम अच्छा नहीं आता हैं ।

इस सन्दर्भ में मेरा यह मानना हैं की अगर हमारे सभी कार्यों में पारदर्शिता हैं तो हम मान – सम्मान आदि में किसी से कम नहीं हैं ।जन्म लिया था वो प्रथम दिन ओर जिस दिन होगी आखिरी स्वाँस वो होगा अंतिम दिन ।समय तो आज़ाद है वह किसी के बांधे , नहीं बँधा नहीं है कभी ।

जीवन के एक काल्पनिक अंश को समय बना बीते दिनो का आंकलन करते है हम । कुछ -खट्टी मिट्ठी यादें ,कुछ सुनहरे पल , कुछ भूले ,शिकवे, शिकायतें ओर गिले । आज फिर एक नई शुरुआत नयी ऊर्जा उमंग के साथ ,करते है हम सतत प्रयास सुख़द सुनहरे भविष्य की ओर ।

भूत के अनुभव से हमारी बिगड़ी सुधारे ,पैसा है तो ही सब कुछ हैं को त्यागे ,बीते कटु व्यवहार, यादगार ,को भुला ,प्रेम, सदव्यवहार से सँवारे आने वाले दिन । ज़िन्दगी छोटी है उसे बेज़ार,बदहाल , ओर ज़हरीली न बनाये हम ।

अब हम चलों फिर से प्रेम ,सकारात्मक ओर मेत्री के गीत सब के साथ गुनगुनायें हम ।सब से दोस्ती का हाथ मिलाते चले हम , एक दूसरे का सदैव सहारा बन यह क़ाफ़िला आगे बढ़ाते चलाते हम ।

हर दिन नया के साथ – साथ हर सूरज की किरणो के साथ हर पल सुनेहरा ओर हँसी ख़ुशी का दिन बनाते चले हम ।सुख़द, शुभ भविष्य , उच्च , सार्थक जीवन की ओर क़दम बढ़ाये ! हम सब मिल एक परिवार बन ।

चिन्तन,मन और तन

हमारे चिन्तन, मन
और तन में परस्पर
है आपस का बहुत
ही घनिष्ठ गठबंधन
वह हमारे सोच
और चिन्तन से भी
होता है प्रभावित मन
वह हमारे मन से भी
होता है हमारा सभी
तरीके से प्रभावित
तन तथा तन और
मनदोनों से होता
है हमारा प्रभावित
सारा का सारा यह
जीवन इसलिए
रखें हम सदैव
सही से सभी के
प्रति अच्छी सोच
और अच्छा करे
अच्छा अच्छा बोले
अच्छा अच्छा रहें
तो स्वस्थ रहेंगे
मन और तन
हमारे हर रोज
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

पुस्तकें

हमारे जीवन को सही
से दिशा देने वाली ज्ञान
का भण्डार होती हैं कोई
तो वह पुस्तकें वह हमारे
जीवन का सजीव सही
से आधार भी होती हैं
लेखक कवि साहित्यकार
के अंतरंग सहयोगी है यह
और बिना पुस्तक के तो
मानों मकान और घर वह
खिड़की विहीन है और जहाँ
पुस्तकों को उचित स्थान न
हो वहाँ पर पुस्तकों के बिना
कोई भी कमरा आत्मा विहीन
है हम अपने जीवन में बाहर
के लोगों को के साथ तो
करते हैं बड़ी आत्मियता से
मुलाकात बड़ी मधुरता से
करते हैं बात पर अपने ही
परिवार के साथ करते हैं
रुखा और कठोर व्यवहार
यह कितना ग़लत है हम
ढेरों धार्मिक पुस्तकें पढ़ते
हैं वह बराबर संत समागम
भी करते हैं सामाजिक सेवा
कार्यों में भी भाग लेते हैं पर
यदि घर में गुस्सा झगड़ा आदि
करते हैं यह कितना ग़लत है
वह यदि हमारे धार्मिक पुस्तकें
पढ़ने के बाद भी जीवन में कोई
सही से परिवर्तन घटित नहीं
हुआ हैं तो पुस्तकों के वाचन
का सही से अर्थ है अधूरा
वह मन की चंचलता व
भटकन कम होने से ही
कलह के उपशान्त होने से
तथा कषायों पर नियंत्रण
से ही लक्ष्य पूरा होता है
ऐसे में हमें जीवन में
सही परिस्कार करना है
और परिस्कार करने में
किसी से नहीं डरना है
यह सहयोगी होती है
पुस्तकें जो जीवन का
संजीवन हैं ।

प्रतिकार

हमारे द्वारा सही से क्रिया
की प्रतिक्रिया का होना
एक सामान्य सी वृत्ति है
मौन वे ही रह सकते है
जिनके दिल मे गहनतम
धृत्ति है हम प्रतिकार भी
अवश्य करें पर संयम
शालीनता के साथ पर
जो मूक रहकर बता दे
मन की बात वही तो
अनमोल कृति है हमारे
द्वारा बुरा चिंतन करना
है बुराई का सही सम्मान
अतः बुराई को मत देखो
बुराई को लो सिर्फ जान
बुराई का प्रतिकार करो
मत करो उस पर ध्यान
ईर्ष्या करने से सामने
वाले का कुछ न होगा
नाश वह हमारा ही हो
जाएगा सम्पूर्ण बिगाड़
क्रोध करने से सामने
वाले का न होगा कभी
अहित लिगार हमारा तो
हो जाएगा अहित अणपार
पर परिवाद से पर का न
होगा कुछ ह्रास हमारी ही
आत्मा हो जाएगी क्लांत
चुगली और मोहनीय कर्म
का है संघात सामने वाले
की तो न होगी बिल्कुल
घात निंदा करती हमारी
नींद को हराम वह सामने
वाला तो सोता साथ में
आराम सदा सदा सहते
रहो मार कष्ट तकरार
बिना सहे मिलता कहां
पेड़ों को उपहार वह
सहनशील करता नहीं
जीवन में प्रतिकार क्षमा
शीलता ही और जीवन
का श्रृंगार खुशी खुशी
करनी तुझे हर विपदा
को स्वीकार और सहन
करो सुख से रहो यही
शास्त्र का सार अतः
बुरी बातें छोड़ हम सही
से अच्छाइयों का करे
विकास वह जीवन में
फलित होगा शांत सुखी
सहवास तभी तो बनेंगे
हम महान यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

संकेत

बिना बोले ही किसी से
शरीर की क्रिया द्वारा
या अन्य माध्यम से
मिले इंगित को हम
संकेत कह सकतें है
संकेत से कितनी बार
हम अपने जीवन की
सुखद राह को प्राप्त
कर सकतें हैं यही
जीवन का चक्र है
हमें मानव होने का
फक्र हैं बीज तना
डाली फूल फिर फल
धीरे धीरे ही मिलता है
है समस्या का हल वह
हमारे जीवन की बगिया
ऐसे ही महकेगी यह
जीवन का चक्र है
कांटों में घिरा गुलाब
भी है वह कोई अच्छा
बन गया तो कोई खराब
भी है अतः मनुष्य के द्वारा
सीखने की कोई उम्र नहीं
होती है वह जब जागे
सबेरा तब है अतः जब
हमारे में आस्था आती
है तो अहंकार भाग जाता
है और अपने आत्मत्व
का सारा शौर्य अपने आप
जाग जाता है आस्था में होता
है स्वयं का अर्पण और यही
है अपनी आत्मा के प्रति
अपना पूर्ण व समग्र समर्पण |

जीवन

जीवन मानव का शुरू होता
जन्म से ख़त्म होता मृत्यु से
बगिया जीवन में कैसे हम
उसको विकसित करें यह
निर्भर हमारे स्वयं के विवेक
पर किताब रूपी जीवन में
सुगन्ध व दुर्गन्ध का करना
है हमारे अपने कर्म पर निर्भर
वह होता जिसका पहला पुष्ट
तो क्या सम्पूर्ण किताब को
पढ़ने को मन लालायित हों
तो समझें उस व्यक्ति ने
अपने जीवन में सही से
अपने किरदार को निभाया
वह अपना यह जीवन सफल
किया व जिसका पहला
पृष्ठ तो क्या कुछ पढ़ने को
हमारा मन नहीं करता हैं तो
उस व्यक्ति के अन्तिम पृष्ठ
को कौन पढ़ेगा तो समझें कि
उसने अपने यहाँ का जीवन
सही से नहीं जिया वह ना ही
उसको यहाँ सफल किया अतः
जीवन रूपी बगिया में सही से
सिंचन कर उसको पल्लवित
सुरभित कर सुगन्ध से भर
हम यहाँ से अलविदा हों
यही हमारे लिए काम्य हैं ।

उठ जाग मुसाफिर भोर भई

रात को नींद ले हम
जब उठतें है तो प्रातः
काल को अपने को
तरोताजा सही से
महसूस करतें हैं
क्योंकि हमारे
द्वारा रात्रि के सही
निश्चिंत विश्राम में
नहीं होती कभी भी
खर्च कोई ऊर्जा
वह विभिन्न -2
दैनिक क्रियाओं से
मुक्त हों नव स्फूर्ति
लेकर है जागता
हमारे तन का सभी
तरह का पुर्जा-पुर्जा
वह हमारा दिमाग
भी रहता है शांत व
रचनात्मक इसीलिए
कहा जाता है कि
सुबह की हो हमारी
सुनहरी बेला हम
उसमें बैठकर सही
से शांतचित्त अकेला
में आत्म चिंतन की
साधना भगवत स्तुति
की आराधना आदि
आदि जो हितकर हो
वह करें वह रहें हम
भी प्रसन्न यह
कहना भी है सही
कि उठ जाग मुसाफिर
भोर भई अब रैन कहाँ
जो सोवत है जो सोवत
है सो खोवत है जो
जागत है सो पावत है।

तन्हाई

गुरुदेव तुलसी कहा
करते थे हम न कभी
रुकना जानते है वह
हम न झुकना जानते
है हो प्रबल संकल्प
इतना सफल हो
सब तरह से सभी
हमारी कल्पनाएं
देखने देखने का
अपना – अपना
दृष्टिकोण वह
चिन्तन होता है
किसी को बुराई
में सही दिखता है
तो किसी को कैसी
ही बुराई अच्छी
नहीं लगती है इसी
दृष्टि से तन्हाई
का अर्थ है कि
अकेलापन या
एकाकीपन इसका
मतलब है बिना
किसी साथी के
अकेले रहना या
किसी ऐसे स्थान
पर होना जहाँ कोई
और न हो दूसरे
शब्दों में यह एक
ऐसी स्थिति है
जहाँ कोई व्यक्ति
अकेला महसूस
करता है लेखक
को एकांत पसन्द
है तो हर किसी को
तन्हाई नहीं अच्छी
लगती हैं सब अपने
अपने अस्तित्व को
अपने दायित्व को
पूर्ण संजीदगी से
निभा रहे हैं अतः
हम अच्छी-अच्छी
सभी आदतों का
करें विकास और
कोई कठिनाई के
सामने हमारे रुके
ना कभी भी प्रयास
वह पनपे हमारे
अच्छी सोच नित
आती रहे बहार
जिससे मिले स्वयं
को ख़ुशी सार्थक
हो विचार अहंकार
के भाव ना आए
कभी ना कभी
ज्ञान को कही विराम
सीखना है ताउम्र ।

प्रभु राम का जीवन : आदर्शों का संजीवन

प्रभु राम का जीवन आदर्शों का संजीवन है । वो जीवन ही क्या जिसमें उतार-चढ़ाव ना आये।वह जब प्रतिकूल समय का हम सामना करेंग़े और उस दर्द को सहने की हिम्मत जुटायेंगे वह तब ही अनुकूल समय की ख़ुशियाँ महसूस कर पायेंगे। इस जीवन में हर वस्तु परिवर्तन शील है।

पानी वो ही होता है पर फ्रिज़र में रख देंगे तो बर्फ़ बन जाती है और फ़्रीज़ के बाहर रख देंगे तो वापिस पानी। भगवान ने मनुष्य को वो समझ दी है कि जब समय विपरीत हो तो थोड़ा संयम धारण करे।वह मन में हम यही चिंतन करे कि जब एक दिन उदय होने से लेकर वापिस दूसरे दिन उदय तक कितने पहर देखता है ठीक वैसे ही जीवन में बदलाव आये तो हमारे यही चिंतन रहे कि यह भी स्थायी नहीं रहेगा।

हर अमावस्य की घोर अंधेरी रात आयी है तो कुछ दिनो बाद पूनम की चाँदनी भी दिखायी देगी। प्रभु राम का जीवन उच्च आदर्शों की मात्र कथा नहीं है । वह न ही आदर्शो के अति की व्यथा है। वह धर्म, कर्तव्य और मर्यादा पालन आदि के उच्चतम स्तर की जीवंत कहानी है ।

उन्होंने राजधर्म का पालन करते हुए भी कभी मनमानी नहीं की जिसकी कोई सानी नहीं है। उन्हें राजा दशरथ द्वारा जब कैकेयी को दिए वरदानों के चलते राजमुकुट की बजाय हुक्म जाने को वनवास का हुआ तो वे न ही तो क्रोधित हुए, न ही हुए दु:खी और निराश। वे वनवास के लिए त्वरित इस तरह तैयार हो गए मानो उन्हें आश इसी की थी।वह उनका मन न तो कैकेयी के प्रति भी प्रतिशोध की अग्नि में जला, न ही अन्याय और अपमान का भाव उनके मन में पला। वह उसी क्षण अपने पिता का वचन निभाने के लिए महल और सभी सुख साधन छोड़ दिया , त्याग दिए ।

उस समय उनके लिए सबसे बड़ा धर्म पिता के वचनों का आदर करना था । उन्हें चाहे उसके लिए किसी के भी दोष में बिना पड़े 14 वर्ष के लिए वन में महा कष्टकर जीवन बिताना पड़ा | हमारा जीवन आदर्शों का आभूषण मात्र बनने से आदर्श नहीं होता, आदर्श आचरण के रूप में घटित हों, तो आदर्श जीवन निश्चित है।

वह दुनिया के सारे सुख-वैभव-ऐश्वर्य आदि फीके यदि हमारे मन में शांति नही है । हमे हमारे मन को साधना बहुत ज़रूरी है जिससे हमारी सभी असीमित इच्छाओं पर अंकुश लगे ।प्रभु राम के जीवन व्यवहार से यही सीखा जा सकता है कि वही व्यक्ति महान बनता है जो संकटों के बावजूद मर्यादा, संयम और धर्म आदि का पालन करता है वह अधर्म का पथ नहीं पकड़ता है ।यही हमारे लिए काम्य हैं ।

सद्ज्ञान

स्वाध्याय हमारे को अपने जीवन में सफलता आदि लक्ष्य प्राप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण कारक है । वह जिस पुस्तक से अपने बारे में हमको सद्ज्ञान आदि की प्राप्ति में सही से जानकारी मि्लें वह अपनी आदतों और वृत्तियों को समझने, परखने तथा बदलने का मार्गदर्शन मिले , तत्त्व का बोध मिले, जीवन का मर्म समझ आयें एवं आगे मोक्ष का पथ की सही से जानकारी मिल सकें आदि – आदि ।

उस पुस्तक को पढ़ना वह उसमें प्रतिपादित विषय पर मनन करना चिंतन करना और उस पर सही से अमल करना ही तो हमारे जीवन का संजीवन है। वह मार्गदर्शन में पहला स्थान हमारे गुरु का है तो दूसरा स्थान ग्रंथ का है ।

वह कभी-कभी एक सूक्त भी हमारे जीवन की दिशा को बदल देता है इसके लिए स्वाध्याय एक शक्तिशाली आलम्बन है जो हमको सद्ज्ञान देता हैं । हम पहले समझें हमारे लिए क्या हेय है वह जिसे जानना बड़ा ही जरूरी है । वह जो उपादेय करणीय होता है पर इन दोनों के बीच बहुत दूरी है।

हमको यदि अपने जीवन में आनंद से जीना है तो हमारा यह मन लोभ से सदा दूर रहे । वह जहाँ हेय व उपादेय का विवेक होता है वहाँ पर जीवन के सारे काम नेक होते हैं। वह सद्ज्ञान प्राप्त कर हम अच्छा करेंगे तो हमको अच्छा मिलेगा व जीवन का हर अच्छा सपना भी हमारा फलेगा। अतः हम करणीय को अवश्य करें वह अकरणीय को छोड़ें । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

पथ चुनें पर कौन-सा


अपने जीवन में कितनी बार हम संकट की स्थिति में आ जातें है कि हम कौनसा पथ चुनें । वह इसमें एक दृष्टिकोण यह भी आता हैं कि जब हमारी मंजिल तय नहीं होती हैं और तब हमको दो राह नजर आती है । यह जीवन हमारा है हम इसको कैसे किस तरीके से जीते है यह हमारे अपने विवेक समझ पर है ।

हम कर्म करने के लिए तो स्वतन्त्र है लेकिन उसको भोगने में नहीं है । अतः हमारी आराधना अध्यात्म में ऐसी हो कि हम वीतरागी बने। हम ऐसी साधना करें कि हमारे कषाय मंद हो । हमारे जीवन की धारा शुभ ,अशुभ लेश्या हैं । वह हमारी जैसी भावधारा होगी लेश्या का रंग भी वैसा होगा ।

हमारे पुरुषार्थ का सुर्य उदित रहें । हमारे गुरु आस्था का सुर्य कभी भी अस्त न हो । आज के समय में हमारे द्वारा अज्ञान वश धर्म प्रमाद से आच्छादित हो रखा हैं जहाँ चहूँ और आडंबर का नारा लग रहा हैं । भगवान महावीर के द्वारा बोली हुई बातें आगम वाणी सत्य की सरसता है ।

वह उसी से हमारे जीवन की रसवत्ता बनती हैं । वह श्रृंगार , हास्य, करुणा , रौद्र, वीर भयानक, बीभत्स , अद्भूत और शांत आदि – आदि ये रस बतलाए हैं । वह प्रशस्त,अप्रशस्त दो पथ हमको दिखलाए हैं ।हमारी गुणवत्ता प्रमोद भावना से बढ़ें । हमारी महत्ता विनम्रता से बढ़े ।

हम देख रहें है कि सब तरफ स्नेह – प्रेम आदि का ह्रास हो रहा हैं । वह इसके परिणामस्वरूप परिवार ,समाज ,राष्ट्र विश्व आदि में मानवीयता का पतन हो रहा हैं । हमारा अध्यात्म में रमा हुआ जीवन निर्मल है , गतिशील बना रहें । वह हमको आत्मलोचन से यह पहचाना है ।

हमारा जीवन उपयोगी बने उसके लिए हमको आगे बढ़ना हैं । हमारे जीवन में साहित्य से श्रृंगार हों । हम भगवान महावीर और आचार्यों साधु- साध्वियों से प्रतिपादित ग्रंथ किताब आदि को पढ़ें और जीवन में उन्नयन आगे से आगे करें यही हमारे लिए काम्य हैं ।

मोबाइल

मैंने थोड़ी छानबीन की अपने से तो मुझे पता चला कि नैनों को मोबाइल से कुछ विशेष प्यार सा हो गया है। वे दिन रात ही मोबाइल के सपनों में ही खोई रहती हैं। वह कुछेक मिनटों का विछोह भी नहीं सह पाती हैं।

हमारे पास जब मोबाइल नहीं था तो हमको अधरों से मुस्कान हो जाती ही नहीं थी वह समेटेने से समटने में ही नहीं आती थी। वह हमको हँसी आती तो वो इस कदर होती कि दम ही नहीं लेने देती थी। वह अब तो चेहरा भी देखना हो किसी को मेरा तो उसे मेरे मोबाइल से अनुनय विनय करनी पड़ती है।

वह तब चेहरे से हटता है यदि उसकी मर्ज़ी होती है। वह मुझे थोड़ी चिन्ता सता रही है कि यदि हँसी इस तरह गायब होती रही तो एक दिन हँसी के अस्तित्व का ही लोप हो जाएगा। वह पारस्परिक मुस्कुरा कर अभिवादन की मधुर रीत का भी विलोप हो जाएगा। हमारे द्वारा जीवन में मोबाइल का उपयोग करना भी एक कला है ।

वह इस कला को भूलकर हम किस और चलें है । हम पर मोबाइल हावी न हो हमे इसका उपयोग अच्छी दिशा प्रदान करने वाला हो, वह इससे हमको सद्ज्ञान प्राप्त हो । वह हमारे नकारात्मक चिंतन पर लग जाए जैसे कोई गहरा ताला हो । वह इससे निकले ऊर्जा का नया श्रोत और मन नव उमंग से ओतप्रोत बने ।

हम देखते है कि कश्ती का काम डुबाने का नहीं , उस पार पहुंचाने का है। वह चिराग का धर्म घर जलाने का नहीं उजास फैलाने का है। वह सीढ़ियां तो वे होती है पर कोई नीचे तो कोई ऊपर जाता है ।

अतः साधन का सही-गलत उपयोग करना कर्त्ता के पाले मे आता है। हम इस आधार पर यह कह सकतें है कि मोबाइल इतना बुरा नहीं है उसमे संतुलन की जरूरत होती है। वह हमको सही से उस पर ध्यान केंद्रित करना है। वह बदलाव से ताजगी भी आती है।

दृढ़ निश्चय , निष्ठा


भाग्य उन्ही पर मेहरबान होता है जो बाँहें चढाकर अपने कंधो को कष्ट देने को तैयार रहते है । अपने ध्येय के प्रति सही से गहरी निष्ठा ही तेरापंथ की शांति पूर्ण नीति की परिणति हैं।

वह संघर्ष आते है वे ही प्रगति के लिए ज़मीन को और अधिक ठोस बना देते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है फ़ौलादी हैं सीने अपने,फ़ौलादी है बाहें। हम चाहे तो पैदा कर दे, चट्टानों में राहें।

व्यक्ति का सबसे बड़ा बल मनोबल होता है । वह संकल्प से जागता है । वह इसके विकास से सहिष्णु होता है । वह ध्येय पूर्ति की लगन से संकट झेल पाता है,स्थिरचित्त होता है,वही जितेंद्रिय संकल्प के पार पहुँचता है । हम देख सकतें हैं कि जितने भी महापुरुष हुए है उनकी कामयाबी की चमक लोगों को दिखाई देती है लेकिन उसने कितने अंधेरे देखे है उसके तह कोई नही जानता हैं ।

वह यदि सपने सच ना हो तो हम अपने रास्ते बदल ले सिद्धांत नही क्योंकि पेड़ हमेशा पत्तियाँ बदलता है , जड़े नही । हम जोश व जज़्बे आदि साथ आचार्य श्री भिक्षु में देख सकते है जिन्होंने संघर्षों के शिलालेख पर सत्कर्मों की स्याही से इतिहास लिख डाला ।

आचार्य श्री भिक्षु के जीवन की कष्टों की कहानी वो सिरियारी की हाटों में आज भी गूँज रही हैं। वो आज भी साक्षी है बाबा के बलिदानों की लाँघ बाधावाँ आगे बढ्या , सफलतावां र शिखरां चढ़्या । ऐसे महामना भिक्षु ने संघ हित संघ गौरव के लिए क्या कुछ नही सहा हैं ।

उन्होंने अपनी छाती में मुक्के तक खायें और सुख सुविधाएँ संघ की जिनवानी पर उन्होंने वार दी। हमको इस गण के इस गणपति पर नाज़ है और इस संघ पर गौरव है । सायंकालीन प्रार्थना का एक पद्य है- दृढ़ आस्था नियम निभाने में,हो प्राण बलि प्रण पाने में।मज़बूत मनोबल हो ऐसा, कायरता कभी न लाएँ हम। हम सभी से मित्रतापूर्ण एवं मधुर व्यवहार करें ।

हम दूसरों के कार्यों दोषों-ग़लतियों-असफलताओं आदि की अपेक्षाकृत सही से अधिक सहिष्णुता-सकारात्मक सोच एवं रचनात्मक रवैया आदि – आदि को अपनायें । हमारे अपने कार्य व व्यवहार में ऐसा आभास हो की किसी भी कार्य में सफलता हमको निश्चित दिखे ।

हम किसी भी विपरीत परिस्थिति में शांत एवं बुद्धि-चातुर्यता भरा व्यवहार करें । हम दूसरों के प्रति सद्दव्यवहसर-नम्रता-सद्भावना मानवता रखें एवं दिव्य दिवाकर की शक्ती में हम पूर्ण विश्वास आदि करे । हम अध्यात्म निष्ठा-आगम निष्ठा-गण निष्ठा-गुरु निष्ठा से ओत- प्रोत रहें ।

वह हमको अध्यात्म में रमकर अपने मन से संताप को मिटाना हैं । वह मुक्ति के द्वार सम्यक् ज्ञान-सम्यक् दर्शन-सम्यक् चारित्र-सम्यक् तप यह चार हैं । हमको इसके समकित अभ्यास से आगे बढ़ सही से जीवन जीना हैं । वह हमको अपनी दक्षता एवं क्षमता आदि को सदैव रख सही से सभी को अपना बनाना हैं । वह आगे बढ़ मोक्ष की और हमको कदम बढ़ाने है यही हमारे लिए काम्य हैं ।

हिन्दी दिवस


हिन्दी दिवस पर सभी देशवासियों को प्रणाम ! 14 सितंबर 1949 को हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाए जाने के सम्मान में हम हिंदी दिवस मनाते हैं। इस हिंदी दिवस पर हम हिन्दी की भूमिका को पहचानें और सही से उसको सराहें ।हिन्दी जो हमें जोड़ती है और हमारी सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करती है।

हिन्दी राष्ट्र भाषा (भारत) की हरियाली हैं । हिन्दी में पाँव के लिए हम कहते है कि छू लो तो चरण , अड़ा दो तो टाँग , धँस जाए तो पैर , आगे बढ़ाना हो तो क़दम , राह में चिह्न छोड़े तो पद , प्रभु के हों तो पाद , बाप की हो तो लात , गधे की पड़े तो दुलत्ती , घुंघरू बाँध दो तो पग , खाने के लिए टंगड़ी , खेलने के लिए लंगड़ी आदि – आदि ।

वह पैर शब्द को हम हिन्दी में गहराई से और समझे तो इसमें सूख – दुःख सहित विस्तृत सार भी हैं जों हम आम बोल – चाल में कहते भी हैं । वह पैर को गति , चलना , पाद , चरण , क़दम , पग , पदचिन्ह , लात ,टँगड़ी , अँगडी़ , टाँग , पाँव , अपनी क्षमतानुसार चलना , अपनी क्षमतानुसार पाँव पसारना , समय के चक्र का चलना , समय अनुसार स्वयं चलना , दौड़ना आदि – आदि हम अपने सुविधानुसार कहते है ।

इस एक उदाहरण से हम यह समझ सकतें हैं कि हिन्दी कितनी नायाब है वह उसके एक शब्द के कितने – कितने अर्थ हैं । वह लेखन में हम हिन्दी को और सही से समझ सकतें हैं कि हम किसी भी काम,क्षेत्र में विजयी होंगे या पराजित,सफल या असफल यह पूरी तरह से हमारें पर निर्भर है ।

हम यदि सोचोगे और अपने मन में यह विश्वास करेगे कि आप जीत जाओगे,तो यकीन मानिए कि जीत आपकी ही होगी, आपको जीतने से कोई नहीं रोक सकता कोई भी नहीं लेकिन इसके विपरीत यदि आप सोचोगे और यह मानकर चलोगे कि यह काम मुश्किल है और मैं हार जाऊँगा तो आपको हारने से कोई नहीं रोक सकता हैं ।

वह इतिहास के महान से महान काम इंसान की इसी सोच पर हुए हैं क्योंकि सफलता और असफलता की कहानी पहले हमारे मन में लिखी जाती है और बाद में वो साकार रूप लेती है। वह इसी तरह हिंदी में मात्रा का बड़ा महत्व है । जैसे- ( अ) मैं अभिभूत हूँ । ( ब) मैं अभी भूत हूँ ।

अतः हम हिंदी में व्यवहार करें । हिंदी का मान करें । हिंदी राष्ट्रभाषा है । हिंदी पर अभिमान करें । इन्हीं भावों से हिंदी दिवस की शुभकामनाएं वह मंगलकामनाएं ।

शिक्षक दिवस


मेरे लेखन वह जीवन के आध्यात्मिक शिक्षक दिवंगत शासन श्री मुनि श्री पृथ्वीराज जी स्वामी ( श्री ड़ुंगरगढ़ ) को वैमानिक देवलोक में प्रदीप छाजेड का भावों से शत – शत वन्दन !

वह साध्वी श्री कृतार्थ प्रभा जी को प्रदीप छाजेड का भावों से शत – शत वन्दन ! इन श्रुतज्ञान को मेरा भावों से बारम्बार भावों वंदन,अभिनंदन और कोटिशः नमन ,जो मोक्षमार्ग है । इस मार्गदर्शन के प्रदाता अन्य सभी को मेरा भाव भरा अभिनंदन है ।

आज के दिन आप सभी हमको ऐसा आशीर्वाद प्रदान करें कि हम जीवन भर ज्ञानपिपासु विद्यार्थी बने रहें ताकि हमारी ज्ञान प्राप्ति के द्वार सदैव खुले रहें । वह आज महान दार्शनिक , शिक्षाविद् भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस पर उन्हें मेरा भावों से सादर सविनय नमन ।

शिक्षक का अर्थ है शि – हमको शिखर तक ले जाने वाला। क्ष – सबके प्रति क्षमा की भावना को रखने वाला । क – हमारी कमजोरी को दुर करने वाला अर्थात जो‌ विद्यार्थी की हर गलती को‌ क्षमा करने की भावना रखता है । वह उसकी हर तरह की कमजोरी को दुर कर उसको कामयाबी के शिखर(सफलता) तक ले जाता है ।

वहीं तो सच्चा शिक्षक कहलाता है। हमारे जन्मदाता प्रथम ज्ञान प्रदायक हैं । वह मेरा उनको हृदय से प्रणाम व वंदन हैं । वह हमको सुसंस्कार और सामान्य जीवनोपयोगी ज्ञान देते हैं ।हमारे को विशिष्ट शिक्षा प्रदान करने वाले गुरु को भी मेरा भावों के उत्कृष्टता से वंदन हैं । वह हमको दिशा दृष्टि देते हैं जो हमारी दशा बदल देते हैं ।

वह हमारी इस माटी की काया को सुंदर मूरत में शिक्षा ज्ञान का दान देकर परिवर्तित करते हैं । वह हमको अंधकार , विषम स्थिति से उबरने आदि – आदि में ज्ञान की मशाल से मार्ग दिखाते हैं । वह हम नौसीखिए को बुद्धिमान बना देते हैं । हम जीवन पर्यन्त उनके ऋणी रहेंगे ।

वह सामान्य , विशिष्ट ,धर्म ज्ञान आदि प्रदानकर्ताओं की शिक्षा के बिना हमारा जीवन अंधकारमय ही रहता हैं । वह बिना शिक्षक के कोई भी पार नहीं सकतें हैं । हम नमन , वंदन , पूजा ,अर्चना आदि – आदि उनकी कर स्वयं को कृतार्थ करें ।

वह उन सभी को मेरा भाव भरा अभिवादान ! जो जगत में हर कण – कण में शिक्षा का उद्गार देने वाले हैं । हमारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ पढ़ायी / शिक्षक ,गुरु आदि तक सीमित नहीं हैं । हम प्रकृति से सही जीवनोपयोगी स्वाभाविक ज्ञान भी सिखते हैं । अतः सभी को आज के शिक्षा -शिक्षक दिवस पर मेरा भावों से नमन है ।

आज शिक्षक दिवस पर मैं अपने आध्यात्मिक शिक्षको के द्वारा दिए संस्कार को संकल्प से और पुष्ट करते हेतु अपने को अच्छा निखार करने में शुभ भावना से आगे बढ़ सदैव प्रयासरत रहूँ यही मैं उनसे आशीर्वाद चाहता हूँ । यही हमारे लिए काम्य हैं|

सुखी, सुन्दर जीवन

सुखी, सुन्दर जीवन
हर आदमी की प्रायः
प्रायः प्राथमिकता है
खुश रहना बहुत से
गुण हैं जो बताते हैं
खुश रहने के लिए
क्या करना इसमें
मुख्य है एक सही
से सीधा सा मंत्र
कि दूर रहना है
सदैव गलत से
मानव अर्थ से
नहीं धर्म के प्रति
श्रद्धा से ही महान
होता हैं मानव धर्म
से नहीं अपने अच्छे
आचरण से अच्छा
बनता हैं ज्ञानीजनों
ने अपने अनुभव से
यह प्राप्त किया कि
मानव जन्म से नहीं
अपने तपस्या आदि
सदगुण अर्जन से
ही महान होता है
अच्छे उपवन का
कण कण सही से
मनभावन होता हैं
सेवाभावी जीवन का
क्षण क्षण प्रभुल्लित
होता हैं क्या धार्मिक
वह सामाजिक और
सांस्कृतिक एवं
पारिवारिक उसके
जीवन का हर पक्ष
महिमापूर्ण होता हैं
अब यह प्रश्न आ
सकता है कि हमको
किससे वह कैसे
दूर रहना हैं तो
प्रत्युत्तर है कौन
क्या कर रहा है
जो कर रहा है
वह कैसे कर रहा
है जैसे कर रहा है
वैसे क्यों कर रहा
है सुखी रहना है
तो इन सबसे न
रखें हम कोई भी
कैसा कभी भी
सरोकार वह
रहेंगे इससे
जितना हम
इनसे दूर तो
रहेगी मनः
शांति उतनी
ही भरपूर अतः
हम जीवन में
कभी किसी से
अपनी कहीं भी
तुलना नहीं करे
हम जैसे हैं वैसे
ही सर्वश्रेष्ठ हैं
ईश्वर की प्रत्येक
रचना सर्वोत्तम है ।

आत्म-सम्मान

आत्म-सम्मान
हर प्राणी में होती
है कुछ न कुछ
अपने अनुसार
योग्यता पर हर
किसी को नहीं
मिलती सही से
दिशा और सही
रास्ता आत्म
सम्मान आदमी
का मानवीय
अधिकार है
अपमान उसके
अंतःकरण को
कभी भी नहीं
स्वीकार है यह
जीवन की शान
ही है कि जिया
जाए सही से
सम्मान के साथ
रहे सबकी दृष्टि
में श्रद्धा और
मान के साथ यह
आत्म सम्मान की
प्राप्ति से ही होती
है मानसिक वह
स्वास्थ्य की उन्नति
सद्बुधि एवं सद्गुणों
में वृद्धि पर आत्म
सम्मान यूँ ही प्राप्त
नहीं होता हैं उसके
लिए आदमी में होती
है सही से इमानदारी,
सद्भावना, शालीनता
एवं प्रमाणिकता के
गुणों की नितांत ही
आवश्यकता सम्यक्
संस्कार सकारात्मक
सोच व योग्यता का
होता आकलन वह
साथ में समय –
समय यदि किया
जाए उसकी सही
से योग्यता का आत्म
सम्मान तो देखते ही
देखते आएगा उसकी
कार्यक्षमता में इतना
निखार कि चकित रह
जाएगा सारा संसार जी
हाँ आत्म सम्मान में
है इतना चमत्कार जो
छोटे से छोटे प्राणी को
भी दिला देते हैं सही
आदर व सत्कार सभ्य
समाज की यही पहचान
यहाँ सब को अपनी
रुचियों के अनुसार
मिलता अधिकार समान
न किसी से ईर्ष्या और
ना होती किसी को
नीचा दिखाने की
कही भावना आत्म
सम्मान तो है सही
से सफलताओं के
लिये है प्रोत्साहन
आशावान और
ऊर्जावान बने
रहना धर्माचरण
के साथ स्वयं
जीतना व दूसरों
को जीतना क्योंकि
आत्मसम्मान की
कोई चाहत नहीं
होना वह आत्म
सम्मान तो स्वयं
ही मिल जाना ।

सुखी कौन

ये इच्छाएँ ही
तो हैं हमारे इस
जीवन में सारे
दु:खों की जड़
अनावश्यक व
अखाद्य खाना
अनावश्यक व
नकारात्मक को
सोचना और बोलना
ही तो है असंयमित
जीवन दु:ख को
निमंत्रण जब भी
हम मन से सोचे
हम ख़ुश है तो
हम सुखी है वह
शायद ही क‍िसी
बाहरी संसाधन
की जरूरत पड़
सकती है माना
की हर कोई
स्वस्थ सुखी
और संपन्न
होना चाहता
है पर बहुत
कम लोग
जानते हैं कि
स्वास्थ्य सुख
और संपन्नता
का सबसे बड़ा
आधार है मन
की खुशी वह
मन प्रसन्न है
तो सभी दुख
दूर है लोग यह
सोचते हैं दुःख
दूर होने पर ही
वे प्रसन्न रह
पाएंगे यह भी
सही नहीं है
सुख आंतरिक
चीज है वह
बाहरी व्यक्ति
वस्तु साधन और
संसाधन आदि
पर आश्रित नहीं
है न ही उसे किसी
रुपए से खरीदा
जा सकता है हम
बस इतना करे
अपनी तुलना
किसी और के
साथ नहीं करे
और हमको जो
कुछ भी प्राप्त है
उसे हम सही
परमात्मा की
देन मानकर
सहज ही में
उसे स्वीकार
करना है वह
संतुष्ट रहना
है दूसरों के
स्वभाव संस्कार
बोल व्यवहार
और हालात
हमें दुखी या
परेशान न करें
क्योंकि जीवन
का सबसे बड़ा
खजाना संतुष्टि
है हम संतुष्ट
रहना सीखें
सुखी जीवन
के लिए यह
बहुत जरूरी है
संयमित जीवन
क्योंकि शांति
प्रदाता होता
है संयमित
मन संयम
यानि मन
वचन और
इंद्रियों पर
नियंत्रण होते
ही इन्द्रियों
पर नियंत्रण
स्वतः ही हट
जाता है मन
सभी असीम
इच्छाओं से
यही हमारे
लिए काम्य
हैं ।

सबको क्षमा करिए

अपने जीवन में हम
उनको क्षमा करें
जिन्होंने हमारे दुख
दर्द आदि में अपने
चेहरे पर मुस्कान
बिखेरी थी क्योंकि
हम ही थे जो उनकी
मुस्कुराहट की वजह
बने थे और उनको
मुस्काने को नहीं
मिला हम उनको
भी दिल से क्षमा
करें जिन्होंने हमारे
साथ में गलत कही
भी किया हो क्योंकि
हम उस समय यही
सोचें कि उनकी तो
प्रवृति है ऐसा करने
कि लेकिन हमने
समता भाव से सब
कुछ सहन कर सही
से अपने को पार लिया
हम उनको भी क्षमा
करें जिन्होंने हमारे
पर क्रोध किया हम
उस समय यह सोंचे
कि वो तो अपने
स्वभाव से विवश
हैं लेकिन हमने
उस समय सही
से धैर्य को रख
अपना संयम नहीं
खोया वह अपने
को स्थिर रखा
हम उनको भी
सही से सहर्ष
क्षमा करें जिन्हें
हमारे सुख वृद्धि
सौभाग्य चढ़ती
आदि से दुख हैं
क्योंकि उन्हें तो
अपने स्वभाव से
दुख हो रहा है
इसका न कोई
और है न कोई
छोर हैं वह दया
संवेदना आदि
के भी पात्र हैं
हमें उनको भी
क्षमा करना
चाहिए जो
हमें कभी भी
अपशब्द बोलें
हैं क्योंकि यह
उनका अपना
विवेक था उस
समय का अतः
शब्द नही सही
से संकल्प जो
कर लो ख़्वाबों
को जब ज़मीं
मिलेगी तो
सृजन का नव
सूर्य उदित हो
आत्म शक्ती
की ज्योत ही
जलेगी हमें हमारे
भरोसे से हमारी
आशाओं से हमारे
सतत वह कठोर
परिश्रम से अपने
लक्ष्य को सही से
काल भाव के योग
से उसको प्राप्त
करना है अतः
हमारे जीवन का
लक्ष्य हैं कभी हम
अपनों से नाराज हुए
तो उन्हें मनाएँ वह
कभी हमारी वजह
से किसी का दिल
दुखा तो कभी
सच्चे हृदय से हम
क्षमा दे व क्षमा
लें ना दोहराएँ
कोई हमारी करी
हुई वही पुरानी
कोई गलतियाँ
वही पुरानी सोच
और वही पुराना
नजरिया जो हमें
सफलता का सही
आलिंगन ही नहीं
करने देगा उसको
हम छोड़े क्योंकि
यह सच है कि
समय किसी के
लिए भी रुकता
नहीं मगर वह
अपने प्रयास
सही से करने
वालों के आगे
झुकता कभी
वह अवश्य है
सफलता मन्नत
से नहीं सही
मेंहनत रूपी
उस और सार्थक
हमारे द्वारा अच्छा
प्रयास करने से
ही हमको प्राप्त
होती है क्षमा
वीरस्य: भूषणम्
का मंत्र हम सही
से आत्मसात करें
अहिंसा, संयम,
तप आदि से आत्मा
की ज्योति जला
अपने मोक्ष के मार्ग
का निर्माण करें
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

सान्निध्य और उपासना से लाभ


हमारे जीवन में दर असल सुख दुख का धन होने या न होने से कोई ख़ास रिश्ता नहीं है क्योंकि जिसे जो मिला है उसी में जो संतुष्ट है वही बेशक सुखी है। हमारे मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है कि पाँच महाव्रती संत महात्माओं के सान्निध्य व उपासना से हमे क्या मिलने की आशा की जा सकती है ?

वह तो फकीर है उनके पास एक कौड़ी नहीं हैं तो इसके उतर में हम क्या कहे ? जैसे धूप में केवल बैठने मात्र से ही सूर्य की गर्मी हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती है उसी प्रकार ज्ञानी, बहुश्रुत संत, महात्माओं के सान्निध्य और उपासना से ही उनके आत्मज्ञान व शक्तियों से भावित भावनाओं का तेज आदि – आदि स्वतः ही हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है ।

वह संयम की खुशबू हमारे जीवन की हर कली- कली को विकसा देती हैं । वह उनके बिना कुछ बोले ही, बिना कोई उपदेश दिए ही हमारे द्वारा उसका पूर्ण लाभ तभी ही उठाया जा सकता है ।

हम वहॉं पर जाकर बैठे । वह हम बिना किसी रागद्वेष-भाव से अपनी बुद्धि की खिड़कियॉं और मन के द्वार खोल कर बैठ जाए। वह विकीर्ण ज्ञान की किरण हमारे अंतर में प्रवेश कर सकें ।

वहॉं जब कोई एक भिक्षु की भाँति केन्द्रित मन की झोली फैला कर आस्था मय और विश्वास, विनम्रता से बैठता है तो वे उसमें अपनी साधना के द्वारा प्राप्त ज्ञान के अनमोल रत्न अनायास ही डालते रहेंगे । हमको जीवन में ऐसे अवसर बड़े भाग्य से मिलते हैं अन्यथा इन महान पुरुषों के दर्शन के लिए भी लोग भाग्य पर निर्भर रहते हैं ।

करें रचनात्मकता का सदुपयोग


हमारे जीवन में स्वयं स्फूर्त चेतना ही अपने गंतव्य पथ पर अविराम गतिमान बनी रहती है। वह जल की प्रचंड तेजधार ही हर बाधा को चीर कर अंतिम सांस तक बहती है।

वह जब उद्देश्य केवल सात्विक, पारमार्थिक तथा सबजन हिताय आदि का होता है तब ही हमारे उस उत्साह की पवित्र श्रम बूंदे , सही से महोत्सव की गौरव गाथा कहती है क्योंकि वहाँ रचनात्मकता का वास है । हमारे जीवन में रचनात्मकता सही से एक ऐसी दिलचस्प अभिव्यक्ति है।

यह प्रकृति-प्रदत्त भी हो सकती है व जन्मोपरांत जीवन के किसी भी मोड़ पर भी प्राप्त की जा सकती है। हम देख सकतें है कि उत्साहित मनुष्य के हृदय में हमेशा शक्ति और ऊर्जा का संचार होता है जो उसे लक्ष्य की ओर ले जाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है ।

वह जिनका उत्साह बुलंद होता है वे ही संसार को जीत सकते हैं । वह जो लक्ष्य से नहीं भटकते हैं वो ही सूर्य बनकर निकलते हैं । वह उनके पास सुविधा, संपदा, समर्थन आदि – आदि कुछ ना होने पर भी वे जीवन के हर क्षण को उपलब्धि बना लेते हैं।

एक साधारण काम भी मुश्किल हो जाता है जब इसे बिना उत्साह के साथ किया जाय तो इसलिए हम जो भी काम करें उसे उत्साह पूर्वक व एकाग्र होकर करें क्योंकि उत्साह में अपार बल होता है । वह उसके बिना कोई भी महान उपलब्धि प्राप्त नहीं कर सकता है। हमारे जीवन में उत्साह एक नई उमंग, एक नई उम्मीद लाता है व नए रास्ते ढूंढने में मदद करता है।

हम इसलिए जीवन में उत्साहित होकर लक्ष्य की ओर बढ़ें। हमारे जीवन में सही से रचनात्मकता हमारी सोच का तरीका बदल सकती है। वह नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है। यह मात्र कला में ही नहीं हमें जीवन के हर क्षेत्र में नए समाधान दे सकती है।

वह हमको हमारे जीवन की समस्याओं को एक अलग नजरिए से देखने की दृष्टि दे सकती है। हम इसलिए अपनी रचनात्मकता को पहचानें वह अपने चिन्तन को आजादी दें । हम नए-नए प्रयत्न करें और अपनी रचनात्मकता का अनुभव सीखने का सदुपयोग करें । वह हम जीवन में निरन्तर उतरोत्तर प्रगति करें यही हमारे लिए काम्य हैं ।

उम्र हर दिन बढ़ती : नहीं घटती है


हमारा जीवन बचपन से बहते-बहते बुढ़ापे पर पहुँच कर अंत होता ही है। वह इस प्रवाह को न कोई रोक सका है, न कोई रोक सकता है। हम मरना नहीं चाहते है पर यह प्रकृति के विपरीत नहीं चाहना है ।

वह ऐसा होना कतई संभव नहीं है।हमारा यहाँ न जीवन रुकता है, न मौत रुकती है। इस तथ्य को सही से जो सहर्ष स्वीकार कर लेता है फिर उसके दुःख काहे का वही जीवन की हर परिस्थिति में हर्ष मना सकता है । वह अपने जीवन में सही से दृढ़ रहकर जो बाधाओं से कभी नहीं घबराता है वही तो कोई नई राह ढूंढ पाता है।

वह जो सामंजस्य के साथ जीने की महान कला को जानता है वह स्वयं को भी व साथ रहने वाले दोनों को जानता व पहचानता है। एक शाश्वत तथ्य है कि जन्म के साथ मृत्यु तो अटल सत्य है ।

हमारी उम्र बढती है जिन्दगी घटती है यह भी सच है पर रह कर इन सबसे हम अनजान लगने लगते हैं वह हम जीने का उलटा अनुमान करते है । हम याद करते रहते हैं या तो अतीत को अथवा हम डूबे रहते हैं इस चिन्तन में कि भविष्य हमारा कैसे कहाँ व्यतीत हो।

हमारे मन में जरा भी विचार नहीं आता कि अनंत काल तक यह जीवन नहीं रहना है। जन्म लिया है तो वह एक दिन जायेगा ही जायेगा या मृत्यु को प्राप्त होगा । वह पता नहीं पूर्ण विराम किस जगह कहाँ किस समय के बाद हमारे लग जाये । वह साँसों का पंछी उड़ जायें । हमें इसी सत्य के साथ जीना है ।

हम हर पल को आनन्द के साथ सही से जीयें ।वह उसके लिए हमें तृप्ति की आवश्यकता होती है ।वह प्राप्त में पर्याप्त की संतुष्टि से हम हर पल का आनन्द ले सकते हैं।

हमारा जीवन पल-पल बीतता जाता है और हर बीतते दिन पर हम बड़े नहीं छोटे होते जा रहे हैं यानी हमारी उम्र तो कभी नहीं बढ़ती बल्कि हर रोज यह घटती ही रहती है ।यही तथ्य है और यही शास्वत सत्य है।

मौन और मुस्कुराहट

सफलता की आहट
कभी हंसते हुए तो
कभी रोते हुए छोड़
देती है ये जिंदगी
हमको क्योंकि ये
जिंदगी न तो पूर्ण
विराम सुख में है
और न पूर्ण विराम
दुख में है बस !
जहां देखो वहां ही
अल्प विराम लगा
हमको छोड़ देती है
ये जिंदगी अतः दिल
को दिल से मिलाते
रखो और क्या लेकर
जाना है साथ में
इस दुनिया से मीठे
बोल और अच्छे ही
व्यवहार है रिश्तों
को बनाए रखो वह
तभी सब चीज सही
से हजम होगी आदमी
है तो आख़िर आदमी
ही आदर्श जीवन की
चेष्टा करते करते
वह थक ही जाता है
कभी कभी खामोश
रहते रहते वह कई
तरह के दर्द सहते
सहते और सही
से आदर्शवादिता में
सब्र करते करते
अपूर्ण उम्मीदें पूरी
होने की प्रतिक्षा
करते करते बहुत
बार कई जनों को
अपने नागवार के
व्यवहार की सफाई
देते देते एक सीमा
का सही से अंत
होता है दूसरी में प्रवेश
इसी को कहा जाता है
जीवन का नया उम्मेष
और सबसे कठिन है
रूठे हुए अपनों को
मनाते मनाते आदि
आदि इस तरह से
कई तरह की बातों
के चलते ऐसे में
हमारे सामाजिक
वह कैसा ही हो
पारिवारिक दरो
दीवार पर सदा सदा
के लिए स्मरणीय
नाम वही लिखा पाता
है जो उपरोक्त सभी
तरह कि बातों में सही
सफल हो जाता है
क्योंकि वह व्यक्ति
बहुत धैर्यवान शान्त
व गंभीर स्वभाव का
होता है संयममय
अप्रमादी स्वावलंबी
जीवन जीना उसने
सीखा हैं हम अपने
आप को प्रसन्न
व सुखी आलेखें
इसीलिए हम यह
देख सकतें है कि
सफल लोगों के
चेहरे पर सदा दो
चीजें होती हैं मौन
और मुस्कुराहट की
आहट जो लगा देते
हैं सफलता के ठाट।

223 वां आचार्य श्री भिक्षु चरमोत्सव दिवस


करें हम भिक्षु स्वामी का सदैव भावों से स्मरण
करें भिक्षु स्वामी के स्मरण से सुधा का पान
मननशील चिन्तन मंथन से हम भी बनें महान
आत्मलीनता का यह उपक्रम सबके मन भावन
सुनकर पढ़ और सीखकर भी करें स्वयं का पान
इससे मिट जाता अज्ञान तिमिर फिर होता सद्ज्ञान
सत् साहित्य पढ़कर भी जाने कम भव भ्रमण का ज्ञान
तत्वदर्शी बनने का माध्यम सही से कराता पान
आदत और स्वभाव बदल बन जातें है इन्सान
भिक्षु स्वामी का जीवन बूटीं हैं बनाती दीप समान
धर्म हैं सोपान मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर बनाता महान
गहन गहन चिन्तन के द्वारा ही लग जाता है ध्यान
भिक्षु स्वामी के स्मरण से देखें हम स्वयं को अपना
वो ही मानव पूर्ण करेगा सोंचे हैं सबका सपना
भिक्षु स्वामी के स्मरण ध्यान से होती हैं हमारी पहचान
शिवपुर की खरी कमाईं का हम करे ध्यान
करें हम भिक्षु स्वामी का सदैव भावों से स्मरण

32 वां विकास महोत्सव

यदि समस्या है तो उसका समाधान भी है। वह जहाँ चढ़ाई है वहाँ निश्चित रूप से ढ़लान भी है। वह अगर हमारे विश्वास की पतवार हाथ मे हो तो हर तूफान पर विजय पाना आसान भी है।

वह निराशा में आशा का संचार हो जाता हैं । वह मायूसी में भी उमंग का उल्लास हो जाता हैं । वह मन के दीपक में विधेय चिंतन का उजाला पल में तिमिर में भी प्रकाश भर जाता हैं ।

गुरुदेव श्री तुलसी का पट्टोंत्सव भादवा सुदी -9 का दिन था । वह उन्होंने अपने आचार्य पद का विसर्जन कर सारा दायित्व आचार्य श्री महाप्रज्ञजी को सौंपा और फरमाया की अब मेरा पट्टोंत्सव नही मनाया जाएगा । यह बात आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के गले नहीं उतरी ।

उन्होंने इसका चिन्तन कर एक विकल्प प्रस्तुत किया और कहा की आज के दिन को हम विकास महोत्सव के रूप में मनायेंगे ।वह तभी से 31 वर्ष पूर्व विकास महोत्सव की शुरूआत हुई थी । मनुष्य ही वह भाग्यशाली प्राणी है जिसे सबसे उन्नत दिमाग का आधार मिला है ।

वह जिससे अभिव्यक्ति विभिन्न प्रकार से कर सकता है। यथा संगीत, भाषा, विभिन्न प्रकार के अविष्कार आदि। वह जितनी ऊर्जा उतना ही ऊँचा अभिव्यक्ति का दर्जा होता हैं । वह इसीलिए हम अपनी ऊर्जा को उच्चतर स्तर पर बनाए रखें ।

वह हम आगे से आगे रचनात्मक बढ़-बढ़ कर सोचते रहें ।विवेकशील व्यक्ति ही सबका अजीज बन सकता हैं । वह सोच समझ कर हर चीज बोलता हैं । वह बुद्धि और विवेक का जहाँ मणि कांचन योग होता हैं वही मानवीय मूल्यों का सुयोग होता हैं ।

वह उस व्यक्ति में क्षमा ,सत्य , आर्जव मार्दव लाघव समता ,सह अस्तित्त्व , समन्वय आदि – आदि गुण विकसित होते हैं । वह उसके आस पास का वातावरण हरदम प्रफुलित रहता हैं । वह आलस्य, प्रमाद, क्रोध,मान, माया,लोभा आदि उससे दूर रहते हैं ।

वह व्यक्ति सच में बुद्धि से भरपूर होता हैं ।वह लोगों में गण मान्य होता हैं ।विकास पुरुष गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी को कोटिशः नमन और विकास महोत्सव के कल्पनाकार आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी को शत शत वंदन करते हुए विकास महोत्सव पर तेरापंथ नंदनवन गण गुलजार है ।

वह चहुँ दिश जय जय कार है ,हो रहा विकास महोत्सव में महा उपकार है । वह इन्ही मंगल भावों के साथ विकास ही विकास आगे ,विकास महोत्सव में जय हो जय हो सदा विजय हो ।

आचार्य श्री कालूगणी का 90 वां प्रयाण दिवस

कालूगणी का स्मरण करें हम
शिवपुर की खरी कमाईं करें हम
स्वाध्याय से सुघा का पान करें हम
मननशील चिन्तन मंथन करें हम
आत्मलीनता से मानव बने हम
धर्म का सदैव उपक्रम करें हम
धर्म कर आत्मा को खुशी दें हम
धर्म को सुनना पढ़ना करें हम
स्वाध्याय के क्रम को नित करें हम
हमारे अज्ञान तिमिर को हटायें हम
सद्ज्ञान को प्राप्त करतें जायें हम
सत् साहित्य को पढ़ने का करें हम
आत्मदर्शी की राह को पायें हम
तत्वदर्शी बनने को प्रेरित हो हम
आदत स्वभाव को बदलें हम
समता की सरिता को बहायें हम
अन्तर का कलमष धों पायें हम
कालूगणी का स्मरण करें हम

क्षमापना महापर्व


खामेमि सव्व जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती मे सव्व-भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ।। हमारे जीवन व्यवहार में जान अनजान में या प्रमादवश भी भूल-चूक होना आदि – आदि स्वाभाविक है।

वह अंग्रेज़ी में इसीलिए कहा गया है To Err Is Human. हमारे द्वारा इन भूलों को गाँठ बॉंध कर रखने से मानसिक तनाव हो जाता है। वह अंतर में नकारात्मकता का स्राव होने लगता है।

अत: उचित है कि हम इसे भूल कर परस्पर क्षमा मॉंग लें, क्षमा दे दें और मन हल्का कर लें। वह इसीलिए खमतखामणा का विधान बनाया गया है। खमतखामणा शब्द में क्षमा माँगना व क्षमा देना दोनों आ जाते हैं ।

वह दोनों ही पक्ष द्वारा सभी पारस्परिक भूलों को भूल कर सही से मन शुद्ध कर लेना अद्वितीय आचार है । वह खमतखामणा क्षमा माँगने व क्षमा देने से तनाव मुक्ति होती है। वह चित्त निर्मल होता है और मन: शांति
मिलती है।

हमारे द्वारा ग्रंथियों से सकारात्मक स्राव जब होता है तब पारस्परिक सद्भाव बढ़ता है। इन्ही शुद्ध भावों से विगत वर्ष में मेरे द्वारा कोई भी कटु शब्द बोलने या लिखने में आदि आया हो या मेरे व्यवहार से आपको किंचित भी आशातना हुई हो तो मैं सबसे सरल ह्रदय से शुद्ध अन्तकरण से आपसे बारम्बार क्षमा याचना करते हूँ । मुझे आशा ही नही पूर्ण विश्वास है आप अपने विशाल ह्दय से मुझे अवश्य क्षमा प्रदान करेगें ।

संवत्सरी महापर्व


संवत्सरी का महान पर्व जैन समाज के लिए महास्नान का पर्व हैं। यह महाकुंभ स्नान हैं । यह अंतःकरण की व्याधियों और मनोकायिक बीमारियों की शुद्धि के लिए चिकित्सा का पर्व हैं ।

यह स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए तथा भविष्य की प्रतिबद्धता के लिए कार्य- सिद्धि का पर्व हैं । यह संवत्सरी शुद्धि का ,
चिकित्सा का और सिद्धि आदि का पर्व हैं । पर्वाधिराज पर्यूषण का शिखर दिवस भगवती संवत्सरी हैं ।जैन शासन की श्वेताम्बर परंपरा में पर्युषण महापर्व के अंतर्गत भगवती संवत्सरी का दिन विशेष धर्माराधना का दिन होता हैं ।

यह क्षमा का पर्व हैं , मैत्री से जुड़ा हुआ हैं । पिछली सारी कटुताओं को, वैर विरोध को दूर करने का दिन हैं । संवत्सरी महापर्व क्षमा, अहिंसा व मैत्री का पर्व है । इसे प्राप्त पर्वाधिराज होने का गौरव है। यह दिन उपवास व अधिकाधिक सामायिक, पौषध, ध्यान, स्वाध्याय आदि से अपने को विशेष रूप से भावित करने का दिन है ।

वह सायं प्रतिक्रमण में ४० लेगस्स का ध्यान करके ८४ लाख जीवायोनि से खमतखामणा कर मन शुद्ध करने का दिन हैं।क्षमा जीवन का श्रृंगार है । यह मुक्ति पथ पर आगे बढ़ने का आधार हैं ।

वह वीरों का आभूषण क्षमा है । वह मानवता का पवित्रतम गुण क्षमा है। वह हुई भूलों के मैल का पश्चाताप के साबुन से
प्रक्षालन की क्रिया क्षमा है । हमारे जीवन को आगे के लिए सहज, सरल बनाने की प्रक्रिया क्षमा है । वह इस सोच से भावित होने पर क्षमा माँगी जाती है , क्षमा दी जाती है कि घर आँगन में जब रोज झाड़ू लगाया जाता है तो मन-प्रांगण को क्यों कषायों के कबाड़-कूड़े से भरा जाता है।

हमारे द्वारा घर में बिखरी चीजों को तो तरतीब से सजाया जाता है तो मन के कोनों-खचोंनों में क्यों कषायों का कचरा जमा कर रखा जाता है। यह प्रतिवर्ष महान पर्व आता है और अपनी आध्यात्मिक ज्योतिकिरणों को बिखेर कर चला जाता है। हम सभी उन ज्योति किरणों में स्वयं को कितना आप्लावित करते हैं चिंतन हमारा अपेक्षित है।

यह महापर्व जीवन को बदलने का महान उपक्रम है। यह पर्व जीवन को निर्मलता के प्रकाश और ज्योति से भरने वाला दीपस्तम्भ है। जीवन में रुपांतरण की प्रक्रिया का पर्व है। अतः हम सम्वत्सरी महापर्व पर इन्हीं शुभ भावों को संजोकर विगत वर्षावधि में हुई जान-अनजान में निज द्वारा दूसरों के प्रति व दूसरों के द्वारा हमारे प्रति भूलों को लिए बारम्बार – बारम्बार खमतखामणा करें और हमारे द्वारा हृदय को पवित्र करके हजार बार बारम्बार खमतखामणा कर लेना चाहिए।

मैत्री महापर्व

प्रश्न किया जा सकता हैं कि क्षमापना से जीव को क्या मिलता है? उतर यह दिया जा सकता हैं कि क्षमापना से जीव को आह्लाद भाव- प्रसन्नता प्रकट होती हैं । वह सब प्राण- भूत आदि जीवों के प्रति जीव मैत्री कर लेता हैं । हमारे द्वारा मैत्री भाव से भाव विशुद्धि हों जाती हैं ।

वह भाव शुद्ध कर हम प्राणी निर्भय बन जातें हैं । मैत्री क्षमापना और निर्भयता का आपस में संबंध हैं । वह संवत्सरी को हमारे द्वारा पिछला खाता बन्द होना चाहिए । हम पिछले सभी कलुष भावों को कागज की तरह फाड़ दें ।

वह क्षमापना दिवस पर हमारे द्वारा मैत्री दिवस भी ह्रदय की अंतरंग गहराई से संसार के सभी जीवों के प्रति मनाया जाए । वह प्रतिक्रमण में भी 84 लाख जीव योनियों में सही से खमतखावणा की विधि हैं ।

हमारे जहाँ भी गांठें है वहाँ पर बन्धन हैं । वह जहाँ गांठें खुली वहाँ पर भक्ति हैं । हमारे द्वारा आज गाँठो को बाँधने का नहीं खोलने का दिन हैं ।

हम अपना अंत निरीक्षण करके जिस किसी के साथ में हमारी गाँठ बन गईं हैं उसको खोलने को तत्पर हों वह कर्मों के भार को हल्का हम करतें रहें । इन्ही शुभ भावो से मैत्री महापर्व पर मैं सभी से ह्रदय की अंतरंग गहराई से सरल ह्रदय से बारम्बार खमतखावणा करता हूँ |

ध्यान दिवस

इस जीवन में हम जो कुछ भी कर पाते हैं वह तभी कर सकते हैं जब अपने स्वास्थ्य, शरीर और मन को ठीक रख पाते हैं। वह कुछ लोग इस शरीर पर ही बहुत कम ध्यान देते हैं। वैसे हम देख सकतें है कि आजकल काफी जागृती भी हुई है । वह जगह-जगह ध्यान आदि के केन्द्र खुल गए हैं ।

वह ध्यान के महत्व को समझा जा रहा है। वह आत्मिक शांति के लिए भी ध्यान आदि की प्रक्रिया पर जोर दिया जाने लगा है। वह इसके लिए तो ध्यान दिवस मनाते हैं। ये सब अच्छा सम्वाद देते हैं।

महावीर ने प्रथम पात्र गौतम को चुना है । उन्होंने बताया कि जीवन में महानतम उपलब्धि आत्म साक्षात्कार है और वह ध्यान से होती हैं । गौतम स्वामी प्राय : चार प्रहर ध्यान करते थे और चार प्रहर का स्वाध्याय आदि करतें हैं । वह यह क्रम आगे भी बढ़ा , साधक ध्यान के समय तपस्या भी करते है , जब ध्यान में बाधा उपस्थित होने लगती है, तब ध्यान को छोड़कर तपस्या में लीन हों जाते है, जैन साधना में ध्यान का वही स्थान है, जो शरीर में गर्दन का है।

शरीर की शिथिलता ,वाणी का मौन और मन का अंतर में विलीन होना ही ध्यान है । वह जागरूक चेतना का प्रतीक ध्यान है । वह जहां दुःख प्रवेश ही नहीं कर सकता है उस परम आनंद का रसास्वादन ध्यान कराता है । वह जहां प्रियता अप्रियता का भाव समाप्त हो जाता है,चेतना का वह क्षण ध्यान है ।

आदमी के जीवन को ज्योतिर्मय बना देती है वह ऊर्जा ध्यान है । ज्ञान और दर्शन के आवरण जहां समाप्त हो जाते हैं, वह निष्पति ध्यान है । सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया का नाम ध्यान है।

वह ध्यान सिर्फ योगियों के लिए ही नहीं जन साधारण के लिए भी उपयोगी है । भगवान महावीर ने भी कहा हैं की हमारे जीवन में महानतम उपलब्धि कोई हैं तो वह हैं आत्म साक्षात्कार की और वह ध्यान से होती है ।

जप दिवस

आचार्य भिक्षु मेवाड़ में प्रवास कर रहें थें । केलवा के श्रावक शोभजी स्वामीजी के परम भक्त थें ।वे जब मन होता , स्वामीजी के दर्शन करते और कई दिन तक उपासना करते थें । एक बार ऐसा हुआ कि काफी दिन हो गए और उन्होंने स्वामीजी के दर्शन नहीं किए तो स्वामीजी का आश्चर्य होना स्वाभाविक था ।

वह जो श्रावक बराबर दर्शन करतें है, वे काफी दिन तक नहीं आते तो पूछना भी पड़ता हैं कि आजकल वे कहाँ हैं । स्वामीजी ने पूछ कर सही से पूरी जानकारी ली ।शोभजी को षड्यंत्रपूर्वक फँसाया गया और तत्कालीन उदयपुर शासक के द्वारा उन्हें बंदी बनाकर नाथद्वारा की जेल में डाला दिया गया ।

स्वामीजी ने शोभजी को जेल की बैरक में जाकर दर्शन दिए तो उससे पहले स्वामीजी ने दूर से शोभजी को पहले देखा तो वो स्वामीजी का बड़ी तन्मयता से गुणगान कर रहें थे आखिर भक्त श्रावक की दीनताभरी पुकार के उत्तर में स्वामीजी बोलें- शोभजी मैं आ गया ।अपनी आँखे खोलों और दर्शन करो ।

उनके कर्णकुहरों को भेदकर आवाज शोभजी के अवचेतन मन तक पहुँची तो वे सजक हों गए । यह सुन उनकी आँखें खुली तो उनको जोर का झटका लगा ओह ! स्वामीजी तो सामने खड़े हैं । उस समय विह्वल भाव से उनके मुँह से बोल नहीं फूट सकें । उनकी वाणी अवरुद्ध हो गई ।

भक्ति का रस अब आँखो के रास्ते झरने लगा । भावना का ज्वार इतने वेग से आया कि हाथ की हथकड़ी और पैरों की बेड़ी तड़ाक से टूटकर नीचे गई और शोभजी एक झटकें के साथ बंधन मुक्त हों गए ।यह एक सच्ची घटना हैं । वह इतिहास में इसका पूरा वर्णन हैं ।भक्ति रस से भरी किसी भी पंक्ति को मंत्र बनाया जा सकता हैं ।

वह उस मंत्र को भावों से भावित कर दिया जाए तो उसकी शक्ति अपरिमित हो जाती हैं । मंत्र में शब्द , भावना और प्रकंपन -इन तीनों का योग होता हैं ।भावना जब प्रबल बनती है तो कोरा शब्द भी शक्तिशाली बन जाता हैं और भावनाशून्य मंत्र को हम हजार बार दोहराएं तो भी उससे कुछ भी नहीं होता हैं ।

जप का अर्थ मंत्र की पुनरावर्ती हैं । हम वैदिक परंपरा को देखें और जैन अथवा बौद्ध परंपरा को देखें , लौकिक परंपराओं को देखें, सबने मंत्रों का चुनाव किया हैं । भारतीय दर्शनों में मंत्र का बहुत विकास हुआ हैं और वह इसलिए हुआ हैं कि उससे कुछ उपलब्धियाँ अर्जित की जा सकती हैं ।

मंत्र ध्वनि ही एक ऐसा साधन है जो हमारे जगत से बंधे मन को मुक्त- बंधन कर देती हैं ।वह विज्ञान के अनुसार सुक्ष्मध्वनि तीव्र छेदन करती है । भारतीय शास्त्रों के अनुसार किसी विशेष साधना के लिये जप को महत्वपूर्ण माना जाता है। वह ऊर्जा जागरण का एक सक्षम विधिवत माध्यम जप है ।

यह एक प्रकार का तप है जिसमें किसी खास उद्देश्य के लिये मंत्रोच्चार द्वारा सोद्देश्य साधना व लक्षित आराधना की जाती है।

अणुव्रत चेतना दिवस

अणु यानी सूक्ष्मतम कण पर शक्ति असीम असाधारण सृजनात्मक भी, विध्वंसात्मक भी आदि – आदि । हम सभी विध्वंस हिरोशिमा नागासाकी की विनाशलीला का दृश्य तो जानते ही हैं। वह सृजनात्मकता में ऊर्जा का असीम रचनात्मक स्रोत है । यह लघु कण एटॉमिक ऊर्जा से विद्युत उत्पादन में साक्षात उदाहरण है ।

आचार्य तुलसी के उर्वर मस्तिष्क में उठी एक कल्पना जो विद्युत तरंग सा एक रचनात्मक सपना आया कि लघु व्रतों से जीवन को सँवारना कैसे हैं । हमने लघु में विशाल का गहन चिन्तन किया। वह सकारात्मक सोच का स्पंदन व अणुव्रतों का अवतरण हुआ ।

हमारे छोटे-छोटे व्रतों से जीवन सुधरे । यह हर श्रेणी के लोगों के लिए संजीवन हैं । वह जैसे विद्यार्थी हो या हो व्यापारी, राजनीतिज्ञ हो या कोई संस्था प्रभारी आदि – आदि हो।यह सबके लिए अणुव्रत आचार संहिता न्यारी-न्यारी है । आज के वातावरण में इसके नियमों की विभिन्न क्षेत्रों में विकास व रक्षा नैतिक मूल्यों की इसकी सटीक प्रासंगिकता है ।

यह वर्तमान में अपेक्षित ही नहीं, भावी पीढ़ी का हो इससे गहन लगाव यह आवश्यक है जिससे आत्मिक भाव जुड़ा रहे । वह उनका मन उन्मुक्त उच्छृंखलता की ओर झुकाव कर निष्क्रिय नहीं हो ।वह उन पर तथाकथित Open Society व Modern विचारधारा का विनाशक प्रभाव रोका जा सके।

वह आधुनिकता की आड़ में सुसंस्कृति का जो विनाश हो रहा है , आदर्श जीवन का उज्जवल प्रकाश लुप्त हो रहा है उसको रोकने का सशक्त माध्यम अणुव्रत हैं ।

अतःहमारी दृष्टि यथार्थ पर हों । हमारी व्यवस्था ऐसी बने कि वो हमको कुपथ पर जानें से रोकें ।वह हमारे द्वारा कोई भी कभी भी कैसे ही गलत कार्य हों ही नहीं अगर ऐसा हमारे द्वारा आचरणों में होता हैं तो मानसिकता में सकारात्मक बदलाव भी आयेगा और यथा परिवर्तन की प्रक्रिया की शुरुआत भी होगी।

वाणी संयम दिवस


मनुष्य और पशु में अंतर क्या है ? इस प्रश्न पर विचार करें तो पाएंगे कि मनुष्य के पास परिष्कृत वाणी हैं , किंतु पशु के पास नहीं हैं ।मनुष्य अपने भावों को वाणी के द्वारा व्यक्त कर सकता है , पशु ऐसा नहीं कर सकता हैं ।यह दोनों में एक बड़ा अंतर हैं |

हमारे जीवन के साथ कुछ ऐसे नियम और कानून जुड़े होते हैं जिनका पालन करके ही मनुष्य सुखपूर्वक जी सकता हैं । प्रत्येक मनुष्य के पास मन, वाणी और शरीर तीन शक्तियाँ हैं ।

इन तीनों को कहाँ खर्च करना तथा व्यय हुईं शक्तियों को पुनः कैसे अर्जित करना हैं, इसका विवेक होना हर समझदार व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं ।वाणी के बाद बात मौन की आती है। प्रश्न हो सकता हैं कि जब हमारे पास बोलने की शक्ति हैं तो फिर मौन क्यों?

वह कहना तो यह चाहिए की प्राप्त शक्ति का हमारे द्वारा अधिकतम उपयोग हों । हमारा मन हैं तो चिंतन करों, वाणी हैं तो बोलो और जो शरीर मिला हैं उससे क्रिया करों। यह वर्जना और निषेध क्यों? प्रश्न बहुत स्वाभाविक है वह
इसका हम उतर खोजें तो बहुत कठिन नहीं हैं ।

मौन का अर्थ बोलने की कला है । वह केवल न बोलना मौन नहीं है बल्कि ढंग से बोलना और कलापूर्वक बोलना मौन हैं । वह शक्ति का उपयोग कब करना चाहिए? क्यों करना चाहिए और ये तीनों महत्वपूर्ण प्रश्न हैं । हमारे पास बोलने की शक्ति है , किंतु इसका मतलब यह नहीं हैं कि हर समय बोलतें ही रहें । हम कब बोलें? पहले इस प्रश्न का उतर तो तलाशना चाहिए ।

वह हम निरंतर बोलते ही रहेंगे तो पागल हों जाएंगें , शक्ति क्षीण हो जाएगी । वह एक समय ऐसा आएगा कि वाणी पूरी तरह से अवरुद्ध हों जाएगी । वह अपव्यय किसी भी दृष्टि से उपयोगी नहीं होता हैं । वह अधिक सोचने में जितना अनिष्ट होता हैं , उससे कम अनिष्ट बोलनें में नहीं हैं ।

हमारे बोलने का उद्देश्य अपनी बात औरों तक पहुँचाना हैं । वह हमारी बात वहाँ तक पहुँचाने के लिए माध्यम गलत हैं , उत्तेजना भरें हैं, शिथिल हैं, कपटपूर्ण हैं तथा उलझन भरें आदि हैं तो हम हमारे आस -पास
एक अस्वस्थ वातावरण तैयार कर लेते हैं ।

वह हमारे जीवन की मधुरता जो वाणी में बहती रहती हैं वह नीम में परिणत हो जाती हैं ।अतः हम अनावश्यक न बोलें, अप्रिय और अहितकर बात नहीं बोलें और सोचें समझें बिना नहीं बोले ।

वह आज वाणी संयम दिवस के दिन हम वाणी का सही से मूल्यांकन करें । हम अपनी शक्ति को जीवन में व्यर्थ होने से बचाएं । हम वाक्- शक्ति से संपन्न होकर भी अवाक् की साधना करें ।

जीना आना चाहिए


एक घटना प्रसंग दो जन मिल कर कभी भी बात करते रहते है एक बार आपसी बातचीत में किसी संदर्भ में एक ने कह दिया कि सोच-समझ कर ही चलना चाहिए। वह जिन्दगी एक बार ही मिलती है, जीना आना चाहिए। यह सुन दूसरे से तुरंत जवाब मिला कि जनाब! यह गलत है ।

एक बार सिर्फ मौत ही मिलती है वह जिन्दगी तो हर रोज उठते ही हमको नई ही मिलती है। वह बस ! हमको आना चाहिए कि पल-पल जिन्दगी का सही से जी आनन्द लेना। वह यहाँ आनन्द से जीने का मतलब कतई नहीं है कि मौज-मस्ती करना अपितु उस उद्देश्य की पूर्ति हेतु आगे बढ़ते रहना हैं ।

वह हमारे जीवन में समय धन से भी ज्यादा कीमती है क्योंकि यदि धन को खर्च कर दिया जाए तो वह प्रयास से वापस प्राप्त किया जा सकता है हालांकि यदि हम एक बार समय को गंवा देते हैं तो इसे वापस प्राप्त नहीं कर सकते हैं । वह समय के बारे में एक सामान्य कहावत है कि समय और ज्वार-भाटा कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करते हैं।

यह बिल्कुल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व की तरह ही सत्य है अर्थात जिस तरह से पृथ्वी पर जीवन का होना सत्य है ठीक उसी तरह से यह कहावत भी बिल्कुल सत्य है । वह समय बिना किसी रुकावट के निरंतर चलता रहता है, यह कभी किसी की प्रतिक्षा नहीं करता है।

हमें इसलिए जीवन के किसी भी दौर में कभी भी अपने कीमती समय को बिना किसी उद्देश्य और अर्थ के आदि में व्यर्थ नहीं करना चाहिए । वह हमें हमेशा समय के अर्थ को समझना चाहिए और उसी के अनुसार इसे सकारात्मक ढंग से कुछ उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए ।

अतः हमें इससे निरंतर कुछ ना कुछ सही से सीखते रहना चाहिए । वह समय यदि यह बिना किसी रुकावट के चलता रहता है तो फिर हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं ।

अतः हमने अपने पूर्व के शुभ कर्मों के योग से यह मनुष्य जन्म जो पाया है। वह जिसको सही से अच्छे उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिन्दगी का उपयोग करना हमको आ गया तो समझे हमने जिन्दगी को जीना सीख लिया है । वह इस तरह हम भी अभी से इस तरह अपना जीवन जियें कि हमारा यह सपना पुरा हो जायें। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

एक बीमा


खुद के द्वारा खुद के लिए हम में से अधिकतर अपना बीमा वह परिवार का बीमा करवाते है । वह ऐसे ही काम के निमित कोई मुझसे मिलने आया।

मैं उनको सही से व्यवहार में नहीं जाना था पर उन्होंने अपने को बीमा सलाहकार बताया वह अपना परिचय दिया । वह कहा आप परिवार की ,निज की आर्थिक सुरक्षा के लिए Whole Life जीवन बीमा कराते हो और उसमें सारी उम्र प्रिमीयम का पैसा देते हो।

वह उसका लाभ मरणोपरांत घर वालों को मिलता है। वह आप तो बिना लाभ लिए ही चले जाते हो। वह मुझसे और बोले कि मैं कहता हूँ एक बीमा खुद के लिए खुद ही ऐसा भी कर लो जिसका प्रीमियम पैसों में नहीं है ।

यह सामायिक, स्वाध्याय, सद्व्यवहार, सदाचार, मौन, ध्यान, तप, जप आदि – आदि के रूप में है। वह जरूरी नहीं है कि धर्म केवल धर्म-स्थान में ही किया जाए ।वह जहाँ भी हो जाए मन धर्म में रमण करने को स्थान हो शुद्ध-पवित्र तो धर्म यहाँ-वहाँ, सर्वत्र किया जा सकता है।

वह संक्षिप्त में धर्म हमारी सिर्फ चर्चा में ही नहीं चर्या में भी होना चाहिए । वह धर्म केवल इष्ट के चित्र में ही नहीं यह हमारे चरित्र में भी होना चाहिए । वह धर्म केवल मंत्रोच्चारण में ही नहीं हमारे आचरण में भी उतरना चाहिए । वह धर्म केवल हमारी जिह्वा पर ही नहीं जीवन में भी होना चाहिए ।

वह अंत में धर्म केवल मंदिर में ही नहीं हमारे मन के मंदिर में होना चाहिए । वह साँस छूटते ही हमें अपने आप बीमा का तुरंत लाभ मिल जाता है। वह क्लेम फाइल करने का भी कोई झंझट नहीं है । वह कोई काम नहीं है ।

वह अन्त में मुझे बोले कि बात समझ में आई हो तो औरों को भी बताएँ। वह उनको लाभ मिलेगा तो धर्म-दलाली आप को भी अपने आप मिलेगी । यह ऐसे बीमा कराने का उपदेश देने वाले और कोई नहीं पाँच महाव्रत धारी साधु है । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

सामायिक दिवस


सामायिक शब्द अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं । वह यदि इसमें से “सा “ निकाल दिया जाए तो वह सामायिक के विपरीत मायिक बन जाता है, जिसका अर्थ होगा मायाचार अर्थात् बिना समता के किया गया धर्माचरण । एक प्रचलित
धारणा हैं कि जैन धर्म बहुत कठिन धर्म हैं ।

आचार्य तुलसी नालन्दा पधारें । वहाँ विश्वविद्यालय के कुछ प्रोफेसर आए । बातचीत के क्रम में उन्होंने कहा – आचार्य जी ! और तो सब ठीक हैं , किंतु जैन धर्म बहुत कठिन धर्म हैं । मुनि की चर्या इतनी कठिन कि सबके लिए उसका पालन संभव नहीं हैं ।

एकांतवास करना, दुस्सह कष्टों को झेलना, घोर तपस्या और अंत में अनशन द्वारा जीवन की समाप्ति ।बड़ी कठिन और दुरूह है यह साधना । गुरुदेव ने बड़े गौर से उनकी और देखा और बोलें कि आपको किसने बताया कि जैन धर्म में मुनि की चर्या कठोर होती हैं ।

मैं तो आपके सामने हूँ, किसी गुफा में तो नहीं हूँ । रोज यात्रा करता हूँ, लोगों के बीच में जाता हूँ । इस समय आपके सामने हूँ मेरी दृष्टि में तो जैन धर्म सबसे सरल धर्म हैं । इसमें किसी तरह की कठिनता नहीं हैं ।

मात्र समता की साधना करों, सामायिक करों, जैन धर्म का मर्म अपने आप ही पकड़ में आ जाएगा । वह जहाँ तक तपस्या की बात है, जैन धर्म के केवल एक उपवास अनिवार्य हैं , शेष अपनी इच्छा पर ।

जोर- जबर्दस्ती का तो जैन धर्म में कोई प्रश्न ही नहीं हैं । बलात् किसी को किसी के ऊपर थोपने का जैन धर्म प्रबल विरोधी हैं। ऐसी चर्चा केवल आचार्य तुलसी के जमाने में ही नहीं चली । हजारों वर्षों से यह चर्चा चलती आ रहीं हैं ।लोगों में यह आम धारणा बनी हुई हैं कि जैन धर्म बहुत कठिन धर्म हैं ।

सामायिक क्या ? बुद्धि और मन को सम करना, एक दिशागामी करना सामायिक हैं ।विभाव से स्वभाव में आना सामायिक हैं । चंचलता से स्थिरता में आना सामायिक हैं । सामूहिक जीवन में वैयक्तिकता की और प्रस्थान करना सामायिक हैं । गृहस्थ भाव से साधुता की और चलना सामायिक हैं ।

सामायिक का अर्थ है सीधा चलना, सच बोलना, सही सोचना और जो भी करें वह साफ हो , सरल हो, उपयोगपूर्ण हों, विवेकपूर्ण हों । सामायिक संवर और शोधन दोनों की संयुक्त प्रक्रिया हैं । इस अवधि में क्रियात्मक पाप रुकता हैं और कृत पापों का शोधन होता हैं ।

सामायिक राजयोग हैं ।शुद्ध,सरल,अध्यात्म का प्रयोग हैं । इसमें हठयोग के लिए कोई अवकाश नहीं हैं । आसन बाहर से भीतर में जाने की प्रेरणा हैं जबकि सामयिक भीतर से भीतर रहने की स्थिति हैं ।

भगवान महावीर के शब्दों में आत्मा ही सामायिक है । यही केवलज्ञान हैं । यही चारित्र और यही समाधि ध्यान हैं । सामायिक समता का अभ्यास हैं । वह प्रतिकूलताओं के बीच संतुलन हैं । विवादों को शान्त करती हैं । इन्द्रियों को अन्तर्मुखी एवं मन शान्त ,स्थिर एवं समाधिमय बनाती हैं । जीवन में सामायिक की उपासना का एक महत्वपूर्ण
स्थान हैं ।

स्वाध्याय दिवस


वर्तमान युग में शिक्षा का बहुत- बहुत महत्व हैं । वह प्रत्येक व्यक्ति को साक्षर बनाने की योजनाएं चल रही हैं ।साक्षरता के लिए सरकार द्वारा बहुत प्रयत्न किए जा रहें हैं ।

शिक्षा और स्वाध्याय दोनों एक ही बात हैं । ज्ञान दो भागों में बंटा हुआ है- पदार्थ का ज्ञान और आत्मा का ज्ञान । वह दूसरे शब्दों में कहें तो जीविका का ज्ञान और जीवन का ज्ञान हैं । ज्ञान ज्ञान हैं ।

वह उसके दो आयाम बन गए हैं । लौकिक जीवन को चलाने के लिए ज्ञान जरूरी होता हैं और आत्मा को जानने के लिए भी ज्ञान जरूरी होता हैं । अपने आपको जानने के लिए जो ज्ञान होता हैं, वह स्वाध्याय हैं ।

विद्यालयों, विश्वविद्यालयों आदि में जों पढ़ाया जाता हैं, वह भी स्वाध्याय हैं । स्वाध्याय का अर्थ हैं अध्ययन, शिक्षा और ज्ञान की प्राप्ति । जो पढ़ा हुआ हैं, उसकी सही से स्मृति करना , पठनीय विषय का मनन करना, उसे दूसरों तक पहुँचाना- ये सारे स्वाध्याय से जुड़े पहलू हैं ।स्वाध्याय का व्यापक अर्थ अनुशीलन हैं ।

ध्यान भी स्वाध्याय से जुड़ा हुआ हैं ।हम ध्यान और स्वाध्याय को सर्वथा पृथक नहीं कर सकते हैं ।जो ध्यान करने वाला है , उसके लिए स्वाध्याय करना जरूरी हैं । स्वाध्याय और ध्यान दोनों में बहुत गहरा संबंध हैं । उद्देश्य एक ही है सत्य की खोज ।

स्वाध्याय से ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म क्षीण होते हैं । जब आवरण का क्षय होता है , ज्ञान प्रगाढ़ होता हैं । वर्तमान में अध्ययन का मूल्य बहुत बढ़ गया । कोई भी कहीं जाएगा तो पहला प्रश्न होगा, कहां तक पढ़े हों । आचरण की बात शायद बहुत कम पूछी जाती हैं।

शिक्षा की सारी बात जीविकापरक हैं । बिना पढ़े जीविका ही नहीं मिलती । जीविका की बात शिक्षा के साथ जुड़ गईं । क्या उसके साथ जीवन की बात को नहीं जोड़ा जा सकता । जीवन के लिए वह अधिक जरूरी हैं । इस दृष्टि से विचार करें तो स्वाध्याय का मूल्य अधिक समझ में आएगा ।

आत्मज्ञान के क्षेत्र में कुछ पढ़ने की मनोवृत्ति जागेगी , जीवन की सार्थकता का बोध होगा । वह सार्थकता विकास के उस महातट की और ले जाएगी, जिससे जीवन – निर्माण और व्यक्तित्व- निर्माण की संभावना हो जाएगी ।

प्रकृति के सानिध्य का आनन्द

प्रकृति की उदारता और उसके मौन संदेश को काश हम सही से समझ पाते। उसके निष्काम त्याग के भाव हमारे मन की बगिया मे भी कुछ जन्म जाते। सच मानों तब स्वर्ग सी रूबरू तस्वीर धरती के कण-कण मे हमको दृष्टिगत होती ।देव भी हमारे इस निष्काम, निस्पृह निष्ठा भाव आदि के आगे अपना सर शान से झुकाते।

विशाल ब्रह्मांड का कण कण हमें अपनी उदारता से सीख देता है। धरती माँ हमें सहना सीखाती है और पानी, अग्नि , वायु हमे मर्यादा में रहना सिखाते हैं आकाश हमें विशालकाय छाती रखकरनिस्वार्थ भाव से सबका सहयोग करना सिखाता है । पर्वत हमें गर्व से ऊंचा सिर हो ऐसा करने कीप्रेरणा देता है ।

फलों से लदी टहनियां हमें विनयपूर्वक झुकना सिखाती है नदी सदा मिलजुलकर सतत प्रवाहमान रहने कीप्रेरणा देती है इतना ही नहीं हमारे घर की खिड़कियां हमे मन के मैल को दूरकर ज्ञान का प्रकाश भरने की प्रेरणा देती है।

दीवार पर लगी घड़ी हमें समयकी नश्वरता को समझ उसका सदुपयोग करके जीवन सुधारने की प्रेरणा देती है इस तरह और भी बहुत सारी जीव और अजीव चीजेँ हमे प्रेरित करती हैं यही तो प्रकृति के सानिध्य का आनन्द है जो हमको असीम सुख प्रदान करता हैं । इस पूरे ब्रह्मांड में असंख्य पृथ्वी है उनका वजन असीम,ताकत भी अमाप है।

सीखाया पंछीयों ने भोर वय उठ जाना,खुले गगन में सैर , चहक-चहक जीवन का राग सुनाना।विशाल ब्रह्मांड से पायी शुद्ध हवा, निर्मल जल,सात्विक नैसर्गिक भोजन,स्वास्थ्यप्रद रमणीक वातावरण और उदारता आदि इतनी की जब भी चाहते हैं भीड से भरी जिन्दगी से निकलना तो हम प्रकृति की शरण में भागते हैं ।

इस तरह हम कह सकते हैं कि प्रकृति हमारे आस-पास हर पल हम पर अलग-अलग रूपों में आनन्द की बहार करती रहती है ।परन्तु हम अपने गोरखधंधों से ही बाहर नहीं निकलते हैं । इसी स्थिति के लिए तो कहा गया है कि सकल पदार्थ है जग माहीं पर कर्महीन नर पावत नाहीं।

भगवान श्रीकृष्ण : खण्ड-1


भगवान श्रीकृष्ण हिंदू धर्म में एक प्रमुख देवता हैं जिन्हें भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। उन्हें प्रेम, करुणा, और सुरक्षा का देवता माना जाता है और व्यापक रूप से पूजा जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और शिक्षाओं का हिंदू धर्म और संस्कृति पर गहरा प्रभाव है। वे प्रेम, भक्ति, और कर्मयोग के प्रतीक हैं । भगवान श्रीकृष्ण वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे। देवकी कंस की बहन थी। कंस एक अत्याचारी राजा था। उसने आकाशवाणी सुनी थी कि देवकी के पुत्र द्वारा वह मारा जाएगा।

वह इससे बचने के लिए कंस ने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में डाल दिया। मथुरा के कारागार में ही भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनका जन्म हुआ। कंस के डर से वसुदेव ने नवजात बालक को रात में ही यमुना पार गोकुल में यशोदा के यहाँ पहुँचा दिया।

वह गोकुल में उनका लालन-पालन हुआ था। यशोदा और नन्द उनके पालक माता-पिता बने।वह अपने जन्म के कुछ समय बाद ही कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी पूतना का आपने वध किया , उसके बाद शकटासुर, तृणावर्त आदि राक्षस का आपने वध किया।

वह बाद में आप गोकुल छोड़कर नंद गाँव आ गए वहां पर उन्होने गोचारण लीला, गोवर्धन लीला, रास लीला आदि की। वह इसके बाद मथुरा में मामा कंस का आपने वध किया। वह
क्रमशः आगे ।

भगवान श्रीकृष्ण : खण्ड-2

आपने सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहाँ अपना राज्य बसाया। उन्होंने पाण्डवों की मदद की और विभिन्न संकटों से उनकी रक्षा की। महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई और रणक्षेत्र में ही उन्हें उपदेश दिया। 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त की।

उनके अवतार समाप्ति के तुरंत बाद परीक्षित के राज्य का कालखंड आता है। वह राजा परीक्षित जो अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा अर्जुन के पौत्र थे । वह उनके समय से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है। वह वैसे तो श्रीकृष्ण के जीवन के सभी पक्ष दिलचस्प हैं |

वह उनकी बाल क्रीड़ाएँ, गोपियों संग रासलीलाएँ, राधा संग प्रेयसी की कथाएँ आदि -आदि उनके जीवन के कितने पक्ष बताएँ। इस धरा पर भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्ट कंश के अत्याचारों का दमन करने तथा कौरवों की पाप वृत्ति का शमन करने को अवतरण लिया ।

वह बाल रूप में भी श्रीकृष्ण ने सही से अपना पौरुष रूप दिखलाया। वह कंश द्वारा प्रेषित कितने राक्षस रूपों को आपने ठिकाने लगाया।वह फिर भी मामा कंश न माने तब आखिर में उनको भी आपने अंतिम राह दिखा दी।इस धरा को उस महापापी से मुक्त करा दी। वह तत्पश्चात की और भी दिलचस्प कहानी हैं । उन्होंने कुटील मामा शकुनी व मतिभ्रष्ट कौरवों की भी समूल
क्रमशः आगे ।

भगवान श्रीकृष्ण : खण्ड-3

निशानी मिटा दी। वह सबसे महत्वपूर्ण अवदान तो कहना चाहिए था कि कुरुक्षेत्र युद्ध भूमि में अर्जुन का मनोबल बढ़ाने के निमित्त युग-युगान्तर को पवित्र गीता का अमर उपदेश दिया जो अनादि काल तक विश्व को सही से जीवनोपयोगी संदेश देता रहेगा ।

वह हम सारभूत में उनके अवतरण के बारे में यह कह सकते हैं यदा यदा ही धर्मस्य: ग्लानिर्भवती भारत:। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याम्यहम |

भगवान श्रीकृष्ण के बारे में कुछ मुख्य बातें जैसे अवतार- भगवान विष्णु के आठवें अवतार , जन्म- द्वापरयुग में मथुरा में ,माता- पिता- वसुदेव और देवकी, जन्मस्थान- मथुरा कारागार, पालन- पोषण- गोकुल में नंद और यशोदा के घर , लीलाएँ-बाल-लीला, गोचारण लीला, गोवर्धन लीला, रास लीला, कंस वध, द्वारका स्थापना, महाभारत में अर्जुन के सारथी ,भगवद गीता – कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद , अन्य नाम- कान्हा, कन्हैया, गोपाल, नंदलाला, वासुदेव, माधव, गोविंद, श्याम, मुरलीधर, आदि , जन्माष्टमी- भगवान कृष्ण का जन्मदिन, जो भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है । ऐसे भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में मेरा भावों से सभक्ति नमन !
प्रणमन ।

पैसा बड़ा नशा

दुनिया में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिनके पास बेशुमार धन दौलत है फिर भी और धन कमाने की किसी भी प्रकार से क्षुधा लगी ही रहती है । अब जो मिला है फिर ना मिलेगा,कभी नही-कभी नही फिर भी हम मानव इच्छा पूर्ति के लिए समुद्र पार दौड़ रहे हैं और हमें सही समझ ही नही आ रहा है ।

हम इस मानव जन्म रूप में स्वर्ग पाताल राज करो में लग रहे हैं जिससे तिसना अधिकी अति की आग हमारी आगे से आगे लगती ही रहेगी , इस मानव जीवन रूपी स्वर्णथाल का उपयोग हम धूल फेंकने के लिए कर रहे हैं , मानव जीवन रूपी इस अमृत का उपयोग हम पैर धोने के लिए कर रहे हैं , मानव जीवन रूपी इस उत्तम हाथी का उपयोग हम लकड़ियों की ढुलाई के लिए कर रहे है तथा मानव जीवन रूपी इस चिंतामणिरत्न को क़ौआ उड़ाने के लिए फेंकने वाला आदि – आदि काम कर रहे हैं।

हमें मानव भव मिला है और ज्ञानी संतो की वाणी मिली है , सत्य और अहिंसा की शक्ती मिली हैं आदि- आदि , फिर भी भौतिकवाद और उपभोक्तावादी चकाचौंध मे हम फँस गये हैं क्यों इतना जानने के बाद समझने के बाद मन मे जीवन में दिशाहीन हैं क्योंकि हमने ख़ुद को संसार की इस क्षणभंगुरता में जकड़ लिया है और किसी भी तरह का कोई डर-भय आदि नही हैं ।

दिखावे की इस अंधाधुँध में घर घोड़ा गाड़ी बंगला पद प्रतिष्ठा आदि – आदि सफलता कितनी ही क्यों ना हो अगर दो पल चैन के व आनंद के नही तो सब व्यर्थ हैं । भौतिकवाद और उपभोक्तावादी चकाचौंध मे लोग जितनी चादर उससे अधिक पैर पसार तुलना की होड़ में लग गए हैं ।

अगर सच्चा सुख चाहिए तो बस इस सांसारिक उलझनों से निकल कर जीवन का सात्विक आनन्द लें । हम सही से धर्माराधना की ओर मुडे़ं वह शरीर, मन और आत्मा की तरफ अधिकाधिक गौर करें।ना किसी से ईर्ष्या , ना किसी से होड़ ,मेरी अपनी मंजिलें , मेरी अपनी दौड़ ।क्योंकि पैसे में आकर्षण जरूर हैं पर एक सीमा के बाद यह भौतिक मायाजाल का मिथ्या ग़ुरूर हैं ।

खाद्य संयम दिवस


हमारे जीवन में रोटी का प्रश्न पहला प्रश्न हैं । यह पहला प्रश्न है इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न हैं । वह कोई भी मनुष्य खायें
बिना नहीं जी सकता है और जब जी नहीं सकता है तब कुछ भी नहीं कर सकता हैं । हमको कुछ भी करने के लिए जीवन जरूरी हैं और जीवन के लिए रोटी जरूरी है । संयम स्रष्टि का आदि हैं ।

यह जड़ और चेतन दोनों की सुरक्षा का मूलभूत आधार हैं ।वह जड़ पदार्थों का खुला प्रयोग जैसे भौतिक जगत के विनाश की कहानी गढ़ता हैं वैसे ही असंयम मानव – जाति के लिए भारी विनाश का कारण बनता हैं । वह सम्पूर्ण स्रष्टि में अमन चैन का एक मात्र साधन संयम हैं ।

वह इसी संयम के कारण सामाजिक, पारिवारिक तथा विविध संगठन आदि – आदि खड़े होते हैं । हमारे इस शरीर का गठन भी किसी विशेष संयम के कारण सुरक्षित रह सका है ।

वह खाने पीने का संयम हैं ।हर व्यक्ति एक सीमा तक खाने पीने का संयम रखता है भले ही फिर वह रोग के डर से हों, सौन्दर्य नष्ट होने के भय से हों तथा मेरे भोग छूट न जायें इस कारण से हों आदि – आदि । यह सहज जीवन की व्यवस्था हैं ।

जैसे कपड़े का कारण धागा और धागे का कारण पक्ष्म ( रोम ) हैं, वैसे ही मोक्ष का कारण ज्ञान, दर्शन और आचारमय जीवन हैं और जीवन का कारण आहार हैं ।वह आहार के बिना जीवन नहीं हो सकता तथा जीवन के बिना ज्ञान, दर्शन और आचार की आराधना नहीं हो सकती और उसके बिना बंधन – मुक्ति नहीं हो सकती हैं ।

इसका तात्पर्य यह हैं कि मनुष्य की पहली चिंता और पहली अपेक्षा आहार हैं ।अतः हमारे द्वारा आहार के प्रश्न को गौंण नहीं किया जा सकता हैं और इसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती हैं । साधना के लिए स्वास्थ्य जरूरी हैं और स्वास्थ्य के लिए आहार जरूरी हैं । वह सभी का सही से संतुलन होने पर हम अनेक शक्तियों को जागृत करने में सफल हों सकते हैं ।

पर्युषण महापर्व


हमको उन्नत धार्मिक भावनाओ से भरने वाला यह अध्यात्म की रश्मियों से ओत- प्रोत करने वाला पर्व हैं । हमको जिस गुण से पूर्ण होना है उसकी भावना, साधना , आराधना, अनुप्रेक्षा आदिकरना इस पर्व की मूल प्रेरणा हैं ।

यह पर्युषण पर्व नहीं किन्तु महापर्व हैं । यह भद्राव मास में सामान्य त्यौहारों की तरह आता हैं इसलिए पर्व हैं किन्तु यह पर्व पूर्ण आत्मशुद्धि का प्रेरक और उत्प्रेरक हैं इसलिए महापर्व हैं । यह जैनो का एकमात्र विशिष्टतम पर्व हैं ।

यह पर्व हमको स्वयं का परिवर्तन विशेष रूप से आत्म मंथन करने को कहता है । यह महापर्व धर्म की ज्वाला से ज्योति जगाने आया है ।हम आध्यात्म साधना में निमग्न हो सर्व अंतर के दोष निकालें । यह पर्व आत्मा के स्व-स्वभाव में आने का है । यह विशेष आत्मशुद्धि का पर्व सामायिक , ध्यान आदि की विशेष धर्मेपासना वह जप ,तप, व्रत, उपवास आदि – आदि नाना अनुष्ठान कर कर होता हैं ।

वह सामर्थ्यानुसार त्याग,पच्चखान किया जाता है । यह पर्व में संयमित खान-पान, सीमित परिधान आदि का माहौल होता हैं । वह विषयों से दूर रहने का संकल्प एवं कौल किया जाता हैं ।यह पर्व में हमको निमग्न आत्ममंथन में अधिकतम रहने को समय मिल जाता हैं ।

वह चारित्रात्माओं का प्रवचन सुनना वह स्वभाव को संयत और सम रखना का योग-सुयोग भी होता है ।
यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक साधना का पर्व होता है |

पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व आध्यात्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से आत्मा की शुद्धि का अधिकाधिक आत्म मंथन का पर्व हैं ।

श्री मज्जयाचार्य जी का 145 वां प्रयाण दिवस


श्री जिनशासन के गणमाली , आगम के उदगाता ।
भारत भू- मंडल में विरले सन्त बन अवतार आए ,
लो स्वीकारों श्रद्धा – सुमनों का उपहार हम लाए ।।
आत्मा पर आत्मा का शासन , प्रामाणिक – व्यवहार ,
अहंकार का सघन विलय हो , हो विनम्र – व्यवहार ।
हैं व्यवहार संघ का मंत्र , निश्चय -नय आत्मा का तंत्र ,
देंगे सपनों को आकार , पाकर आस्था का आधार ।
मन की आशा फलेगी ओम् ,सुरभित सांस मिलेगी ओम् ।।
दिया मूल्य संयम को गहरा बाह्य दृष्टि फिर नहीं पली,
‘आचार : प्रथमों धर्म ‘ की स्वर लहरी अविराम चली ,
आध्यात्मिक अनुभव की सरिता आत्म – निरीक्षण से निकली ,
प्रबल मनोबल धाराधर से कौंधी उजली सी बिजली ,
हैं अनुशासन तो सहयोगी , संघ – संगठन के उपयोगी ।
सहज कसौटी हैं संयम की , जागरूक – व्यवहार ,
तन में हमारे रहे निरन्तर , जागृति के संस्कार ।
संवेदन का कोमल धागा , थामे मृदु व्यवहार ,
सतत संघनिष्ठा रग – रग में नया – रक्त संचार ।
अप्रमाद का हो अभ्यास , बढ़ते जाएं सब सोल्लास।
संघशक्ति का निर्मल स्रोत , भरता जीवन में उद्योत ।
अदभुत अनेकान्त आलोक , बन जाएं हम सभी अशोक ।
त्रिभुवन तारक तेरापंथ , गण में प्रतिपल रहे बसन्त ।
श्री जिनशासन के गणमाली , आगम के उदगाता ।
भारत भू- मंडल में विरले सन्त बन अवतार आए ,
लो स्वीकारों श्रद्धा – सुमनों का उपहार हम लाए ।।

जीवन का महाभारत : ध्रुव-1


प्रतिशोध की ज्वाला हमारी चेतना को कलुषित बना देती है।वह मात्रा का अन्तर हो सकता है पर यह सभी मे रहती है। हम अप्रमत्त या वीतराग बनकर ही इससे मुक्ति पा सकते हैं क्योंकि यह मनोवृत्ति अवचेतन मन मे अनवरत बहती है। हमारे जीवन में वाणी का अपना मोल होता है ।

अतः हम जब भी बोले तो पहले इसको तौल करके बोले और जब भी हम इनको अपनाये तो हम सबको भाये। इंसान के जीवन में वाणी का विशेष महत्व होता है।वह किस जगह,किस टोन में और किस बात के परिपेक्ष में क्या बोलना आ गया आदि – आदि उसे सही मायने में जीना आ गया हैं ।

वो शब्द ही थे द्रौपदी के जिसके कारण महाभारत जैसा युद्ध रचा गया और दूसरी और वो शब्द ही थे द्रौपदी के जिसके कारण महाभारत में भीष्मपितामह से अखंड शौभाग्यवती भव का आशीर्वाद भी मिला।अतःइसलिए कहते हैं जंहा ज़रूरत हो वंही बोलो और अनायवस्क कभी भी मत बोलो।

मैं इस तरह बैठा- बैठा सोच ही रहा था कि तब मेरे मन में एक कल्पना आई कि महाभारत के अर्जुन के रथ की तरह क्यों नहीं तुलना हमारे तन-मन की नांई की जाए। वह तब लगने लगता है कि अर्जुन का रथ केवल वाहन ही नहीं है यह हमारे पूरे अस्तित्व का हूबहू सही-सही प्रतीक भी हैं ।

हम इसी परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे रथ का तन-बदन हमारा तन है । वह अश्वों की भूमिका हमारी इन्द्रियाँ निभायेंगी । हम कृष्ण सारथी को हमारी बुद्धि समझें और स्वयं अर्जुन हमारी आत्मा हुए । वह हमारा मन अश्वों की लगाम हो गया । वह इस तरह सभी जगहों पर पात्रजन सज गए
क्रमशः आगे ।

जीवन का महाभारत : ध्रुव-2

वह कोई पात्र बाकी नहीं रहा हैं । वह हम यह क्यों भूल जाते हैं कि रामायण और महाभारत आदि हुए तो उसमें विभिन्न पात्रों की साधारण बातें हठ और अहंकार आदि- आदि विनाश के कारण रहे हैं । हर मानव मन में एक अरण्य संस्कृति छिपी है ।

वह जो हमारे मन पर पड़ा तथाकथित सभ्यता का नक़ाब अकस्मात उभर कर हमारे आवरण को हटा देती है । वह तब हमारे शब्द एक हिंसक वन्य पशु की तरह रह रह कर बदलने लगते हैं । यह क्रम अनिरंतर ठहर ठहर कर चलता रहता है ।

अतः आवश्यकता है हम अपने भावों का पैमाना बदलें । वह हमारे रोष हो तो हम अन्याय के विरूद्ध अहंकार बदल कर स्वाभिमान का रूप ले। हम सदा विवेक स्वरूप संयत सोच में रहे तो निश्चित ही सभी तरह से बात बन सकती है । वह जीवन के बन्द दरवाज़ों की चाबी हाथ लग सकती है ।

हम इसी परिप्रेक्ष्य में और देखें तो हमारा सही दिशा में जब श्रीकृष्ण सरीखा जागरूक सारथी होता हैं तब रथ भी आगे बढ़ेगा । वह जीवन के संग्राम में भी जब मन स्वयं रथ का नियंत्रण लेने लगें ।

वह इंद्रियाँ स्वतंत्र हो जाएँ तब आत्मा भ्रमित हो जाती है और हमारा जीवन अनचाहे ही संघर्षों में रत हो जाता है इसीलिए जीवन में श्री कृष्ण जैसे सारथी का होना जरूरी है ताकि हमारे जीवन की सफल विजय की पताका वह फहराना सुनिश्चित कर दे ।

सुभाष जी बैद के मासखमण की तपस्या पर मेरे भाव

आत्म शुद्धि का तप से खुलता द्वार हैं ।
तप की निर्मल गंगा से होता भव सागर पार हैं । ( अन्तरा)
दृढ़ मजबूती सुभाष जी की हम देख हर्षाते हैं ।
दो- दो मासखमण कर तप विरुवा सरसायें हैं । ( अन्तरा)
निर्मल तप गंगा में कल्मष आपने धोया हैं ।
संयम श्री जी की प्रेरणा से तप का पौधा बोया हैं । ( अन्तरा)
सौ बार बधाईं है भावों से ‘प्रदीप’का अर्चन हैं ।
स्वागत करतें है हम लेकर तप का चन्दन हैं । ( अन्तरा)
करतें मिलजुल कर हम तप का अभिनन्दन हैं ।
तपस्वी के चरणों में करतें शत – शत वन्दन हैं । ( अन्तरा)
तप गंगा में बैठ आपने डुबकी लगाईं हैं ।
मुरझाईं कलिओं को तप से विकसाई हैं । ( अन्तरा)
मंजुल भावों से हम तपस्वी को बधातें हैं ।
तप अभिनन्दन पर सब संगीत सुनातें हैं । ( अन्तरा)
सुमित, नीरज, कनक , धीरज , संतोष, प्रमोद का मन पावन हैं ।
मंजु, ललिता, खुशबू, धारा, निशा के मन में खुशियों का सावन हैं । ( अन्तरा)
तप के प्रांगण में खुशियों के दीप जलें हैं ।
कुल पर कलश चढ़ा आपने गौरव क्षण पाया हैं । ( अन्तरा)
तप का बोया सपना आज फलित हो पाया ।
रतनगढ़ में दिव्य नजारा देख ह्रदय हरषाया । ( अन्तरा)
आत्म शुद्धि का तप से खुलता द्वार हैं ।
तप की निर्मल गंगा से होता भव सागर पार हैं । ( अन्तरा)

स्व : श्रीमती प्रेम देवी बरडिया के प्रथम स्मृति दिवस पर मेरे भाव


मानो भादो बदि 6 , 2082 (14-8-2025) की काली अंधियारी रात में घने काले बादल गरज गरज कर बरस रहे थे, चारों ओर अंधकार छाया था और अत्यंत तीव्र बारिश हो रही थी, बिजलियाँ रह रह कर कौंध रही थी वह उसी दिन प्रातः 4 बजे स्व : श्रीमती प्रेम देवी बरडिया यहाँ से च्युत कर देवलोक पधार गई ।

मैं भावों से आपको नमन कर रहा हूँ और स्मृतियों में जो आज शेष हैं उन स्मृतियों में मैं गमन कर रहा हूँ । इन्ही शुभ भावों से आपके चरणों में शत- शत भावों से मैं नमन करता हूँ । वह अचानक ही है से थे में हुआ बदलाव मानो मेरे विश्वास के परे था ।

हमारा जड़ और चेतन का योग ही जीवन बनता है और मरण का संयोग बनता हैं । यह आत्मा और शरीर का अलगाव संयोग और वियोग के भाव पैदा करता है । वह जब हमारा जीना व मरना छूटेगा तो हमारे संबंधों का अलगाव टूटेगा । वह तभी तो हमको अमरत्व प्राप्त होगा और तभी हमारे लिए मुक्ति का मार्ग पर्याप्त होगा ।

सुब़्ह उगता शाम को ढ़लता हूँ मैं , सूर्य के मानिन्द बस चलता हूँ मैं प्राय: सबकी अपने कर्म अनुसार जीवन की यही कहानी हैं । किसी ने लिखा हैं कि वह पथिक की पथिकता क्या, जिस पर बिखरे शूल न हो। वह नाविक की धैर्य की परीक्षा का क्या,जब धाराएँ प्रतिकुल न हो ।

समय गतिमान है तीव्र वेग से गुज़र जाता है,रह जाती कर्तृत्व के स्मृतियाँ शेष है । अतः हम हर क्षण का उपयोग करे वह अपने भीतर सुप्त ज्ञान को जागृत रखे । वह स्वयं को प्रयास करते करते हम सदैव प्रतिभाशाली निरन्तर बनाएँ । हमारी ज़िंदगी की राह में मुश्किलें तो आएगी किंतु !

गम्भीरता व धैर्य आदि के चक्षु से हमको स्वयं ही इससे पार हो सफल बनाना हैं । वह जिसके ये चक्षु जागृत है वह शान्त्त भाव से आगे से आगे विकास के नए – नए रास्ते भी खोलता रहता है। हम अपने जीवन में यह ग़ुरूर करते हैं कि हम इतने वर्ष के हो गए पर हम यह भूल जाते हैं कि इनमें से आधे तो हम रातों को सोने में ही खो गए। वह हमारे जों शेष बच जाते हैं उसमें से घटा दीजिए जो बचपन और में गए दिन है ।

वह तदुपरांत कुछ योग-वियोग, तनाव, चिंताओं आदि में हम खो गए। वह जो शेष रहते हैं उनमें भी हम कहाँ शांति से सही जी पाते हैं। वह कुछ अकस्मात आई विपदाओं आदि में खो जाते हैं। हम इसलिए यह विवेकपूर्ण चिन्तन करें कि क्या हमारा जीवन है ।

वह उसके लिए क्या ग्रहणीय व करणीय आदि है और हमारे जीवन का संजीवन क्या है । वह यह हम चिन्तन करें कि बोलने के लिए बहुत कुछ होते हुए भी हमारे द्वारा मौन सर्वश्रेष्ठ है। वह दुनिया में खाने के लिए हमारे पास अनगिनत चीजें होते हुए भी सबसे बेहतर रह-रह कर कुछ समय का खाने का त्याग व उपवास आदि ही हैं ।

हम अनगिनत मनोहर दृश्य अपनी आँखों से देखते है पर संसार में होते हुए भी बंद आँखों से भीतर का वास्तविक दृश्य देखना श्रेयस्कर है । हमारे द्वारा पैसों का अंबार लगाकर अभिमान करने से बेहतर है हम कम पैसे कमा कर भी अपने स्वाभिमान से आनन्द वह खुशी से अपने जीवन को जी लें ।

वह हमको अगर ग़ुरूर है कि हमारे बिना यह काम रुक जाएगा , वह काम नहीं होगा आदि – आदि तो हम अपने घर की दीवारों पर टँगी हुईं तस्वीरों को अवश्य देखें कि क्या उनके बिना आज तक कोई काम रुका है।

अतः हम जीवन की वास्तविकता को समझें और सही से व्यवहारिक बनें। यही हमारे लिए काम्य हैं । इन्हीं शुभ भावनाओं के साथ हो हर दिन हमारे लिये मंगलकारी ,सब कष्ट निवारक।

अन्त में मैं स्व : श्रीमती प्रेम देवी बरडिया की आत्मा के प्रति पुनः यह अपनी मंगलकामना करता हूँ की आपकी आत्मा जहाँ कही भी हो वो कर्मों की उदीरणा करते हुए भव – भवान्तर के इस संसारचक्र से जल्दी से जल्दी मुक्त हो और आत्मा का चरम लक्ष्य मोक्ष को वो प्राप्त कर अवस्थित हो । इन्हीं शुभ भावो के साथ मैं स्व : श्रीमती प्रेम देवी बरडिया के चरणों में शत् – शत् बारम्बार वंदन करता हूँ ।

पवित्रता अन्दर की है जरूरी

किसी एक संत
ने घटना सुनाई
कि जब पूछा किसी
ने संत से कि
बाबा! कुछ अपने
जीवन में अनुभव
की बात बताएँ
जो मेरे काम आए
जवाब में दाग दिया
उन्होंने एक अजीब
सा सवाल कि कभी
घर में झाड़ू लगाया
हैं? यह सुन वह
सकपका गया कि
मेरे सवाल के ही
जवाब में यह कैसा
सवाल किया बोले
तो क्या फिर भी
उसने बटोरा साहस
और कहा कि जी
जब मैं विदेश में
रहता था तो अपने
यहाँ झाड़ू पोछा
करता था तो
सटाक से दूसरा
प्रश्न आ गया
कि क्या सीखा?
तो वह बोला कि
इसमें सीखने वाली
क्या बात है झाड़ू
पोछा कर लिया
इतनी सी ही तो
बात है तो उस संत
ने मुस्कुराकर कहा
तुम आजकल की
पीढ़ी कुछ ध्यान
ही नहीं देते हम थे
कि हर बात से कुछ
न कुछ सीख लेते
सुनो! घर में झाड़ू
पोछा बाहर से कम
वह अंदर से ज्यादा
करना पड़ता है तब
वह घर ज्यादा साफ
और अच्छा भी रहता
है यही बात हमारे
जीवन में भी तो
लागू होती है कि
हमारे द्वारा बाहर
की सुचिता से
अन्दर की पवित्रता
ज्यादा जरूरी होती
है वह ऐसा सही से
सोच करने से हमारे
वातावरण में निर्मलता
आती है वह पवित्रता
हर ओर छा जाती है
मन को भीतर तक
झंकृत कर जाती है
ध्यान , योग आदि
इसको साधने का
सुन्दर उपक्रम है
शुद्ध भावों के योग
से होता है इससे
जीवन का सही से
सकारात्मकता में
परिवर्तन है वह
इससे हमारे
खिलता है मन
का उपवन वह
श्रद्धामय होती है
आध्यात्म की तरंग
अंतर्मन को यह
स्वच्छ विचारों
से सही से भर
देती है इसे
कहते हैं अन्दर
की हम सफाई
वह मन ही मन
सोचा संत के
अनुभवों का
कोई जवाब नहीं

संसार की स्थिति

संसार की स्थिति
एक घटना प्रसंग
कोई एक व्यक्ति
मिला लम्बे अर्से
पश्चात कॉलेज
के एक सखा
से जैसा कि
होता है यह
सधारणतया
तो पूछ लिया
बताओ मित्र!
कैसे हो? घर
परिवार में सब
ठीक तो है न
वैसे? लग रहे
हो कुछ थके
थके से यह
सुन कर मेरा
सवाल बैठ
गया वह वही
पर थाम कर
मेरा हाथ और
लगा बताने वह
अपनी आत्मकथा
अपना हाल तो
वह बोला! सुनो
बंधु मेरी बात।मैं
समझा जाता हूँ
बहुत ही सफल
व्यक्ति अपने ही
जीवन में क्योंकि
मेरी छोटी बेटी है
डॉक्टर टोकियो में
छोटा बेटा है अच्छे
पद पर हावर्ड में
बड़ा बेटा और
उसकी पत्नी दोनों
ही करते हैं काम
पेरिस फ्रांस में
और बड़ी बेटी
और जमाई हैं
शिकागो में इस
तरह सब के सब
well Settled हैं
अच्छा कमाते खाते
हैं मैं सुन रहा था
यह सब चुपचाप
और देख रहा था
दोस्त की भाव की
भंगिमा साथ ही साथ
क्योंकि वह था भारत
में अनाथ आश्रम में
वैसे सुबह से शाम तक
की भागदौड़ की जिन्दगी
में किसको है फुर्सत
दो मिनट बैठ कर सही
से सुस्ताने की और
सोचने की ,कि क्या
है स्थिति इस सब
अपने अपने में ही
सीमित हर आदमी
की हम देखेंगे तो
आश्चर्य करेंगे कि
बेचारे गरीब को
तो चलना पड़ता है
मीलों दो जून की
रोटी और कमाने के
लिए और अमीर को
चलना पड़ता है मीलों
रोटी पचाने के लिए
यह क्रम चलता है
हर रोज सुख की
खोज में दिन रात
लगाता है वह दौड़
इसे दौड़ कहें कि
एक दूसरे की होडम
होड़ यह सब करके
भी जब वह सुख मूल
समझ नहीं पाता है
जो पागल की तरह
अतृप्ति से भटकता
ही रह जाता है ऐसे
में संतोष ही एक
मात्र इस समस्या
का हल है इसी से
बनता है सुखमय
हमारा आज और
कल है यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

ज़िन्दगी

जीवन मानव का शुरू
होता जन्म से खत्म
होता मृत्यु से बगिया
जीवन में कैसे उसको
विकसित करना यह
निर्भर स्वयं के विवेक
पर होता किताब रूपी
ज़िन्दगी के जीवन में
सुगन्ध व दुर्गन्ध का
करना है हमारे निर्भर
कर्म पर होता जिसका
पहला पृष्ठ तो क्या
सम्पूर्ण किताब को
ही पढ़ने को मन
लालायित होता तो
समझें उस व्यक्ति
ने अपनी यहाँ इस
ज़िन्दगी में सही से
अपने किरदार को
निभाया है जीवन
सफल किया हैं वह
जिसका पहला पृष्ठ
तो क्या कुछ पढ़ने
को ही मन हमारा
नहीं करता है तो
उसकी किताब का
अन्तिम पृष्ठ को
कौन पढ़ेगा तो
हम समझें कि
उसने अपना
यहाँ का जीवन
जो जिया वो
सही से नहीं
जिया वह ना
ही उसको सफल
किया अतः जीवन
रूपी बगिया में
सही से सिंचन
कर उसको
पल्लवित वह
सुरभित कर
सुगन्ध से भर
हम यहाँ से
अलविदा हों
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

प्रकृति

प्रकृति की
पारस्परिक सहयोग वृत्ति
हम प्रायः प्रायः
यह बात तो करते
हैं कि समाज में
पारस्परिक वह
सभी सहयोग की
किसी सामूहिक
संकट में भी व
किसी भी तरह
से एकाकी के
दुःख कंटक
आदि में भी
आदि – आदि
पर हमने यह
क्या सोचा है
कभी भी कि
प्रकृति भी अपना
रखती है सही से
पारस्परिक सहयोग
कि वृत्ति इसका
ज्वलन्त उदाहरण है
फूल सूर्यमुखी हम
जानते हैं सूर्यमुखी
के फूलजैसा कि
नाम है सूर्य की
रोशनी की तरफ
करते रहते हैं वह
अपनी मुखाकृति
लेते रहने के लिए
सूर्य से ऊर्जा शक्ति
वैसे तो हर आम
इंसान सुबह उठता
है अपने परिवार
का भरण पोषण
भी करता है और
ये जिंदगी यु ही
बीतती चली जाती
है जब तक सोचता
है खुद के लिए तो
जीवन भी उसका
तमाम हो जाता है
लेकिन किसी के
लिए किया साथ
नही आएगा खुद
के कर्म खुद की
पुण्याई ही साथ
जाएगी इसलिए
भर दे हम इसको
इंद्रधनुष के रंगों से
और रोचक किस्सो
से इस बुक के सभी
पन्नों को तो हमारे
फिसल जाएंगे बंद
मुट्ठी से रेत की
तरह ये पल अतः
लिखे हम प्रकृति
की तरह सही से
पारस्परिक सभी
सहयोग वृत्ति को
अपनी कहानी
अपनी ही कलम
से जिसमें शब्द
भी हमारे और
कहानी भी है
हमारी लिखनी
है हमे कैसी
वो मर्जी भी है
हमारी शर्त !
बस इतनी है
स्नेह संवेदना
और विश्वास
की स्याही से
हम सतकर्मों के
शिलालेख सम
शब्द लिखते जाए
और सीमित ही
समय में हर पात्र
हर चरित्र जीते जाए
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

नदी और सागर

और और की दौड़
में मानो जैसे है
नदी का सागर
में समा जाना जो
जीवन दिखता नहीं
वह सागर की तरंगों
के समान ही होती
हैं हमारी इच्छाएं वह
एक खत्म नहीं हुई
कि दूसरी और आगे
तैयार लालसाएं अर्थ
व पदार्थ तो है हमारे
केवल जीवन निर्वाह
के ही तो साधन मात्र
वह साध्य नहीं है
इस सच्चाई को
जिसने ही समझ
लिया वही सुखी
और खुश भी रह
सकता है क्योंकि
चलते रहने का ही
तो नाम है जीवन
वह एक जगह यदि
टिक गए तो समझो
भाग्य के हाथों बिक
गए वह अपना ही
पुरुषार्थ को खो ही
दिया फिर जीवन में
रह क्या गया एक
ढर्रा और सारा उत्साह
सारी उमंग में है इस
जीवन के अनेकों रंग
बिना इसके तो सब
ही हमारे फीके पड़
गए और जन्म लिया
वह चले गए बिना
कुछ किए अतः इस
हेतु जीवन को हम
गतिमान करने का
सदैव प्रयत्न करके
शक्तिमान समय के
काल भाव के आगे
झुके वह बाधाओं से
कभी भी हम हार ना
माने वह दुगने उत्साह
से निरन्तर हम बढ़े
आगे और कामयाबी
के हर साज पर सही
से गुनगुनाए और चलते
हुए क़दमों की हौसला
अफजाई हो यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

कबीरा गर्व न कीजिए


इतिहास साक्षी है कि रावण ज्ञानी ही नहीं महाज्ञानी था । वह साथ ही इतिहास है इस बात का भी साक्षी कि इतना ज्ञानी होने पर भी उसके विनाश का कारण उसका “अहं’ उसका “मैं’ था ।

अहंकार वह विष है जो हमारे शरीर को ही नहीं, हमारे मन को भी एक क्षण में विषाक्त बना देता है। वह अगर हम समय पर रहते इसको सहनशीलता,संयम और विवेक आदि के सहारे नियंत्रित कर लें तो बहुत अच्छा हमारे लिए होगा । वह नहीं तो इसके भयावह परिणाम हमारे सब कुछको भी नष्ट कर देते हैं ।

वह हमारी आत्मा को विकृत करके हमारी विवेक शक्ति को खत्म कर देता हैं। वह रामायण,महाभारत आदि जैसे बड़े-बड़े युद्ध अहंकार का परिणाम है। वह आत्म-कल्याण में भी सबसे बड़ा अवरोधक है।

बाहुबली एक साल तक कायोत्सर्ग-मुद्रा में खड़े रहे लेकिन छोटे भाइयों को दीक्षा-पर्याय में बड़ा होने से वंदना कैसे करें के अहंकार ने केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होने दिया।वह अहंकार का विसर्जन ही एक मात्र आत्म कल्याण का उपाय हैं । वह जिसने भी अपने क्रिया- कलापों को सही से अंतर्मुखी बना लिया,संयत जीवन का रहस्य समझ लिया आदि – आदि तो अहंकार भूलकर भी उसके पास नही फटक सकता हैं ।

आत्मा और शरीर का भेद विज्ञान जानने समझने वह आचरण हमारे द्वारा सही से करने के बाद कभी भी अहंकार हमारा टिक नही सकता है । हम तब अपने जन्म-जन्मांतर से चरम लक्ष्य मोक्ष को पाने की सवारी पाकर कृतार्थ हो जाते है । इस युग में संत कबीर ने सटीक कहा है कि कबीरा गर्व न कीजिए, कबहूं न हँसिए कोय। अझू नाव समुद्र में, न जाने क्या होय।।

ERASERS ( मिटाने वाला )


एक घटना प्रसंग बात-बात में किसी संदर्भ में विधार्थीयों की परीक्षा लेने आदि उद्देश्य से एक गुरुजी ने कह दिया कि Erasers तो उनके लिए बनाए जाते हैं जो गलतियाँ करते हैं।

यह सुन कुछ समय तो मौन रहा लेकिन पास ही बैठे एक कुशाग्र बुद्धि बालक ने सोच कर उनको बोला मानो नहले पर दहला मार दिया । उसने कह दिया कि नहीं गुरुजी ! Erasers तो उनके लिए बनाए जाते हैं जो अपनी भूल को सही से सुधारना चाहते हैं। यह सुन गुरुजी !

विधार्थी के सटीक जवाब पर हतप्रभ रह गायें । वह अपने मुँह से उसकी प्रशंसा करते नहीं थके । हमारे द्वारा अपने जीवन में सही से अपनी गलती को समझना और फिर उसको सुधारना हमारी समझदारी हैं । वह अहम् के वशीभूत या अन्य कारण से ऐसा न करना हमारी भारी भूल है ।

आज के युग में कोई भी अपनी भूल प्यार की भाषा में भी सुनने को तैयार नहीं हैं , सुधारना तो दूर हैं । वह अपनी नज़र में सबसे ज्ञानी और हर कार्य में सही होता है पर उसे नहीं पता कि मैं अहम्-दंभ को बनाकर हमदम कितना अज्ञानी हूँ । वह मैं ज्ञान के असली स्वरूप का संज्ञानी कहाँ हूँ ?

वह पढ़ी-लिखी सही से पीढ़ी को सुसंस्कारों की भाषा समझ में नहीं आती हैं । हम कुछ भी करने को आज़ाद हैं हमको यही आज की शिक्षा सिखाती हैं । वह जो अपने विवेक के चक्षु खोलें तो उसके अन्तः के पट खुलें और फिर सही से अपनी भूल ह्रदयंगम होगी ।

वह ego के दंश का शूल जो हटायेगी तभी तो सही से सिमटी हुई सोच को समझ का विस्तार मिलेगा । हमको हमारी अकड़ की पकड़ को छोड़ रिश्तों की स्निग्धता की अहमियत को समझना होगा । वह इससे हमारे प्रेम-सद्भाव की रश्मियों से नया ही सब तरफ़ रिश्तों का आकार विस्तारित होगा ।

वह तभी तो कहा है कि सामने वाले पर जो असर विनम्रता से कही बात का होता है कठोर शब्दों में कही बात का उतना ज्यादा असर नहीं करती है और दरवाजा खोलने के लिए खटखटाया जाता है न कि जोर जोर से ठक ठक करते रहो ।

यादें

यादें जीवन में
हमारे वो सुखद
पल अहसास है
जिसके सुखद
पल को मानव
याद कर अपने
जीवन में कभी
भी सही से कही
भी जीवन की
किसी भी घड़ी
आनन्द के पल
जी सकता हैं
यादें बीते दिन
की बचपन की
आदि वो हमारी
कुछ ऐसी होती
हैं जो भूले ना
भूलाए जाए आज
भी वो यादे याद
आती है वह सब
जब सब मिल जुल
कर गलियो में ही
खेला करते थे वह
आस पडोसी के भी
बच्चे सभी मिल कर
एक दूसरे के साथ
मस्ती किया करते
थे वह उस समय
टीवी चैनल शो को
देखने के लिए सारे
एक ही घर में जा
कर टीवी को देखा
करते थे वह कही
भी एक दूसरे के
घर जा कर सोना
खाना आदि करते
थे वो जीवन ही
क्या जिसमें
उतार चढ़ाव ना
आये वह जब
प्रतिकूल समय
का सामना हम
करेंग़े और उस
दर्द को सहने की
हिम्मत जुटायेंगे
तब ही तो सही
से अनुकूल समय
की ख़ुशियाँ को
महसूस कर पायेंगे
इस जीवन में हर
वस्तु परिवर्तन शील
है पानी वो ही होता
है पर फ्रिज़र में रख
देंगे तो बर्फ़ बन जाती
है और फ़्रीज़ के बाहर
रख देंगे तो वापिस
पानी वो बचपन की
ही यादें याद आती
हैं हम पहले कि
पड़ोस के घर भी
अपने घर से हुआ
करते थे ना कोई
रोक ना कोई भी
टोक एक रिश्ते
में सब बंधे ना
होने पर भी एक
परिवार जैसा सही
से खूबसूरत वह
प्यारा सा रिश्ता था
बस ! अपनी ही सब
मस्ती में मस्त रहते थे
दोस्त हो या पडोसी
सभी एक परिवार
सा लगता था वो
बचपन आज भी
याद आता है ।

कुछ और गुर

हो जाता है
आसान तब
हमारा यहाँ
जीना एक
तनाव मुक्त
सही से है
जो जीवन
यह तभी
सम्भव हैं
जब हम
ख़ुशनुमा
बना कर
रखें अपना
सही से हर
कोई स्वभाव
को हरदम
और अवसर
मिलने पर वहाँ
हँसिए खिलखिला
कर बच्चों की
तरह स्वीकार
करिए कुदरत
के इस दुर्लभ
तोहफ़े को
सहर्ष नहीं
लिखा होता
है यह सबके
भाग्य में
दुर्लभ हर्ष हम
हर कोई उम्र में
अपने शरीर की
नहीं मन की
भी खूबसूरती
पर दें ध्यान वह
हर बदलाव का
लें दिल से सही
संज्ञान समझें
हम सबको
जाना तो है
एक न एक
दिन पर क्यों
बनाएँ हम ऐसा
मन कि बिताने
पड़ें कोई भी
स्थिति में कैसे
ही दिन गिन
गिन जिन्दगी
जीने के ये
तो सब कहते
ही हैं और
अनुभव सिद्ध
भी है कि हम
जिन्दगी जियें
शालीन तरीके
से सरल भावों
से तनाव रहित
व रहें सबके
साथ मिलजुल
कर प्रेम भाव
सहित हमको
समझदारी
जरूरी है पग
पग पर किन्तु
जिन्दा रखें हम
हमेशा अपना
बचपन अपने
अंदर क्योंकि
ज्यादा कोई
समझदारी बना
देती है हमारी
जिन्दगी को सब
तरीके से ही
बोझिल और
बन जाती है
बाधा जीने में
सबके साथ
हिलमिल हम
याद रखें कि
जीवन का अर्थ
तो मिल सकता
है जीकर ही और
रिश्तों का अर्थ
निभाकर ही एक
बात है बहुत ही
जरूरी कि रहना
चाहिए जिन्दगी
में थोड़ा सा
खालीपन भी
क्योंकि यही
तो है वह
समय जब
होती है हमसे
हमारी सही से
अंतरंग ही
मुलाकात
यही तो है
वह मुलाकात
जब होती है
हमसे हमारी
खुलकर बात

फूल

खुशनुमा हो
अपना सही
से जीवन
फूल की
तरह खिले
मन पवन
फुलों की
सौरभ सभी
को हर्ष से
भर देती जैसे
हमारा सीना
गर्व से यह
कहते फूल
जाता है और
हम कहते –
कहते कि
वह हमारे
जमाने की
कहानी वह
गौरव ही क्षण
जीवन का
खजाना है
वह पुराना
जमाना और
फिर जीवन में
नहीं आना है
परन्तु हमको
उसका सही
वर्णन ही कर
देता है मन
को आनंदित
व सही से
प्रसन्नचित्त
यदि मनुष्य
को सही रूप
में सुख और
शांति की सही
से प्यास होगी
तो आत्म बोधित
होने में हमको
बिल्कुल भी
आगे कभी
वक़्त नही
लगेगा हम
महकाए फूल
ख़ुशबू ख़ुशियों
की मुस्काएं
चंदनिया में
सुधियों की
हम कहें कुछ
अपने मन की
और रिश्तों पर
कैसी हो जमी
बर्फ पिघला
लें वह घर के
हर कोने कोने
में जब ख़ुशियों
के शुभ घेरे हों
तब तन्हाई में
भी मेले होते है

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

भगवान श्री कृष्ण के चरणों में भावों से मेरा शत ! शत ! वन्दन ।वह भाद्रपद कृष्णा अष्टमी की पावन रात जब तत्कालीन सुधीजनों को उस रात भगवान श्रीकृष्ण के रूप में बहुत बड़ी सौगात मिली थी।

वह भगवान श्री कृष्ण को मनुष्य जन्म में पूर्ण पुरुष कहा जाता है यानी जो जीवन के सभी विरोधों को सहज भाव से आत्मसात कर सके उसी में पूर्ण पुरुष बनने की बिसात है ।

भगवान श्री कृष्ण वंशी वादक भी हैं तो गोपियों संग रास हास-परिहास के वाहक भी हैं और इसके विपरीत कुरुक्षेत्र में गीता के गहन, गंभीर, अमृत वचनों के पाठक आदि भी हैं । भगवान श्री कृष्ण का चरित्र जितना मोहक है उतना ही रहस्यमय है । वह जितना चंचल उतना ही गंभीर है ।

वह जितना सरल उतना ही जटिल है । वह जन्माष्टमी का पर्व श्री कृष्ण के लोकनायक, संघर्ष, शील, पुरुषार्थी, कर्मयोगी व युगांधर आदि – आदि होने के महत्व को सही से प्रतिपादित करता है। भगवान श्री कृष्ण की विराटता अनंतता और सर्व कालिक प्रासंगिकता ही हैं जो प्रायः प्रायः कितनों के मन में सही से श्री कृष्ण तत्व के प्रति असीमित आकर्षण का कारण है।

भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्ट कंश के अत्याचारों का दमन करने तथा कौरवों की पाप वृत्ति का शमन करने इस धरा पर अवतरण लिया । भगवान श्रीकृष्ण ने बाल रूप में भी अपना पौरुष रूप दिखलाया।

वह कंश द्वारा प्रेषित कितने राक्षस रूपों को उन्होंने ठिकाने लगाया फिर भी मामा कंश न माने तब आखिर में उनको भी अंतिम राह दिखा दी।वह इस धरा को उस महापापी से मुक्त करा दी। वह तत्पश्चात की उनकी और भी दिलचस्प कहानी है । उन्होंने कुटील मामा शकुनी व मतिभ्रष्ट कौरवों की भी समूल निशानी मिटा दी।

वह सबसे महत्वपूर्ण अवदान तो कहना चाहिए था कुरुक्षेत्र युद्ध भूमि में अर्जुन का उन्होंने मनोबल बढ़ाने के निमित्त युग-युगान्तर को पवित्र गीता का अमर उपदेश दिया ।

वह उपदेश अनादि काल तक विश्व को जीवनोपयोगी संदेश देता रहेगा । ऐसे चतुर नीतिकार न्याय के पक्षधर प्रेम व स्नेह के सागर विश्व के पवित्रतम ग्रंथ गीता के उपदेशक अधर्म के विरुद्ध धर्म के संदेशक ( संदेशवाहक) श्रीकृष्ण का जन्म दिन मनाना तभी सार्थक है जब हम भगवान श्री कृष्ण की विभिन्न विशेषताओं को सही से आत्मसात करना सीखें । वह अपने जीवन में गीता के सूत्रों की एक-एक बात उतारें।यही हमारे लिए काम्य हैं ।

79वाँ स्वतंत्रता दिवस

मंगलकामनाएँ एवं मेरे भाव –
स्वंत्रतता पर हमारा मन
ऐसा हो जो
बिना बोले मन
को खींच ले क्योंकि
बाहर की चकाचौंध
तो हमारे मन
को एक बार
खींचती हैं जो
कुछ समय बाद
मन को पकड़ कर
रखने में असफल
हो जाती हैं लेकिन
भीतर की शुद्धि
मन को खिंचती
ही नहीं उसको
बाँध देती हैं और
वह धीरे – धीरे
आकिंचन्य की
और हमारा
चेतन सही से
बढ़ता जाता हैं
जिसमें आगे यह
अनुभव होता हैं
कि मेरे पास कुछ
नहीं हैं और मुझे
कुछ भी इसकी
जरूरत नहीं हैं
क्योंकि में अपने
आप में पूर्ण हूँ
आत्मा का शुद्ध
रूप हूँ वह मोक्ष
की और कदम
हमारे बढ़ जाते
हैं यही हमारे
लिये काम्य हैं

पर्यावरण की भयावह स्थिति


कहते हैं कि हम स्वस्थ रहे ,मस्त रहे ,वसुधा पर आश्वस्थ रहे । हमारे खेत , जंगल , नदियाँ , भुधर आदि सभी सुरक्षित रहें ।प्रदुषण तन का मन का मिटे यह कुदरत का आह्वान हैं ।

इन्सान इस सहनशील धरती का दोहन नहीं करे । सुन्दर घर हो सुन्दर अंबर में हमारी नयी पहचान बढे क्योंकि माटी महके-पंछी चहके उतरे स्वर्ग विहान प्रकृति का यह हमको उपहार है ।

इसके विपरीत हम प्रकृति के साथ ऐसा दोहन कर रहे हैं जैसे पर्वतों के शिखरों को तोड़-तोड़ पत्थर हमने मंगवाएँ है,हमने जंगल की हरियाली हर ली , वन वीरान बनाए है । हम उस वन में ऊँचे फ़्लैट बना इतरा के स्वयं बैठे है । ये जंगल वीरान हो गये है अब तो केवल सर्वत्र आदमियों के ही जंगल हैं । हमने प्रकृति के उपहार की क्या हालत की हैं ।

पंछी का हाल बेहाल हो गया है क्योंकि मनुष्य के दूषण से उसका जीना हुआ मुहाल हो गया हैं , वायु को प्रदूषित करने में मानव को लाज नहीं आ रही हैं ,हम मानव प्रकृति के दानव सरताज बने हैं , संजीवनी नदियाँ थी उसके नीर को हम मानव ने कचरा,मैला आदि उसमें डाल मलिन कर दिया हैं , पंछी तो पानी पीकर चोंच भर उड़ जाता है पर हमारी पानी की लिप्सा व्यर्थ बह रही हैं , हर खिड़की सोच की हमने मूँद ली हैं , भर-भर पत्थर ईट,पंछी के घर हमने छीन लिए हैं जो पेड़ पर बसेरा कर खुले आकाश में उड़ते,उस धरती को अब हमको मैली नही करनी हैं ।

थोड़े जल की आस तो सबको होती हैं इस तरह अगर हमको अपने जीवन कि रक्षा करनी है तो पर्यावरण की सुरक्षा करनी ही होगी । इस विषय पर सभी को पूर्ण गंभीरता से चिंतन करना जरूरी है।अन्यथा स्थिति नियंत्रण से बाहर भी हो सकती है।

आजकल की स्वस्तुथिति

वर्तमान युग भौतिकतावाद और टेक्नॉलजी का हो गया हैं ।एक इंसान की क़ार्य क्षमता दस आदमी जितनी हो गयी हैं । एक समय था कि प्रायः हर व्यक्ति सादा जीवन उच्च विचार की धारा में चलते थे।

भरा-पूरा परिवार एक साथ आँगन में बैठ कर एक ही थाली में खाते थे।ना ज़्यादा ख्वाहिशें थी और ना ही मन में किसी तरह की बेईमानी आदि । घर के मेन गेट पर ना ताले होते थे और ना ही गहने रखने के लिये बैंक लॉकर आदि – आदि । समय क्या बदला,इंसान के सोच का तरीक़ा भी बदल गया हैं ।

हर इंसान पैसों के पीछे दीवाना हो गया हैं । किसी का ध्येय अति मेहनत और लगन से ज़्यादा धन कमाना हैं तो किसी का लक्ष्य चोरी-बेईमानी आदि से धन प्राप्त करने की लालसा बढ़ाकर ।

जीवन में आगे जब एक स्टेज ऐसा आता है कि अक़ूट संपती तो इकट्ठी कर ली पर अब अपने स्टेट्स को बरकरार रखने के लिये संतोष भी नहीं कर सकता हैं और अधिक धन प्राप्ति के लिये तरह-तरह के दांव पेच भी अपनाने लगता हैं ।अपने गुँथे जाल में खुद ही उलझ जाता हैं ।

आज का इंसान धन तो ख़ूब कमा रहा है पर बदले में पारिवारिक प्रेम और मन की शांति खो रहा है । एक ही परिवार में चार सदस्यों को आपस में एक साथ बैठ कर कुछ पल बिताने का समय नहीं हैं ।

इंसान अपनी लाइफ़ को भी एक मशीन की तरह बना लेता है जो चौबीस घंटे या तो कुछ क़ार्य करता है या सोते समय भी व्यापार की ही सोचता है। अतः हम कह सकते है कि कैसे हो गए हैं आजकल रिश्ते सब फुर्सत में हैं पर वक्त किसी के पास आजकल नहीं है । लोमड़ी की चालाकी, सियार की होशियारी जन्म जात होती हैं ।

शेर की बहादुरी गीदड़ धमकी से हर इंसान वाकिफ हैं ।सब प्राणी की प्रकृति बदलना आसान नही हैं । मानव की यह मजबूरी नही हैं पर स्वार्थ उसकी अपनी कमजोरी हैं । सामने वाले के अनुसार उसका व्यवहार ढल जाता हैं । कमजोर को देखकर साहस बढ जाता हैं । रुतबा देखकर नम्र बडा बन जाता हैं ।

गिरगिट सा बदल जाता पर स्वयं को नही बदल पाता हैं । अतः मन सोचने को मजबूर हो गया और एक बार नहीं बार – बार उस और ध्यान गया कि चालाकी, चतुराई और बेशर्मी आदि को आजकल के प्रचलित शब्दार्थ में होशियारी कहते हैं , वाह री ! आजकल की दुनियादारी ।

श्वास की दिव्य शक्ति


हमारे साथ में श्वास की एक अद्भुत दिव्य शक्ति भी जुड़ी हुई होती है । हममें से अधिकांश यह शायद नहीं जानते होंगे कि हमारे जन्म के साथ ही प्रकृति पदत्त हमारा श्वास भी एक दिव्य शक्ति के रूप में साथ में हैं ।

हम बहुत से शायद यह भी नहीं जानते कि श्वास हमें जीवित तो रखता ही है पर वह सही तरीके हमको नियंत्रित करके वह चिताओं व तनाव से मुक्त रखने का काम भी बखूबी कर सकता है ।

जब भी हम श्वास के प्रति जागरूक होकर निकलते हैं उसके सहारे अपने अंतस की यात्रा पर तो हम वर्तमान पल में आ जाते हैं और अतीत भविष्य से दूर हो जाते है या कट जाते हैं । हम ऐसा होते ही खुद को तनाव से मुक्त कर लेते हैं और हर श्वास-प्रश्वास हमारे शांति युक्त आने लगता है ।

हम अपनी दैनिक दिनचर्या में श्वास,उच्छवास क्रिया को प्रायः अक्सर भूले ही रहते हैं और उसके प्रति जागरूक प्रायः नहीं रहते हैं। जबकि हमारा सारा जीवन ही श्वास पर टिका है । ऐसे में हम प्राय: हमारी आन्तरिक शक्ति के प्रति अनभिज्ञ रहते हैं , जिसे हम अपना जीवनाधार मानते हैं।

उस आन्तरिक शक्ति को हम दैनिक दिनचर्या की व्यस्तता में भूले ही रहते हैं ,जबकि उचित तो है उस शक्ति की तो कोई भी कार्य करते हुए हमारे मन में सदैव स्मृति रहनी ही चाहिए । उसकी तो हम मन से पल भर के लिए भी विस्मृति नहीं होनी चाहिए ।

वही हमारी सक्षमता व सफलता का राज है। इसी को तो वर्तमान में जीना कहते हैं पर आवश्यक है इस अवस्था को पाने के लिए हमारे द्वारा थोड़ा अभ्यास श्वास क्रिया , प्राणायाम आदि का नियमित होते रहना चाहिए ।

वह अमृतपान होगा


कहते है कि हम अपने जीवन में जरूरतमंद की मदद करने की आदत ही बना ले । वह सदा मन से नि:स्वार्थ भाव से और सरल स्वभाव से मदद करें । वह मन से हम किसी भी वास्तविक जरूरतमंद को यथाशक्य मदद करने से न चूकें। वह मन में हम यही भाव रखें कि भगवान मुझे सदैव मददगार और उदार बनाए रखें।

एक बार जब गुरुजी ने यह बात कही कि अपने जीवन में रोज एक शुभ काम किया करो । हम जैसे किसी जरूरतमंद की ही मदद करे तब एक जिज्ञासु ने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि गुरुवर! एक आदमी की सहायता करने से कौन सा संसार बदल जाएगा?

यह सुन गुरुजी बोले कि माना एक से कोई संसार थोड़े ही बदल जाएगा परन्तु जिस व्यक्ति की आपने सहायता कि उसका संसार अवश्य बदल जायेगा । हमारे जीवन में सेवा एक पावन कर्तव्य है ।

वह इसमें हमारा नाम कमाने का मन्तव्य नहीं होना चाहिए । हमारे भीतर परहित एवं आत्मतुष्टि ही उद्देश्य हो। वह हमारे भीतर कभी भी प्रदर्शन की मंशा न हो । वह किंचित भी श्रेय लेने की अभिलाषा न हो । हमारे भीतर लेशमात्र भी गर्व या अहंकार मन में न हो बल्कि हमारे भाव निष्काम हों कि हम तो सवा के माध्यम मात्र हैं ।

हमें प्रसन्नता है कि हमको सेवा प्राप्तकर्ता जैसा सुपात्र मिला । वह जब यों सेवा होती है तभी बिन माँगे ही हमको आत्मतोष का मेवा मिलता है ।

वह सामाजिक व्यवस्था में भी सेवा का बहुत महत्व है और व्यापक अर्थ है। वह हमारे पर सेवा प्राप्त करने वाले के द्वारा मन ही मन शुभेच्छाओं की बौछार करता नहीं थकेगा। वह हमारा उस दिन का अमृतपान होगा। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

सर्वोत्तम निवेश : BEST INVESTMENT


हमारा जीवन सदैव बहती धारा है जिसका कोई भी कभी भी किनारा नहीं है । वह इस जीवन में अपने धन को प्रायः प्रायः सभी लोग ऐसी जगह निवेश करना चाहते हैं जहाँ से प्रतिफल साधारण से भी विशेष मिले ।

वह इसके लिए किसी अनुभवी सज्जन सलाहकार ने बताया कि निम्न प्रतिभूतियों में उनको इतना अच्छा Return मिलेगा कि Dividend दनादन आता ही रहेगा। वह प्रतिभूतिया सद्साहित्य पठन , सही सोचे, सकारात्मकता को नहीं भूले, सुपाच्य भोजन आदि – आदि ऐसी विधाएँ हैं जिससे स्वास्थ्य सुधरता हैं ।

वह साथ में हमें यह भी नहीं भूलना है कि इससे हमारा व्यक्तित्व विकसित हो । वह हमको यह भी ध्यान में रखना है कि यह ऐसी विधा है जिससे हमारा मानसिक स्वास्थ्य ( MENTAL HEALTH ) भी उन्नत हो । हमारे जीवन में अविरल उतार चढ़ाव है। वह निरंतर भाव अभाव है ।

वह सतत प्रतिभाव स्वभाव है जो अनवरत प्रवाहमान है । वह इन सभी अनुस्रोत प्रतिस्रोत से हमें सकारात्मकता के मैदान में आत्म स्वभाव में जाना है । हमें कमियां औरों की नजर नहीं आएगी। वह हम और न ही अतिरिक्त स्वयं को समझेंगे ।

नो हीणे नो अइरीत्ते का भाव भावित हो जायेगा । हमारा जैसा चिंतन होगा वैसा ही हमारा मंथन होगा । वह जैसा मंथन होगा वैसा ही हमारा मन होगा। हमारी सोच ही विचारों का सही मूल से आधार है । हमारी सोच से ही व्यवहार निर्मित बनता है ।

वह सोच सकारात्मकता से सदा भरपूर रहे । वह हमारी जागरूकता ही जीवन का कोहिनूर है । वह सकारात्मक चिंतन से सही कार्य वह लाभ की रुपरेखा पल्लवित होती है ।इस तरह यह और ऐसे भी सभी अच्छे तरह के सर्वोत्तम निवेश है जो हमको सही से दीर्घकाल तक बिना नुकसान के DIVIDEND देते रहेंगे । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

मुनि श्री पारस कुमार जी

धन्य है पारस मुनि तपस्या की अलख जगायी
गुरु आशीर्वाद से तपस्या की अमृत प्याली पी
जीवन नैया तपस्या में बिना पतवार चल रही है
गुरुदेव के आशीर्वाद से तप की गंगा बह रही है
ले मशाल तपस्या की अपने रास्ते किये रोशन
तपस्या की रोशनी से आत्म सुख पाये नयन
संयम जीवन में तपस्या कर आत्मा को उज्जवल किया
निरन्तर तपस्या कर आत्मा की ज्योति को जगमग किया
गुरु सन्निधि से तपस्या के फल का रंग नजर आया
कर्म निर्जरा लक्ष्य से तपस्या का रंग सही उभर आया
श्रद्धा और समर्पण मुनिवर के रग- रग में बसी है
सेवा करते भी तपस्या का आनंद जीवन में लिया है
गुरवर के आशीर्वाद से सब विघ्न मिट जातें
तपस्या में गुरुदेव शक्ति से आगे बढ़ लक्ष्य पाते
तपस्या की आशा उल्लास से प्रदीप आपको बधाता
पग- पग पर भावों से तपस्या के प्रदीप गीत गाता
जन- जन के ह्रदय में भावो का समन्दर रोज लहरा रहा
तपस्या के सुख का पल भावो से सबके मन में बस रहा
वीर प्रभु के शासन में तपस्या का रंग शिखरों चढ़ाया
जिनशासन में तपस्या कर आत्मा को ऊँचा चढ़ाया
धन्य है पारस मुनि तपस्या की अलख जगायी
गुरु आशीर्वाद से तपस्या की अमृत प्याली पी

बालोउपि


हम सागर की कुछ बूँदो को अपने हाथ में ले सकतें हैं लेकिन हम सम्पूर्ण सागर को अपने हाथ में नहीं ले सकतें हैं । हमारे जीवन में हर दृष्टि से हर चिन्तन से विशालता का वास हों ।

यह विशालता ऐसी हों जो हमारे जीवन की बगिया को सौरभ से पुलकित करती रहें ।यह पुलकंद ऐसी हों कि हमारे जीवन में उदय से विशालता का वास बसा रहें । हमारे जीवन में हर दृष्टि से उदय विशालता के वास से जीवन महक उठता रहेगा ।

वह हमारी वाणी और जीवन में माधुर्य, समर्पण भाव, निष्ठा, आकर्षण आदि – आदि भी हमारी विशालता को बढ़ाते हैं । हर जीव अपने कर्म अनुसार जन्म लेता हैं । वह जन्म के बाद स्वच्छंद अपने हिसाब से अपना जीवन जीना चाहता हैं । हमारी विशालता में सृष्टि का कण- कण समाहित हों ।हर जीव अपने कर्म अनुसार जन्म लेता हैं तो वह स्वच्छंद अपने हिसाब से अपना जीवन जीना चाहता हैं ।

हम किसी के ऊपर थोप कर किसी कार्य को नहीं कर सकतें हैं ।हम उसको समझाकर उसके मर्म के प्रति जागृतकर उसकी चेतना को जगा विशाल ह्रदय से प्रसन्न मन से उसको उस कार्य के प्रति स्वेच्छा से अग्रसर कर सकतें हैं । वह कार्य की परिणति करवा सकतें हैं ।

हम इसी तरह सही दृष्टिकोण को पारिवारक , सामाजिक एवं अन्य चिन्तन से देखें तो उसमें समता, माधुर्य, सुनी अनसुनी आदि करना हैं । इस तरह गुणों को सही से समझ हम विशालता में अपने अन्दर सही से समाहित कर सकतें हैं । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

जब तक काम पूरा न हो जाए : किसी को मत बताओ

UNTILL IT IS DONE TELL NONE
हम हमारे जीवन में कोई अति विशेष काज कर रहे हैं वह हमको उसी समय अविवेक से लग रहा था जो काफी समय से हुआ अब कि आज पर एक समय ऐसा आ जाता है और मन करता है इस काम का ढिंढोरा अभी सबको कह बोल आज पीट दें ।

वह ढिंढोरा पीट कर होने वाले काम को हम अवरोध पैदा स्वयं कर लेते हैं । वह काम कभी होता ही नहीं हैं । हम हमारे जीवन में इस तरह के कितने काम के प्रसंग में यह देख सकतें है कि काम पूर्ण होने के बाद ही काम को बताते है या काम होने के बाद स्वतः ही काम का मालूम हो जाता हैं ।

वह साथ में इसमें हम यह भी देखते है कि कितने काम में जब सफलता बहुत संभावित लगती है तब भी हमको वांछित परिणाम प्राप्त होने से पहले चीजें गलत होने की सम्भावना बनी रहती है या गलत हो सकती हैं ।

वह इस कहावत UNTILL IT IS DONE TELL NONE की उत्पत्ति प्राचीन है कि कुछ स्रोतों के अनुसार इसका मूल ग्रीक या लैटिन से है। यह चार्ल्स डिकेंस और एंथनी ट्रोलोप की रचनाओं सहित साहित्य में भी हमको दिखाई देती है। इस कहावत का प्रयोग लोगों को यह याद दिलाने के लिए किया जाता है कि अप्रत्याशित घटनाएँ कभी भी हमारे जीवन में सबसे सोच-समझकर बनाई गई योजनाओं को कभी भी बिगाड़ सकती हैं।

यह उन विभिन्न चीजों को भी संदर्भित करता है जो कई बार चूक से गलत हो सकती हैं या बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। वह भले ही दूध का कप और हमारे होठों के बीच की ही जितनी दूरी हों । यह किसी भी कार्य के अंतिम चरण को दर्शाता है ।

वह बिंदु जहां सफलता निकट लगती है, जैसे कि किसी के मुंह तक प्याला लाना आदि – आदि । हमको सही से यह कहावत बताती है कि इरादे से लेकर उस कार्य के पूरा होने तक का रास्ता हमेशा दिखने करने आदि जैसा आसान नहीं होता है और अप्रत्याशित परिस्थितियाँ कभी भी हमारे सामने आसानी से अंतिम चरणों को बाधित कर सकती हैं। वह तभी तो हमको गुरुमंत्र यही कहता है UNTILL IT’S DONE , TELL NONE यही हमारे लिए काम्य हैं ।

अपना घर

आत्मा के साथ मन
का रिश्ता बहुत ही
गहरा है वह आत्मा
पर अच्छे बुरे सभी
कृतकर्मों का खूब
सख्त पहरा है हमको
जो प्रतिबिंबित हो
रहा है जीवन दर्पण
मे हर पल वो किसी
भी दूसरे का नहीं
हमारा ही अपना
चेहरा है क्योंकि
हमारे घर की बात
आती है तो हम सब
यह सुनकर गर्व से
फूले नहीं समाते वह
जब हम अपना मन
माफिक और सही से
आलीशान घर बनाते
है तो उसको बनाने
में सभी तरह से ही
अपनी पसंद का
सामान लगाते हैं
और बन जाने
पर उसे अच्छे से
अच्छे डिजाइनर
से और अच्छे ही
साजो सामान से
सजाते संवारते
हैं वह तत्पश्चात्
गृह प्रवेश का
अपने हिसाब से
उत्सव मनाकर
उसमें रहना भी
शुरू करते हैं
पर भूल जाते
हैं हम कि यह
वास्तव में नहीं
है अपना घर
ईमानदारी और
इंसानियत जैसे
गुण वो हमारी
आत्मीयता के
भाव है जो सही
से हममें ही
हमेशा के लिए
बरकरार रहने
चाहिए हम
यह दूसरों में
खोजने की
बजाय स्वयं
उनसे अपने
आपको ही
पूरित करें
अध्यात्म में
ओत प्रोत हो
हम हमारी
आत्मा को
भावित करें
वह तभी तो
यह कहा है
अंत भला
सो भला
यही हमारे
लिए काम्य
हैं ।

सोचें समाधान स्वरूप ही


हम अच्छे सद्गुणों से पूरित होंगे तो हम धोखे नहीं खाएंगे । वह हमारी दृष्टि और सृष्टि सही और न सही को जांच पाएगी औऱ वैसे भी हम जैसा दूसरों से चाहे पहले वैसा स्वयं बने।

वह स्वयं से ही हम सीखकर ,प्रसन्नचित और शांत आदि – आदि रहने के अनुभव पाएं और जीवन में कैसी ही समस्याएँ तो हम अपने विवेक से समस्याओं के समाधान का सही रास्ता खोज आगे बढ़े । हमारे जीवन में कभी कोई भी ऐसी समस्या का विषय अकस्मात आ पड़ता है जो हमसे वही पर त्वरित हल माँगता है।

वह ऐसे में हमारे द्वारा पहले कारण नहीं तुरंत हल ही खोजा जाना चाहिये ।इसका ज्वलत उदाहरण आग लगना है। वह हमको जब कहीं भी आग लगने का संवाद आता है तो हमारे द्वारा तुरन्त वही आग बुझाने का ही प्रयत्न किया जाना जरूरी होता है ।

वह कारण आदि बाद में ही देखा जाता है। वह एक और उदाहरण किसी का एक्सीडेंट हो जाना है । ऐसे में भी त्वरित इलाज ही किया जाता है कारण आदि बाद में ही देखा जाता है। इस तरह ऐसे और भी उदाहरण हो सकते हैं।

हमारे अपने मन का स्क्रीन यदि पारदर्शी व साफ होगा तो हम हर स्थिति व घटना के साथ सही से इंसाफ कर पायेंगे । हमारे मन के भटकाव से हमारे स्क्रीन पर भी धुंध और धूल जमेगी ।

अतः तभी तो कहा है कि हम अपनी जिंदगी में नहीं करें ऐसी भूल कि हमारे जीवन में कोई भी ऐसी भयंकर भूल हों जायें । हम अपने जीवन में हर कदम पर सजग रहें ताकि हमको आत्मा का प्रकाश ही प्रकाश मिलता रहे व हमारे शुद्ध भावों की धारा सही से गतिमान हो वह सदा हम विकास करतें रहें ।

हम सं विषम हर परिस्थिति में सं रहतें हुवें, अपनी इन्द्रियों कों अपने वश में करतें हुवें, हम भौतिकता सें आध्यात्मिक की और अग्रसर होतें हुवें, अपनी आत्मा कों उज्जवल करतें हुवें, हम अपने परम् लक्ष्य की और अग्रसर हों ।

वह हम अपने जीवन में समस्या बड़ी हो आदि ऐसी कुछ बातों में क्यों हुआ, कैसे हुआ, किसकी वजह से हुआ आदि बाद में देखना है और हमको वहाँ तुरन्त तो कारण नहीं निवारण ढूँढना है यानि हमको समस्या स्वरूप नहीं
उसका समाधान स्वरूप बनना है। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

रखें सदा संयमित चिन्तन : खण्ड-1


किसी ने सही कहा है कि हम मन में भर कर नहीं जियें मन को भरकर जियें । यह छोटी सी जिंदगी है हम हमेशा खुश रहें , मुस्कुरातें रहें । वह जो प्राप्त है वही पर्याप्त है ।

हम इसी को जिंदगी का उसूल बनायें। हमारे द्वारा किसी भी बात पर संयमित चिन्तन ही उचित है । वह अति चिन्तन तो हमको उलझा देता है । वह आदमी को सही से समुचित हल भी प्राय: यह नहीं दे सकता हैं ।

वह परिणाम स्वरूप आज की पीढ़ी में जो कुंठा और निराशा झलकती है उसका मूल कारण है उनकी सोच उन्हें किसी निर्णायक हल की आशा नहीं देती हैं । वह अत्यधिक चिन्तन हमको गर्त की और ले जाता हैं ।इस जगत में कई दफ़ा कुछ बातों से हमारा मन व्यथित हो जाता है और आपसी रिश्तों में खटास भर जाती है।

वह गलती किसी की भी हो उसे विस्मृत करके एक दूसरे से क्षमा-याचना करके रिश्ते वापिस जोड़ना हम सीखें ।हमारे द्वारा तोड़ना आसान है जबकि जोड़ना मुश्किल हैं ।

हर इंसान को पराई थाली में घी अधिक लगता है पर वो अपने से नीचे वालों की तरफ़ नहीं देखता कि तुम्हें जो मिला है उतना तो तुम्हारे से नीचे वाले को तो कुछ भी नहीं मिला इसलिये हमको जो प्रभु ने दिया है उसमें ही हम सही से ख़ुशियाँ ढूँढने का प्रयास करें। वह जीवन में सबसे मुख्य बात कि जितना हो सके
क्रमशः आगे ।

रखें सदा संयमित चिन्तन : खण्ड-2

तो किसी ज़रूरत मंद की मदद अवश्य करें।वह जो ख़ुशी दूसरों को ख़ुशियाँ देने में मिलती है वो ख़ुशी स्वयं के भोगने में नहीं हैं । हम किसी दूसरे कि तरक़्क़ी देखकर मन में कैसे ही हीन भावना नहीं लायें ।

इस दुनियाँ में हर इंसान को उसके प्रारम्भ में किये गये कर्मों के अनुसार ही ख़ुशियाँ या दुःख मिलता है।वह हमारे सामने ही उदाहरण देख लीजिये की धिरु भाई अम्बानी के दो बेटे हैं।आज के दिन बड़ा बेटा कहाँ है तो छोटा बेटा कहाँ हैं ।

हम मन में यही सोचें कि जब हमारी स्वयं की पाँचों अंगुलियाँ बराबर नहीं होती तो हम दूसरे से स्वयं की तुलना क्यों करें। हम यह बात हमेशा दिमाग़ में रखें कि होश में रहते हुए कोई ग़लत कार्य ना करें और अपने सामर्थ्य के अनुसार सत्कर्म अर्जित करें।

वह अंत में अगर हमको सुखी रहना है तो इस सोच के साथ जियें कि जो भाग्य में मिला है वो बहुत है और किसी भी वस्तु की सीमा नहीं होती हैं और जो पास में है वो पर्याप्त है।

अतः हम किसी भी समस्या के लिए कभी भी अति चिन्तन पर जोर न दें । वह अन्यथा सम्भावना है कि समस्या और गहरी उलझ जाएगी । यही सही चिन्तन वह सही सोंच हमारे लिए काम्य हैं |

हँसना है प्राकृतिक औषधि

आजकल हम देख सकतें है कि सबके चेहरे से हँसी भी दुर्लभ हो गई है । अतः हमारे कोई संदर्भ न हो तो भी हँसने की क्रिया को हम सदैव सुलभ बनाएँ । हम जीवन में इतना हँसे कि हँसते-हँसते पागल से हो जाएँ।

वह हँसना और खाना शुद्ध हवा हमारे द्वारा स्वस्थ रहने के लिए बहुत कारगर दवा हैं ।कहा जाता है कि हमारे द्वारा खुलकर हँसना व मुस्कुराते रहना न केवल प्राकृतिक औषधि है अपितु यह सदा प्रसन्न रहने तथा दीर्घजीवी होने की सरल विधि हैं ।

वह हँसने-हँसाने से हमारी बुद्धि कुशाग्र होती है। वह रोगग्रस्त व्यक्ति भी यदि प्रसन्नमुख रहता है तो जल्दी स्वस्थ होता है। हमारी मुस्कुराहट हमारे चेहरे पर भगवान के हस्ताक्षर है। प्रख्यात समाजिक लेखक डेल कारनेगी का यह कथन हैं कि हँसी या मुस्कुराहट पर हमें कुछ ख़र्च नही करना पड़ता हैं परंतु यह बहुत कुछ पैदा कर देती हैं ।

वह यह सही से पानेवाला मालामाल हो जाता हैं और इसको देने वाला ग़रीब नही होता हैं । हमारे द्वारा हँसना एक मानवीय लक्षण हैं और हमारी जीवंतता का सशक्त हस्ताक्षर हैं । वह सृष्टि का कोई भी जीवधारी यदि नही हँसता , किसी ने तो मानव की यह परिभाषा ही कर दी हैं की वह हँसनेवाला प्राणी हैं।

वह इसलिए जो दिल खोल दे अपनो के बीच तो उसको खोलना नहीं पड़ेगा डॉक्टरों के बीच कैसे ही निराशा को लिए क्योंकि उसके मन में आशा की किरण हैं । वह दुखियों के लिए सुख अन्धकारमय जीवन के हेतु ज्योति और परेशान तथा मानसिक तनावग्रस्त लोगों के लिए सर्वोत्तम प्रकृतिक औषधि हँसना हैं।

एक विचारक ने कहा है कि अगर हम हँसेंगे तो हर कोई भी हमारे साथ हँसेगा और अगर हम रोएँगे तो कोई भी हमारा साथ नहीं देगा। वह इसीलिए कहा गया है कि जब भी हमको अवसर मिले तो हम हँसने-मुस्कुराने से नहीं चूकें और स्वस्थ रहें । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

रक्षाबंधन

रक्षाबंधन पर्व का नाम आते ही भाई – बहन के रिश्ते की ड़ोर का चिन्तन आता हैं । इस अवसर पर यह सहज चिन्तन आना भी स्वाभाविक हैं क्योंकि यह पर्व भाई – बहन के मधुर रिश्ते को मजबूत करता जाता हैं । रक्षाबंधन पर्व का रक्षासूत्र एक धागा भर नहीं, रक्षासूत्र और शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का यह प्रतीक है ।

हर वर्ष सावन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को ये त्यौहार आता है । यूं तो रक्षाबंधन भाई बहन का प्यार व खुशियों और अपनापन का त्यौहार हैं पर समाज के कई पहलुओं से इसका सरोकार है । यह पर्व भाई बहन दोनों को शिक्षा और समानता का अधिकार भी देता है ।यह पर्व भाइयों को बहन का सम्मान करना सिखाता है ।

वह आगे अगर वक्त आन पड़े तो बहन भी रक्षा को तैयार रहे । बदलते वक्त के साथ इसका स्वरूप बदलता हैं । बदलते उम्र के साथ इसका रूप बदला हैं क्योंकि यह पर्व बचपन में सिर्फ अटूट प्रेम का आधार रहा हैं पर आगे फिर यह जिम्मेदारियों का आकार बना हैं ।

वह कच्चे धागों के बाद अब धीरे – धीरे फैंसी राखियों की बहार आ गयी हैं । वह प्रेम और सम्मान इस पर्व को सही से मनाने वालो का न तो कम हुआ हैं और न ही इस पर्व की चमक फीकी पड़ी हैं । वह चाहे कितनी बदले उम्र और जिम्मेदारियाँ लेकिन इसमें सिर्फ और सिर्फ भाई बहन का सच्चा प्यार रहेगा ।

यह पर्व अनुभव के ऐसे भावों में हमको प्रवेश कराता हैं जहाँ सिर्फ और सिर्फ एक – दूसरे के प्रति प्रेम का अहसास कराता हैं । वह शब्दों का वहाँ स्थान रिक्त होता हैं। यह इस तरह प्रेम का प्रतीक पावन पर्व है ।

बालिका शिक्षा या नारी शिक्षा की आवश्यकता – खण्ड-1


आज के समय में हम देख सकतें है कि शिक्षा की सभी को आवश्यकता हैं । मेरे चिन्तन से हर किसी के जीवन में शिक्षा का वही स्थान है जो हमारे शरीर में साँसों का हैं ।

आज के समय में हम एक आम ग्रामीण परिदृश्य को देखें तो वहाँ पर पाँचवीं तक की स्कूल तो आसपास है लेकिन आठवीं के बाद विद्यालय दूर है। वहाँ परिवहन की कोई सुविधा नहीं हैं ।

वह कितनी ही महिलायें आर्थिक तंगी, घर से स्कूल की दूरी, सुरक्षित परिवहन की कमी, उच्च माध्यमिक विद्यालयों का अभाव, शौचालयों की स्थिति और सामाजिक असुरक्षा आदि – आदि की वजह से शिक्षा आदि से वंचित रह रही हैं ।

वह आज के समय में हम यह देख सकतें है कि लड़कियाँ कंधे से कंधा मिला सब जगह सब तरह से अपना भरपूर सहयोग कर रही हैं । वह घर की आर्थिक मजबूती में भी अपना पूर्ण रूप से सही से योगदान दे रही हैं ।

आज के समय में बालिका शिक्षा यानि लड़कियों की शिक्षा बहुत अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल व्यक्तिगत रूप से लड़कियों के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए भी कई फायदे लाती है। वह शिक्षित लड़कियाँ बेहतर निर्णय लेती हैं । वह घर परिवार में सभी का सही से अच्छे से ध्यान रखती है और स्वास्थ्य
क्रमशः आगे ।

बालिका शिक्षा या नारी शिक्षा की आवश्यकता – खण्ड-2

खण्ड-2
और स्वच्छता के बारे में अधिक जागरूक होती हैं । वह आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र होती हैं जिससे वे स्वयं को और अपने परिवारों के लिए बेहतर जीवन स्तर सुनिश्चित कर पाती हैं। 

यह शिक्षा लड़कियों को सामाजिक मानदंडों और रूढ़ियों को चुनौती देने और लैंगिक भेदभाव को कम करने के लिए सशक्त बनाती है । आज के समय में हम देखते हैं कि एक लड़का पढ़े तो परिवार का भविष्य बनता है लेकिन लड़की पढ़े तो शादी की उम्र निकलने का डर पैदा होता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह ही मानसिकता अब भी गहराई से मौजूद है। लड़कियों की शिक्षा को लाभ से ज्यादा खर्च माना जाता है। मुझे कुछ समय पूर्व किसी ने कहा कि हमारे यहाँ आज भी महिलायें इतनी अच्छी शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकती हैं क्योंकि उनके सामाजिक बन्धन है जबकि वह योग्य, सुसंस्कारी और अच्छी प्रतिभावान आदि – आदि हैं ।

यह विरोधाभास खत्म होना चाहिए ।हम देख सकतें है कि शिक्षित लड़कियाँ बेहतर नौकरी के अच्छे अवसर प्राप्त करती हैं । वह अपनी आय तो बढ़ाती ही हैं और गरीबी के चक्र से परिवार को बाहर निकलने में सक्षम होती हैं। वह शिक्षित लड़कियाँ अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में बेहतर
क्रमशः आगे ।

बालिका शिक्षा या नारी शिक्षा की आवश्यकता – खण्ड-3

निर्णय लेती हैं ।वह जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आती है। वह शिक्षा लड़कियों को बाल विवाह और कम उम्र में गर्भावस्था से जुड़े जोखिमों के बारे में सही से उनको जागरूक करती है। वह शिक्षित लड़कियाँ अपने जीवन के बारे में अधिक आत्मविश्वास से निर्णय लेती हैं और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती हैं ।

वह बालिका शिक्षा विशेष रूप से देश के लिए लाभकारी होती है। वह शिक्षित महिलाएँ सोच-समझकर सही निर्णय सभी का ले सकती हैं । आज हमारे देश में सर्वोच्च पद पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी है ।

वह महिलायें लैंगिक हिंसा को कम कर सकती हैं । वह कम बच्चे पैदा कर सकती हैं और कार्यबल में शामिल हो सकती हैं। यह लैंगिक भेदभाव और असमानता को समाप्त करने की दिशा में शिक्षा के द्वारा सही से सशक्त कदम है ।

वह बालिका शिक्षा आज के समय में एक ऐसा सशक्त माध्यम है जो लड़कियों को सशक्त बनाती है, समाज को विकसित करती है और एक बेहतर भविष्य का सही से निर्माण करती है । अतः बालिका शिक्षा या नारी शिक्षा की आवश्यकता को हमें सही से समझते हुए अपनी प्रतिभा वह
क्रमशः आगे ।

बालिका शिक्षा या नारी शिक्षा की आवश्यकता – खण्ड-4

सूझबूझ से इसको विकसित करने को अपना योगदान देना चाहिए । अच्छाई और बुराई हर युग मे रही है और यह बात बहुत अंशों मे सही है। भगवान महावीर के समय भी क्या दासप्रथा, भूखमरी,राज्यलिप्शा,सत्ता संघर्ष,स्त्री के प्रति, क्रूरता, अकाल, शोषण, छलना, अकाल मृत्यु आदि नहीं थे? वह क्या आज जैसी विकसित स्वास्थ्य, शिक्षा,आवास व्यवस्था,न्याय व्यवस्था, यातायात की सुलभता आदि आम जनता के लिए सुलभ रहे थे?

पर इसके बावजूद इसे ऐकांत कलयुग, दुषम आरा (दुखःमय) इस आधार पर नही कहा जा सकता है? आज की अच्छाईयों को पूरी तरह नजर हमारे द्वारा नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता है? इस संदर्भ मे श्रीमद् रायचंद का यह मंतव्य ज्यादा यौक्तिक लगता है कि इस समय वीतराग की वाणी का मिलना दुष्कर है।

वह अगर योग मिल भी जाए तो उस वाणी पर श्रद्धा का होना दुष्कर है और अगर श्रद्धा हो भी जाऐ तो उस मार्ग पर चलना महादुष्कर है इसलिए यह दुषम आरा है। यह कलयुग की काली धारा है। हमे सही मार्ग की और चलना चलना चाहिए यही हमारे लिए काम्य है ।

बड़ी विडंबना

प्रायः प्रायः कोई
भी अपने जीवन
में यह देख और
समझ सकतें
है वह सुनने
को सब कोई
सुनते ही होंगे
और अनुभव भी
करते होंगे कि
जीवन का एक
एक क्षण है
कितना अमूल्य
कि बीता पल
नहीं पाया जा
सकता किसी
भी मूल्य फिर
भी हम में से
अधिकांशत:
लोग इसे गँवा
देते हैं कोई भी
गफलत में वह
निरर्थक के ही
कामों में अथवा
आलस्य में कोई
सरोकार ही वह
नहीं रखते और
ध्यान ही नहीं
देते आगे का
भव को सुधारने
के लिए इसका
उपयोग करने
में इससे बड़ी
विडंबना क्या
हो सकती है
सबके साथ हो
हमारा सही
से सद्व्यवहार
और नैतिकता
पूर्ण हो सही
आचार हम
जलायें सबमें
भरोसे का दीप
बाँटें जन-जन
में सही से यहाँ
खुशियों के “प्रदीप”
जो मिला है यह
अनमोल जीवन ,
कृतज्ञता हर रोज़
ज्ञापित करें हम
सेवा-सहयोग का
अनुदान कर सही
से शांति हर ओर
स्थापित करें कभी
न हो ऐसा कृत्य
कि बाद में हम
पश्चाताप करें
सृजनात्मक
हो चिंतन वह
सृजनात्मकता
कि कृत्तियों
से हम इस
वसुन्धरा को भरें
अपना विवेक
को सही से
जगाए और
समय को
नष्ट करने
से डरे तथा
एक एक
पल का सही
से सदुपयोग
करे हमारे
जीवन का
हर क्षण सही
से जागरूक
बना रहा
हमको
क्योंकि
जीवन की
साँसें हैं चंद
जाने कब हो
जायें ये मंद
यही हमारे
लिए
काम्य हैं ।

भैक्षव शासन री सुषमा : ध्रुव-1

आचार्य श्री भिक्षु का सत्य की खोज में निष्ठा से जीने के संकल्प का था । वह आचार्य श्री भिक्षु की जीवटमय मानसिकता का कुशल योद्धा के शांति और सत्य की क्रांति के विकल्प का अप्रतिम उदाहरण है ।

आचार्य श्री भिक्षु ने सदा अपने मन की बात सुनी थी । वह कभी दबे नहीं सिद्धांतों पर अटल रहे और झुके नहीं आदि – आदि निर्भयता के गजब उदाहरण हैं । वह उनको जो बात सही लगी उन्होंने बेझिझक कही।

वह जब आचार्य रुघनाथजी ने शास्त्रोक्त थी जो बात सही वो नहीं मानी बस , वहीं से पावन तेरापंथ की शुरुआत हो गई। विक्रम संवत 1817 चैत्र शुक्ला नवमी का पावन दिन सब दिनों से भिन्न हो गया । वीर भिक्षु ने रुघनाथ जी के संघ से अभिनिष्क्रमण किया | एक अलग ही नदी और बहा दी वह तेरापंथ महानदी बन गई।

वह आज भी वीर भिक्षु के जीवट की अमर कहानी कह रही जो अनवरत बह रही है । आचार्य भिक्षु के अथक बलिदानों से तेरापंथ धर्मसंघ की सुषमा आज चहुँ और अपनी उत्कृष्ट सौरभ से महक रही हैं । आचार्य भिक्षु के बाद एक से एक बढ़कर आचार्यों ने तेरापंथ धर्मसंघ को खूब- खूब अपने अथक श्रम से सिंचन दिया हैं ।

वह अभी तीर्थंकर के प्रतिनिधि युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी का निरन्तरता में दिव्यता का प्रकाश हम सबको पावन कर अध्यात्म की और अग्रसर कर रहा हैं । हम देखते है कि पुर्णिमा का पावन दिन निश्चित ही अन्य दिनों से भिन्न है । वह इस दिन रात्रि को भी पूर्ण चन्द्रमा होगा जो शतगुणी हों इस दिन की गरिमा को बढ़ा देता है ठीक इसी तरह
क्रमशः आगे ।

भैक्षव शासन री सुषमा : ध्रुव-2

क्रांतिकारी वीर भिक्षु ने तेरापंथ की जो स्थापना की वह आज विकसित हो दिन रात दुगना- चौगुना हो गया है और हो रहा है। हम हृदय के तल से श्रद्धावनत हो उस महान संत को स्मरण करते हैं । वह वंदन करते हैं कि उनके द्वारा प्रतिपादित तेरापंथ को एक से एक बागवान और इसके संरक्षण को मिले हैं ।

यह सदाबहार धर्म वाटिका खिलती रही है और खिलती ही रहेगी अविराम दिन हो या रात हो। एक गुरु और एक विधान का अनुपम सजीव साक्षात् उदाहरण आज भी तेरापंथ धर्मसंघ में देखा जा सकता हैं । तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्यों ने खूब यात्राएँ देश- विदेश में की थी ।

आचार्य श्री तुलसी ने लगभग 90 हज़ार किलोमीटर की यात्रा की थी । वह वर्तमान में युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने लगभग 60 हजार किलोमीटर की यात्रा सुदूर देश- विदेश में की हैं वह अभी भी निरन्तर गतिमान हैं । आचार्य श्री महाश्रमण जी की निरन्तर यात्राएँ व पूरी सार- सम्भाल का ही यह परिणाम है कि आपने तेरापंथ धर्मसंघ के सभी आचार्यों द्वारा सिंचित इस तेरापंथ वटवृक्ष को बड़ी सुदृढ़ता और मजबूती प्रदान की हैं ।

आचार्य श्री भिक्षु ने जो शुरुआत की वह आज विशाल रूप में हमारे सामने हैं । आचार्य श्री भिक्षु की प्रतिभा सूझबूझ आदि विराट थी । आचार्य श्री भिक्षु के समय में मुनि श्री थिरपाल जी, फतेहचन्द जी जो उनसे दीक्षा में बड़े थे । बड़े साधु- साध्वी के आने पर आज भी आचार्य श्री उनको देखकर अपने पट्ट से उतर पहले उनको आचार्य श्री भिक्षु के
क्रमशः आगे ।

भैक्षव शासन री सुषमा : ध्रुव-3

समय की तरह ही बड़ी विनम्रता से वन्दना करतें हैं । इस तरह तेरापंथ धर्मसंघ की सही से पूर्ण अखण्डता आज भी विद्यमान हैं । तेरापंथ धर्मसंघ में आज भी साधु- साध्वी निस्पृहता में ओत- प्रोत रहते हैं ।

यह जीवट की गौरवगाथा बलिदानों की कहानी है । वीर भिक्षु के दृढ़ संकल्प वह आगम सम्मत अवदानों की हैं । उनमें ग़ज़ब का साहस था । वे ग़ज़ब के दृढ़ निश्चयी थे । यह शास्त्र संगत बात नहीं कहने वाले थे ।

उनके कदम -कदम पर रोड़े अटके और उनका घोर – विरोध हुआ पर वह तिल भर भी विचलित नहीं हुए और उनके तिनका मूसल भी बन गया । उन्होंने अनेकों कष्ट सहे परन्तु सही मार्ग को नहीं छोड़ा। उन्होंने शान्त भाव से समझा- समझा कितनों को इस पथ पर मोड़ा।

उन्होंने संघ संघटन में भी दूर दृष्टि से काम किया। वह एक गुरु और एक विधान का मूल-थम्भ अवदान दिया। उत्तरवर्ती आचार्यों ने फिर कुशल माली का काम किया। वह जो बीज भिक्षु ने वपन किया उसको वट वृक्ष रूप में विकसित किया। हे तेरापंथ के आद्यप्रवर्तक ! हम आभारी हैं यह पावन पथ जो तुमने दिखलाया।

वह उसका निश्चित कल्याण हुआ है जिसने उसे सच्चे मन से अपनाया हैं ।तेरापंथ धर्मसंघ की सुषमा सभी आचार्यों द्वारा निरन्तर सार- सम्भाल से प्रतिदिन देश- विदेश में अपनी सौरभ से हम सबको पावन कर रही हैं । ऐसे वीर भिक्षु को मैं अर्पित कर रहा हूँ सभक्ति श्रद्धा सुमन । प्रणमनन, प्रणमन, प्रणमन।

समय रूकता नहीं पल भर भी : भाग-1


हम देख सकतें है कि आने वाले पल को,कब , किसने और कहाँ देखा है? वह धूप-छांव के मध्य संधि की, कहाँ रेखा है? इस सच्चाई को समझ,जो वर्तमान मे जीता है उसने ही भविष्य को वर्तमान मे देखा है।वह गया हुआ समय वापिस नहीं आता हैं ।

हम अपने जीवन में यह देख सकतें है कि समय कभी भी किसी के लिए भी किसी काम के लिए भी पल भर भी आदि – आदि रुकता नहीं हैं । वह तो सागर की लहरों की तरह अनवरत ही चलता ही रहता है इसीलिए तो कहा गया है समय जो बीत गया वह सदा के लिए अतीत हुआ।

वह उसको तो कोई भी किसी तरह भी कभी भी वापस ला सकता नहीं हैं । वह इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे से हुई भूलों के लिए कहा गया है कि जो बीत गया सो अतीत हुआ हम आगे की सुध ले। हम जन्म-लेते हैं जब तो कुछ हमको समझ आती है ।

वह उस समय उचित कार्य हम यह सोच कर टाल देते हैं कि भविष्य में यह काम कर लेंगे पर समय अपनी गति से चलता ही रहता है।वह जो कार्य जिस समय करना चाहिये उसे नहीं करके हम नादानी में समय को उजुल-फ़िज़ूल बातों में नष्ट कर देते हैं।

वह जब अन्तिम समय हमारे सामने दस्तक देता है तब हमको याद आता है कि जिस कार्य को हम्हें बहुत पहले करना था वो समय तो हमने नष्ट कर दिया।वह उस समय यह मुहावरा याद आता है कि
अब पछताये तो क्या होगा,जब चिड़िया चुग गयी खेत ।

वो ही इंसान अपने जीवन में सफल होगा जो सही समय सही सोंच सही चिन्तन से काम को क्रियान्वित करेगा । वह आज तक कोई भी कल नहीं देखा पाया है? हमारे पास तो केवल वर्तमान का पल है । वह जो नहीं जीता जिन्दादिली से इस पल को वह अपनी ही जीन्दगी के साथ छल करता है । हम देख सकतें है कि सब चीज के दो पहलू होते है एक सकारात्मक दृष्टिकोण
क्रमशः आगे ।

समय रूकता नहीं पल भर भी : भाग-2

और दूसरा नकारात्मक दृष्टिकोण । हमारे ज्ञानावरण के क्षयोपशम में भी इस स्मार्टफोन की बहुत अहम भूमिका है।हम ऑनलाइन तकनीक के माध्यम से हम ज्ञानीजनों से ज़ूम मीटिंग आदि के माध्यम से आमने सामने मिलने ,अपनी जिज्ञासाओं का सही से समाधान पाने वह सभी प्रेरणाएं पाने तथा ज्ञान का विकास होने आदि – आदि में स्मार्टफोन बहुत सहायक है ।

हम अपने विवेक से इसकी उपयोगिता को समझकर इसका सही से सदुपयोग करे तो आज हमको धर्मसंघ की सभी तरह की सही जानकारियां ,गुरुदेव के प्रवचन,सुख-संवाद और सब चारित्र आत्माओं के सभी संवाद आदि – आदि इसी के माध्यम से पाने में सफल होते हैं।

हम इसका सही उपयोग करें तो यह हमारे ज्ञान के विकास में सहयोगी है,नहीं तो भटक भी सकते हैं।ये विलक्षण गुण हम मनुष्यों में ही है कि हम अपना विवेक से इसका सदुपयोग करके सभी जानकारियां पाकर अपनी आत्मा का कल्याण कर सकते हैं।

वक्त कहता है मैं फिर न आऊंगा और मुझे खुद पता नहीं तुझे हसाऊंगा या रुलाऊंगा, जीना है तो इस पल को जी ले क्योंकि मैं किसी भी हाल में इस पल को अगले पल तक रोक न पाऊंगा।

अतः इसी को ध्यान में रखते हुए हमारे से हुई भूलों के लिए कहा गया है कि जो बीत गया सो अतीत हुआ हम आगे की सुध ले। यही सकारात्मक दृष्टिकोण है । हम इसी को अपनाएँ और बीती हुई भूलों को गौण करें ।

वह घड़ी से सीख के बारे में गुरुदेव महाप्रज्ञ जी फरमाते थे कि घड़ी की सुई नियम से चलती है इसलिए लोग उसका विश्वास करते हैं । वह तुम भी नियम से चलो तो लोग तुम्हारा विश्वास करेंगे । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

एक विचार

हम देख सकतें है कि हमारी जिन्दगी में सही से एक विचार भूचाल ला सकता है । एक कुम्हार मिट्टी से कुछ बना रहा है। वह धीरे-धीरे मिट्टी को चिलम की शक्ल दे रहा है।

वह तभी कोई आगन्तुक आया और उसको बोला हे कुंभकार! तू चिलम बना रहा है , अभी तो गर्मी का मौसम है , सुराही आदि बहुत बिकेगी। वह चिलम पीने वाले तो कम होंगे और सुराही तो घर-घर चलेगी। यह सुनकर कुंभकार ने एक पल सोचा और उसकी सोच को आगन्तुक के विचार ने भीतर ही भीतर दबोचा।

यह विचार कुंभकार को सही लग भीतर में जच गया। वह जचा क्या उसके जीवन की धारा बदल गईं । उसने लौंदे को वापस मिट्टी में बदला और सुराही बनाना शुरू किया। यह देख मिट्टी बोली ! रे कुंभकार! पहले तो तू चिलम बना रहा था और अब बीच में ही अर्ध पूर्ण चिलम मिटाकर सुराही बनाना शुरू कर दिया?

यह निर्णय तूने क्यों लिया ? यह सुनकर कुम्हार बोला कि मेरे को सही राह मिल गई और मैं गलत में कभी नहीं जाऊँगा । वह अब मेरा विचार बदल गया। उसने चिलम से सुराही बनाना शुरू कर दिया। वह मिट्टी!

बोली तुम्हारा तो विचार बदला मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई क्योंकि अब मैं चिलम से नुकसान नहीं करवा कर घर- घर में लोगों की प्यास बुझाने का काम करूँगी । वह अब सुराही बनकर लोगों को भी शीतल जल पिलाऊँगी और खुद भी शीतल रहूँगी।

अतः यह सही है कि एक विचार हमारी जिन्दगी में भूचाल ला सकता है । वह कमाल कर सकता है। वह हमारी जिन्दगी बदल जाती है और क्या से क्या हो जाती है ।

वफ़ादारी : ध्रुव-1

इस संसार में जो आया है उसका जाना निश्चित है । इस संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है ।वह अगले पल क्या होगा कोई नहीं जानता हैं । हमारा जीवन क्षणभंगुर , परिवर्तनशील आदि है वह उतार-चढ़ाव जीवन के सफर में सच है। हम आज के समय में प्रायः प्रायः जहाँ खोजे परस्पर प्रेम आदि – आदि भाई-भाई में भी नहीं मिलता हैं । वह पल में यहाँ पर रिश्ते नाते बदल जाते हैं ।

वह पल में रास्ते बदल जाते हैं । हम कई किश्तों में जीते हुए कभी सुख में ,कभी दर्द भरे रिश्तों आदि में बंध जाते हैं आदि – आदि | यहाँ कुछ भी शाश्वत नहीं है वह कहीं भी निस्वार्थ वफादारी का मिलना मुश्किल है ।

हमारे जीवन में वफ़ादारी एक ऐसा गुण है जो किसी व्यक्ति या सिद्धांत के प्रति हमारी कर्तव्यनिष्ठा की प्रतिबद्धता दिखलाता है। यह हमारा एक ऐसा दुर्लभ गुण है जो हमारी गहन ईमानदारी व समर्पण की भावना दर्शाता है। वह वफ़ादारी केवल भावना नहीं है । यह एक सजीव तप है।

वह आज के समय में रिश्ते भी स्वार्थ व अधिकार की भावना से इस कदर अच्छादित हो रहे हैं जब वफ़ादार अब मिलते कहाँ हैं।

हर प्राणी में कुछ न कुछ योग्यता होती हैं पर हर किसी को सही दिशा और सही रास्ता नहीं मिलता हैं ।वह सम्यक् संस्कार , सकारात्मक सोच व योग्यता आदि का आकलन साथ में समय – समय पर यदि किया वह उसकी योग्यता का आत्म सम्मान जाए तो उसकी कार्यक्षमता वह वफ़ादारी में इतना निखार आ जाएगा कि सारा संसार चकित रह
क्रमशः आगे

वफ़ादारी : ध्रुव-2

जाएगा क्योंकि आत्म सम्मान में इतना चमत्कार है कि देखते ही देखते वह आता हैं । वह छोटे से छोटे प्राणी को भी आदर व सत्कार दिला देते हैं। यही सभ्य समाज की सही पहचान हैं ।

वह यहाँ सब को अपनी रुचियों के अनुसार समान अधिकार मिलता हैं । वह न किसी से ईर्ष्या और ना किसी को नीचा दिखाने की भावना होती हैं । वह नैतिकता , ईमानदारी और सद्भावना के सदाचरण व धर्माचरण की प्रभावना से सबको अपनी क़ाबिलियत के अनुसार ही आत्म – सम्मान मिलता हैं ।

वह मानसिक व भावनात्मक तन और मन प्रसन्न होतें है और आत्मसम्मान तो प्रोत्साहन कि सफलताओं के लिये है ।हमको आशावान और ऊर्जावान बने रहना हैं । वह धर्माचरन के साथ स्वयं जीतना व दूसरों को जीतना हैं । वह आत्मसम्मान की कोई चाहत नहीं होती हैं क्योंकि आत्मसम्मान तो स्वयं ही मिल जाता है ।

इस सत्य को हम जितना जल्दी समझ ले तो हम उतने ही सुखी शांत और संयमित रहेंगे । वह इतिहास में कर्तव्यनिष्ठा का सजीव उदाहरण श्री राम के अनुज भरत व लक्ष्मण का व सेवक हनुमान का आदि- आदि है । यहां कुछ भी शाश्वत नहीं है हमारे जैसे कर्म होते हैं वैसे हम फल पाते हैं ।

वह स्वर्ग नरक इसी जहान में हैं । हम इस संसार में खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ जाएंगे केवल हमारे सद् कर्म ही साथ जाएंगे । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

पठन : खण्ड-1

हमारे द्वारा पठन के कार्य से हमारे भीतर ज्ञान का दीपक प्रकाशित होता रहता हैं । वह पठन का कार्य हमारी आत्मा
को सुदृढ़ प्रकाश तो देता है ही साथ में आत्मा को अन्तिम लक्ष्य की और बढ़ाता है ।

वह अमृत से सरोबार भी हमको करता हैं । हम सद् साहित्य पठन के द्वारा ही चिन्तन मनन आदि कर सही से आगे बढ़ सकते है और लेखन आदि का कार्य भी सुचारू रूप से कर सकतें हैं ।

वह लेखन आदि में हम अपने भावों को जोड़ सही से उसको पूर्ण कर सकतें है तभी तो हम यह कह सकतें है कि लेखक की आत्मा उसके कलम में होती हैं । मेरे जीवन में पठन का वही स्थान हैं जो दिए में बाती का होता हैं । हम पठन को जीवन के किसी भी दृष्टिकोण से देखें तो वह अपना अलग ही सही से महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं ।

वह पठन से हम अपने जीवन का निर्माण वह अपने व्यक्तित्व को निखार सकतें हैं । हर आत्मा का कर्म अनुसार जन्म निश्चित है।वह हर आत्मा अपने पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार ही इस सृष्टि पर वह और जगह जन्म लेती है।

हमारे द्वारा उसी क्रम में एक मनुष्य जीवन आता है। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक का जीवन तो पूरा एक किताब की तरह होता है।वह जिसका पहला पेज सूचक होता है मनुष्य का जन्म और अंतिम पृष्ट इंसान की मृत्यु कहलाता है। वह अपने जीवन में पहले और अंतिम पेज के बीच के पन्नों को इस जीवनकाल में अच्छे या बुरे कार्यों द्वारा
क्रमशः आगे ।

पठन : खण्ड-2

हम्हें ही भरना होता है। वह हमको जैसे अगर किसी किताब को पढ़ने में इतना आनंद आता है कि उसको बीच में छोड़ने का मन ही नहीं करता तो ठीक वैसे ही इंसान को अपने जीवनकाल में ऐसे कार्य करने चाहिये कि लोग स्वतः ही आपकी और खिंचा चला आये।

वह उसकी मौजूदगी ही भरी सभा में एक आकर्षण बन जाये। यह तभी सम्भव होता है कि इंसान का मन बच्चे की तरह सच्चा,करण जैसा दानवीर, महात्मा गांधी जैसा हो अहिंसावादी और राम जैसा मर्यादा पालन आदि – आदि करने वाला हो।

वह अगर ऐसा इंसान का जीवन होगा तो उस इंसान के जीवन की किताब का पहला और अंतिम पृष्ट तो क्या पूरी किताब ही बहुत सुंदर होगी।वह ठीक उसके विपरीत कार्य करने वाले व्यक्ति की किताब का पहला पृष्ट तो क्या कोई पेज पढ़ने का मन नहीं करेगा।

हर आत्मा का जन्म से लेकर मृत्यु तक के किये गये कार्यों के आधार पर ही पुनः जन्म होता है। हमने कितने पुण्य कार्य किये होंगे तब हमको यह मनुष्य जन्म मिला हैं । वह जीवन के हर दिन हम्हें कोई ना कोई नेक कार्य करके इस जीवन से अलविदा होना है।वह इसको सुन्दर सुमनों की सौरभ से हमको संवार कर पठन से भरना है । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

अध्ययन

अध्ययन आत्मा का
वह दीपक हैं जो
आत्मा को सही का
बोध करा दीप की
तरह ही प्रकाशित
करता रहता हैं
हमको अपने
जीवन में सही
से रखनी होगी
व्यवस्था और
हम पथ पर
बढ़ते रहे उन्नति
के तो मिलेगा तभी
हम सभी को सही
से लाभ वह ऐसी
खोलनी होगी ही
हमको दुकान
रहे शिक्षा वह
सही से अध्ययन
सामाजिक उन्नयन
रहना हमें प्रसन्न
सुखद मकान है
स्वार्थभाव हम रहे
दूर शिष्टता और
हमारे विशिष्टता हो
कोई न असभ्यता तो
नहीं अपमान है हो
विकास मानसिक
रखें भाव अपनत्व
विदुषियों विद्वानों
को मिलता सम्मान
है यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

तथ्यात्मक सत्य : खण्ड-1


अनेकांत के दर्पण मे ही सदा सत्य के दर्शन होते हैं | वह तप से निश्चित तेज निखरता हैं जिसका साक्षी स्वयं सूर्य का हर कण हैं । हमको विकल्प दूसरा कोई नहीं क्योंकि उङने को आकाश चाहिए पर श्रद्धामय हो अगर समर्पण तो सारे बंधन मिट जाते हैं ।

हमारे जीवन कभी ऐसी स्थिति देखने को मिलती हैं कि कभी-कभी लोग किसी बात पर इस कदर से लड़ते-झगड़ते हैं कि दोनों ही अपने आप को सही और दूसरे को गलत समझते हैं।

वह इसका कारण यह है कि गलती किसी की हो वह पीठ की तरह होती है जो खुद के सिवाय बाकी सबकी दिखती है। अतः हमको अनुभवी बुजुर्गों ने कहा है कि मतभेद में सदा अपनी बात पर दृढ़ता से न अड़ें, हठधर्मी कभी न करें और दूसरा भी सच हो सकता है इस बात पर भी हम ध्यान दें आदि – आदि |

वैचारिक मतभेदों, उलझनों, झगड़ो आदि से बचने के लिए व शांति की स्थापना के लिए भगवान् महावीर के अनेकान्तवाद का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण है ।

अनेकान्तवाद वस्तु के विषय में उत्पन्न एकांतवादियों के विवादों को उसी प्रकार दूर करता है जिस प्रकार हाथी को लेकर उत्पन्न जन्मान्धों के विवादों को नेत्र वाला व्यक्ति दूर कर देता है।इसे संसार जितना जल्दी व अधिक
क्रमशः आगे ।

तथ्यात्मक सत्य : खण्ड-2

अपनाएगा, विश्व शांति उतनी ही जल्दी संभव है। वह जब एकांगी दृष्टिकोण विवाद और आग्रह से मुक्त होंगे, तभी भिन्नता से समन्वय के सूत्र परिलक्षित हो सकेंगे। वह जीवन का संपूर्ण विकास इससे संभव है।

हम देख सकतें हैं कि एक ही बात के एक से अधिक दृष्टिकोण हो सकते हैं और सभी एकदम सही हो सकते हैं । हमारा अपना नजरिया ही ठीक है यह मानकर हमारे द्वारा दूसरे का गौण नहीं किया जा सकता है । वह इसके अनेक उदाहरण हो सकते हैं जैसे सिक्के के पहलू दो अंग्रजी के 6 और 9 आदि।

एक और उदाहरण लेते है कि एक ने कहा 6+3 होते हैं नौ दूसरे ने कहा 5+4 होते हैं नौ दोनों ही शतप्रतिशत सही हैं । अत: हम अपनी अपनी सोच पर अड़ें नहीं। ऐसे उदाहरण और भी हैं। अत: हमको यह वीकार कर चलना चाहिए कि केवल हम ही नहीं दूसरे भी अपने दृष्टिकोण से ठीक हो सकते हैं।

वह ऐसी स्थिति में सयानों ने कहा है कि यह तथ्य है सत्य है कि ज्यादा बोझ लेकर चलने वाले अक्सर डूबते ही हैं । वह चाहे बोझ क्रोध का हो अथवा हठधर्मी का हो आदि – आदि ।

वर्धमान

आचार्यों ने साहित्य
वह अनेक भिन्न
भिन्न रश्मियों से
हमारे जीवन को
वर्धमान किया हैं
वृद्धि होना हमारे
जीवन में हर दृष्टि
से सकारात्मकता
से हमको ओत प्रोत
करता है हमारे में
वर्धमानता रहें यह
ऐसी रहें जो हमको
सुव्यवस्थित चिन्तन
से ओत- प्रोत कर
भवसागर के पार
करा दें और यह
वर्धमानता ऐसी
हों जो हमारे
मनुष्य जीवन को
भवसागर के पार
निकालने में यह
सही सहायक हों
तेरापंथ धर्मसंघ में
प्रतिवर्ष वर्धमान
महोत्सव मनाया
जाता है इसके पीछे
इसमें यही चिन्तन
अभीष्ट हैं कि हर
क्षेत्र में वर्धमान हो
वर्धमान जीवन
हमारा सदैव
अध्यात्म से
आप्लावित रहें
भगवान महावीर
का वर्धमान नाम
था भगवान के
नाम से जुड़ाव
हमको आगे
बढ़ाते रहें और
अध्यात्म पथ में
योगभुत सहयोगी
रहें एवं हमको
आगे मोक्ष के
सम्मुख पहुँचा
दें कम से कम
भव में यही
हमारे लिए
काम्य हैं ।

नया युग

मैंने चारों तरफ
अपनी खूब
नजर दौड़ाई तो
मुझे एक बात
सही से और
स्पष्ट समझ
में आई कि
आज के इस
समय में यहाँ
हर किसी के
जीवन की दौड़
है केवल और
और की होड़
सांसारिक को
चाहिए कि हर
चीज हो उसके
पास अतिरिक्त
वह अतिरिक्त
शोहरत और हो
अतिरिक्त ही
उसके पास
सही सम्पदा
अतिरिक्त हो
प्रतिष्ठा और
अतिरिक्त यह
अतिरिक्त वह
आदि – आदि
इस अतिरिक्त
की चाह ने तो
बना दिया है
उसका सभी
तरीके से सोच
में जीवन ही
पेचीदा उलझा
अन्यथा हमारे
जीवन का तो
रास्ता है सही
वास्तविकता में
एकदम सीधा
साधा हमारी
मन की माटी
पर हम हर
पल गिरा रहें
है तृष्णा का
जल हम अपने
जीवन को सही
चले थे बनाने
Simple और
मीठी सी चीनी
वाली सी पर
हमारी जिंदगी
हो गई है सब
कुछ तरीके से
Complicated
ही मसलन हम
हमारे बचपन
में देखते है कि
कपड़े होते थे
हमारे तीन ही
प्रकार के स्कूल
के घर के और
किसी खास
अवसर के
और अब.अब
तो कैजुअल
फॉर्मल नॉर्मल
फिर Sleep का
Wear Sports
का wear Party
का wear और
Swimming का
Suit Jogging
का Dress
फलाना और
ढिमका आदि
इस तरह है
अलग अलग के
अवसरों की है
अलग अलग
सबकी वह
पहले दंड
उठक या
बैठक होती
कुश्ती कबड्डी
साइकलिंग
और दौड़ ही
थे Body
के builder
और अब तो
बहुत अच्छे
आधुनिक और
Well Equipped
Gym में बनाए
जाते हैं Body
& Shoulder
मैं इसमें साथ में
यह सोच रहा हूँ
नया युग में हम
करने चले थे
अपनी सारी इस
जिंदगी को आसान
पर हमारे मच गया
ड्रेसों और Gym में
आदि – आदि में
खूब- खूब ही
यहाँ पर मशीनों
आदि का घमासान
यह है नया युग
अतः हमारे जीवन
की इस दौड़ में होती
है जीत उसी की ही
जिसके रहती है
कोशिश की हमारे
आपसी बातचीत में
जब दिखने लगे कई
तरह से विचार भेद
तो उचित है हम भूल
कर छोटे मोटे सभी
सैद्धांतिक मतभेद
हो जाएँ आपस
में ही सही सहमत
दिल बड़ा कर वह
हँसने हँसाने में
हरदम भूल कर
जीवन के सारे गम
वह जब भी किया
हो किसी ने कुछ
अच्छा सही से तो
बेझिझक रहें हम
प्रथम करने में सही
से उसकी प्रशंसा
हरदम और किसी
को किसी भी कही
समय में पड़े कोई
जरूरत मदद की
जरा भी न हम
हिचकिचाएँ छोड़
कर सब काम
उसकी मदद को
जाएँ वह कभी
न हिचकिचाएँ
क्षमा करने में
किसी को भी
उसकी भूल पर
ना ही कराएँ
महसूस उसे
कभी भी हीन
भावना का भूल
कर यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

सेवा हो निस्वार्थ भाव से


हम देख सकतें है कि सामाजिक व्यवस्था में सेवा का बहुत महत्व है । वह व्यापक अर्थ में हम देख सकतें हैं कि समाज के सभी वर्ग सम्पन्न और समर्थ नहीं हो सकते हैं ।अतः जो समृद्ध हैं उनके द्वारा उन जरूरतमंद लोगों की मदद करना सही से यह पावन कर्तव्य है। वह जरूरी नहीं है कि सेवा आर्थिक रूप से ही की जाए ।

यह शारीरिक या अन्य प्रकार से भी हो सकती है। वह सेवा एक पावन कर्तव्य है। इसमें नाम कमाने का मन्तव्य नहीं होना चाहिए।हमारे जीवन का असली आनंद तो मिलजुल कर जीने में ही है अन्यथा अकेलेपन की आदत से तो हमारा मन भावनाहीनता और रूखापन से भर जाता है।

फलतः वह अपनों से दूर होता जाता है।हमारे जीवन में वास्तविक आनंद कभी अकेलेपन में नहीं होता है जबकि सामाजिकता न केवल दूसरों का ही जीवन सँवारती है , हमारे अंतर्मन को भी सन्तोष और आनन्द से भर देती है।

हमारे द्वारा निस्वार्थ दूसरों की मदद करने से हमको जो आंतरिक आनन्द मिलता है वह किसी भी भौतिक सम्पदा से कहीं अधिक मूल्यवान होता है। यह जीवन की वास्तविक सच्चाई है ।

हमारे द्वारा परहित एवं आत्मतुष्टि ही उद्देश्य हों । वह कभी न हो प्रदर्शन की मंशा और न हो किंचित भी श्रेय लेने की अभिलाषा आदि – आदि ।

वह हमको लेशमात्र भी गर्व या अहंकार मन में न हो बल्कि निष्काम भाव हों कि हम तो सेवा के माध्यम मात्र हैं । हमें सेवा प्राप्तकर्ता जैसा सुपात्र प्रसन्नता से मिला हैं । वह जब सेवा यों ही बिन माँगे होती है तभी आत्मतोष का मेवा मिलता है । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

फैशन-परिधान


हम देख सकतें है कि आज हर कोई फैशन पसंद हो रहा है। वह फ़ैशन में Matching पर विशेष जोर दिया जा रहा है। वह इसके संग वह रंग उसके संग नीचे या ऊपर का कपड़ा ढीला मध्यम या तंग आदि – आदि । यह सोच-सोच कर आदमी दंग रह जाता है।

आधुनिक युग में ब्रांडेड की फैशन हैं तो हम कौन से कम हैं । हम जैसे अधरों पर सदा सत्य रखेंगे तो सुबह इष्ट को र्प्राथना का अर्घ्य अर्पण करेंगे। हम आँखों पर सदा ही शुभ दृष्टि का ऐनक पहनेंगे । वह हाथो को उदारता से दान का हक देंगे।

वह हृदय में प्रेम का प्रवाह बहायेंगे। वह चेहरे पर सदा मुस्कान रखेंगे व अपनी जबान पर सदा दूसरों के लिए उदारता से वाह! वाह! और दिल में हर वक्त क्षमा का भाव रखेंगे | वह और भी कोई नया संस्करण होगा तो उसका भी अपने जीवन में अपना सही से संज्ञान लेंगे ।

हम भी आओ आज एक प्रस्ताव पास करें कि हम भी ये चीजें ब्रांडेड ही इस्तेमाल करें । वह ब्रांडेड के सिवाय दूसरा कोई व्यवहार नहीं करें पर Matching के बारे में जो मैं सोच रहा हूँ वह आपको भी पसंद आएगा ऐसा मैं आपसे विश्वास करता हूँ।

वह यह है कि आदर- सम्मान, दया व अनुकंपा का भाव, शिष्टाचार व विनम्रता का स्वभाव आदि – आदि हैं । वह ऐसे फ़ैशन – परिधान हैं जो हर पोशाक की शान बढा सकते हैं । वह साथ ही ये कभी भी कोई भी समय हमारे चलन से बाहर नहीं होंगे । यह सदाबहार रहतें हैं । अतः हम इस पर सही से चिन्तन – मनन करें और तैयार हो जाए । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

उठ जाग मुसाफिर भोर भई


इंसान के जीवन को सफल या असफल बनाने वाला कोई तंत्र है वो तो उसके स्वयं के विचार हैं । हम जैसे विचार अपने मन में सोचते हैं तो हमारा दिमाग भी उसी दिशा में क़ार्य करना शुरू कर देता है। आज विश्व में जितनी भी क्रांति या विनाश हुआ है वो इंसान के विचारों से ही हुआ है।

हम अपने जीवन में रात-भर नींद लेकर जब भोर हो जाती हैं भरपूर उठते हैं तो नव उर्जा व प्रसन्नता से हमारा मन भरा रहता है ।वह स्वस्थ आदमी के मन का ओर-छोर भीतर ही भीतर नाचता है जैसे वर्षा ऋतु में पपीहा और मोर । ऐसा इसलिए होता है कि विभिन्न दैनिक क्रियाओं से हमारे द्वारा रात्रि के निश्चिंत विश्राम में कोई ऊर्जा खर्च ही नहीं होती हैं ।

वह विभिन्न दैनिक क्रियाओं से मुक्त नव स्फूर्ति लेकर तन का पुर्जा-पुर्जा जागता है । हमारा दिमाग भी शांत व सही से रचनात्मक रहता है इसीलिए कहा जाता है कि सुबह की हो सुनहरी बेला उसमें बैठकर शांतचित्त अकेला हम करे सही से आत्म चिंतन की साधना वह भगवत स्तुति की आराधना।

वह अरुणोदय सबको प्यारा लगता है जहाँ दिनकर से पहले उजियारा होता हैं । वह काँव-काँव कर कौवे आते और भोर पहर से हमें जगाते हैं । हम सब ने अपना सदैव श्रेष्ठ दिवस स्वीकारा हैं । हम निज कर सदा प्रतिष्ठित मंगल काम करे ।

अतः यह कहना भी सही है कि उठ जाग मुसाफिर भोर भई ।अब रैन कहाँ जो सोवत है। जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है।

निशा बैद के 11 की तपस्या

( 31/07/2025 )

बैद परिवार के घर – आँगन में खुशियाँ छायी हैं ।
11 की तपस्या का दीप जला मन शक्ति जगायी हैं ।
आत्मा के “प्रदीप “ की और निकटता पायी हैं ।
बैद परिवार के घर – आँगन में खुशियाँ छायी हैं ।
साध्वी श्री संयम श्री जी की शक्ति है, वचनों में जादू हैं ।
अन्य साध्वी श्री जी की भी पूरी – पूरी सार- सम्भाल हैं ।
तप का मंदार चला फलके पूरा घर का आँगन हैं ।
सतिवर के हम आभारी तप बीन बजाईं हैं ।
बैद परिवार के घर – आँगन में खुशियाँ छायी हैं ।
11 की तपस्या का दीप जला मन शक्ति जगायी हैं ।
सुभाष- मंजू के मन में भी खुशियों का सावन हैं ।
सुमित , नीरज , कनक, धीरज का भी मन पावन हैं ।
भाभी ललिता का भी मन- मयूर झूम उठ पावन हैं ।
तप के गीतों को सुन बनता मन हमारा पावन हैं ।
बैद परिवार के घर – आँगन में खुशियाँ छायी हैं ।
11 की तपस्या का दीप जला मन शक्ति जगायी हैं ।
तप धरती पर समता के अब फूल खिले ।
तप तरणी से भवसागर का पार मिले ।
रंग- अनोखा छाया तप के दीप जलें ।
मंजिल पाकर हम सबके अरमान फलें ।
बैद परिवार के घर – आँगन में खुशियाँ छायी हैं ।
11 की तपस्या का दीप जला मन शक्ति जगायी हैं ।
निशा के तप का रंग अनोखा देते सब बधाई हैं ।
कुल की शान बढ़ा अपने जीवन को निखारा हैं ।
तप की ज्योति में निशा ने अपने को सँवारा हैं ।
नभ धरती गूंजे रतनगढ़ में तप की शहनाईं हैं ।
बैद परिवार के घर – आँगन में खुशियाँ छायी हैं ।
11 की तपस्या का दीप जला मन शक्ति जगायी हैं ।
आत्मा के “प्रदीप “ की और निकटता पायी हैं ।
बैद परिवार के घर – आँगन में खुशियाँ छायी हैं ।

संघर्ष , मनोबल

हमारे जीवन में
संघर्ष तो आता
ही हैं और हमको
संघर्ष तो करना
ही पड़ता है यदा
कदा वह नहीं है
कोई ऐसा जो
चलता रहे जिसका
जीवन बिन संघर्ष
के ही सदा कोई
चाहे हो कितना
ही अनुभवी व
बुद्धिमान जो
अपने जीवन में
बिना संघर्ष के
थपेड़ों के बन
नहीं सकता वह
महान वह समय
समय पर आने
वाले संघर्ष के
दौर हमको
सही सीखाते हैं
कैसे किया जाए
हम सभी विपरीत
परिस्थितियों पर
सकारात्मक से गौर
वह जब तक न
पडे हथौड़े की
चोट तो पत्थर
भी भगवान् नहीं
होता जिंदगी बहुत
कुछ सिखाती है
कभी हंसाती है
कभी रूलाती है
जो हर हाल में
खुश होते हैं
वह जिंदगी
उनके आगे सर
झुकाती है वह
संघर्ष ही हमें
आगे बढ़ने की
प्रेरणा देते हैं
जीवन के सभी
संघर्षों में कभी
हार मिले तो
रुकना नहीं है
निज मनोबल
ऊॅचा कर पुनः
प्रयत्न करना है
क्योंकि रात के
बाद ही हमको
नया सवेरा भी
आता है और
जो हौसलों से
काम लेते हैं वही
लोग सफलता को
गले लगा लेते हैं
और वह इतिहास
एक दिन नया रच
जाते हैं क्योंकि
जीवन के संघर्ष
अनुभव दे जाते हैं
और हमारा भी
व्यक्तित्व उतना
प्रखर होता जाता
है इसलिए हम
हार कर बैठने
के बजाय लक्ष्य
को पाने के लिए
बढ़े ही बढ़े
क्योंकि जीवन
में संघर्ष
जरूरी हैं।

जड़त्व के मूल में अस्तित्व

हमारी जड़ के मूल
में व्यवहारिक रूप
से सम्पूर्ण आस्था
जो व्ववहारिक रूप
से सही से हर कोई
मानवीय गुण में अपने
हिसाब से प्रयाप्त हैं
वह उसकी भी होती
मनोदशा सही से
उत्थान पतन की
वह भी सोता और
जागता है आपस
में एक दूसरे के
संग अपनी सही
इजहार करता हैं
सुखांत दूःखांत की
व्यथित स्थिति
प्रस्थिति की उद्धृत
परिवेश में‌ क्योंकि
जड़ के साथ में
उद्भव होता है
जीवन भी जड़
चेतन के योग से
है संचालित जहाँ
कर्मों का सही से
क्षय हुआ कि
हमारी आत्मा की
शुद्ध अवस्था में आ
जड़ मोक्ष में सही से
अवस्थित हो जाती
हैं वह जीव के कर्मों
का मैल लगा कि
वहाँ आत्मा मूल
रूप स्थित अवस्था
जड़ से दूर संसार
के भ्रमण में
रमती रहती हैं
वह आत्मा
जड़ के सही
से सुसंयोग में
भी योग अपने
कर्म अनुसार
करती ही रहती
हैं हमारे अपने
मस्तिष्क की सही
से कार्यकुशलता
करती है निर्भर
काफी कुछ हमारे
अपने विश्वास
के तंत्र पर क्योंकि
विश्वास का तंत्र है
प्रकृति प्रदत एक
वैज्ञानिक संयंत्र
जो बना देता है
ना कुछ को भी
सब कुछ मंत्रवत्
क्योंकि जड़ और
चेतन का योग ही
बनता है है जीवन
और मरण का संयोग
आत्मा और शरीर का
अलगाव पैदा करता है
संयोग और वियोग के
भाव और जब हमारा
जीना व मरना छूटेगा
तो संबंधों का अलगाव
भी टूटेगा तभी तो हमको
अमरत्व प्राप्त होगा और
तभी मुक्ति का मार्ग
हमारे लिए पर्याप्त होगा
यही हमारे लिए काम्य हैं ।

जैसे विचार होंगे वैसे ही अचार


हमारा जीवन एक बहती धारा है । वह इसका कोई भी किनारा नहीं है । वह इसमें अविरल उतार चढ़ाव है ,निरंतर भाव अभाव है । यह सतत प्रतिभाव स्वभाव है। वह अनवरत प्रवाहमान है ।

हमे इन सभी में अनुस्रोत प्रतिस्रोत से सकारात्मकता के मैदान में आत्म स्वभाव में जाना है क्योंकि हमारे जैसे विचार होंगे वैसे ही हमारी सोच के मनोभाव होंगे और उसका वैसा ही हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ेगा क्योंकि हमारे केवल मन की तरंगें ही विचार नहीं हैं ।

वह हमारी चेतना को सही दिशा देने वाली ऊर्जा को आकार देते हैं ।हमारे द्वारा इसी प्रक्रिया से ही तो स्वप्न साकार करते हैं । हमारे हर विचार एक बीज है जो आगे चित्त में पड़ कर फलित होता है इसीलिए तो हम अच्छे विचार पैदा करते हैं और देखते आदि हैं ।

वह हम शान्ति, करुणा, साहस आदि जैसे सद्गुण तथा नकारात्मक विचार भय, क्रोध, द्वेष जैसे दुर्गुण आदि उत्पन्न करते हैं । हमारे शुभ और नेक विचार ज़िन्दगी का आईना होते है ।

वह हम इंसान को समय-समय पर सही से अपनी सभी जिमेदारियों के प्रति जागरूकता का एहसास भी दिलाते है और हमे नेक और सच्चे रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं ।

अतः हमारे द्वारा यह जरूरी हैं कि हमारें विचार शुद्ध रहें| वह हम अपनी इन्द्रियों के अधीन न हों | हम अपनी इन्द्रियों को वश में करते हुए, आध्यात्मिक विचार रखते हुए सही सुविचारों को आत्मसात करते हुए इस दुर्लभतम मनुष्य जीवन को सार्थक करें। अतः हम अपने विचारों को सही दिशा में साधें और अपने जीवन निर्माण की ओर लगा दें। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

वक्त का नियम बड़ा सख्त

वक्त है हमारे जीवन
की एक ऐसी ईकाई
जिसने कितनों को ऊँच
नीच है दिखाई रहता है
यह तो अनवरत ही
प्रवाहमान वह दिल की
धड़कन की तरह नहीं
लेता है एक पल भी
विश्राम वह अंहकार
ममकार के इस तिमिर
पर विवेक संयम की लौ
प्रज्वलित कर हम प्रहार
करें वह राग-द्वेष की परतें
जन्म- जन्मान्तरों से हमारे
भीतर जमी हुई हैं बहुत गहरे
इनसे निजात पाने के लिए
हर किसी को भी करना
पङेगा सही संघर्ष अनवरत
अविराम क्योंकि इनको
पोषित कर रहे है मोह माया
छल प्रपंच के सबल सशक्त
चेहरे सम्यक दर्शन और सम्यक
ज्ञान और सम्यक चारित्र रूपी
त्रिवेणी ही है स्वर्ग और हमारा
मिथ्यादर्शन मिथ्या ज्ञान और
कथनी और करनी की सही
से एकरूपता न होना ही नरक
है कथनी और करनी हमारी
एक जैसी हो वह हम शुद्ध
भावकिर्यापूर्वक हमारी सभी
प्रवृतियां हो स्वर्ग यही है और
इसके विपरीत अशुभ प्रवृति
मन,वचन और काया की
नरक रूप है दुःखदाई होती
है हमको अपने जीवन की
हर ऊँचाइयों को सही से छू
जाना हैं और अपने अपने
गंतव्य की और सही से
आगे प्रस्थान करना ही है
क्योंकि खो देता है जो
इस वक्त को वह फिर
से पछताता ही रहता है
क्योंकि गुजरा हुआ वक्त
होता है नदी के पानी की
तरह जो कभी लौट कर नहीं
आता है अतः बुद्धिमान वही
होता है जो जानता है वक्त
का सदुपयोग करना और
वक्त के साथ चलना यही
हमारे लिए काम्य हैं ।

आनंद

हमारे जीवन की भी नदी की
तरह हैं अपनी सहज गति
वह उद्गम से होकर प्रवाहित
कर राह में छोटे-बड़े
नद-नालों को समाहित।
राह में सबकी प्यास बुझाती,
धरती को सिंचित करती,
हो जाती है विलीन सागर में
चलती-चलती ठीक
इसी तरह
हम अपने जीवन में जैसे
सम्भव हो वैसे धन से तो
बहुत सारा सामान ख़रीद
सकते हैं परन्तु शांति नहीं
वह धन से दवाई आदि भी
खरीद जा सकती है परन्तु
उत्तम सही स्वास्थ्य नहीं वह
इसीलिए हम धन को सर्वोपरि
न मानकर अपनी सकारात्मकता
से जीवन को सही चलाएं वह
बढ़ायें वह तभी जीवन खुद
खूबसूरत बन जाएगा क्योंकि
हमको आंनद धन के ही
माध्यम से नहीं मन के भी
माध्यम से ही आता है वह
यदि मन से आंनद की
सही अनुभूति नहीं होती
तो सारा आंनद भी अधूरा
रह जाता है । यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

कर्मभूमि

कहतें हैं कि शक्‍ल से
खूबसूरत लोग दिल से
भी खूबसूरत हों ऐसा कभी
जरूरी नहीं है और हम
अपनी सही से आत्‍मा की
सुंदरता पाने के लिए तो
व्यक्ति में गुणों का होना
जरूरी है क्योंकि कोई
अगर दिखने में बुरा होते
हुए भी कोई गुणवान और
प्रतिभावान हो तो उसे
कामयाब होने से कोई
भी नहीं रोक सकता है
क्योंकि हमारे जीवन की
इस लंबी दौड़ में साँझ की
तरह ढलते हुए रूप की
नहीं बल्कि सूरज की तरह
अँधेरे में उजालों को रोशन
करने वाले गुणों की कद्र
होती है संकल्पों और
विकल्पों के अन्तर द्वन्द्व
में ये जिन्दगी यूँ ही बीत
जाती है वह जिस ऊर्जा
से हम सही से सृजित हो
सकते थे नये कीर्तिमान
वो ऊर्जा निरर्थक ही सब
जगह रीत जाती है और
मिलता है जिन्हे उचित
मार्गदर्शन दिशाबोध और
दृष्टा का मंगल आशीर्वाद
वे जागृत चेतनाऐं जिन्दगी
की जटिल जंग को भी
निर्विघ्न जीत जाती है
क्योंकि अपनी कर्मभूमि
की पाठशाला में जिसने
भी अव्वल नम्बर पाया
वही इस दुनिया का सही
से असली बादशाह ही
कहलाया है क्योंकि
तन की सुंदरता तो मात्र
क्षणिक है वह आयु की
ढलान के साथ यह भी
ढल ही जायेगी और रह
जायेगी तो सिर्फ वह ही
चारित्रिक सुंदरता जो
हमेशा हरेक को याद
आयेगी अतः हम अपने
गौण तन को निखारने
के प्रयास को ही करें
क्योंकि हमारे जीवन
में महत्व है हमारे सभी
आंतरिक गुणों का वह
पूरे पुरुषार्थ के साथ
उनका हम विकास करें
यही हमारे जीवन को
ऊर्ध्वगामी बनायेंगे यही
हमारे इर्द-गिर्द शांति वह
सौहार्द को फैलायेंगे जो
हमें भी आत्मिक सुकून
की अनुभूति दे जायेंगे
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

नीति के वचन

ना जीवन में
अभी के इस
समय में सही
शांति है ना
ही पर्याप्त
रूप से नींद
और ना ही
परिवार के
लिये कुछ
समय है
और जिस
हम शरीर
से काम
ले रहें है
हमको
उसको भी
स्वस्थ वह
सही से यहाँ
रखने के लिये
भी समय नहीं
है वह आसान
भी नहीं है अभी
हमारे द्वारा सही
से जीवन में
धीरज रखना
वह आज के
इस द्रुतगामी
युग में धैर्य
किसे है वह
सबको यहाँ
त्वरित फल
ही चखना पर
जो जानते हैं
सही से धीरज
को धरना वह
सोच सोच कर
कदम रखना
उन्हें पता है
कितना यह
मधुर होता
है नीति के
अनुसार ही
बोलना वह
सही से सब्र
का फल भी
चखना वह
यह भी देखा
हैं कि धैर्य
से हमारे
द्वारा सोचने
की वजह से
हो जाते हैं
स्वतः ही कई
कठिन प्रश्न का
हल और कभी
कभी तो हो
जाते हैं नये
नये तरीके
का भी इजाद
दरअसल वैसे
भी साधु संतो
व बड़े बुज़ुर्गों
का है कथन
कि हड़बड़ में
तो होती ही
है सदा ही
गड़बड़ अतः
इसीलिए
उचित है
रखना सब्र
जो कमाया
वो भी साथ
जायेगा ही
नहीं आप
उसे पूरा
खर्च भी
नहीं कर
पाओगे और
कौन सी यहाँ
हमारी साँस
आख़िरी ही
होगी वो भी
हम नहीं
जानते तो
फिर जीवन
में समता को
धार लें तो
अपने आप
ही हमको
इस जीवन
में शांति भी
आ जायेगी
यही हमारे
लिए काम्य
हैं ।

गोस्वामी तुलसीदास जी जयंती


गोस्वामी तुलसीदास जी को आज जयंती पर मेरा भावों से शत- शत नमन । आज का दिन हमें उनके योगदान, भक्ति, और साहित्यिक उपलब्धियों आदि को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता हैं ।

भारतीय संस्कृति में साहित्य के रूप में अपना खूब योगदान देने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी के लिए शब्द की धारा कैसे भी मैं बनाऊँ वो कम ही होगी ।

भारत महान ऋषियों, मनीषियों और विद्वानों आदि की पावन भूमि रही है । वह इस देश में समय-समय पर ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है जिन्होंने समाज के कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान के लिए अद्वितीय कार्य किए हैं ।

वह इन्ही में से एक ऐसे ही महाज्ञानी और संत गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती आज श्रावण के पवित्र महीने में मनाई जा रही हैं । गोस्वामी तुलसीदास जी की रचनाएं भारतीय संस्कृति और धर्म के अमूल्य धरोहर हैं ।

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी जो भगवान श्रीराम के परम भक्त और श्रीरामचरितमानस जैसे कालजयी ग्रंथ के रचयिता थे उन्होंने अपने काव्य और लेखन के माध्यम से प्रभु श्रीराम के आदर्शों और उनके जीवन चरित्र को सही से जन-जन तक पहुँचाया था ।

वह आज गोस्वामी तुलसीदास जी कि जयंती का महत्व इस बात में निहित है कि यह दिन उनके जीवन, भक्ति और साहित्यिक आदि योगदान को हमें सही से स्मरण करने का अवसर देता हैं ।

वह उनकी रचनाएं न केवल आधुनिक भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं बल्कि वे भारतीय संस्कृति, धर्म और दर्शन आदि का जीवंत संगम भी प्रस्तुत करती हैं ।

गोस्वामी तुलसीदास जी जो भगवान श्रीराम के परम भक्त और श्रीरामचरितमानस जैसे कालजयी ग्रंथ के रचयिता थे उन्होंने अपने काव्य और लेखन के माध्यम से प्रभु श्रीराम के आदर्शों और जीवन चरित्र को जन-जन तक पहुंचाया था । हम आज एक ऐसे ही महाज्ञानी और संत की जयंती मना रहे हैं । आपके गुणों को हम सही से अपने जीवन में आत्मसात कर सकें यही हमारे लिए काम्य हैं ।

नानक दुखिया सब संसार

एक चूल्हा और एक
आँगन एक सुख है
मन का और एक
आँसु हो सभी का
एक दुःख तन का
और प्यार त्योहार
हो सभी का यही
सांसारिक शांति है
हमारे जीवन में
सुखः दुःख के
कोई प्रदाता हैं तो
वह हमारी स्वयं
कि मनोकामना
कुछ चाहने या
न चाहने की भी
भावना अतः हम
यह सारांश में
कह सकते हैं
कि हमारा सही
से मनोकामना
रहित जीवन
है सुख का भरा
ख़ज़ाना जबकि
इच्छाओं के साथ
हैं जुड़ी हुई हमारी
निराशाएँ एवं दुःख
की सभी सम्भावना
हम में से कोई नहीं
है ऐसा इस संसार मे
जिसके पल्ले सुख ही
सुख हो और लेशमात्र
भी कभी नहीं दुःख हो
क्योंकि सुखी और
संपन्न दिखने वाले
भी दिखते हैं केवल
बाहर से ही सुखी
अंदर में वे भी हैं
नाना तरह से सभी
दुःखी इसीलिए यह
किसी ने ठीक ही
कहा है कि यदि
किसी दिन कहा
जाए कि हम
सबको कि
अपने अपने
दुःखों का
सभी थैला
एक ही यहाँ
टेबल पर रखो
और वहाँ से
बदले में किसी
भी दूसरे की
परेशानी का
थैला उठा लॉ
तो हम सभी
आश्चर्यचकित
रह जाएँगे कि
हर कोई चुपचाप
अपनी परेशानियाँ
ही वापस उठा लेगा
मतलब साफ है कि
नानक दुखिया सब
संसार देखन में ही
लगता है दूजे के
पास सुखों का
यहाँ भरा भंडार
जीवन में हमारे
सभी तरह से
बाहरी ही यहाँ
परिस्थितियाँ
नहीं रहती हर
वक्त एकसी
सुख दुःख दिन
रात सर्दी गरमी
हानि-लाभ आदि
आदि होती ही
रहती हैं परिवर्तित
इसी तरह हमारे
सकारात्मकता के
साथ कभी न कभी
नकारात्मकता भी
आ ही जाती है
इससे बचने का
सर्वोत्तम सरल
तरीका है रखें सदा
सकारात्मक सोच
एक ही दिन नहीं
हर दिन हर रोज।
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

अनुभूति

जैन साधना पद्धति
का मूल मंत्र हैं
गुप्ति की साधना
वह निवृत्ति को
प्रधानता अतः
मोक्ष मार्ग का
मुख्य तत्व हैं
सम्यक् प्रकार
से बुद्धि एवं
श्रद्धा पूर्वक
मन,वचन और
काया को सही
से उन्मार्ग से
रोकना वह सन्मार्ग
पर करना क्योंकि
हमारे द्वारा कभी
भी भौतिक विषयों
कषाय आदि की
सावद्य प्रवृत्ति से
वचन का निरोध
वाणी का यहाँ
नियमन है वह
हम आध्यात्मिक
दृष्टि से मौन का
प्रयोजन अन्तर्दृष्टि
का सही से विकास
अन्तर्दृष्टि का विकास
कर व्यक्ति अपने
भीतर सतत और
प्रवाहमान सत्
चित्त और आनंद
की अनुभूति कर
सकता है जब से
इंसान का जन्म
होता है वैसे वैसे
ख़्वाहिसें भी दिन
प्रतिदिन बढ़ती ही
जाती है और मरते
दम तक जब राजा
सिकंदर की ख्वाहिश
थी वो भी पूरी नहीं
हुयी तो हम तो
आम इंसान है
कोई भी व्यक्ति
झोंपड़ी में रहता
है तो पके कमरे
की इच्छा रखता
है तो दूसरी और
पके कमरे वाला
पके मकान की
आकांक्षा रखता है
इंसान कभी यह
नहीं देखता कि
जो सुख सुविधा
हम्हें नसीब है वैसी
सुविधा तो बहुत
लोगों के पास नहीं
यह दुनियाँ भी मृग
मरीचिका है हमको
जो मिला उसका
प्रभु को शुक्रिया
नहीं और जो दूसरों
के पास देखकर
सपने देखे वो पूरा
नहीं होने पर भी
भगवान से शिकायत
जो नहीं मिलने की
प्रभु से शिकायत है
वो हमारे मन से ही
तो निर्मित है इसे ही
हम स्वयंकृत और
अंतहीन दुःख कहते
हैं इसलिए हमारे
द्वारा जरूरी है कि
हम रखें अपने
भावों पर नियंत्रण
वह दें सदा सही से
स्वस्थ सोच को ही
आमंत्रण और सुधारें
जीवन का पल-पल
हर क्रिया का क्षण
क्षण यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

दो नीति वचन : खण्ड-1


हम में से किसी को जब शुभ कर्मों के उदय से सम्पन्नता का सुयोग मिलता है तो हमारा जीवन स्तर बढ़ाने का मन करता है।

वह हमको सुनीति कहती है कि हम अपने जीवन स्तर की बजाय जरूरतमंदों की सहायता का स्तर बढ़ायें और सही से आत्मतोष पायें ।

हम अपने जीवन में सम्भव हो तो असमर्थ की सहायता / सामाजिक कर्तव्य आदि के लिए विसर्जन करें क्योंकि उसका व्यवहारिक सन्दर्भ प्रसिद्ध आगम का सूत्र परस्परोपग्रहो जीवानाम् (अर्थात जीव एक दूसरे पर आश्रित है / जीवों में परस्पर  उपकार है) में देखा जा सकता है ।

वह दुनिया आपको इसलिए याद नहीं करती कि आपके पास बड़ा धन है अपितु इसलिए याद करती है कि आपके पास बड़ा मन है और आप सिर्फ अर्जन नहीं करते आवश्यकता पड़ने पर विसर्जन भी करते हैं । हमारे द्वारा धन का संचय हमारे मूल्य को घटा देता है और धन का सदुपयोग हमारे मूल्य और यश को बढ़ा देता है ॥

वह धन से हम जितना चाहें सही से सुख के साधनों को अर्जित करें और बाकी बचे धन को सृजन कार्यों में, सद्कार्यों में, अच्छे
क्रमशः आगे ।

दो नीति वचन : खण्ड-2

कार्यों आदि में लगाएं । यही हमारे लिए काम्य हैं । हम देख सकतें हैं कि संसार में अनेक भाषाएं हैं किन्तु मुस्कान हमारी एक ऐसी भाषा हैं जो अपने में सब भाषाओं की परिभाषा समेटे हुए।

हमारे द्वारा विचारों को वश में रखना बोलना शब्द बनाता हैं और शब्दों को वश में रख वो भाव प्रकट करता हैं । वह शब्दों का महत्व तो बोलने के भाव से समझ आता है ।

वह अन्यथा स्वागत तो पायदान पर भी लिखा होता हैं इसलिए हम मनुष्य का व्यक्तित्व मन की पवित्रता पर निर्भर है। हम आत्मीय भाव से प्रकाश रखे जिससे नम्रता, शील, सत्य और साहस आदि के दीप से पवित्र मन की ज्योति जलती रहे।

वह जो बात हमारे दिल से निकले उन्हें शब्दो की जरूरत ना पड़े , नि:शब्द भाव , नेक , सरल , साफगोई और जिंदादिल आदि हमारी रहे।

वैसे भी हम चाहे कितने भी भारी भारी शब्दों से सजावट कर के भावों की अभिव्यक्ति दे दें यदि हमारी आंखों में स्नेह, होठों पर मुस्कान और ह्रदय में सरलता और करुणा नहीं तो सब कुछ व्यर्थ है क्योंकि सब मनुष्यों की मुस्कान प्रसन्नता की परिभाषा हैं ।

दीर्घ जीवन की लघु कहानी


चाहे कोई कितना
ही यहाँ पर शतवर्षी
हो कर जाए चाहे
कोई शीघ्र ही इस
संसार से मुक्ति
पा जाए सबकी
है एक ही छोटी
सी कहानी कि
जन्म होने पर
ही बँटने वाले
रसगुल्लों से हो
कर शुरू अंतिम
संस्कार के पश्चात
औपचारिक रूप
से स्मृति सभा का
संपन्न होने पर
खत्म हो जाती है
यह जिन्दगी की
कहानी है यह
सभी का क्रम
हमारा यह जीवन
है सफलता तथा
असफलता का
एक संगम स्थल
वह समस्याओं से
भरा हमारा आज है
तो समाधान से भी
परिपूर्ण कल है
यह संयोगों व
वियोगों का ही
तो एक मेला है
पर इस मेले में
भी आदमी रहता
सदा अकेला है
इसलिए जरूरी
है हम करें सच्चाई
का सही से सम्यक
साक्षात्कार और ऐसे
में कभी नहीं होगी
इस जीवन के जंग
में हमारी हार अतः
यहाँ पर याद उसे
ही किया जाता है
जो आने और जाने
के बीच इन सभी
तमाम होते जीवन
के लम्हों को सही
से सार्थक कर लेता
है और जीवन जीकर
अपने सुकृत्यों की
सौरभ से भर लेता
है वह शख्स अपने
सही आचरण से
इतिहास की अखूट
धरोहर बन जाता
है जो अनुकरणीय
अनुमोदनीय एवं
अविस्मरणीय गौरव
गाथा का हमारे
प्रणेता हो जाता है
सामाजिकता की
दरो-दीवार पर
अपना अमिट
निशान भी अंकित
कर जाता है यही
सही से जीवन
में अपना हम
हमारी आत्मा
का कल्याण
कर सकतें हैं
हमारे लिए
काम्य हैं ।

तीन सवाल : तीन जवाब : ध्रुव-1


मेरे से किसी ने पहला प्रश्न पूछा कि जीवन में सबसे अधिक चोट तुझे किसने पहुँचाई? तो मैंने त्वरित जवाब दिया मेरी अंतहीन आशाओं ने, अभिलाषाओं ने आदि – आदि । हर युग मे अच्छाई और बुराई रही है और यह बात बहुत अंशों मे सही है।

भगवान महावीर के समय भी क्या दासप्रथा, भूखमरी, सत्ता संघर्ष, राज्यलिप्शा, स्त्रीके प्रति क्रूरता,अकाल,शोषण,छलना, अकाल मृत्यु आदि नहीं थे?क्या आज जैसी विकसित स्वास्थ्य, शिक्षा,आवास व्यवस्था,न्याय व्यवस्था, यातायात की सुलभता आम जनता के लिए सुलभ रहे थे?

राम राज्य को भी पूरी तरह निरापद नही कहा जा सकता है। आदमी अपने कृत कर्मों से स्वयं को सर्वथा नहीं बचा सकता है। वह अभी दुषमआरा चल रहा है पर यह भी सच्चाई है की आज जैसी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, आवास, यातायात, खाने-पीने की सुलभता, भौतिक सम्पन्नता आदि – आदि सामान्य जनमानस को कभी सुलभ नहीं रही है ।

वह गुणवत्ता का ह्रास हुआ है,विश्वास का भी विनाश हुआ है, हमारे संस्कार भी जीर्ण हुए हैं ,निस्वार्थ के भाव क्षीण हुए हैं पर इसके बावजूद इसे ऐकांत कलयुग, दुषम आरा (दुखःमय)इस आधार पर नही कहा जा सकता है? वह आज की
क्रमशः आगे ।

तीन सवाल : तीन जवाब : ध्रुव-2


अच्छाईयों को भी हमारे द्वारा पूरी तरह नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता है?इस संदर्भ मे श्रीमद् रायचंद का यह मंतव्य ज्यादा यौक्तिक लगता है कि इस समय वीतराग की वाणी का मिलना दुष्कर है।

वह अगर योग मिल भी जाए तो उस वाणी पर श्रद्धा का होना दुष्कर है और अगर हमारे श्रद्धा हो भी जाऐ तो उस मार्ग पर चलना और महादुष्कर है इसलिए यह दुषम आरा है। वह कलयुग की काली धारा है।

दूसरा प्रश्न किया कि आज तक के आपके अनुभव से सबसे सुखी व्यक्ति कौन हो सकता है ? मेरा जवाब था कि जो समझता है और और तथा बस काफी है में अन्तर वह इस जीवन में सबसे सुखी है। शक्‍ल से खूबसूरत लोग दिल से भी खूबसूरत हों ऐसा जरूरी नहीं है ।

वह आत्‍मा की सुंदरता पाने के लिए तो व्यक्ति में गुणों का होना जरूरी है । वह दिखने में बुरा होते हुए भी अगर कोई गुणवान और सही से प्रतिभावान आदि हो तो उसे कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता है क्योंकि जीवन की लंबी दौड़ में साँझ की तरह ढलते रूप की नहीं बल्कि सूरज की तरह अँधेरे में भी उजालों को रोशन करने वाले गुणों की कद्र होती है । हमारे जीवन में ऐसे कई उदाहरण हैं जो बाहरी खूबसूरती के पैमाने को परिस्थितियो
क्रमशः आगे ।

तीन सवाल : तीन जवाब : ध्रुव-3


के अनुसार बदलते रहतें हैं । अतः हम सही से देखें तो इस दुनिया में भीतर की खूबसूरती का एक ही पैमाना है और वह है आत्मा से पवित्र और सुंदर होना । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

वह एक और सवाल कि कुछ लोग करते हैं देखने में तो इतना धर्म कि वह लगता है सही से धर्म का मर्म समझते हैं। उनका जीवन फिर भी क्यों इतना दु:खी है? मेरा जवाब था कि उनके दु:ख के दो कारण हैं एक तो पूर्व जन्मों के कर्म से व दूसरा आज भी यदि कर्म हो काला तो क्या करेगी माला।

हमारे द्वारा जरूरी नहीं है कि धर्म धर्म-स्थान में ही किया जाए । वह हमारा मन जहाँ भी हो जाए धर्म में रमण करने को और स्थान शुद्ध-पवित्र हो तो धर्म यहाँ-वहाँ सर्वत्र कहीं भी किया जा सकता है।

वह संक्षिप्त में धर्म सिर्फ हमारी चर्चा में ही नहीं होना चाहिए यह हमारी चर्या में भी होना चाहिए । वह धर्म केवल इष्ट के चित्र में ही नहीं वह हमारे चरित्र में भी होना चाहिए ।

वह धर्म केवल मंत्रोच्चारण में ही नहीं हमारे आचरण में भी उतरना चाहिए । वह धर्म केवल हमारी जिह्वा पर ही नहीं जीवन में भी होना चाहिए और अंत में धर्म केवल हमारे मंदिर में ही नहीं मन मंदिर में भी होना चाहिए ।

प्रभु का सहारा

हमारे द्वारा किया
हुआ धर्म सिर्फ
और सिर्फ चर्चा
में ही नहीं रहना
चाहिए यह चर्या
में भी हो वह धर्म
केवल इष्ट के
चित्र में ही नहीं
होना चाहिए वह
हमारे चरित्र में
भी होना चाहिए
वह धर्म केवल
मंत्रोच्चारण में ही
नहीं वह उतरना
चाहिए हमारे
आचरण में भी
वह धर्म केवल
हमारे जिह्वा पर
ही बोलने का
नहीं होना चाहिए
यह हमारे जीवन
में भी हों और
वह हमारे से
झलकें वह
धर्म केवल मंदिर
में ही नहीं होना
चाहिए हमारे मन
के मंदिर में वह
हो किसकी आँखे
खुलीं हैं जों देख
रहीं ख़्वाब हैं और
खुली आँखो से
देखो ख़्वाब तो
हवाईं या शेख़
चिल्ली सी हों
सकतीं हैं और
अगर जुड़ जाए
साथ में जुनून तो
यह हक़ीक़त में
भी बदल सकतीं
है क्योंकि हम
देख सकतें हैं
कि हमारे द्वारा
बन्द आँखो के
ख़्वाब अक्सर
ख़्वाब हीं रह
जातें हैं वह आँख
हमारी खुली और
वे ग़ायब हों जातें
हैं हमारे द्वारा
दूसरों को सही
से समझना यहाँ
बुद्धिमानी है वह
खुद को समझना
असली ज्ञान है
और दूसरों को
काबू करना बल है
और खूद को काबू
करना हमारी
सही से वास्तविक
शक्ति है और
जिसने संसार को
बदलने की कोशिश
की वो हार गया
और जिसने खुद
को बदल लिया
वो जीत गया हम
अपने किसी भी
तरह मन के
अधीन न हो
और हम मन
को अपने को
अधीन (वश) में
करते हुए अपने
स्वयं को सही
से बदलतें हुए
अपनी आत्मा को
उज्जवल करनें
का प्रयास करें
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

मृत्यु एक विवेक जगाती है


जन्म के साथ मृत्यु का जुड़ाव रहा हैं । हमने जन्म लिया हैं तो हमारी मृत्यु निश्चित हैं । मेरे पास में से हवा का एक झौंका आया और मन प्रफुल्लित हो उठा । वह थोड़ी देर बाद दूसरा हवा का झौंका मेरे पास आया तो मेरा मन क्लांत हो उठा। वह तब मेरे मन में प्रश्न उठा कि क्या हवा सुरभित और दूषित है ? नहीं !

हवा स्वयं में न सुरभित है न ही दूषित हैं । हवा तो सिर्फ वाहक है । वह रास्ते में फूल खिले तो वह खुशबू ले आई और यदि कूड़ा करकट मिला तो बदबू ले आई। हमारे भी वैसे ही विचार हैं जो हमारे आंतरिक व्यक्तित्त्व के सूचक व वाहक आदि हैं ।

हमारे यदि भीतर में अच्छे भाव मिलेंगे तो वह अच्छाई ले आएगा और यदि बुरे भाव मिले तो वह हमारे साथ बुराई ले आएगा। हमारे आंतरिक व्यक्तित्त्व को हम देख नहीं सकते और न ही कोई साधन हमारे पास देखने का है। अतः हमारे विचार ही सबसे अच्छा माध्यम खास हैं ।

वह उसके द्वारा हम आंतरिक स्थिति को सही से जान सकते हैं । हमारा स्वयं का व्यक्तित्त्व परख और पहचान कोई हो सकते हैं तो वह हमारे मन की खुराक विचार है।

अतः हमारा जैसा विचार होगा वैसा ही आचार होता हैं । अतः हम यह न भूलें कि हमारी आत्मा कभी मरती नहीं हैं । वह कभी भी नष्ट नहीं होती हैं । वह केवल अपना शरीर बदलती है। अतः हमको शरीर की मृत्यु यह स्मरण कराती है कि जो स्थायी नहीं उससे लगाव समझदारी नहीं हैं ।

वह वास्तव में मृत्यु हमारा एक विवेक जागती है कि जो अजर-अमर है हम उसे जाने। हम आत्मा को पहचानें और कभी भी मृत्यु से विचलित नहीं हुए। वह मृत्यु एक दु:खद घटना नहीं अपितु नवयोनि में जाने का प्रवेश द्वार है।

हम मृत्यु को सही से यूँ या और कोई सही चिन्तन से समझ कर जियें और जब भी यह आए तो उसको सही से प्रसन्नता से स्वीकार करें ।यही हमारे लिए काम्य हैं ।

सुदीर्घजीवी शासनश्री साध्वी श्री बिदांमाजी


धन्य ! हैं सतिवर धर्म संघ में खूब नाम किया
संयम जीवन की चादर ओढ़ आत्मा को तार लिया
धन्य ! हैं सतिवर…..
तेरापंथ धर्मसंघ के उज्जवल इतिहास में अपना ज्योतिर्मयी नाम
लिखवा लिया
तीन- तीन आचार्यों की शरण में आत्मा को तप की आंच में तपा
दीप जला लिया
धन्य ! हैं सतिवर…..
आचार्य श्री कालूगणी जी से दीक्षा भाव , आचार्य श्री तुलसी से पायी दृष्टि,
आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी से साधना और आचार्य श्री महाश्रमण जी कि कृपा,
धन्य ! हैं सतिवर…..
संथारा ले कर अंतिम मनोरथ भी कर लिया पूर्ण साकार
मिला मानव जीवन जैन धर्म और भैक्षव शासन सुखकार
धन्य ! हैं सतिवर…..
संथारे का स्वाद निराला बस! सौभाग्य से ही आप जैसे को मिल पाता
शांत भाव से प्रभु का स्मरण कर चरम लक्ष्य को सही वरण कर
पाता
धन्य ! हैं सतिवर…..
तीन – तीन पाट के आचार्यों की साझी आपने हाजरी,देखे सभी पाट के श्रावक ,श्राविका ,संत ,सतीराज।
तुलसी गुरुवर से दीक्षित हुए ,’शासन’ श्री , सुदीर्घजीवी अलंकरण पाया गुरु महाश्रमण गणिराज।
धन्य ! हैं सतिवर…..
हीरक जयंती कि दीक्षा हुई संवत 2073 में , रहते साध्वी चर्या में पूर्ण सजग से किया आनंद का आगाज,
हर महीने करते थे पांच – पांच उपवास मंगलपाठ सुनाने को रहते थे तत्त्पर पातरी आदि के काम में सज
धन्य ! हैं सतिवर…..
आपने साध्वी जीवन को उच्चतम गरिमा तक पहुँचाया
श्रावक के तीनों मनोरथ को अंगीकार कर शिखरों चढ़ाया
धन्य ! हैं सतिवर…..
करता “प्रदीप” आपके चरणों में प्रणाम । आध्यात्मिक आरोहण कर मुक्ति नगर में शीघ्र करें विश्राम।
शक्ति संप्रेषित करें श्रावक में भी करूं अपना सतत् अविराम आध्यात्मिकता में विकास।।
धन्य ! हैं सतिवर…..
धन्य धन्य साध्वी श्री जी अपने जन्म को लिया सुधार।
सुदीर्घ 107 वर्षों की संयममयी जीवनयात्रा पूर्ण कर ।
धन्य ! हैं सतिवर…..
धन्य ! हैं सतिवर धर्म संघ में खूब नाम किया
संयम जीवन की चादर ओढ़ आत्मा को तार लिया
धन्य ! हैं सतिवर…..

मुनि श्री कमल कुमार जी

तप के बादल बरसें रिमझिम -रिमझिम
कर लें डुबकी लगाकर हम इसमें स्नान
लाभचंद जी संग हम पाप पंक धों लें
अब तो हमको अवसर मिला हैं महान
गुरु आशीर्वाद से कमल मुनि की सार
संभाल से कर ली तपस्या आपने महान
तप से अनुराग बढ़ाया तप हैं तारणहार
तप की पतवार ने कर दी भव से पार
तप पाप ताप संताप हरता है शिव धाम
जीवन में दिव्य प्रकाश को भरता हैं तप
होती जय जयकार है वह मार्ग हैं तप
संकट कटें विघ्न मिटें तप है सुख मार्ग
तप का दीप जला पाप ताप है हरता मार्ग
तप से जग में कितनों ने अपने को बदला
तप अरुणाई से कितनों ने स्वयं को उजला
तंत्र मंत्र की सिद्धि आदि में तप का योग होता
मोक्ष के मार्ग में बढ़ने वाले के तप साथ होता
लाभचंद जी ने आंचलिया कुल को महाकाया
लम्बी- छोटी तपस्या कर जीवन को सरसाया
सुमित मुनि रश्मि मुनि का मिला भावों से साथ
सुदूर से ही मुनिवर का मिला आशीर्वाद से साथ
कर्मों के बंधन कट काया बन जाती हैं तप कुन्दन
राग- द्वेष कण को दूर हटा तप से निर्मल होता चेतन
51 दिन की तपस्या कर आत्मा में लगायी ठाठ हैं
जीवन में पहना लाभचंद जी ने तप का मुक्ताहार हैं
कमर कस कूद गए लाभचंद जी तप के अमिट यज्ञ में
तप की असीम रश्मियों से आत्मा हो गई उजलें में
तप की ऊष्मा से ही संयम के आम्र हैं खूब फलें
भग जातें कष्ट सभी जब तप हों साथ रखवालें
तप के बादल बरसें रिमझिम -रिमझिम
कर लें डुबकी लगाकर हम इसमें स्नान ।

पूर्ण विराम

हम देख सकतें हैं
कि पूर्ण विराम नहीं
है किसी वाक्य का
सही से सम्पूर्ण विराम
है यह वास्तव में
आगे बढ़ने से पूर्व
का थोड़ा सा विश्राम
क्योंकि उसके बाद
भी कर सकते हैं फिर
से प्रासंगिक विषय
पर नये वाक्य की
सही से शुरुआत
वक्त बहुत कुछ
हमको सिखाएगा
पर शायद वक्त
पर नहीं सीखा
पाएगा इतने
सलीके से ही
किरदार हम
अपना सही
से सजायें कि
लोग छोड़ सके
पर भूल नहीं सके
गुजरते वक्त के
साथ कुछ कुछ
समझ गए कि
वक्त बीतेगा तो
लोग बदलेंगे ही
और खुद के सपने
टूटेंगे लोगों के साथ
छूटेंगे हम अकेले
टूट कर बिखर
जायेंगै क्योंकि
हमको संभालने
कोई भी कभी नहीं
आएगा हम खुद ही
बिखरेगें और खुद ही
संवरेगें क्योंकि
समय बड़ा बलवान
है वहीं आपको सिखा
देगा लोगों के साथ
रहना भी और लोगों
के बगैर रहना भी
हमको यह समझ
जाना चाहिए कि
उसी तरह जीवन में
समय समय पर होने
वाली भूल को बढ़ते
रहना चाहिए आगे
सीख कर भूल से
कायम रखते हुए
अपने विषय के
उसूल को नहीं है
पूर्ण विराम की ही
तरह हुई भूल भी
किसी बात का
आवश्यक रूप से
अंत।

आज की जिंदगी

हम देख सकतें हैं कि आज की ज़िन्दगी ने इस कदर करवट ले ली है कि बहुत बार पहचानना मुश्किल हो जाता है यह असली है कि नकली है।

वह यहाँ तक कि मुस्कुराहट को ही देख लीजिए कि लोग हकीकत में कम पर तस्वीर में ज्यादा मुस्कुराते हैं।वह जो कुछ आप हैं नहीं दूसरों के सामने वो ही बनना, अथवा वो क्षणिक व्यवहार आदि जो आप द्वारा एक व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए उसके साथ किया जाता है।

यह सच माने तो वह दिखावा हैं कि भलाई घर छोड़कर ही नहीं होती, घर जोड़कर भी हो जाती है।वह भेष बदलने से ही नहीं ,भाषा को कुछ सही बदलने से भी भलाई होती हैं । बुज़ुर्गों ने सही कहा है कि दूसरों की मदद करते हुए यदि दिल में खुशी हो तो वही सेवा है बाकी सब दिखावा है।

हम बस भलाई करते रहे बहते पानी की तरह,बुराई खुद ही कचरे की तरह किनारे लग जाएगी।वैसे भी तो नेक लोगों की संगत से हमेशा भलाई ही मिलती है क्योंकि हवा जब फूलों से गुज़रती है तो वो भी ख़ुशबूदार हो जाती हैं ।

इन्सान वही हो सकता है जिसके पास इंसानियत हो और साथ ही उसकी अच्छी व सकारात्मक नियत हो ।हमारे द्वारा अहंकार में जीकर किसी को रुलाने का न फायदा न कायदा होता हैं ।

अतः हम ऐसे में क्यों न करें सबको खुश रखने व हंसाने का वायदा आदि – आदि ।हम अपने भीतर असीम, अपूर्ण इच्छाओं की पीड़ा आदि से छटपटाते हैं पर दिखावट में उनसे संतुष्ट कोई नहीं हैं क्योंकि चेहरे के भाव ऐसा दिखलाते हैं।

यह विडंबना ही तो है : ध्रुव-1

आदमी ने आदिम काल से आधुनिक काल तक जो सही से तरक्की के सोपान चढ़े हैं वह अकल्पनीय हैं व अति प्रशंसनीय हैं। वह हमारे मन में खलती है जो एक बात वह यह है कि तरक्की तो सबदिक् इतनी हुई है कि हम चाँद, सितारों पर पाँव धर दिये।

वह सब दिशाओं पर अरमान आकाश चढ़ रहे यहाँ तक कि ऐसे-ऐसे यंत्र बना दिये जिससे हजारों ही नहीं लाखों किलोमीटर दूर बैठे इन्सान को देख और सुन सकते हैं।आज दादी की कहानी सुनानी किसको आती है।

हम भूल गए कि जो कुछ चीजें कुछ बातें लॉकर में बंद नहीं होती वह भी दौलत है बल्कि वह तो बेशकीमती दुर्लभ दौलत है। यह उन बड़े बुजुर्गों की ही बदौलत है।

हम एक जरा सी बात अपने को समझा नहीं पाए कि क्या इसमें कोई गर्व की बात है कि हम चाँद और सितारों को तो छूकर आ गए पर अपनों से मिलने अर्से से नहीं जा पाए। हम घर से निकलते थे तो माँ की दुआएँ साथ चलती थी ।

वह अब B P और Sugar की गोलियाँ, हमारी जरूरी बिसात होती हैं । वह भी कोई जमाना था जब तपती दुपहरी में हम पेड़ की छाँव में गहरी नींद सोते थे मीठे-मीठे सपनों में खोते थे और आज हम कीमती बिस्तर पर भी करवटें बदलते हैं पर
क्रमशः आगे ।

यह विडंबना ही तो है : ध्रुव-2

वह गहरी नींद नहीं ले पाते हैं। हमारे आज फेसबुक पर हजारों दोस्त हैं पर पहले हमारी एक आवाज पर चार बुलाते थे चौदह दौड़े आते थे वे जिगरी दोस्त आज कहाँ हैं। वह आज Balance Sheet में तो PROFIT बढ़ रहें हैं पर रिश्ते LOSS में डूबते जा रहें हैं।

यह आज की दुनिया जिसके लिए हम शेखी बघारते हैं की हमने बनाई है यह तथाकथित आधुनिक जिन्दगी जो हमने बड़ी जतन से सजाई है, उसमें जितना शोर है उतनी ही खामोशी है। वह यहाँ जितनी भीड़ है उतनी ही अंदर से तन्हाई है क्योंकि आज आदमी का दिल कहीं है दिमाग़ कहीं है।

हमारे पास जब कुछ नहीं था तो सब कुछ था और आज हमारे पास सब कुछ है पर देखा जाए तो जो पहले था वह आज कुछ भी नहीं है। मैं उससे आगे , मैं उससे पीछे क्यों, इसी दौड़ में जिन्दगी के सारे लम्हें यों खो गए ।

वह मानो कभी थे ही नहीं और जिन्दगी यूँ ही फिसलती गई। वह हमारा पतन भी इतना हुआ है कि पास बैठे इन्सान का हमको दु:ख-दर्द और कष्ट दिखाई ही नहीं देता है।

यह विडंबना नहीं तो और क्या है। हम इस सम्बन्ध में यही कह सकते हैं कि भौतिक स्तर के साथ-साथ हमारा वर्धमान रहे नैतिकता के स्तर में भी तो आदमी महान होता रहे।

धन्य हूँ मैं : भाग-1

शेक्सपियर ने प्रभु से यह अपील की मुझे दिल कृतज्ञता से सरोबार देवें। हम चाहते हैं कि उऋण बन सकें।वह आगे के लिए भार न रह जाये क्योंकि कर्ज कर्ज ही होता है , चाहे वह रुपये का हो या उपकार का आदि – आदि हो। वह रुपयों का कर्ज उतारना कठिन नहीं हैं पर उपकार की कृतज्ञता करना बड़ा कठिन हैं ।

वह हर कोई ऐसा दिल नहीं पाता हैं इसीलिए शेक्सपियर ने प्रभु से यह अपील की थी । हम आज है वो किसकी बदौलत हैं ? एक दिन बैठा-बैठा मैं यह सोच रहा था ओर इसी सोच ने मुझे दबोच रहा था कि मैं आज जो कुछ भी हूँ वह किसकी बदौलत हूँ।

यह चिन्तन करते करते मुझे अन्तर से उत्तर मिला कि तू आज जो कुछ भी है अपने बूते पर कम माँ-तात के बनाये बना है। हमारा जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता है । वह इसमें सुख और दुख का आना-जाना लगा ही रहता है, जिस प्रकार रात के बाद सुबह होती है, उसी प्रकार दुख के बदल छट जाते है और खुशी के दिन आते हैं ।

वह रात दुख का प्रतीक है और दिन सुख का हैं । हम देख सकतें हैं कि जिस तरह पानी दो किनारों के बीच बहते हुए आगे बढ़ता है, उसी तरह जीवन में सुख और दुख दो किनारे हैं जीवन इन्ही के बीच चलता हैं ।

अतः हमें विपदाओं से कठिनाईयो से हार से हताश हुवें बिना,बिना रुके दुगुने उत्साह से अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाते रहना चाहिए, फिर देखें मंजिल (विजय) जीत,सफलता आदि हमारें क़दमो में होगी। हम देख सकतें हैं कि आज के समय में आधुनिकता का दबाव, प्रतिस्पर्धा का
क्रमशः आगे ।

धन्य हूँ मैं : भाग-2

प्रभाव , ज्यादा से ज्यादा आमदनी की चाह , आदमी की आवश्यकता आदि – आदि इन सब के चलते बहुत से विद्यार्थी केरियर के लिए स्वदेश से सात समंदर पार दूर देश सुदूर प्रदेश चले जाते हैं ।

वहीं उनको मैं,मेरी पत्नी और मेरे बच्चों का परिवार लिये सदा-सदा के लिये रमना, बसना आदि पड़ता है । वह वर्षों घर वापस नहीं आ पाते हैं यद्यपि फोन आदि से बात कर लेते हैं और खर्चा-पानी भी भेजते रहते हैं।

वह आगे धीरे-धीरे बात-चीत का दौर भी कम होता जाता है। वह खर्चे-पानी की राशि भी घटती जाती है।वह भी नियमित नहीं आती है।

यह सब मात्र औपचारिकता होती जाती है। यह औपचारिकता भी आगे – आगे आहिस्ते-आहिस्ते कभी निभाई जाती है, कभी वह भी नहीं हो पाती है। एक दिन ऐसा आता है कि पूर्णतया विस्मृत ही हो जाती है। वह माँ-बाप इंतजार करते रहते हैं। बेटे दो मिनट बात करने की फुरसत भी नहीं निकाल पाते हैं। वह उन सबसे मेरा कहना यही है कि हे भारत के सपूतों ! एक बात को कभी न भूलो , जिन्दगी में दो लोगों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी हैं । वह उनका उपकार अविस्मरणीय तो है ही हम समझे उनके बिना ज़िन्दगी बिल्कुल अधूरी है ।

वह तो हमारे जीवन की जमीन में वह जड़ हैं जो अपनी शाखाओं को सही से फलदार बनाने में अपना सबकुछ लगा देतें हैं और बदले में कुछ नहीं चाहते हैं । यह बस चाहते हैं कि उनका पाला-पोषा वृक्ष व उसकी शाखाएँ आदि सदा फलें-फूलें और फल देते रहें। हम बच्चे हैं धन्य जों उस पेड़ की शाखाएँ हैं ।

वह मनुष्य है अति विशेष

एकेंद्रिय से त्रस
जीव त्रस जीव
से पंचेंद्रिय वह
पंचेंद्रिय से
मनुष्यभव
मनुष्यभव से
आर्य देश आर्य
देश में प्रधान
कुल और
प्रधान कुल से
उत्कृष्ट जाति
उत्कृष्ट जाति
के साथ रूप
और समृद्धि
रूप समृद्धि के
साथ बल बल
के साथ दीर्घ
आयु दीर्घ आयु
के साथ हो
सम्यक्त्व वह
सम्यक्त्व के
साथ हो सही
से सदाचार वह
सदाचार के साथ
उत्कृष्ट प्रभुभक्ति
का परम यहाँ
सौभाग्य ! ये
सभी क्रम से
अधिक दुर्लभ हैं
हमको मिला है
ये सौभाग्य यहाँ
मनुष्य भव का
इसे व्यर्थ ना जाने
दे हम देख सकते हैं
कि आगम वह
अन्य शास्त्रों के
अनुसार मनुष्य
जन्म का सही
से उद्देश्य है कि
करना ऐसी
साधना कि
हम इस एक
जन्म में नहीं
तो आगे के
कई जन्मों
में तो जन्म
मरण के सभी
चक्कर से ही
छुटकारा पाने
के मार्ग पर सही
से अग्रसर हो
सकते है इसीलिए
अन्य प्राणियों की
अपेक्षा हम मनुष्य
में चिन्तन की वह
भावनाओं की
दृष्टिकोण की
है अद्भुत क्षमता
आदर्श पुरुष है
वह जो इस बात
को है समझता
और इसी ही
उद्देश्य की पूर्ति
में जीवन का
उपयोग है करता
हमारे जीवन में
कल क्या होगा
यह कोई नहीं
जानता अतः
हम भविष्य के
ऊपर कोई भी
कार्य नहीं छोड़े
और जो समय
के साथ चलता
है वही कामयाब
होता है उसे जीवन
में कभी पछतावा
नहीं होता क्यूंकी
वो सब कुछ
हासिल कर लेता
है समय का
दुरुपयोग करने
वाला व्यक्ति
अपने जीवन में
कुछ नहीं कर
पाता और जब
उसका सारा ही
समय व्यतीत हो
जाता है तब वह
बहुत पछताता है
वो कहावत है ना
अब पछताए होत
का जब चिड़िया
चुग गयी खेत
अर्थात अब
पछताना व्यर्थ
है क्यूंकी समय
निकल चुका है
बचपन से ही
हमें समय के
महत्व को सही
से समझना
चाहिए हमारा
एक एक सेकंड
भी बहुत कीमती
है अतः हम उसे
व्यर्थ में बैठकर
या व्यर्थ के
कामों में व्यतीत
कभी नहीं करें
जिस प्रकार लोक
में कोई पुरूष
परवस्तु को यह
परवस्तु है ऐसा
जानकर परवस्तु
का त्याग करता
है उसी प्रकार
ज्ञानी पुरूष
समस्त परद्रव्यों
के भावों को ये
परभाव है ऐसा
जानकर छोड़
देते है अतः
तभी तो कहा
गया हैं कि
यदि सौभाग्य-
वश किसी
के मन में
किंचित मात्र
भी है इसका
सही से अवशेष
शेष तो समझें
कि वह मनुष्य
आज इस दुनिया
में विशेष ही
नहीं है
अति विशेष।

सच्ची स्वतंत्रता

भय से मुक्ति ही
हनारी सच्ची
स्वतंत्रता हैं
हमारा यह
चिंतन सही
से प्रतिदिन
का रहें कि
हम सदैव
चौकन्ना रहे
कर्मों के वार
से वह मूर्च्छा
और आसक्ति
हमारी टूटे हम
होश में रहते हुए
अपने विवेक से
हलुकर्मी रहते हुए
अंतर्मुखी होकर
संयती जीवन जीने
का प्रयास करें
धर्म हमारे जीवन
का आभूषण है
जो हम चौकन्ना
रहकर सही से
मधुर व विनम्र
व्यवहार से रिश्तों
में मजबूती रखते
हुये अपना यहाँ
आत्मकल्याण करें
भारतीय शास्त्रों में
योग-ध्यान और
मौन को सही
से बताया गया
है विचारों की
इस अवांछनीय
भीड़ से मुक्ति
के सही साधन
जो हैं अचूक
औषधीय
प्रसाधन ऋषि
मुनियों द्वारा
शास्त्रों से
खोजकर ये
लाए गए हैं
विचारों की
अनियंत्रित
गति ही है
अशांति का
कारण वह
उपरोक्त
तरीकों से
उन्हें सही से
नियंत्रित करना
ही है इसका
निवारण हम
डरते हैं
क्योंकि
हम अपने
अस्तित्व को
छोटा व सही
से सीमित
समझते हैं
हमारा सारा
ही भय इसी
मिथ्याभ्रम पर
टिका हुआ है
वह जिस दिन
आदमी यह
समझ लेता है
कि उसका
अस्तित्व तो
है शरीर धन
सम्मान आदि
से परे तब फिर
वह किस बात
से डरे? यही हैं
हमारी अपनी
सही से सच्ची
स्वतंत्रता ।

आशीर्वाद

हमारे ॠषि मुनियों
द्वारा प्रतिपादित
व पुरखों द्वारा
सही से स्वीकृत
प्रायः प्रायः
अपनी कोई
हर क्रिया है
गहन विज्ञान
सम्मत जब
हम करते हैं
किसी को भी
प्रणाम तो
सहज ही
निकलता है
उनके मुँह से
हमारे लिए खुश
रहो सदा सुखी
रहो का सही
से आशीर्वाद
का अमृतपान
प्रणाम के इस
उत्तर में ह्रदय
से निकले ये
शब्द नहीं हैं
कोई भी तरह
से साधारण
शब्द मैं तो
कहूँगा कि हैं
ये दुनिया के
सबसे कीमती
शब्द वह हैं
चमत्कारी शब्द
आजकल घर
घर में आम हो
गया जो गृह
क्लेश का
वातावरण
है उसका
मुख्य कारण
अपनी यहाँ
कि संस्कृति
का विस्मरण
जिसके परिणाम
स्वरूप हम आज
के समय में देख
सकते है कि यहाँ
वर्तमान जीवन
शैली में सफलता
का पैमाना केवल
संपत्ति आलीशान
घर ब्रांडेड कपड़े
और कारों आदि
आदि में निहित है
यदि कोई व्यक्ति
आर्थिक रूप से
सक्षम है तो उसे
अपने समाज में
स्वतः ही सफल
माना जाने लगता
है भले ही उस
सफलता के पीछे
बेईमानी छल कपट
शोषण या नैतिक
गिरावट क्यों न हो
यह धारणा है कि
साध्य ही सब कुछ
है साधन की कोई
भी परवाह नहीं है
अब आम होती
जा रही है वह
इस विचारधारा
ने ईमानदारी
सत्यनिष्ठा
संवेदना और
कर्तव्य जैसे
नैतिक मूल्यों
को बहुत पीछे
छोड़ दिया है
आज के समय
के ऐसे चिन्तन
के व्यक्तिवाद
का शिकार है
जहाँ मैं ही
प्राथमिक है
हम का कोई
विशेष महत्व
भी नहीं रहा
भूलते जा रहे
हैं हम कि
आशीर्वाद
के महत्व को
मन से निकले
उन शब्दों में
छुपे ममत्व को
एक कवच होता
है आशीर्वाद
जो रखता है
पाने वाले की
ख़ुशियों को
आबाद हम
सारांश में
कह सकते है
कि प्रणाम
अनुशासन है
शीतलता है
प्रणाम नम्रता
है जो आदर
सिखाता है
झुकना भी
सिखाता है
प्रणाम क्रोध
बाधक है वह
अहंकार को
मिटाता है
वैसे तो
हज़ारो
फूल
चाहिए
एक ही
माला को
बनाने के
लिए वह
हज़ारो ही
दीपक और
चाहिए एक
आरती को
सजाने के
लिए वह
हज़ारो बून्द
चाहिए समुद्र
बनाने के
लिए पर
कितना सही
हैं हम यह न
भूलें कि
प्रणाम है
हमारी
पावन
संस्कृति
न आने दें
इसमें हम
कोई भी
विकृति
इन्ही भावो
से सभी बड़ों
को मेरा है
सविनय सादर
प्रणाम
प्रणाम ।

सर्वोत्तम दर्शनीय स्थल

दर्शनीय स्थल घूमने
का प्रसंग आता हैं
तो लोग निकलते
हैं पर्यटन के लिए
कभी जलवायु को
बदलने के लिए
तो कभी दर्शनीय
स्थल देखने के लिए
तो कभी कार्यस्थल
से ऊबकर तनाव से
मुक्त होने के लिए
जाते हैं जगह-जगह
पर मन से होते
प्रसन्न रहने को
वह हम हमारी
हर कोई चिंता से
कभी भी व्याकुल
रहने को हर
जतन का सही
से प्रसन्न रहने
को वह हम हर
तिनका तिनका
खुशी का चुन
चुन बारीक सी
निगाहों में अपने
आपको प्रसन्न
रख सकें क्योंकि
हम मज़बूत वह
खूबसूरत से अपने
आप में सर्वोत्तम
और उज्ज्वल रहने
का विश्वास पिरोते
हैं छोटी चिड़िया
आदि को देख
मानो उस समय
आया यह मौसम
बरसात का सर्द
का मौसम की
घनघोर बारिश
आदि देख हम
क्यों नही बनाते
अपने सभी ही
अरमानों वह
उम्मींदो का
कर्म श्रम धर्म
कल कल गीत
गाते झरनों का
है दृश्य तो
कहीं विकसित
होते नये नये से
पर्यटन स्थलों का
आकार लेता भविष्य
इस तरह संसार में
देखने के लिए हैं
बहुत से खूबसूरत
स्थल पर सबसे
खूबसूरत स्थल
है बंद आँखों से
देखना अपने
भीतर का अंतस्तल
भा गई एक बार
जो मन को वह
मनमोहक छटा
तो दूसरा कोई
दृश्य नहीं है
उसके जैसा
कोई भी समतल ।

कुछ और गुर

हो जाता है
आसान तब
हमारा यहाँ
जीना एक
तनाव मुक्त
सही से है
जो जीवन
यह तभी
सम्भव हैं
जब हम
ख़ुशनुमा
बना कर
रखें अपना
सही से हर
कोई स्वभाव
को हरदम
और अवसर
मिलने पर वहाँ
हँसिए खिलखिला
कर बच्चों की
तरह स्वीकार
करिए कुदरत
के इस दुर्लभ
तोहफ़े को
सहर्ष नहीं
लिखा होता
है यह सबके
भाग्य में
दुर्लभ हर्ष हम
हर कोई उम्र में
अपने शरीर की
नहीं मन की
भी खूबसूरती
पर दें ध्यान वह
हर बदलाव का
लें दिल से सही
संज्ञान समझें
हम सबको
जाना तो है
एक न एक
दिन पर क्यों
बनाएँ हम ऐसा
मन कि बिताने
पड़ें कोई भी
स्थिति में कैसे
ही दिन गिन
गिन जिन्दगी
जीने के ये
तो सब कहते
ही हैं और
अनुभव सिद्ध
भी है कि हम
जिन्दगी जियें
शालीन तरीके
से सरल भावों
से तनाव रहित
व रहें सबके
साथ मिलजुल
कर प्रेम भाव
सहित हमको
समझदारी
जरूरी है पग
पग पर किन्तु
जिन्दा रखें हम
हमेशा अपना
बचपन अपने
अंदर क्योंकि
ज्यादा कोई
समझदारी बना
देती है हमारी
जिन्दगी को सब
तरीके से ही
बोझिल और
बन जाती है
बाधा जीने में
सबके साथ
हिलमिल हम
याद रखें कि
जीवन का अर्थ
तो मिल सकता
है जीकर ही और
रिश्तों का अर्थ
निभाकर ही एक
बात है बहुत ही
जरूरी कि रहना
चाहिए जिन्दगी
में थोड़ा सा
खालीपन भी
क्योंकि यही
तो है वह
समय जब
होती है हमसे
हमारी सही से
अंतरंग ही
मुलाकात
यही तो है
वह मुलाकात
जब होती है
हमसे हमारी
खुलकर बात

दो छोटी-छोटी बातें : खण्ड-1

हमारे जीवन में कुछ छोटी-छोटी बातें इतनी दिलचस्प और रोचक कीमती होती हैं जैसे सागर के मोती। हम आज दो-एक से मुलाकात करते हैं । हम अपने जीवन में यह देख सकते हैं कि छाता, दिमाग और किताब आदि तभी काम करते हैं जब वह खुलते हैं और बिना खुले तो इनको कोई याद ही नहीं करता कि कहाँ हैं ठीक इसी तरह हमारा यह कर्मों का चित्र सचमुच ही विचित्र है ।

वह कितने -?कितने जन्मों के साथ हमारे से जुड़ा हुआ है और इस वर्तमान जीवन का नाता भी है । आदमी सही से बुद्धिमान होकर भी जीवन के इस सच को क्यों नही समझ पाता है । हमारे द्वारा इस जीवन के लंबे सफर में न धन साथ में जाता है न परिवार आदि – आदि ।

हम फिर भी न जानें इस जीवन का व्यर्थ में भार ढोने से कहां चूकते हैं ? हमें जीवन माँ स्थाई शांति व स्थाई सुख के पथ को ही अपनाना है और उसी दिशा में अपने चरणों को सदा गतिमान बनाना है ।

यहाँ दुनिया की रिवाज भी कितने अजीब है कि हमारी जब तलक साँस चलती हैं तो कोई हमारे साथ नहीं चलता हैं और जब हमारी साँस रुक जाती है तो साथ-साथ चलने कोकाफिला बन जाता हैं । हमारे जीवन का एक ही तो शाश्वत सत्य मृत्यु हैं ।
क्रमशः आगे ।

दो छोटी-छोटी बातें : खण्ड-2


हमारे जीवन में एक न एक दिन ऐसा आयेगा कि हमारी साँसो का पंछी उड़ जायेगा। वह हमारी देह ज्यों की त्यों पड़ी रहेगी । हमारे जीवन में हर चीज का उपाय कुछ न कुछ, कहीं न कहीं आदि हो सकता है ।

हमारे पास मौत का कोई भी उपाय नहीं हैं।हमारी साँसों का क्या भरोसा वह कब चलते-चलते रूठ जाये। वह हमारा जीवन है से था में बदल जाता हैं । वह यों अकस्मात हट्टा-कट्टा भी चल देता है कि पीछे वाले हाथ मलते-मलते रह जाते हैं कि यह क्या हो गया आदि – आदि ।

हम जब यह ध्रुव सत्य जानते हैं तो हमारा मन हर वक्त ऐसा बना रहे कि जब आयुष्य पूर्ण होने का फरमान आये तो किसी से भी कोई गिला शिकवा न रहे। वह यह मन्त्र हरदम हमारे मन में रमा रहे कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है ।

वह मृत्यु तो तन की होती है हमारी आत्मा तो सदा से ही अजर है । हमको फिर यहाँ अफसोस किस बात का जब तक हैं तब तक सद्कर्म करते जायें। वह जब बुलावा आये तो हम सहर्ष तैयार रहें। वह प्रसन्न मन सबसे विदा लें। अब हम ही यह समझ लें कि यह क्या दर्शाता हैं ।

धन्य हूँ मैं : भाग-1


शेक्सपियर ने प्रभु से यह अपील की मुझे दिल कृतज्ञता से सरोबार देवें। हम चाहते हैं कि उऋण बन सकें।वह आगे के लिए भार न रह जाये क्योंकि कर्ज कर्ज ही होता है , चाहे वह रुपये का हो या उपकार का आदि – आदि हो। वह रुपयों का कर्ज उतारना कठिन नहीं हैं पर उपकार की कृतज्ञता करना बड़ा कठिन हैं ।

वह हर कोई ऐसा दिल नहीं पाता हैं इसीलिए शेक्सपियर ने प्रभु से यह अपील की थी । हम आज है वो किसकी बदौलत हैं ? एक दिन बैठा-बैठा मैं यह सोच रहा था ओर इसी सोच ने मुझे दबोच रहा था कि मैं आज जो कुछ भी हूँ वह किसकी बदौलत हूँ।

यह चिन्तन करते करते मुझे अन्तर से उत्तर मिला कि तू आज जो कुछ भी है अपने बूते पर कम माँ-तात के बनाये बना है। हमारा जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता है । वह इसमें सुख और दुख का आना-जाना लगा ही रहता है, जिस प्रकार रात के बाद सुबह होती है, उसी प्रकार दुख के बदल छट जाते है और खुशी के दिन आते हैं ।

वह रात दुख का प्रतीक है और दिन सुख का हैं । हम देख सकतें हैं कि जिस तरह पानी दो किनारों के बीच बहते हुए आगे बढ़ता है, उसी तरह जीवन में सुख और दुख दो किनारे हैं जीवन इन्ही के बीच चलता हैं ।

अतः हमें विपदाओं से कठिनाईयो से हार से हताश हुवें बिना,बिना रुके दुगुने उत्साह से अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाते रहना चाहिए, फिर देखें मंजिल (विजय) जीत,सफलता आदि हमारें क़दमो में होगी। हम देख सकतें हैं कि आज के समय में आधुनिकता का दबाव, प्रतिस्पर्धा का प्रभाव , ज्यादा से ज्यादा आमदनी की चाह , आदमी की आवश्यकता आदि – आदि इन सब के चलते बहुत से विद्यार्थी केरियर के लिए स्वदेश से सात समंदर पार दूर देश सुदूर प्रदेश चले जाते हैं ।
क्रमशः आगे ।

धन्य हूँ मैं : भाग-2

वहीं उनको मैं,मेरी पत्नी और मेरे बच्चों का परिवार लिये सदा-सदा के लिये रमना, बसना आदि पड़ता है । वह वर्षों घर वापस नहीं आ पाते हैं यद्यपि फोन आदि से बात कर लेते हैं और खर्चा-पानी भी भेजते रहते हैं। वह आगे
धीरे-धीरे बात-चीत का दौर भी कम होता जाता है। वह खर्चे-पानी की राशि भी घटती जाती है।वह भी नियमित नहीं आती है।

यह सब मात्र औपचारिकता होती जाती है। यह औपचारिकता भी आगे – आगे आहिस्ते-आहिस्ते कभी निभाई जाती है, कभी वह भी नहीं हो पाती है। एक दिन ऐसा आता है कि पूर्णतया विस्मृत ही हो जाती है। वह माँ-बाप इंतजार करते रहते हैं। बेटे दो मिनट बात करने की फुरसत भी नहीं निकाल पाते हैं।

वह उन सबसे मेरा कहना यही है कि हे भारत के सपूतों ! एक बात को कभी न भूलो, जिन्दगी में दो लोगों का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी हैं। वह उनका उपकार अविस्मरणीय तो है ही हम समझे उनके बिना ज़िन्दगी बिल्कुल अधूरी है ।

वह तो हमारे जीवन की जमीन में वह जड़ हैं जो अपनी शाखाओं को सही से फलदार बनाने में अपना सबकुछ लगा देतें हैं और बदले में कुछ नहीं चाहते हैं । यह बस चाहते हैं कि उनका पाला-पोषा वृक्ष व उसकी शाखाएँ आदि सदा फलें-फूलें और फल देते रहें। हम बच्चे हैं धन्य जों उस पेड़ की शाखाएँ हैं ।

प्रतीक्षा

अपने जीवन में
हम सही से कितने
कार्य के अवसर की
प्रतीक्षा में रहते हैं
अवसर बहती एक
नदी की तरह होते
हैं जो आते हैं और
आगे बढ़ जाते हैं
हमारे द्वारा यह
पकड़े जाने की
प्रतिक्षा भी नहीं
करते हैं अगर
हम उन्हें पकड़ने
से चूक जाते हैं
तो फिर नहीं
पकड़ पाते हैं
क्योंकि वे तो
नदी की तरह
आगे बढ़ जाते
हैं आशा और
निराशा डगमग
तो हमारी यहाँ
भवसागर में नाव
बहती जायेगी
और बिना रुके
कोई प्रतीक्षा के
हमने हांथ सही
से आगे बढ़ाया
तो तुरन्त हमारी
आत्मा आगे
की और बढ़
जायेंगी और
मोक्ष को प्राप्त
करेंगी हम सही
से यहाँ पर
अपनी आत्मा
की अजमाइश
कर मनुष्य भव
का सार निकाल
परिणाम को प्राप्त
करें वह हमारी
आत्मा को शुद्ध
करने का बिना
प्रतीक्षा के अवसर
हमको कभी भी
निराश नहीं करेगा
और हम अपना
ज्ञान बटोर कर सही
से आगे का पथ को
प्रशस्त करें बिना
प्रतीक्षा के इसलिए
अवसर आते ही
बिना प्रतीक्षा
के उन्हें पकड़िए
अन्यथा हमको
फिर पछताते
रहना पड़ेगा ।

इंतजार

हम स्वयं को सही
से ऐसा बनायें कि
जहाँ हम है और
जहां से हम चले
जाएँ वहाँ पर अपनत्व
से हमको सब प्यार करें
हमारे प्रति अलग ही
सबका जुड़ाव हो
क्योंकि हमको
स्वयं ऐसा बनाना है
कि वहाँ हमको सब
याद करें जहाँ हम
पहुंचने वाले हो और
वहाँ पर सब हमारा
इंतजार करें हमारे
इस व्यवहार को देख
हर किसी को स्वतः
ही जीवन मूल्य के
हमारे आचरण से
स्थापित आदर्श
दिखायी दे क्योंकि
जब समय हमारा जरा
भी कहने बोलने करने
आदि से इंतजार नहीं
करता तो हम समय का
व्यर्थ इंतजार क्यों करें
इसलिए जीते जी हम
कुछ ऐसे नेक काम
करने को काल- भाव से
उत्सुक होकर प्रयासरत
रह जीवन के हर क्षण को
नेक कार्यों व गुणवत्ता के
मिठास से बराबर भरते रहें
जिससे कम से कम भव
में हमारी आत्मा मोक्ष
का वरण करे ।

जीवन बगिया का सिंचन


हमको हमारे जीवन की बगिया को यदि विकसित करना है तो उसे हम माली की तरह खाद-पानी आदि से सिंचिंत करते रहें ।हमको यह मनुष्य भव का जो जीवन मिला हैं उसको जीना हैं ।

हमको बिना भटके मंजिल को पाना हैं । हमारे जीवन के रास्ते बड़े पेचीदे हैं जिसमे हम अगर गुम हो गए तो हमारा पतन हैं इसीलिए उपमाओं में हमको सही से जीवन को ढालना है। वह सुर ताल का संतुलन बिठाकर जीवन को गुनगुनाना है।

वह पुष्पों को खिलाकर जीवन की बगिया महकाना है। हमको जिंदगी को ऐसे सजाना है की हम जिन्दा इतिहास बन जाए। वह सुमन बन ऐसे महक जाना हैं कि सौरभ सदियों तक आए।

हमको अंधेरों मे विवेक का दीया बन कुछ इस कदर जल जाना है की हमारी ज्योति ही सब जगह उजाले का प्रतीक बन जाए। वह ऐसा गीत की हर लय बन जाना हैं कि उसमें हम खो जाए।

वह इतना हमको विराट् हो जाना हैं की सब कुछ सत्य हो जाऐ। हमको अपने विश्वास की महफिल में इतना प्राण भर देना हैं की हर गुजरने वाले की वह मंजिल बन जाए। वह इसके सारांश में हमको जीवन को सार्थक बनाना है। वह विवेक की बागडोर से जीवन चलाना है।

वह जीवन को धर्म के मर्म से समझ कर सही से आगे बढ़ाना हैं और संसार समुद्र के कीचड़ में मुक्ति का हमको कमल खिलाना है। अतः हमारा सुविचार सदा रहे । वह हमारा सहानुभूति व मिलनसारिता का व्यवहार हमको शान्त शुद्ध आचार में मन सदा आशाओं का भण्डार हो ।

वह उत्तम सोच , मृदुभाषिता आदि कभी विलासिता छू न जाए। हमारा आत्मविश्वास भरपूर हो । हमारा मन कभी सेवाभाव से दूर न हो ।वह सभी की यथोचित मात्रा प्रचुर हो आदि-आदि । वह इससे हमारी जिन्दगी फलती फूलती रहेगी और सदा प्रसन्नता व प्यार मोहब्बत की कहानी कहेगी। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

विडम्बना

हम देख सकते हैं कि
पारिवारिक माहौल में
तो विडम्बना की सही
से पराकाष्ठा तब हो
जाती है मॉं तात
जब समयानुसार
फ़्रेम मे मंढ दिए
जाते हैं और रोज
की रोज़ ताजा
फूलों की माला
चढ़ा कर पूजे
जाते हैं पर
बहुत से ऐसे
उदाहरण हैं
मौजूद मॉं बाप
के साथ हम
क्या क्या सही
व्यवहार करते
हैं यह हमारी
विरोधाभास
विसंगति या
विपरीत आदि
के परिणाम ही
हैं जबकि एक
बूँद मे वही
गुण हैं जो
विशाल समुंद्र
में है पर वह
गुप्त अवस्था मे
है पर बिंदु के
साथ सिंधु का
अंतर भी सही से
परिमाणगत है
और गुणगत है
नहीं होता एक
ही गुण बिंदु मे
है होता एक ही
गुण सिंधु मे है
होता बर्शर्ते
मनुष्य जब तक
अपने मन को
शुद्ध आत्मा मे
सयुंक्त है रखता
वह अपने आपको
सिंधु ही है मानता
क्योंकि हमारा मन
जब तक आत्मा के
साथ सलिप्त है
और होता वह
तब तक दुर्बल
नही हैं उस
अवस्था मे तो
वह परमात्मा के
साथ है होता ।

मेरा मत कुछ और है


हम किसी को उसके काम में कमी देख तुरन्त बोल देतें हैं कि वो अपना कार्य सही से नहीं करता है क्या उसकी जगह हम स्वयं को तोल कर नहीं देख सकते है कि हम कहाँ हैं |

हमारे भाव वास्तव मे मन के अनुचर मालिक है।हमारे द्वारा मन के शोधन के लिए भावों की शुद्धि अनिवार्य है ।हमारे मन की मलिनता का कारण हमारे अपने भीतर ही हैं ।

वह मलिनता को हमने मिटाया तो हमारा मन स्वतः पुनीत पावन बन जायेगा । वह कहते हैं कि जो हम दूसरों को देते हैं वैसा ही एक दिन वापिस लोट कर हमारे पास ज़रूर आता है।

यह बात बहुत सारे शास्त्रों में वर्णित है। हमारे जीवन में हमारी गल्तियों का मुख्य कारण हमारा प्रमाद और कषाय आदि होते हैं ।हम सब छद्मस्थ है ,गल्तियां होना स्वाभाविक है लेकिन हम उस गल्ती से सीख लें ,उसको दोबारा न दोहराएं ।

हमारे जीवन में उतार-चढ़ाव तो आने स्वाभाविक है लेकिन उसमें सन्तुलन बनाये रखना बहुत जरूरी होता है,वो तभी सम्भव है जब हम गलती से सीख लेकर दोबारा वो गलती न करें। वह जहां उलझो,वहां सुलझो के सिद्धांत को अपनाकर हम अपने अध्यात्मपथ की ओर सही से प्रशस्त कर सकते हैं ।

वह हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण सूत्र है कि हम पकड़ को अनाग्रही बनकर मजबूत न बनाएं । हम गलती से सीख लेकर अपने आत्मविशुद्धि के मार्ग को प्रशस्त बनाएं।

अतः हम बीती ताहि बिसार दे,आगे की सुध ले।यह बहुत महत्वपूर्ण सूक्त हमें पुरावर्तन करवाकर बहुत ही प्रेरित करता है ।अतः यह सही से तथ्यात्मक पूर्ण सत्य है कि भूल होना तो स्वाभाविक है पर भूल से सीख लेकर आगे बढ़ना सफलता का पहला सोपान है।

ज्ञान प्राप्ति

जीवन के हर
क्षेत्र में हमको
ज्ञान प्राप्ति
को उत्सुक
रहना चाहिए
ज्ञान प्राप्ति
हमारे जीवन
में एक ऐसा
सशक्त वह
सही माध्यम
हैं जो जीवन
में हमारे को
आगे बढ़ने के
लिए प्रेरित
करतें रहतें है
होता बीज है
हमारा जैसा
वृक्ष पल्लवित
होता वैसा
वह हमको
जन्मदाता
से मिले जो
यह संस्कार
बिम्ब होता
शिशु में सही
से साकार वह
हमको पहली
शिक्षा मिलती
उनसे और जीवन
मार्ग का दर्शन
शिक्षा गुरु से
सद गुरु मिल
जाए तो हो
उपकार इस
संसार जगत
से वह दुलार
बिन उनके
कटता बचपन
मुश्किल से
छत्र छाया में
ही जीता वह
बालक और
सभी बाधाओं
से हो निष्फ़िक्र
से हमारे द्वारा
एक बोली
सुनने वाले
के दिल में
मिश्री घोल
सकती है
एक उसका
दिल भी तोड़
सकती है जैसे
सीमेंट से पुल
भी बनाया जा
सकता है और
आँगन में दीवाल
भी खींची जा
सकती है पुल
तो इधर-उधर
के लोगों को
जोड़ती है वह
आँगन में
खींची दीवाल
लोगों को
तोड़ती है इस
तरह सही से
अच्छे संस्कार
देते हम सभी
बड़े सही
से अपना सभी
सर्वस्व को
निछावर कर
देते और खिल
जाता दिल सुर
सरगम से देख
बच्चे की हँसी
मासूम चेहरे पर
भूल जातें हम
कष्ट सारे क्योंकि
होता सुखद हमको
अनुभव किलकारी
सुन के वह मॉ
बाप के जिगर
का टुकड़ा होता
होता राज दुलारा
सबसे न्यारा उसके
आगे सब रंग और
फीका लगता नैनो
का वो सबका जो
ध्रुव सितारा होता
हम अपना बचपन
भी बच्चे में जीते
और देख उनकी
सभी तरह की
अठखेलियाँ हर्षित
होते जाने कितने
कितने हम स्वप्न
है बुनते वह बड़ा
आदमी बन एक
दिन जग में रोशन
हों नाम मेरा करेंगे
अतः हम समझें
कि हमारे द्वारा
केवल पढ़ना
तो है दूसरे के
शब्दों को ही
दोहराना वह
प्राप्त ज्ञान को
जीवन के सभी
व्यवहार में
उतारना ही
है वास्तविक
ज्ञानार्जन करना।

ज्ञानार्जन


हमारे जीवन में ज्ञानार्जन केवल पुस्तक पठन अथवा प्रवचन आदि श्रवण मात्र से ही नहीं हो जाता हैं । यह तो केवल प्रथम चरण है । वह वास्तव में ज्ञान तब आता है जब भीतर में उतर कर अनुभव बन जाता है इसीलिए कहा जाता है कि ज्ञानार्जन के तीन चरण श्रवण व पठन, मनन और ध्यानपूर्वक ग्रहण आदि हैं ।

हम देख रहे कि आज मानव फूला नहीं समा रहा है कि उसने विज्ञान एवं तकनीक में अप्रत्याशित उन्नति कर ली है जिससे काफी ज्ञानार्जन के साथ-साथ सुख सुविधाएँ भी पा ली हैं।वह किन्तु यह भूल रहा है कि हमने इन तथाकथित सुख -सुविधाओं में हमारे भावना स्तर पर कुठाराघात कर उसे सही से अपूरणीय क्षति पहुँचाई है। वह यह भी भूल रहा है कि मानव वास्तव में शरीर नहीं उसका असली तत्व तो अंतरात्मा हैं |

वह उसके बाद पवित्र मार्ग पर चल कर उसे परमात्मा बनना है अत: मानव को इस जन्म की सार्थकता के लिए येन-केन-प्रकारेण अपने अंतर्मन को अधिकाधिक आत्म शोधन में लगाना सही से आवश्यक एवं श्रेयस्कर है।

हम अपने जीवन में सही से छोड़ने लायक बात को छोड़े एवं जानने लायक बात को जाने । हम अपने जीवन में ग्रहण करने वाली बात को सही से समझ ग्रहण करें (आत्मसात करें) ।

वह इस तरह हम अहं से सही से बाहर निकलकर में में की जगह हम और ज्यादा से ज्यादा आप शब्द का प्रयोग जीवन में करें ।

हम विनम्रता,सरलता को आत्मसात करते हुए, होठों पर सदा मुस्कान रखते हुए, किसी के साथ में जालसाजी,बहकावें में आने से बचाव करते हुए, किसी के प्रति घृणा करने से बचते हुए आदि – आदि ज्ञानार्जन करते रहें ।

वह हुए ज्ञान को अर्जित करते हुए हम मित्रों के प्रति वफादारी सच्ची मित्रता निभाते हुए सभी नगीनों के प्रति सचेत रहतें हुए हँसी-खुशी अपनी जिंदगानी जीते रहें।अतः हम जब श्रुत अथवा पठित ज्ञान को पुनः-पुनः सोचते हैं, उस पर मन को स्थिर करते हैं।वह हमारे में हृदयंगम होता है।

वह आचरण के रूप में हमारे जीवन में उतरता है। हमारे हर कर्म, हर विचार आदि में झलकने लगता है। अतः हम यह समझें कि केवल पढ़ना तो दूसरे के शब्दों को दोहराना है । हमारे द्वारा प्राप्त ज्ञान को जीवन के व्यवहार में उतारना ही वास्तविक ज्ञानार्जन करना है ।यही हमारे लिए काम्य हैं ।

पुत्र रत्न

भुवाल माता के
आशीर्वाद से
17.7.2025 को
पुत्र रत्न की
प्राप्ति पर
छाजेड़ कुल का
हो रहा है श्रृंगार
नेमीचन्द जी का आश्रीवर
सीता देवी का है सिंचन
सुनील जी का है प्यार
प्रमिला देवी की है ममता
तनुज अक्षिता का है योग
विवान का हैं भाई
रागिनी अंकित भुआ
पूपा लाड़ लड़ायें
सावन की खुशियों
में भरकर हर्ष मनायें
मानों यहाँ हो रहा
है अलग ही तरह
का खुशी में रम
श्रृंगार और वंश
में हो रही वृद्धि है
जीवन का आधार
देखो यहाँ छाजेड़
कुल की बदली
है काया मानों सभी
ने ओढ़ी हरि चुनरिया
और खुशियों के इन
नजारों ने आंखों को
लुभाया वह महक
उठे फुल चारों ओर
छाई आँगन में खुशहाली
जीवन का श्रृंगार बच्चे
जीवन का आधार बच्चे
देख इन सबको हैं हर्षाते
मन ही मन है मुस्काते
नहीं करती खुशियों
कभी भी इस तरह
का यह सिलसिला
कम सबको करती
सही से उल्लासित
मानों प्रकृति का
वह जीवन का यह
आधार देख खुशियों
में इसे पंछी गाना
गाते पेड़ पौधे नए
नए रूप दिखाते
सुप्त स्त्रोत भी बहने
लगते सब में भर्ती
एक नया जोश हैं
प्रकृति कर रही
बच्चे की खुशी
में सही से श्रृंगार
मानो बयान कर
रही हैं यह जीवन
का आधार और
बारिश का संकेत
करते नभ पर छाए
काले काले मेघ
गगन पर चमके
बिजली तेज तेज
खुशियों को प्रकृति
कर रही हैं तेज
मन में उठी नई
नई तरह की तरंग
चौकड़ी भरने लगी
सारंगी धरा और
प्रकृति भी श्रृंगार
में रमकर खिल
रही है यह जीवन
का आगे आधार
आओ हम सब
मिलकर गीत
बाबू के आने
के खूब गाएं
और इस मौसम
में त्योहार मनाएं
सदा ही आगे
आगे बढ़ते जाएं
तरक्की की नई
राह पातें जायें
खुशियाँ सब
तरफ फैले ।

अकेलापन

अकेलापन सुख
का अंत और
एकांत में हैं
आनंद के क्षण
एक घटना प्रसंग
एक बूढ़े बाप ने
बेटे को बोला कि
बेटा ! बेटा अभी
बाजार जा रहे हो
होली पर्व पर मेरे
लिए एक चीज
लेकर आना याद
से भूलना नहीं
तो बेटा बोला
बोला क्या लाना
है तो वह बोला
कि मेरी यह
जरूरत जरूर
पूरी करना वह
चीज है हर
रोज मेरे पास
जरूर बैठा करो
दो बात अपने वह
मेरे मन कि कर
लिया करो और
मुझे अकेलापन
बहुत अखरता
है तुम्हारी माँ भी
तो अब नहीं है
यहाँ इस दुनिया
मैं किससे क्या
बात करूँ मेरा
मन कहाँ पर
हल्का करूँ कि
जिससे कोई भी
बातें कर सकूँ
बस अब मेरी
यह फरमाईस है
इस पर्व पर है
यही कि इसे
तुम जरूर पूरी
कर देना और
पता नही अब
कितने दिन और
यह मेरी आगे
जिन्दगी रहेगी
वह यहाँ से मुझे
भगवान बुला लेंगे
तभी यहाँ से मेरी
सवारी रवाना हो
जाएगी पुत्र और
बहू यह सुन
कुछ भी आगे
नहीं बोल सके
क्योंकि उन
दोनों की आँखों
से आँसू ही बहते
रहे अकेलापन
हैं इस संसार की
सबसे बडी सजा
है और एकांत इस
संसार में सबसे बडा
वरदान हैं ये दो
समानारथी दीखने
वाले शब्दों के अर्थ
में आकाश और
पाताल का अंतर
है क्योंकि सभी
के अकेलेपन में
छटपटाहट है तो
एकांत में आराम
है हमारे जीवन
के सभी तरह
के शब्दकोश
का सबसे और
मूल्यवान शब्द है
शांति हम अशांति
के झँझावतों में
लड़खड़ाते है तो
अंतरक्रांति की
यह विचारधारा
आत्म-शांति और
सुख की अनुभूति
हमें एकांत के
सहवास में गहराती
जाती हैं क्योंकि
अकेलेपन में घबराहट
है तो एकांत में शांति
वह जब तक हमारी
नजर बाहर की ओर
है तब तक हम
कहीं भी अकेलापन
को महसूस करते हैं
और जैसे ही हमारी
नजर भीतर की ओर
मुडी तो एकांत का
अनुभव होने लगता
है ये जीवन और
कुछ नहीं वस्तुत:
अकेलेपन से
एकांत की ओर
एक यात्रा है ऐसी
यात्रा जिसमें रास्ता
भी हम है राही
भी हम है और
मंजिल भी हम
हैं और इस
तरह एक दिन
अकेलेपन का यह
संघर्ष पीछे छूट जाता
है और जीवन में
एकांतिक शांति
का सही से उदय
हो जाता हैं और
अद्भुत क्रांति की
लक्षित मंज़िल
सही से मोक्ष
को पा लेते हैं|

खुशहाल जीवन

हमको यह मानव
भव की मिली हैं
जिंदगी जो हमारे
अच्छे कर्मों से
सही से मिलती
है मानव के रूप
में यह मानवीय
जीवन जिंदगी
हम न जाने
यहाँ कितनी
कितनी कई
योनि में घूमने
के बाद इस
मानव भव में
आयें हैं हम
इस मानव भव
का सही से सदा
सदुपयोग करें
और हम इसको
बड़े सदकर्मों में
सही से बिताए
और अपना सही
से खुशहाल हो
यह अपना जीवन
जियें यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

पिछला बनाम वर्तमान जन्म

हमारा हर समय
किसी भी बुरे
वह अच्छे कर्म
से वह हर कोई
हालत में बचने
का दृढ़ निश्चय
का सावधान हो
रहने का चिन्तन
हो क्योंकि हमारा
पिछले जन्म में
जो हुआ सो हुआ
उसका तो हम
अब कुछ नहीं
कर सकते है
गया समय
कभी भी नहीं
आता पर हम
वर्तमान को तो
सही तरीके से
सावधानीपूर्वक
जी ही सकते है
इतना तो हम
कर ही सकते
हैं ताकि हम
अपना वर्तमान
और अगला
जन्म तो सही
से सार्थक तो
कर पाएँ और
हमारे को कोई
भी पश्चाताप
करने की नौबत
न आए जरा
हम यह भी
सोचें कि पिछला
जन्म हमारा तो
इतना बुरा नहीं
था बल्कि उससे
हमने तो इतना
पुण्य भी कमाया
था तभी तो इस
जन्म में हमने
मानव तन को
पाया है वह
तुलसीदासजी
ने ठीक ही तो
कहा है की बड़े
भाग मानुष तनु
पावा सुर दुर्लभ
सब ग्रंथन्हि
गावा तो फिर
हम इतनी सी
सावधानी तो रखें
कि इस जन्म में
सदा श्रेष्ठ सोचें
श्रेष्ठ पथ का
हम सही से
अनुसरण तो
करें श्रेष्ठ
व्यक्तित्व का
निर्माण करते
हुए जिएँ और
हम इस जन्म
को श्रेष्ठ से
और श्रेष्ठतम
तो बनाएँ मन
अगर जो यह
मजबूत है तो
डर की क्या
बिसात है
यदि परमात्मा
से सही प्रीत
है तो डर के
आगे जीत है
नई बहारे होगी
जीवन में करना
होगा यह सही
से हमको
भागीरथ प्रयास
वह उगेगा सूरज
उम्मीदों का होगा
हमारे में नित
नित नूतन प्रकाश
डर के आगे जीत
है रखना यह सही
से हमको मन
में यह विश्वास ।

संयम जीवन

जीवन वही जो
हमको सही से
आगे प्रेरित करें
जिसके अपने
सही से आदर्श
हो और जो बीते
हुए कल से आने
वाले कल को
और बेहतर बना
कर जीने के लिए
सही से आगे के
लिए हमको
प्रतिबद्ध करें
जो एक एक
सांस धुओं के
छल्ले बनकर
नहीं अंगारा
होकर कर्मों
का क्षय कर
जिया जाए
वह जीवन
सदा पूज्य है
वह जीवन
वंदनीय ओर
स्मरणीय व
श्लाघनीय है
उस जीवन का
एक अलग ही
इतिहास है उस
इतिहास का एक
एक अध्याय हर
एक पन्ना वो
हमको सही
से अनगिनत
अंधेरों में सांस
ले रही जिंदगी
को उजालों का
गर्व सिखाता है
वह हमको
निंदा व प्रशंसा
दोनों में सही
से आनन्द के
पल जीना
सिखाता हैं
वह जीवन
में हर कोई
परिस्थिति में
सुख से जीने
के हर रहस्य
को खूब अच्छी
तरह से जीना
समझाता है
क्योंकि वहाँ
निरंतर भाव
का अभाव है
सतत प्रतिभाव
स्वभाव है वह
इसमें अनवरत
प्रवाहमान हैं
इन सभी के
अनुस्रोत व
प्रतिस्रोत आदि
से हमें भर
कर जाना है
आत्म स्वभाव
में इस जीवन
सकारात्मकता
के मैदान में
हमें इससे
नहीं नजर
आएगी और
कमियां किसी
की और न ही
हम समझेंगे
अतिरिक्त
स्वयं को नो
हीणे नो अइरीत्ते
का भाव हो
जायेगा भावित ।

हो सामाजिक सौहार्द का विस्तार

मानव एक सामाजिक प्राणी है । हम देख सकते हैं कि आदिकाल के पश्चात सभ्यता के विकास से परिवार व समाज व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ हैं । वह इसका मनुष्य की जीवनशैली पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा हैं । वह इसी के चलते मनुष्य आज सम्बन्धों में जीता है सामाजिक प्राणी कहलाता है।

परिवार, मित्र, समाज, समूह आदि आधारभूत इकाईयाँ हैं । इनमें गहन परस्पर निर्भरता बढ़ने लगी हैं । यह मानो एक दूसरे की परछाईयॉं हैं । इसका मूल कारण पारस्परिक अपेक्षाएँ है ।

वह दूसरा से हमें कुछ माने चाहत रहती है लेकिन हम सही से एक दूसरे की भावनाओं को महत्व दे। वह आनन्दमय जीवन का मूलमंत्र दूजों के संग खुशी बाँटना है जिससे हम भी और सामने वाला भी सुखी होंगे ।

वह सामाजिक सौहार्द का तो यह मूल आधार हैं कि हर सदस्य में पारस्परिक प्रेम, त्याग , समर्पण और सेवा का भाव आदि हो जिससे हर सदस्य प्रसन्नमुखी हो । हम यह भी समझें कि हर व्यक्ति एक दूसरे से भिन्न होता है। वह विचारधारा भी भिन्न-भिन्न होती है और उसूल भी भिन्न होते हैं।

अतः हमारे द्वारा अस्वीकृति को तिरस्कार मानना एकदम भूल है। वह हमारे द्वारा हमारी किसी भी क्रिया और बात आदि की अस्वीकृति का कारण सही से समझ यथोचित सुधार करना चाहिए जो हमारे व्यक्तित्व को व्यापक बनाए रखेगा और नजरिया सही से समन्वयक होने का आधार बनेगा ।

अतः इससे तब हमारा सम्बन्ध प्रेम में बदल जाता है। वह सेवा समर्पण बन जाता है। यहीं से सामाजिक सौहार्द का विस्तार होता है और यही सामूहिक प्रगति का आधार हैं ।

हम दीपक बनें

दिया तेल और
बाती तीनों है
अलग अलग
लेकिन जब
मिल जातें हैं
तो बन जातें
हैं दीपक
हम दीपक
आत्मा के
ऐसे बनें कि
जों खुद ही
जलकर प्रकाश
जग को देता हैं
वह ऐसा हम
महादानी बने
दीपक की
तरह जो
जलता हैं दूजों
के ही खातिर
पर ना होता
उसके मन में
कोई डर क्योंकि
वह अपना कार्य
करता जाता है
हम अपने जीवन
में करे सही से
धारण परम वीर
निस्वार्थ समर्पित
उसकी सभी तरह
कि शौर्य व
कहानी क्योंकि
दीपक ना केवल
हमको संदेश ही
सुनाता हैं पर वह
उसको सही से
जीकर भी दिखा
देता हैं दीपक
देख हमको
चलते जाना हैं
हथेली पर ले
उसकी अमिट
सही निशानी
दीपक का
प्रकाश मानो
है हमारे जीवन
कि अलग ही
सुखमय बेला
है उसका मानस
अलबेला कितना
पावन कितना
निर्मल मानो हों
गंगा नदी के पानी
की अमृत धार
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।

पंक्तियाँ जो बन गई सूक्तियाँ

हम अपने जीवन में
देख सकतें हैं कि
कुछ बाते हमको
इतनी प्रभावित
करती हैं कि जो
पंक्तियाँ हमारे
बन जाती सूक्तियाँ
है इसी तरह का
एक प्रसंग जब
एक बार
उद्योगपति
रतन टाटा ने
लंदन में दिया
एक वक्तव्य
जिसकी सारभूत
सुन्दर पंक्तियाँ
बन गई सभी के
लिए धारण करने
योग्य सूक्तियाँ
कहा उन्होंने
अपनी भावी पीढ़ी
को बनने के लिए
अमीर कभी न करें
हम प्रेरित बल्कि
बनाएँ उन्हें सतत्
कर्मशील एवं
श्रमशील करेंगे
श्रम-सह-कर्म
तो अमीर स्वतः
ही हो जाएँगे नहीं
है इसमें कोई भ्रम
मेरे कहने का
तात्पर्य है कि
हमारे में सही
से विवेक हो
आवश्यक और
अनावश्यक मे
अंतर का उसकी
पहचान का नही
तो अनावश्यक
को भी जैसे
लडाई झगड़ा
कलह फसाद
आदि आदि को
भी आवश्यक
समझ बैठे फिर
तो यह काम
हैवान का
होता है हम
आवश्यक और
अनावश्यक का
तो सही से यह
विश्लेषण करते
हुए आवश्यक
कार्य का खाता
बढ़ाते जाए और
अनावश्यक कार्यो
की संख्या घटाते
हुए इस दुर्लभ
मनुष्य जीवन को
सार्थक बनाए हम
में से प्रायः हर
कोई बाहर यानि
भौतिक सुख व
सम्पदा में खुशीयों
की तलाश करता
रहता है जैसे अच्छी
नौकरी अच्छे रिश्ते
अच्छा घर वह साल
में एक दो बार
विदेश भमण का
सफर आदि आदि
वह ऐसा करने
वाला समझदार
नहीं है क्योंकि
असली खुशी
इन सब के अंदर
नहीं है वह तो
हमारे भीतर ही
तो सच्ची खुशी
छिपी है हम जब
जब भी खुशी की
तलाश करने बाहर
निकलेंगे तो सिवाय
निराश होने के
कुछ नहीं पाएँगे
वह नाम अहंकार
पैसा रुतबा आदि
आदि पा कर भी
स्थायी खुशी नहीं
पा सकेंगे एक
कहावत है कि
अपनी थाली की
खिचडी में कितना
ही घी चुपडा हो
लेकिन पराई कि
थाली में भी घी
ज्यादा दिखता है
वह जिसकी दृष्टि
अन्य को देखने में
व्यस्त हो जाती है
उसे अपनी कोई
सपंदा अपना वैभव
नजर नहीं आता हैं
वह तो अपनी सारी
ऊर्जा ही उसी में
खर्च कर देता है
अतः हम सही
से प्रबंधपटुता
कार्यदक्षता एवं
सहिष्णुता आदि
के गुणों से हो
अपने जीवन में
गतिमान तभी तो
कहा गया हैं कि
पंक्तियाँ जो बन
गई हैं सूक्तियाँ ।

बनायें भावी पीढ़ी को आत्मनिर्भर

हम देखतें हैं कि
जब माता पिता
व परिवार आदि
ईमानदारी सेवा
संयम जैसे गुणों
को जीते हैं तो
वे गुण बच्चों के
स्वभाव का सही
से हिस्सा बनते
जाते हैं इसलिए
आज की भागती
दौड़ती दुनिया में
जब हम परिवार
के साथ मिल
अर्थपूर्ण समय
नहीं बिताते हैं
तो भावी पीढ़ी
के बच्चे भी
भावनात्मक
रूप से बहुत
सुसंस्कार शून्य
होते जाते हैं
माता पिता व
अभिभावकों
को है सचेत
होने की जरूरत
कि परिवार में
वातावरण ऐसा
बनाए रखें कि
वही भविष्य में
संस्कारों का वट
वृक्ष बने क्योंकि
भावी पीढ़ी हैं
आगे जीवन का
सही से आधार
भावी पीढ़ी ही
हमको सिखाती
है जीवन में
अच्छे आचरण
को अपनाने
का आधार
भावी पीढ़ी
हमको देख
कर ही सीखती
हैं सुख दुख
सही गलत का
भान अनेक
बार कहा
जा चुका है
अब भी कह
रहा हूँ कि
करते हैं हम
उसके साथ
जैसा वर्ताव
हो गया है
शुरू उसका
पड़ना आज
की पीढ़ी पर
भी और भावी
पीढ़ी पर भी
दूरगामी प्रभाव
इस सन्दर्भ में
आज का यह
समुचित नारा
है चेत मानव
चेत क्यों है
आमादा तू
अपने ही
विनाश पर
क्यो नहीं
हो रहा तू
अविलंब
सचेत
पाश्चात्य
देशों में हर
पीढ़ी को सही
से सिखाया
जाता है
बचपन से ही
अपना काम
स्वयं करना
वह आत्मनिर्भर
बनना इसलिए
भरी रहती है
कूट कूट कर
वहाँ के छोटे
छोटे बच्चों में
भी आत्मनिर्भरता
स्वाभिमानीता इसी
कारण उनको कभी
भी आगे चलकर छू
भी नहीं सकती
अकर्मण्यता
अतः जरूरी है
दूर रहें ऐसी
सोच से हम
जिससे पनपे
परिवार में
निकम्मापन
बल्कि हम
भरें सही से
ऐसी भावना
भावी पीढ़ी
में कि
वर्धमान रहे
आत्मतोष व
कर्मठता
बच्चों को
कोरा उपदेश
नही स्वयं
का उदाहरण
दें हम जो
संस्कार डालने
हैं उनमें उन्हें
स्वयं जिएँ हम
समझें आज की
भावी पीढ़ी
परिवार की
ही नहीं
अन्ततोगत्वा
है देश की
आधारशिला
उसे सुसंकारित
करना है हमारा
ज़िम्मा तभी तो
चलता रहेगा
यह सिलसिला ।

मुमुक्षा


चारित्र मोहनीय कर्म के क्षयोपशम होने के बाद ही मुमुक्षा में आत्मा केन्द्रित हो जाती हैं। वह पाँच महाव्रत को धारण करने को उत्सुक होते हैं । ( मुमुक्षा=मोक्ष पाने की तीव्र इच्छा ) उनकी आत्मा तो परम सौभाग्यशाली होती है।

हम आज के समय में देखते है कि इच्छाएँ, कामनाएँ तो मनुष्य की जन्मजात से ही भावनाएँ हैं । वह मनुष्य बचपन से ही इच्छाओं में ही जीता है। उसकी अंतहीन इच्छाओं का चक्र भी खत्म ही नहीं होता है।उसकी नई-नई चीजों की लालसा थमने का नाम ही नहीं लेती है।

वह मानसिकता असीम धन-दौलत, आलीशान मकान, आयातित लग्जरी वाहन आदि देने में कुछ भी कृपणता न करें भगवान आदि में रहती है । ऐसे सांसारिक माहौल में भी दीक्षा के लिए उन्मुक्त होना सचमुच परम सौभाग्यशाली व श्रेष्ठ महान आत्मा के व्यक्तित्व का परिचायक होता हैं ।

उनके संसार से निर्लिप्तता, निर्मोहता आदि के परम उत्कृष्ट भाव होतें हैं । हम अपने जीवन में जब तक दुसरो की अपेक्षाओं पर निर्भर है तब तक हमारे जीवन का स्वभाव अभाव ही रहता है ।

वह जिस दिन से हम स्वयं से अपेक्षा करेंगे वह पल हमारा आत्म स्वभाव का होगा और हमारे कोई भाव या अभाव नहीं होगा । हमारा एक ही ध्येय होगा कि बस आत्मा कि उज्जवलता मिलती रहे ।

वह जिसके अंतिम परिणाम मोक्ष से हम कोई भी अनभिज्ञ नहीं हैं ।भगवान महावीर के भवो की यही दास्ता है । उनके भाव अभावो से जीवन गाथा शुरु होती हैं ।

वह स्वयं में रम जाने से सिद्धार्थ कुल के उजियार वर्धमान थे जो आगे चल भगवान महावीर बन गए क्योकि उन्होंने स्वयं को स्वयं से जीता है।

मुमुक्षा की स्तिथि में मन की समस्त उर्जा इस एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित हो जाती है। वह उसका जीवन तो धन्य हो जाता है। यह ऐसा तभी होता है जब महान पुण्य कर्मों का उदय होता है।

हाथ की लकीरे

हम देखते हैं कि
काल- भाव के
अनुसार दिन
रात की मेहनत
से अच्छे दिन भी
आये है वह घर
में है जो सबकी
अटारी भी बनी
हैं वह सबकी
भूख भी मिटी है
मेहनत करके
कितनों ने अपनी
दुनियाँ को खूब
सजाए है वह
इसकी खूबसूरती
में नित्य ही आगे
चारचांद लगाए है
वह अपने हाथ की
खुरदुरी लकीरे पर
कितनी चिकनी
कृति स्वयं ही
तो बनाये है
रात में दिन करने
की कला भी हुनर
से ही लाये है वह
धड़कता है सीना
बहता हममें भी
रुधिर है अन्न
जल से चलती
काया इसके
बिना तो सब
धूमिल है बस
यह विनती है कि
कर भला तो हो
भला वालो से
हमारे भी अपने
जीवन भरे हो
दुनियाँ की यह
खुशियाँ कितनों
को भी यह
अपने अधिकार
से नसीब हुई
है जीवन वही
जो प्रेरित करें
जिसके अपने
आदर्श हो जो
बीते कल से
आने वाले कल
को और बेहतर
बना कर जीने
के लिए सही
से आगे से आगे
प्रतिबद्ध हो और
जो एक एक
सांस धुओं के
छल्ले बनकर
नहीं अंगारा
होकर जिया
जाए उस
जीवन का भी
अपना इतिहास
है और उस
इतिहास का
एक एक अध्याय
हर एक पन्ना
न जाने अनगिनत
अंधेरों में सांस ले
रही जिंदगी को
उजालों का गर्व
सिखाता है अतः
जब हम मुस्कुरायें
तो सारी ही कायनात
इस अभियान में
हमारे साथ जुड़
जाती हैं मगर
आंसुओं का
कोई साथी नहीं
होता हैं ।

पनपने न दें अकर्मण्यता

अकर्मण्यता व
निष्क्रियता एक
ऐसा भयानक रोग
है जिसके साथ
चलता रहता वह
नकारात्मकता का
रोग है व निराश होने
कि वृति का योग है
अतः जरूरी है हम
अंत तक अपने
काल भाव से जैसे
सम्भव हों वैसे
कार्य रत्त रहें व
निरंतर सही से
सक्रियता की
धारा में बहें जो
फालतू विचारों से
बचता है वही तो
जीवन में आगे बढ़
एक नया इतिहास
रचता है हम यह
देखते हैं कि आदमी
अपने जीवन में
आरंभ करता है
काम करना तो
आगे शुरू करता
है शनैः-शनैः वह
जीवन में प्रगति
पथ पर आगे भी
बढ़ना वह एक
दिन आता है जब
उसके सेवानिवृत्त
होने का समय भी
आ जाता है क्योंकि
अक्सर कम हो जाती
है शारीरिक व क्षमता
भी और थकान महसूस
होने लगती है उसको
मानसिक रूप से भी
मन के हारे हार है
मन के जीते जीत
यह बात कई बार
मुख से निकलती
है जीवन का बहुत
बड़ा रहस्य इस
साधारण सी यह
लोकोक्ति में छिपा
है जिसका मन हार
जाता है फिर चाहे
दुनिया के कितने
भी साधन और
शक्ति उसके पास
क्यों ना हो वह
जरूर पराजित होता
है कुछ ना होते हुए
भी मनोबल जिसका
बना हुआ है वह एक
दिन जरूर विजयी
होता है इसलिए
चाहे उम्र कोई भी
पड़ाव हो हम अपने
मन में अकर्मण्यता
पनपने न दे कभी
शरीर कितना भी
हृष्ट पुष्ट हो या
ना हो लेकिन
शरीर को कार्य
करने के लिए
प्रेरित करने वाला
तो मन ही है और
सारे कार्य हमारे
मन के द्वारा ही तो
संचालित होते हैं
मन से कभी भी
हार मत मानना
नहीं तो आसान
सा जीवन हमारा
कठिन से भी आगे
कठिन हो जाता है
क्योंकि वक्त हमको
जीवन में यह कहता
है मैं फिर न आऊँगा
मुझे खुद पता नहीं
तुझे हँसाऊँगा या
रुलाऊँगा जीना है
तो इस पल को जी
ले क्योंकि मैं किसी
भी हाल में इस पल
को अगले पल तक
रोक न पाऊँगा |

सोच सोच में फर्क

हर आदमी की
सोच है उसकी
मानसिकता का
हूब हू बिंब वह
मन में चल रहे
सकारात्मक और
नकारात्मक विचारों
का प्रतिबिम्ब पर
हम क्यों बात करें
अपने जीवन में
नकारात्मकता की
रखें सही वृत्ति सदा
सकारात्मकता की
बहुत अन्तर आ जाता
है जीने के तरीके में
दैनिक व्यवहार के
सलीके में एक
छोटा सा उदाहरण
आया मेरे सामने कि
एक व्यक्ति सोंच
रहा था कि मेरे
कैंसर नहीं हों
वह इसी चिन्तन
से उसने एक बार
थोड़े दिन में दूसरी
बार अपना सही
से स्वास्थ्य का
चेक अप और
करवाया तो
उसके कुछ
नहीं आया
फिर थोड़े दिन
बाद और उसने
अपना फिर चेक
अप करवाया तो
उसके कैंसर आ
गया यह सुन
उसे ऐसा लगा
मन ही मन वह
मायूस हो गया
जीवन का रस
ही खो गया तब
किसी ने उसको
ऐसा सकारात्मक
जवाब दिया कि
उसका मन भी
आशा से भर
गया बोला वह
हाँ एक दिन
हम मर जाएंगे
पर बंधु! यह
तो सोचो बाकी
दिन तो हम जिन्दा
रहेंगे इस वाक्य ने
उसको जीने की
कला दे दी उसकी
सोच की धारा ही
मुड़ गई मन में
उसके उत्साह की
लहर बहने लगी
तब मन में आया
मरने की सोच
सोच क्यों जियें
मायूसी की हम
जिन्दगी मौत कब
होगी किसी को
कोई पता नहीं
क्यों छाने दें मन
पर अज्ञात दिन
का कहर जितने
दिन जिएँ जिएँ
खुल कर मन
में भर कर
आनन्द
की लहर ।

पानी भी कुछ कहता है

हम देख सकते है
कि दुनिया में ऐसी
कोई चीज नहीं है
जिससे हमारे द्वारा
कोई भी परिस्थिति
में सही से सीखा
नहीं जा सकता हो
वह उससे हमको
कुछ न कुछ सही
से सीखने को
मिल ही जाता है
हर चीज़ से हर
परिस्थिति से कुछ
न कुछ सचमुच
मसलन लें पानी
को ही हम वैसे
तो है वह एक
तरल पदार्थ ही
पर कहता है
कुछ न कुछ
वह भी जैसे
जीवन में हम
हर स्थिति में
सही से रहें
चाहें कोई भी
हमारे परिस्थिति
आ जायें हम
हर परिस्थिति
में सम्भाव से
रहें वह सही
सामंजस्य बिठा
कर सीखें पानी
की तरह चलना
और सदा सदा
प्रसन्न रहना
वह किसी भी
अड़चन में
बाधा से हमको
कभी भी न
घबराना और
किसी न किसी
तरह अपनी राह
को सही से ढूँढ
ही निकालना
हम लें अपने
जीवन में भी
पानी की तरह
हर स्थिति से
ऐसी प्रेरणा
तभी तो कहते
है कि पानी भी
कुछ कहता है।

कीमत

जिज्ञासा की
खिडकियों से
ज्ञान रश्मियों
के दर्शन होते
हैं वह दरवाजे
बंद रखने वाले
अज्ञान तिमिर के
साये मे सोते है
केवल एक ढ़रे
पर चलते रहने
का नाम नहीं
है यह जिन्दगी
कुछ नया वे ही
कर पाते हैं जो
जिज्ञासा के साथ
नये स्वप्न संजोते
हैं हमारे द्वारा
जीवन में सही
से कोई भी लक्ष्य
हासिल करने के
लिए जरूरी है
लक्ष्य के प्रति अपनी
प्रतिबद्धता यह ठीक
है कि योग्यता क्षमता
प्रतिभा व लगन आदि
भी हैं मुख्य गुण पर
उनके साथ सर्वोपरि
है संकल्पबद्धता
प्रतिबद्धता इरादों को
शक्ति प्रदान करती है
प्रतिबद्धता से बहुगुणित
हो जाती है कार्यक्षमता
गौण हो जाती है सभी
हमारी व्यक्तिगत
आपदा अपना सबसे
अच्छा संसाधन तो
हम स्वयं ही हैं क्या
हम अपना पर्याप्त
उपयोग कर रहे हैं
अतः सही से अपनी
योग्यता को निखारें
और क्षमता बढ़ाएँ
यही आनंद है और
यही प्रगति है यही
ज़िन्दगी के सफ़र
की तन्हाई में वो
सच्चा हमारा ही
हमसफ़र हैं
साथ रहता वह
हर रहगुज़र
अनुभव किया
की हमारे संकल्प
का सही से हो
प्रकंपन उस
परम पिता को
प्रभावित करता
है और भगवान
भक्त की भावना
पढ़ सम्पूर्ति करते
हैं वह मन में इरादे
प्रस्फुटित होना
सहिष्णुता की
खरी कसौटी है
जिससे संकल्प
प्रखर बनता हैं
वह एक दिन यही
प्रतिबद्धता संकल्प
शिखर बल आदि
में मिल सफल हो
सम्मान वर्धापना
करता हैं अतः
तभी तो कहा
हैं कि मासूम
चेहरों के पीछे
भी कुटिल कैसी
भी मस्ती हो
सकती है वह
विपन्नता की
छांव मे भी
खुशियों की
बस्ती हो
सकती है
जरूरी नही है
शिक्षा के साथ
सुसंस्कारों का
पहले से होना
क्योंकि एक
एक अनपढ़ भी
अपनी योग्यता
से महान् हस्ती
हो सकता है।

सजगता

हमारे को छोटी सी
ज़िंदगी मिली वो भी
क़ीमती जाने फिर
मिले न मिले ये
हमको मनुष्य गति
हम मिल जुल कर
सही से परस्पर प्रेम
और सहयोग से कर
ले सफल सार्थक
जीवन ये दुर्लभ वह
हम सजगता से करें
सुरक्षा इन सभी सम्बंधों
की क्योंकि टूटी तो
फिर जुड़ न पाएगी
जैसे पहले थी कर
सुधार या क्षमता
क्षामना भूल या
त्रुटि की कर लो
मज़बूत अटूट
आदि ये पुल या
डोर सभी तरह
के सम्बंधों की
रहिमन धागा प्रेम
का मत तोड़ो यह
चटकाय टूटे तो फिर
ना जुड़े जुड़े तो गाँठ
पड़ जाय विचार
करने से पहले यह
सजगता हो की जो
हम सोच रहे है जो
हम कर है वह कहीं
अमंगलकारी तो नही
है हमारा हर विचार व
वाक्य सरल स्पष्ट
बोधगम्य होना चाहिए
हमको जीवन में नदी
की धार के साथ बहना
है चलना है जल को
साफ होते हुए भी
सही से सजगता
से देखना है तभी
तो हम सही से
समझ पाएंगे कि
दुनिया में चीजें कैसे
बनती और वह
रूपान्तरित होती है
उसके पीछे का
राज और सारी
कमियाँ हमारे
समझ में आ
जायेगी हमारा
जीवन धैर्य से
सजगता से
सही दिशा की
और गतिमान
रहता है धैर्य
और संयम तथा
सजगता हमारे
ये तीनों चीजें
समझ उत्पन्न
करती हैं और
चेतना को सही
से करीब लाने
में मदद करती
हैं इस संसार में
सबसे मतिमान
है आदमी को
मति ही दे
सकती है उसको
सही से मानसिक
शक्ति इसका
मूल बीज है
सजगता वह
जागरूकता अत:
सजगता ही है जो
हमको सही से
मुख्य शक्तिदाता
पर विडंबना है
कोई इस ओर
ध्यान ही नहीं
देते हैं कभी और
और सांसारिक
झंझटों में ही
उलझे रहते हैं
सभी अतः
हमको जरूरत
हैं अंतस्थ आत्म
सजगता की
अंदरूनी शांति
की वह आंतरिक
सतर्कता की
क्योंकि जब
होता है हमारा
अन्तरमन शान्त
तब पत्तों के हिलने
तक की कोई
आवाज का भी
होने लगता है
स्पष्ट भान वह
मन करने लगता
है अद्भुत शांति
रस पान।

जीवन की किताब

आध्यात्मिक ग्रंथों
के भी अलावा हमारे
जीवन में दुनिया की
सबसे अच्छी और
उपयोगी किताब तो
है आदमी स्वयं वह
खुद को ही समझ
लें ठीक से तो
हो जाए बहुत सी
समस्याओं का
स्वत: ही समाधान
है निज को सही
से समझने में
हमारा इतना
दम भगवान
ने मनुष्य को
वो समझ दी
है कि जब
समय विपरीत
हो तो थोड़ा
संयम धारण
करे वह मन में
यही चिंतन करे
कि जब एक दिन
उदय होने से लेकर
वापिस दूसरे दिन
उदय तक कितने
पहर देखता है ठीक
वैसे ही जीवन में
बदलाव आये तो
यही चिंतन रहे कि
यह भी स्थायी नहीं
रहेगा हर अमावस्या
की घोर अंधेरी रात
आयी है तो कुछ दिनो
बाद पूनम की चाँदनी
भी दिखायी देगी अतः
हमारा जीवन वृत हो
ऐसा कि उस किताब
का नाम जिसके हर
पृष्ठ पर छपे हों
हमारे जीवन के
रहस्य वह हर रहस्य
बयान करें सही
से हमारे सुख
दुःख की भरी
अनगिनत कहानी।

करें गहन चिन्तन

प्रायः प्रायः यह
चलन है देखते
हैं आजकल की
असलियत है
सब अपने मतलब
की बात को तो
सही से समझते
हैं पर बात का
मतलब ठीक से
नहीं समझते हैं
हम जिन लोगों
के साथ रहते हैं
उठते बैठेते हैं
समय बिताते हैं
उनकी सोच वह
उनके विचार और
उनके चाल चलन
आदि आदि हमें
प्रभावित करते
ही करते हैं वह
अच्छे व विद्वान
लोगों की संगत
हमें ऊँचाई की
राह दिखाएगी
इसके विपरीत
बुरे लोगों की
संगत हमें गर्त
में गिराएगी
अतः करें हम
सदा सही से
सद्पुरुषों की
ही जीवन में
सदैव संगत
लाएँ निस दिन
जीवन में उच्च
कोटि की हम
रंगत यही हमारे
लिए काम्य हैं ।
प्रदीप छाजेड़

हृदयंगम करें

हमारे जीवन में
छोटी भूल बड़ी
भूल तो हमसे
होती रहती हैं
हमको कभी
हंसते हुए
छोड़ देती है
ये जिंदगी तो
कभी रोते हुए
छोड़ देती है
ये जिंदगी न
पूर्ण विराम हो
सुख में न पूर्ण
विराम दुख में
बस जहां देखो
वहां अल्प विराम
छोड़ देती है ये
हमको जिंदगी
अतः सदैव हम
दिल को दिल से
मिलाते रखें और
क्या लेकर जाना
है साथ में इस
दुनिया से मीठे
बोल और अच्छे
व्यवहार है रिश्तों
को बनाए रखना
हैं तभी सब चीज
हजम होगी
वह बहुत सा
अनुभव हमको
आता ही है
गलत फैसलों
से अगर नहीं
टकराए हम
गलत से तो
सही को कैसे
पहचानेंगे
इसीलिए तो
कहा जाता है
भूल सिखाती
है हमको जीवन
सुधार का सही
से उसूल हम
यह समझें कि
अनुभव की
भट्ठी में तप
कर जो
जलते हैं
दुनिया के
बाज़ार में
वही तो
सिक्के
चलते हैं
यही तो
हमको
सही से
करना है
हृदयंगम ।

सुख का स्रोत है मन: स्तिथि


हम देख सकते हैं कि सुख कौन नहीं चाहता हैं और किसे नहीं भाता हैं । वह साधारणतया तो सारा जीवन आदमी इसी के लिए दौड़ भाग करता हैं । हमारी मानसिकता में सच्चा सुख अच्छा घर, अच्छा धन्धा, सम्मान, प्रशंसा , पद-प्रतिष्ठा आदि-आदि हैं तथा तन-बदन में कभी न हो आधि -व्याधि वह हर परिस्थिति में चित्त समाधि रहे ।

बूँद-बूँद से घड़ा भरता है और उसी बूँद से नदी बनती है।हम अगर गहराई में जायेंगे तो नदी हम्हें बहुत ही अच्छी सीख देती है। वह जो अपना रास्ता स्वयं बनाती है,प्यासों की प्यास बुझाती है, अपने हृदय में अनेक जीव जंतुओं को पनाह देती है, पर उसके बदले में कोई चाह नहीं और उसका पानी इतना निर्मल जैसे किसी महापुरुष को दिल हो।

वह इसीलिये भगवान भी उसमें वास करते हैं। वो निरंतर गतिमान रहती है,जैसे आलस्य का वहाँ कोई बहाना ही ना हो।हम उसमें कितनी भी गंदगी डालें पर वो तो अपने सरल मन से हम्हें मीठा और शीतल जल ही प्रदान करती है फिर एक दिन समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व ही समाप्त कर लेती है।

अतः हम सबको भी नदी से सीख लेनी चाहिये कि चाहे कितनी भी विषम परिस्थिति आये अडिग रहो,जीवन में छल कपट नहीं सरल बनो,कभी अच्छे क़ार्य करके नाम के पीछे मत भागो,हर समय पर हित की भावना रहे और मन इतना सरल हो जैसे एक छोटे बच्चे का होता हैं ।

वह कहते हैं ना कि बच्चे के दिल में भगवान का वास होता है,क्योंकि उसका मन सरल होता है और जीवन में सत्कर्म करते करते इस दुनियाँ से विदा हो जाओ।

अतः हमारा सुख कभी बाहरी वस्तुओं से नहीं आता हैं । वह तो हमारे भीतर से ही उपजता है और जब इच्छाओं की लहरों में उफान (कोई हो तो) थम जाता, मन शान्त हो जाता हैं । यही तो सुख के स्रोत की कहानी है जो किसी से अनजानी नहीं हैं ।

विचार-शक्ति

हमारे विचार ही
तो हमको जीवन
में सही से आगे
बढ़ने की प्रेरणा
प्रदान करते हैं
सद्विचारों की
ही शक्ति है
कि मनुष्य
को वह सही
से आसमान
पर बिठा
देती है और
दुर्विचारों की
नफ़रत हमको
गहरे गर्त में
भी ढ़केल देती
है हमारा दैनिक
कार्यक्रम भी
चलता है जैसे
चलाता है मन
इसीलिए यह
कहा जाता है
कि हमारे
जीवन के
सही संचालन
में मुख्य भूमिका
निभाता है मन
यह भी नहीं है
अतिशयोक्ति
कि हमारे कोई
से अच्छे बुरे कैसे
ही भाग्य का सही
से निर्माता है मन
वह कहा भी तो
है मन के हारे हार
है मन के जीते जीत
मन के चाहे कितने
बैर है और मन के
चाहे प्रीत विचार
एक भावनात्मक
उपचार हैं यह
हमारे अपने
आत्मसम्मान
के गुण को सही
से बढ़ाता हैं हम
जब भी अपना
लक्ष्य बनाते हैं
तो उसे प्राप्त
करने के सही
तरीक़े सोचते
हैं वह सफलता
प्राप्त करते हैं
हम शुभ-शुभ रहे
हर दिन हर पल
वह शुभ शुभ रहें
हमारे विचार और
उत्साह बढ़े चित्त
चेतन में निर्मल
रहे आचार वह
सफलतायें नित
नयी मिलें होए
हर्ष अपार और
पवित्र विचार
रहे सुवासित
ज्यूँ गंगा की
धार अतः
हमारे रहे
सभी विचार
नियंत्रित
और प्रबुद्ध
रहेगी आत्मा
सदा पवित्र
विशुद्ध वह
यदि लग
गई यह कैसे
ही साधना में
सही मार्ग पर
तो करने लगेगी
प्रस्थान सिद्ध
बुद्ध की
राह पर।

भावों में तीव्र ममकार है अहंकार

हमारे द्वारा अपने जीवन में बड़े-बड़े सपना देखना कोई ग़लत नहीं हैं ।हर इंसान के मन में हमेशा यह भाव रहता है कि मैं भी एक दिन बड़ा आदमी बनु।वह मेरे पास भी दुनियाँ की तमाम सुविधाएँ हो,लम्बा चौड़ा कारोबार हो और समाज में मेरी तूती बोले। वह आकांक्षा सभी की पूरी हो यह कोई ज़रूरी नहीं हैं ।

हमारे द्वारा जब मन में सोचे हुए सपने पूरे नहीं होते हैं तो कुछ व्यक्ति उसको अपने दिल से लगा लेते हैं और इसके कारण कई घातक परिणाम भी सामने आते हैं। हमारे भावों में तीव्र ममकार ही अहंकार हैं । वह इसमें मैं ही मैं की टंकार हैं और मैं के अहं के सिवाय कुछ स्वीकार नहीं हैं ।

इसमें यही आत्मबोध प्राप्त करने में सबसे बड़ा अवरोध है ।यह वैसा ही है जैसे सूरज को बादल ढक लेते हैं । वह कुछ व्यक्ति उस स्तिथि में अवसाद में चले जाते हैं तो कुछ व्यक्ति और कुछ कर लेते है ।

यह भी सही है कि हमारी आशाएँ और आकांक्षाएँ हम्हें आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करती है पर हर इंसान मन में यह सोच कर चले कि मैंने अपने मन में आकांक्षाएँ और आशाएँ तो बहुत की थी ,अगर उसका परिणाम हमारे अनुकूल हुआ तो बहुत अच्छी बात है और परिणाम आशाएँ के विपरीत रहा तो कोई बात नहीं , और जो मेरे भाग्य में था उसी में संतोष है।हमने प्रयास तो किया हैं ।

वह मन में हम यह भी सोचें की जो मुझे प्राप्त हुआ उतना तो बहुत लोगों को भी नसीब में भी नहीं हैं इसलिये जीवन में आशाएँ और आकांक्षाएँ ज़रूर रखो पर पूरी नहीं होने पर जो प्राप्त हुआ उसमें संतोष करना सीखो। वह इसके विपरीत अहंकारी के ज्ञानचक्षु के आगे अहंकार की अभेद्य सी चादर छा जाती है ।

हमारा ज्ञान तो तब प्रकट हो सकता है जब मैं मिटता है और विनम्रता और समर्पण भाव जागता हैं । यही तो उसकी सही से कुंजी है। वह यही साधक की सार्थक पूंजी है। अतः अहं हमारे जीवन के विकास में बहुत बड़ी बाधा है । वह अहं के पतन से ही हमारे आत्मज्ञान के सूर्योदय की आशा टिकी है।

डर और भय

साहस का दीप
जला बढ़ चले
जीवन में उससे
डर और भय का
भूत स्वतः ही
भाग जाता हैं
नभ सा हो यह
हमारा विस्तृत
कार्यक्षेत्र सघन
हमारी निष्ठा व
सकारात्मक
शुचिता के बल
पर बढ़ती रहे
सही से प्रतिष्ठा
मंझिल है हमारी
दूर हम है यहाँ
मुसाफ़िर चलते चले
हम अपनी धारा पर
सरलता प्रोत्साहन
कि सभी उर्वरा सोच
का दिखेगा नज़ारा
बशर्ते हम करनिय
सभी कार्य करते
रहें सदैव जीवन में
हमेशा एक दूसरे को
समझने का प्रयत्न
सही से कर ना की
उसको परखने का
हम जीवन में अपने
स्वयं के भरोसे से
और विश्वास से
श्रम से निडरता से
पुरुषार्थ से आत्म
विश्वास से हमको
हर दिन सपना एक
संजोना है तथा सही
से सपने को हक़ीक़त
में बदलने का प्रयास
भी करते रहना है
और आख़िर में
हमको लक्षित
मंझिल ज़रूर मिलेगी
हम वर्तमान में जीये
और जिस क्षण हमको
मरना है मर जाएँगे
लेकिन आज हम
डर डर के क्यों मरे ?
यह जीने की कला
है अतः हम भय
मुक्त रहकर अभय
की साधना करे
वह हम सब मनुज
के त्रस्त मुख से
भय आच्छादन
हटने लगे नव
आदित्य नव
प्रकाश बिखेरता
दिखे भय एक तरह
से मानसिक रूप
से दुर्बलता है वह
जिसका मनोबल
मजबूत होता है
उसमें भय और
डर के नाम
की कोई चीज
नहीं होती अतः
हमको डर और
भय किसका
सदैव अभय हों
अपने कदम बढ़ाते
चलें वह मोक्ष की
मंजिल पहुँचे यही
हमारे लिए
काम्य हैं ।

यह तथ्य है

यह तथ्य हैं कि
घमंड और नशा
दोनों ही नाशवान
है हम देखते है
कि जब नई नई
सम्पन्नता आती
है तो कईयों
की प्राय: प्रायः
विनम्रता, शालीनता
आदि मूल रूप से
नष्ट हो जाती है
वह दिमाग में एक
नशा सा छा जाता
है पैसा सिर पर चढ
कर बोलने लगता
है और तब दूसरों
की थोड़ी सी भी
चढती नहीं सुहाती
है और चापलूसों की
जी हजूरी ही उसको
मन को भाती है
बहुत अनभिज्ञ होते
हैं ये लोग कि लक्ष्मी
तो स्वभाव से ही
चंचला होती है
भरे पड़े हैं यहाँ
इतिहास के पन्ने
दूरस्थ और हाल
ही के सभी तरह
के उदाहरणों से
कि कल तक जो
थे साम्राज्यों के
मालिक वह आज
यहाँ पर दिख रहें
हैं साधारण से एक
मुसाफिर जो हो
गए हैं अकारण ही
काल चक्रके किन्हीं
कारणों से अहं जाति
कुल बल रूप और तप
का भी हो सकता है
ज्ञान लाभ ऐश्वर्य का
अहं भी आदमी को
डूबो सकता है गर्व
करने वाले का
पतन एक न एक
दिन अवश्य ही
होता है वह कही
भी अहंकार का
मद देर तक नहीं
टिकता है अतः
हम सही से
जागृत कर विवेक
को बच सकते
है इस मोहपाश से
वही व्यक्ति सबके
लिए श्रद्धेय पूजनीय
वन्दनीय हो सकता है।

मृत्यु

मृत्यु जीवन का
वह पड़ाव है
जहाँ आत्मा
वर्तमान में
धारण किए
हुए कोई भी
शरीर को छोड़
अपने कर्मानुसार
आगे के भव में
अगले शरीर को
धारण करती हैं
माना की मृत्यु
पर तो किसी का
ज़ोर नहीं पर शरीर
तो हमारा स्वयं का
अपना है वह जैसे
चाहों वैसे हम
अपना सही से
यह जीवन को
जी सकते हैं हम
मौज मस्ती या
रोष रंजिश में
या शांति और
प्रेम में जीवन
जी सकते है
हमारा यह
कोड़ी में देह
बिक सकता
है गर रात दिन
रहा भोग में या
चुन सकता है
हीरा बन ऐसा
कोहिनूर देह
रहते बन यहाँ
हम सब विदेह
इस जन्म में
खुले जब हमारे
स्वयं के प्रयास
से भीतर के
ऐसे ज्ञान चक्षु
वह जिस दिन
जल गयी उसमें
बाती आत्म रूपी
दीप में वह मिट
जाएगा ये सघन
अँधेरा भोग
विलास और
क्लेश का यह
अप्रमत्त हो बन
जाऊँगा देह
से विदेह क्योंकि
हमको यह
जो जीवन
मिला है ये
बहुत ही
सौभाग्य से
मनुष्य भव
का हम इसे
व्यर्थ में ना
जाने दे मृत्यु
से पहले जीवन
का सार निकाल
मोक्ष को प्राप्त
करें यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

करें चिन्तन मनन

प्रकृति के संसाधन
हम देख सकते है
कि प्रकृति के
पास पर्याप्त
मात्रा में साधन
हैं प्राकृतिक
संपदा तो
अमूल्य है
निःशुल्क
और
अमूल्य
दोनो को हम
बिना मूल्य का
कहा भी जा
सकता है पर
दोनो शब्दो मे
बहुत अंतर है
यह हम उस
हॉस्पिटल में
वेंटिलिटर पर
आसीनवृद्ध या
और कोई ने
हमको यह
सही से अच्छी
तरह से समझा
दिया है क्योंकि
अकिंचन और
रंक में भी तो
यही फर्क है
अनादि काल
में एक बार
पैड़ के फल
तोड़कर खाने
से ३,४ दिन
भूख नहीं
लगती थी
इतनी शरीर
की फल से
तृप्ति होती
थीं फिर धीरे
धीरे प्रकृति का
दोहन होने लगा
या यूँ कहे पेड़
की कटाई होने
लग गयीं तो
पैडों के फल की
मिठास भी कम
होने लग गयी
और दिनो दिन
हालत बद से
बदतर हों रहीं
हैं जिससे शुद्ध
हवा पानी का
अभाव तो दिख
हीं रहा हैं साथ
ही साथ में नित
नयी असाध्य
और बीमारियाँ
भी आ रहीं हैं
अगर यहीं हालत
रहीं तो पूरी
मानव जाति
का अंत आगे
दूर नहीं यदि
नहीं रोके हमने
अपने कदम
बड़ी दृढ़ता और
शीघ्रता से।

जीवन सुख- दुख का मेला

हमारा जीवन एक
वृत है और सुख
दुःख है इसकी
परिधि साँसों का
घेरा है और लक्ष्य
तक पहुँचना है
हमारे जीवन
की इस यात्रा
में अच्छे बुरे
कर्मों का साया
रहता हैं जीवन
की यात्रा मे
सुख और दुःख
तो सहयात्री है
जो आते जाते
है ऊबड़ खाबड़
बनते बिगड़ते
रिश्तों की तरह
चढ़ते उतरते है
भगवान के हाथ
है ग्रीन सिग्नल
जो लक्ष्य की
प्राप्ति होती हैं
मंज़िल हमारी
तय है बस सफ़र
पर चलते जाना
है क्योंकि हमारा
जीवन है यहाँ
पर सुख दुख का
मेला वह इस मेले
में हम मानव
सदा ही रहते
अकेला है वह
समस्याओं का
यहाँ आना जाना
लगा रहता है और
आदमी उस प्रवाह
में सदा ही बहता है
गलती का जब वह
करता है पश्चाताप
तब मन व जीवन
बन जाता है साफ
जीवन के हर पल
पल को हमें आनंद
व उल्लास से खूब
भरना होगा और
साधना के सुखद
स्वरों से निर्भय हो
बनकर सदा ही
संवारना होगा वह
प्रियता और
अप्रियता दोनों
स्थितियों में जो
सदा समता के
भाव रखता है
वह जीवन के
इस महाजंग
में न कभी भी
थकता है और
न ही कभी
सिसकता
है क्योंकि
दुनिया का
हर इंसान
सुख चाहता
है दुःख कोई
नहीं चाहता
वह दुःख से
डरता हैं
इसलिए दुःख
से छुटकारा
पाने के लिए
तरह तरह के
प्रयत्न करता
है सुख और
दुःख धूप छाया
की तरह सदा
इंसान के साथ
रहते हैं इस लंबी
जिन्दगी में खट्ठे
मीठे पदार्थों के
समान दोनों का
स्वाद ही चखना
होता है सुख दुःख
के सह-अस्तित्व
को आज तक
कोई भी मिटा नहीं
सका है जीवन की
प्रतिमा को सुन्दर
और सुसज्जित
बनाने में सुख
और दुःख ही
आभूषण के समान
है इस स्थिति में
सुख से प्यार और
दुःख से घृणा
की मनोवृत्ति ही
अनेक समस्याओं
का कारण बनती
है और इसी से
जीवन उलझन
भरा प्रतीत होता
है अतः जरूरत है
इन दोनों स्थितियों
के बीच संतुलन
स्थापित करने की
सकारात्मक वह
सही दृष्टिकोण
अपनाने की हमारे
जीवन का अच्छा
पथ सुगम हो और
पौरुष हो ज़िन्दा
तम नही वहाँ
पलता है अच्छी
हर राह जब
राही चलता है
सूर्य अस्त से पहले
गंतव्य- मोक्ष क्या
तेरा क्या मेरा
प्राणों का नही
स्थिर डेरा हो
विशुद्ध आचरण
,बल-बुद्धि-विवेक
आदि से सारा तभी
तो कहा गया
है कि जीवन
है सुख और
दुख का मेला।

विश्वास-तंत्र

हमारा विश्वास
तंत्र ही हैं जो
बना देते हैं
हमारे द्वारा
असम्भव को
भी सम्भव
हमारे अपने
मस्तिष्क की
कार्यकुशलता
करती है निर्भर
काफी कुछ
हमारे अपने
विश्वास-तंत्र
पर विश्वास

तंत्र है प्रकृति
प्रदत एक ऐसा
अलग ही वैज्ञानिक
संयंत्र जो बना
देता है ना कुछ
को भी सब
कुछ मंत्रवत्
विश्वास-तंत्र के
कारण ही तो
बिना औषधि
की गोली भी
बन जाती है
औषधि प्रभावी
यह आदमी ही
नहीं पशु के मन
पर भी होता है
विश्वास-तंत्र सही
से पूर्ण प्रभावी इसी
कारण बिना खूंटी
रोपे ही केवल
अभिनय से ही
ऊँट बँधा रहता है
उससे वहीं का
वहीं जब एक
बच्चे को हम
हवा में सही से
उछालते हैं तो
वह हँसता है
क्योंकि वह
जानता है कि
हम उसे पकड़
लेंगे इसे कहते हैं
विश्वास – तंत्र
विश्वास से ही
विश्वास उत्पन्न
होता है और
अविश्वास से
अविश्वास यह
एक वास्तविक
मानसिक प्रकिया
है जो हम
प्रेक्षाध्यान में बार
बार अनुप्रेक्षा से
सही से सिखते है
की प्रार्थना और
विश्वास दोनों
अदृश्य हैं परंतु
दोनों में इतनी
ताकत है की
वह नामुमकिन
को मुमकिन
बना देते हैं
विश्वास जीवन
में इतना आए
की खुद पर हो
विश्वास और
गुरु पर हो
आस्था फिर
कितनी भी
आए बाधा
मिल जाता
है रास्ता क्योंकि
इंसान मरा करते
है विश्वास नही
मरता है वह
नामुमकिन को
भी मुमकिन
विश्वास किया
करते है सपने
सच हो जाते है
हर दुआ काम
आती है विश्वास
की डोर को
अपनी विश्वास
खिंच लाती है
अगर हम अपना
यह दृढ संकल्प
करें और इसे
बार बार अपने
मन ही मन में
दोहराते रहें कि
चाहे कुछ भी
हो जाए कोई
भी मेरी खुशी
और मुस्कराहट
छीन नहीं सकता
इससे हमारे
आत्मविश्वास
का स्तर ऊँचा
उठेगा और
आनन्द का
अक्षय स्रोत
बहेगा ही
बहेगा यही
हमारे लिए
काम्य हैं ।

मृत्यु से क्यों डरें


हम अपने जीवन में मृत्यु का नाम सुनते है तो हमको भीतर में अजीब सा आह्लाद पैदा करता है या मैं यो कहूँ की मृत्यु के नाम से ही हम सब डरते है । वह सब धर्माचार्य इस बात पर एकमत हैं कि मृत्यु किसी भी जीव की भव-भव की यात्रा का अंत नहीं हैं ।

वह तो केवल आत्मा का देह परिवर्तन है । यह बात तो सर्वसम्मत है कि आत्मा तो अजर-अमर है उसका तो न जन्म न मरण होता है। वह कर्मानुसार हर नव देह में ओढ़ कर उसका आवरण आत्मा से जुड़ जाता है। हम यह तथ्य जब हृदयंगम कर लेते हैं तब मृत्यु का भय ही समाप्त हो जाता है। यह शास्त्रानुसार परम सत्य भी है ।

अतः हम जितना ज़्यादा सम्भव हो सकें उतनी ज्यादा अच्छी स्थिति में रहें क्योंकि हमारी अगली गति का आयुष्य कब कहाँ कैसे बँधेगा यह हम में से किसी को पता नहीं है । हम देखते हैं कि मृत्यु तो शरीर की होती है आत्मा की नहीं होती हैं क्योंकि आत्मा तो अमर-अजर है ।

वह आत्मा हमारें कर्मो के हिसाब से एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को धारण कर लेती है । वह शरीर की मृत्यु तो एक पड़ाव है जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र को त्यागकर नये वस्त्रों को ग्रहण कर लेता है । अतः हम अपने अंतर को टटोलें ।

वह अपने भीतर के काम,क्रोध,लोभ,मोह आदि दुर्गुणों को दूर करें और उस मार्ग पर चलें जो मानवता का मार्ग है । वह मृत्यु तो नव भव का उत्कर्ष हैं , जीवन नहीं फिर संघर्ष यू यह है इसलिए हम क्यों मृत्यु से डरें । अतः मृत्यु एक शाश्वत सत्य हैं यह जब भी आए हम इससे डरे नही उसे सहर्ष स्वीकार करें ।यही हमारे लिए काम्य हैं ।

मन ही है बन्धन: मन ही मुक्ति का साधन

हमारे द्वारा मन के जीते जीत हैं और मन के हारे हार हैं । हमारा मन एक दर्पण की तरह है । वह अगर स्थिर और स्वच्छ आदि रहता है तो उसमें रह-रह कर आत्मा की झलक दीख सकती है। वह चंचल कामनाओ और विक्षेपों आदि से यदि भरा हुआ मन होता है तो फिर उसमें कुछ भी नहीं दीख सकता हैं ।

अतः सघन ध्यान आध्यात्मिकता के ज्ञान आदि से ही मन में धीरे-धीरे आत्मज्ञान का द्वार खुलता है । हम किसी भी काम,क्षेत्र आदि में विजयी होंगे या पराजित,सफल या असफल आदि यह पूरी तरह से हमारें पर निर्भर है ।

हम यदि यह सोचोगे और अपने मन में यह विश्वास करेगे कि आप जीत जाओगे तो यकीन मानिए कि जीत आपकी ही होगी, आपको जीतने से कोई नहीं रोक सकता कोई भी नहीं, लेकिन इसके विपरीत यदि आप सोचोगे और यह मानकर चलोगे कि यह काम मुश्किल है और मैं हार जाऊंगा तो आपको हारने से कोई नहीं रोक सकता हैं ।

वह इतिहास के महान से महान काम इंसान की इसी सोच पर हुए हैं क्योंकि सफलता और असफलता की कहानी पहले हमारे मन में लिखी जाती है और बाद में वो साकार रूप लेती है। हमारे द्वारा मन को जोड़ने से ही भावों में शक्ति का संचार होता है । वह मन को जोड़ने से ही मन का सारा भार निर्भार होता है ।

वह मन को जोड़े बिना भक्ति में शक्ति कहां से आती है । वह मन को साथ में लेकर चले बिना हमें मंजिल कहां मिल पाती है । हमारे शरीर और वाणी का एक मात्र संचालक मन ही होता है । हमारे द्वारा मन को सरल, तरल बनाना होगा जैसे कोई निश्छल बालक होता है ।

हमारा मन एक ऐसी फैक्ट्री है जिसमें हम जैसा सही से भावनाओं रूपी कच्चा माल डालेंगे उसी अनुरूप वह परिवर्तित हो कर पक्का माल निकलेगा। अतः हमको यह ज्ञात रहे कि इच्छाओं की शुद्धता ही मन की सकारात्मक शक्ति है ।हम मन को सही दिशा में साधें और इच्छित फल पाएँ यह वांछित है ।यह मन ही बन्धन हैं व मन ही मुक्ति का साधन है ।

गुरु

गुरु है अपने
आप में निराला
गुरु की महिमा
है भारी गुरु को
स्मरण कर हम
पातें है मोक्ष की
निकट मंजिल
हमारे मन के
जो दीप जला
दें वह जीवन
में सही राह
का मार्ग हमको
सही से आगे
प्रशस्त कर दें
एवं गुरु सही
से सुयोग्य
विद्यावान
दयावान
सुदृष्टिवान
प्रतिभावान
आदि होते है
गुरु हमारे जीवन
के निर्माता होतें
हैं जों हमारा जीवन
उज्ज्वलतम बनातें हैं
हमारे मन की खुराक
है हमारे अपने विचार
जैसा होगा विचार
हमारा वैसा ही
होता हमारा आचार
कैसा है व्यक्ति?
वह बताती उसके
विचारों की बात
में अभिव्यक्ति
गुरु के मन की
बात उनका मन
हीं जानें क्योंकि
मन के पग हजार
गुरु का बैरागी मन
कभी निर्मल कभी
अनुरागी वह हर्षित
मन आसमां में लगाते
फेरे इंद्रधनुष जैसा
हजारों रंग अपने
छुपाते अंदर में
मन बनाते कभी
खुशियों की माला
गुरु के स्मरण से
समझ जाएं यदि
हम शास्वत विधान
कि मेरे अंदर ही है
भगवान मेरे भीतर है
अनन्त – अनन्त
शक्ति का संचार
मैं हूँ शुद्ध परमात्म
स्वरूप अमान वह
पवित्रता बसी है
हमारे कण कण में
करनी है हमको सही
से उसकी पहचान
निर्विकारता और
आनंद का नहीं
है पार सिर्फ करना
है मुझको स्वयं का
सही से साक्षात्कार
आओ ! जानें हम
सही से अपने आपको
मिटा दें राग द्वेष मोह
माया के सारे व्यवधान
बन जाएं हम जल्द
अजर,अमर,आत्मवान ।

आशावादी

जीवन मे हम
कौन-सा रंग
भरें यह हमारे
स्वयं के सही
से निरंतर रहने
वाले चिन्तन
पर निर्भर है
हमारा जीवन
उम्मीदों आशाओं
का सदा निर्मल
गतिमान रहने
वाला निर्झर है
हमारे को जीवन
में सदा सही से
आशावादी रहना
भी कितना अच्छा
होता है वह जिसके
साथ हम जीकर
व्यर्थ निराशा के
भार को नहीं ढोते
है लेकिन उससे
भी ऊँचा होता है
हमारा स्वयं का
आत्म विश्वास की
मधुरिम उमंग का
संग जिसमें हमारे
पल पल ही छलकता
रहता है ऊर्जा से
अभिसिक्त सही से
तरंगों का अलौकिक
रंग क्योंकि जीवन में
खुशनसीब हैं वे
जो गिर-गिर कर
संघर्षों की राह
को सही से पार कर
करते हैं उपलब्धियाँ
का मुकाम हासिल
वे ही करते हैं
अपने जीवन को
सही से गौरवान्वित
एवं सुवासित अतः
हार से हार मान
कर बैठ जाने वाले
हैं स्वयं की मानसिक
दुर्बलता के प्रतीक
जबकि इसे सफलता
का प्रथम सोपान
मान कर आगे बढ़ने
वाले आशावादी न
केवल लहराते हैं
सफलता का
परचम बल्कि
खींच देते हैं
अलग ही सबके
लिए अनुकरणीय
अमिट लीक यही
हमारे लिए
काम्य हैं ।

वर्षा ऋतु

वर्षा ऋतु लगती
हैं सबको मनभावन
मानो सभी तरह के
जीवों को आनन्द
रस से भर देती हैं
पशु पक्षी वह
जानवरों की
तरह हम मनुष्य
का जीवन भी
वर्षा ऋतु के साथ
में जुड़ा हुआ है
घनिष्ठता से हम
कह सकते हैं
मनुष्य भी है एक
मौसम प्रिय प्राणी
प्रिय हर ऋतु से
संभवतः ॠषि
मुनि जन की
तप साधना का
भी हो सकता है
यह भी एक कारण
जिससे साधना हो
जाती हैं वर्षा ऋतु
में असाधारण वह
वन-वाटिकाओं में
रोजाना पौ फटते ही
भिन्न-भिन्न पक्षियों
की चर्र-पर्र चूँ-चूँ
चीं-चीं की मधुर
चरपराहट और
चहचहाहट सबको
कितनी ही कर्णप्रिय
लगती है जिसका इस
मीठी आवाज में रम
जाता मन उसके लिए
तो है मानो यह जागने
के लिए Morning
Alarm काली है घटा
आई पावस ऋतु
अद्भुत है छटा और
हमारा तृषित तन
रिमझिम बारिश
हर्षित मन बंजर
धरा हरियाली
युक्त हो ये
वसुंधरा जो
वर्षा फुँहार से
खेत खलियान में
आई बहार अतः
वर्षा का ऋतु जब
है आता तो छोटे
बड़े सभी के मन
को हर्षित करता ।

होनी का योग

माना की होनी
तो होकर रहेगी
लेकिन हमारा
जब तक जीवन
हैं तब तक हम
सही से अपना
जीवन खुश हों
सही से जियें
वह अच्छे से
अच्छा उसको
सही से बनाते
रहें क्योंकि हुआ
मन का चाह तो
भी ठीक और नहीं
मन चाहा हुआ तो
भी ठीक यह तो
हमारे को संतोष
होगा कि हमने
प्रयास तो किया
आध्यात्मिक दृष्टि
से हम देखें तो
रावण में था मैं
और राम की
भाषा में हम
आज हम इसी
मैं और हम
के बीच झूलते
में रहते हैं अतः
हमको यहाँ सही
से आवश्यकता है
कि हम अपने
भीतर का थोड़ा
थोड़ा रावण
जलाते रहें
वह अपनी
अहमियत को
सही से सब
प्रयास से
पहचानते रहें
और जीवन के
हर पहलू में
हम संयम को
कभी न भूलें
वह याद रखें
संयम की होगी
सदा ही जय
और अहं की
होगी पराजय
हमको हमारे
जीवन में इस
अशांति में शांति
खोजना हो तो
हमको सबसे
पहले अपने
आप को ही
बदलना होगा
वह हम दूसरों
से अपेक्षा छोड़
दोगे तो जीवन
अपने में आधी
अशांति दूर हो
जायेगी बाक़ी
बातों से अगर
हमारा मन
अशांत होता
है तो उसको
हम नियति का
योग मानकर
अपने मन को
तसल्ली दें यही
हमारे लिए काम्य
हैं ।

सादगी व सरलता

सादगी व सरलता
सदा वांछनीय-
हमारे जीवन में सदा
सादगी व सरलता
वांछनीय होती है
महात्मा गांधी हमारे
सामने इसके सही
से साक्षात उदाहरण
हैं उनकी जीवनशैली
सादगी के साथ साथ
सत्य और अहिंसा का
पर्याय है उनका कहना
था कि मेरा धर्म मुझे
सभी से समान प्रेम
करना सिखाता है
कि हमारा जीवन
सभी तरीके से
धार्मिकता से
ओत- प्रोत और
अच्छा आचरण
वाला वह सही
से रचनात्मक हो
महात्मा गांधी के
जीवन का एक
प्रसंग याद आता
हैं कि उनके दर्शन
का व्यवहारिक
पक्ष उनकी अपनी
जीवनशैली से
मिलता है जिसका
अनुसरण करके
हम सादगी का
पाठ ग्रहण कर
सकते है लंदन के
किंग से मिलने गए
तो छोटी धोती
और शाल पहना
हुआ था सीधे
सादे वस्त्र में जो
गरिमा थी वह
दिखावटी और
तड़क भड़क
कपड़ों में नही
बाहरी दृष्टि से
देखे तो गांधीजी
की काया और
रूप रंग में नायकों
जैसे माणक़ नही
थे लेकिन उनके
जीवन तथा कार्यों
का स्तर किसी से
कम ना था ज़हाँ
तक तन की बात
हैं पूज्यप्रवर
आचार्य श्री
महाश्रमण जी
प्रायः प्रायः
अपने प्रवचन में
फ़रमाते हैं की
हमें जो यह
जीवन प्राप्त
हुआ है उसको
टिकाये रखने के
लिए हम खाएं वह
खाने के लिए न
जीयें भोजन भी करें
तो ऐसा जो स्वास्थ्य
व साधना दोनों के
अनुकूल हो हमारा
आनंद भोजन में नहीं
भजन में हो हमारा
भोजन हितकर
मितकर व रिटकर
हो व उसे हम
शांति के साथ
करें वह स्तर
स्तर की अंधाधुँध
दौड़ में जीवन की
हर अंधी चाह
आकाँक्षा के पीछे
ना भाग गँवाओँ
हम अपने जीवन
सरल सादगी पूर्ण
स्वस्थ उत्सव
मनाएं हम देख
सकते हैं कि
साधारणतया
इन्सान चाहता
है जब तक मैं
जिऊँ तो सारे
ठाठ बाट में रहें
मेरे पास वह
गाड़ी घोड़ा और
ब्रांडेड लिबास हो
आलीशान निवास
यह कईयों की
तमन्ना हो भी जाती
है पूरी पर अधिकांश
की तो रह ही जाती
है अधूरी वैसे भी
जब हमको यहाँ
से आयुष्य
पूर्ण होने पर
जाना पड़ता है
इस दुनिया से
मुँह मोड़ कर
तो यहाँ से जाना
पड़ता है सब
कुछ यहीं छोड़
कर अतः हमारे
जीवन में सादगी
व सरलता आदि
सदा वांछनीय हैं ।

रहिये ‘भी’ में : : न कि ‘ही’ में

हम सदैव अपने
जीवन में समता
में रहेंगे तो सही
से हर परिस्थिति
का उचित रूप से
सामना कर लेंगे
क्योंकि हम देख
सकतें है कि
आत्मविश्वास और
अहम् में जरा सा
अन्तर है हमारी
इससे एक भी होने
पर छवि बदल जाती
है दोनों को एक ही
मानने के वहम में
हमारा विश्वास यह
कहता है कि हम
सही से विनम्रतापूर्वक
दृढता से मैं भी कर
सकता हूँ यानी हमारे
इससे अन्य किसी
की भी योग्यता के
प्रति सही से आदर
का भाव झलकता
ही है वह इसके
विपरीत हमारा
केवल मैं ही कर
सकता हूँ की
अकड़ में रहने
वाले के मन से
स्पष्ट रूप से
अहम् का भाव
टपकता ही है
कि केवल और
केवल मैं ही कर
सकता हूँ यह
अन्य कोई नहीं
राम और रावण के
बीच मूल अंतर
संयम और अहं
का ही था वह
असंयम ने उसकी
सोच को दूषित
कर दिया सीता
हरण में उसका
अहं उसकी मति
पर हावी हो गया
राम आराध्य होकर
भी सात्विक रूप
से रहे आराधना में
ही सदैव लीन वह
उन्होंने कभी नहीं
खोया अपना
कैसा भी संयम
अतः हमें अपने जीवन
में सही से अनंत
शक्तिमय और
आनन्दमय स्वरूप को
सही से पहचानना
चाहिए तथा उसके
साथ हमको सही से
आत्मविश्वास और
उल्लास की ज्योति
प्रज्ज्वलित करनी
ही चाहिए क्योंकि
इसी से हमको
वास्तविक सुख
का सही से
साक्षात्कार
संभव है ।

स्वयं को जितना

एक कल्पना से यह
मान लें कि अपने
किसी भी बल से
किसी के द्वारा
सारे संसार को
जीतना है सबसे
आसान काम
लेकिन अपने
आप को जितना
है उतना ही
सबसे कठिन काम
वह चल पड़ता है
जो सही से आगे
शान्तिपथ पर वह
अपने आपको जानता
हैं सही से स्वयं को
जीतना क्योंकि हम
सभी के जीव के जीवन
पर पूर्व संचित संस्कार
व कर्मों के प्रभाव का
असर होता ही है वह
स्वयं का स्वभाव भी
होता हैं हम देख
सकते हैं कि
जीवन में कोई
भी परिस्थितियाँ
किसी कमजोर
नर को ही डराती
है और जहाँ हो
आत्म बल ऊँचा
वहाँ स्वयं वे
हार जाती है
स्वयं की शक्तियों
का जब हमें सही
से अनुमान होता
है तो सफर निज
लक्ष्य के सचमुच
बड़ा आसान होता
है वह शक्तियों के
समंदर से न अब
अनजान रहना है
अगर घर है यह
तुम्हारा ना कभी
महमान रहना है
हमें हमारे पूर्व
भव में किए हुए
सुकर्मो के कारण
ही यह दुर्लभ मानव
जीवन मिला है हम
इसे सही से जियें
और आमोद –
प्रमोद में व्यर्थ न
गँवा दे हम सुख में
अति उत्साहित भी
ना हो एवं दु:ख में
अती हताश भी ना
हो अतः हम हर
कोई परिस्थिति में
सम रहतें हुवें इस
जन्म को सार्थक
करते हुवें अपने
परम् लक्ष्य की
और सही से
आगे अग्रसर
हों स्वयं को
जीत आत्मा का
अन्तिम लक्ष्य
को प्राप्त करें
यही हमारे
लिए काम्य है ।

भावों का सम्प्रेषण

जीवन में सही से
हमारे भावों का
सम्प्रेषण हमको
आगे की राह दिखाता
कहतें है कि मानव
नहीं उसके भाव ही
बिना बोले ही सबको
खींच लेते हैं यह
भावों का ही सही
से सम्प्रेषण है जो
रिश्तों के अहसास
को समेटे बनायें
रखता है वह मन
में प्रचुर उत्साह
भी रखता हैं जों
जीवन में रुक
नहीं सकता
कभी भी कोई
प्रगति का प्रवाह
मानो ऊर्जा का
यह अक्षय स्रोत
अद्भुत उत्साह मन
में उमंग और होता
है नया जोश कुछ
करने का जज्बा
भविष्य के पट
पर कर्तृत्त्व की
लकीरें अंकित
करने की ललक
और होती है
शक्ति रोम रोम
यही जीवन की
सही से होती है
आधार शिला वह
जिस पर सही से
अनुशासन और
संस्कारों के ढांचे
में ढल कर ही
इस उम्र पर
टिकता भावी
आगे का विला
नियमन और
संतुलन की
हो उत्कृष्ट
सही से मिशाल
विवेक संगत
श्रृंखला में बंध
कर भावों के
सम्प्रेषण से
बनाने होंगे
नए नए आगे
सही कीर्तिमान
क्योंकि हमको
करना हैं सुंदर
भविष्य का निर्माण
अनुशासित बन ले
हाथों में हो सही
परिश्रम का सबल
कमान वह रहता
सहायक सदा
भावों का सम्प्रेषण|

जीवन है बिना रुके अविराम

हमारी साँसो की घड़ी
पल पल चलती ही
रहती हैं यह बिना
रुके ही अविराम
जीवन में हमारे
सामने हो सदा ही
कार्य की सतत
प्रवाहित श्रृंखला
वह चलता रहे सदैव
कार्य का अविराम
व अजस्र सिलसिला
हमारे शरीर के साथ
है आत्मा नाम का
अमूल्य तत्व भी
जो कभी जलता
नहीं बल्कि घुला
शाश्वत सत्व भी
है राख बन जाना
ही नहीं है इस
जीवन की कोई
अमूल्य साख प्रदान
करना है इसे एक
अक्षय व अनंत की
शानदार धाक
स्वयं स्फूर्त चेतना
ही अपने गंतव्य
पथ पर अविराम
व गतिमान बनी
रहती है जल की
प्रचंड तेजधार
ही हर बाधा
को चीर कर
अंतिम सांस
तक बहती है
वह जब उद्देश्य
केवल सात्विक
पारमार्थिक
तथा सबजन
हिताय का
होता है तब ही
उस उत्साह की
पवित्र श्रम बूंदे
महोत्सव की
गौरव गाथा
कहती है विनय
से बढ़े हमारा सही
से सतत और
अविराम ज्ञान
वह विनय में
आए नहीं विराम
हमारे संस्कारों की
पौध भी बने प्रखर
फलवान घटे सभी
हमारे हृदय में
व्याप्त अज्ञान
हमारी ज्ञान ध्यान
की यह सम्पदा
बढ़ती जाए रोज
वह हम आत्म साधना
की करें हर पल हर
क्षण सही से खोज
क्योंकि हमारा
जीवन है बिना
रुके अविराम ।

अंतर्द्वंद्व

परिस्थितियों से किसी
के जीवन में भी अंतर्द्वंद्व
की स्थिति आती है तब
क्या करे और हमारा
चंचल मन वैसे भी
अति अल्प विश्राम
करता हैं तो उस समय
विश्राम हमारे चंचल
मन को कहाँ मिल
पाता है वह बहुत
बहुत बार चंचल
मन में नाना नाना
विचारों के सिलसिले
भी चलते ही रहते
हैं बिना रुके अविराम
वह करता है मन
अति अल्प विश्राम
होते हैं हम जब
नींद में तो भी
बहुत बार नाना
नाना विचारों के
यह सिलसिले भी
चलते ही रहते हैं
बिना रुके ही
अविराम वह
जरूरत है पीड़ा से
बाहर निकलने कि
हमारे जीवन की
इस अविराम गति
में बहुत बार किसी
विशेष विषय पर
अंतर्द्वंद्व भी हो जाता
है शुरू मन में वह
मन पड़ जाता है
दुविधा में आ जाता
वह अनिर्णय की सही
से स्थिति में वह सही
गलत यश अपयश हानि
लाभ जैसी बातों का
अंतर्द्वंद्व आदमी को
समय समय पर भी
आंदोलित करते ही
रहते हैं वह कभी
कभी तो जीवन में
अंतर्द्वंद्व की स्थिति
में आदमी टूट भी
जाता हैं और
हतोत्साहित भी
हो जाते हैं क्योंकि
मन व इन्द्रियों से
वशीभूत कोई भी
मानव शान्ति के
लिए करता रहता
है कोई भी कैसा
आचरण वह मन
और इन्द्रियों की
माँग जब तक
होती पूरी तब
तक रहता है
शान्त दुखों के
आने व चाह पूरी
न होने के कारण
बन जाता हैं शैतान
शान्त व शैतान पर
नहीं रह पाता हैं
आत्मा का नियंत्रण
तभी तो स्थायी शान्ति
की खोज में ही चल
पड़ते चरण मन और
इन्द्रियों के वशीभूत
जो नही होता इंसान
वह ठीक इसके विपरीत
बुद्धि से ऊपर उठकर
करता है परमात्मा का
जो भी ध्यान वह कभी
नहीं रहता दुखी व
परेशान क्योंकि
भीतर के अंतर्द्वंद्व
को जानता है सही
से जीतना वह
बुद्धि मन और इन्द्रियों
पर नियंत्रण और
संयम स्थायी शान्ति
पाने का ज़रिया हैं
यह अनुपम अतः
हमारी समझदारी
उस स्थिति में है
ऐसी जो किसी भी
विषय पर दुविधा
की स्थिति आने
पर मन को एक
बार उस विषय से
पुरा सही से एकदम
हटा देना चाहिए
और उसे हमको
मानसिक कायोत्सर्ग
की स्थिति में डाल देना
चाहिए वह हम कुछ
न सोचें उस विषय
को भूल ही जाएँ काफी
समय बाद फिर मन में
उस विषय का शांत मन
में बटन खोलें और शांत
स्थिर आदि दिमाग से
सोचें वह आशा है हमारा
अंतर्द्वंद्व सही से समाप्त
हो जाएगा और समस्या
का कुछ न कुछ हल
सही से निकल ही
जाएगा यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

जागरूकता

जागरूक जहाज मे
हम देख सकते है
कि पानी का प्रवेश
नहीं होता वह इसी
तरह ही हमारे
जागरूक मन के
अंदर आवेश का
कभी भी परिवेश
नहीं होता है अतः
जागरुकता ही होती
है हमारे इस जीवन
का विटाट पाठ हम
अगर जागरूक रहे
तो हमारा अतः स्थल
भी तो नकारात्मकता
के घुसने का आदेश
कभी भी नहीं देता हैं
हमारे जीवन में एक
बात है बहुत खास
जिसके पालन से
सफलता एवं आनंद
रहेंगे सदा हमारे पास
वह छोटी सी बात
है जागरूकता बात
मामूली सी लगती है
पर हो जाए इसका
सही से हमको अभ्यास
तो जीवन की गाड़ी
सदा प्रसन्नता और
सफलता की पटरी
पर ही चलती है
हम त्याग संयम की
सही से चेतना जगाएं
संकल्प शक्ति जगा
मन मजबूत बनायें
हम त्यागें सुविधावादी
शैली और सादगी वह
सरलता को अपनाएं
आवश्यकता और
आकांक्षा का भेद
सही से समझ अपनी
आवश्यकताओं को भी
क्रमशः घटाएं वह
पदार्थ भोग की सीमा
कर अपनी नित
ओजस्विता को बढ़ाएं
हम बढ़ा जीवन में
अपनी जागरूकता को
अनर्थ पाप से बच पाएं
क्रोध मान माया अरु
लोभ आदि उन्हें सही से
पतला बनायें हम
अपने जीवन में
हर काम को सही
से सतर्कता या
सावधानी के तराजू
पर यदि तोल लें
कि यह मेरे लिए
सही है कि नहीं
तो हमसे भूल होगी
ही नहीं और हो
जाए इसका सही
से जागरूकता से
हमारे को अभ्यास
तो हो जाएगा
हमारा यह सफल
सुंदर जीवन का
एक मंत्र खास ।

उजाला

हम देख सकते
हैं कि शक्‍ल से
खूबसूरत लोग
दिल से भी
खूबसूरत हों
ऐसा कभी भी
जरूरी नहीं है
वह आत्‍मा की
सुंदरता पाने के
लिए तो व्यक्ति
में गुणों का होना
जरूरी है सफल
से अधिक जीवन
में हमको योग्य
होना जरूरी है
क्योकि हमारे
जीवन के अनुभव
हमारी आज की
मस्ती में नहीं वह
अतीत के पन्नों
में लिखे होते हैं
वह उजाले से
उजाला नही
मिलता अंधेरे
ही उजाले को
जन्म देते हैं
हम देख सकतें
हैं कि बादलों
का प्रकाश
टिकाऊ नही
होता है वह
सूरज को भी
शाम का एहसास
रहता है हमारे
जीवन के प्राण
वायु तो उसकी
मंथर गति मे ही
रहते हैं आँधियों ने
तो हरदम तबाही
ही मचाई है यही
बात बतानी है कि
दिखने में बुरा होते
हुए भी अगर कोई
गुणवान और
प्रतिभावान हो तो
उसे जीवन में
कामयाब होने से
कोई नहीं रोक
सकता है क्योंकि
जीवन की लंबी
दौड़ में साँझ की
तरह ढलते रूप की
नहीं बल्कि सूरज की
तरह अँधेरे में उजालों
को रोशन करने वाले
गुणों की कद्र होती
है ऐसे कई उदाहरण
हैं जो बाहरी खूबसूरती
के पैमाने में सभी
परिस्थितियों के
अनुसार बदलते
रहतें हैं अतः दुनिया
में भीतर की सही से
खूबसूरती का एक ही
पैमाना है और वह
है आत्मा से पवित्र
और सुंदर होना ।

जीवन में प्रगति

कहते है कि हमको
वृक्ष बनने के लिए
सामर्थ्य हमारा चाहिए
वह बीज के अंत:स्थल
में सारत्व होना चाहिए
यों तो जन्म लेते हैं
धरा पर हम सभी
लेकिन अच्छा होने
के लिए कुछ ख़ास
हमको होना चाहिए
जीवन में चाहिए यदि
तरक्की उन्नति और
विकास तो प्रथमतः
करें हम अनावश्यक
बातों को सही से
नज़रअंदाज़ करने
का प्रयास वह
होना चाहिए हमारे
अन्दर यथावश्यक
स्वस्थ तन और
मन के लिए भी
ना कहने का
साहस प्रगति के
लिए होता है यह
सहायक हम आज
के समय में देखते
हैं कि चाहे अमिर
हो या ग़रीब सभी
के जीवन में
कुछ ना कुछ
अभाव रहता ही
है और जहाँ हमको
अभाव महसूस होगा
वँहा ही तो सही से
आगे बढ़ने का हमारे
द्वारा सकारात्मक
प्रयास से विकास
होगा और उन्नति
भी क्योंकि इंसान
extra प्रयत्न तभी
करेगा जब उसको
जीवन में कोई भी
अभाव महसूस होगा
क्योंकि संतोषी इंसान
को नए की चाहत भी
नहीं होती हैं इसलिए
कहा है कि अगर
जीवन में कोई भी
क्षेत्र में प्रगति करनी
है तो मन में अभाव
खटकना चाहिए वह
तभी जीवन में उस
दिशा में उन्नति करने
की नयी दिशाएँ और
खुलेगी वह इंसान
उस दिशा में सही
सार्थक प्रयास भी
करेगा वह यह आज
भी नई नई खोज
बदस्तूर जारी है
आदमी ने पृथ्वी
लोक के पार चाँद
मंगल व न जाने
कहाँ कहाँ तक पहुंचने
की बाजी मारी है और
भौतिक सुविधाओं के
मामले में मनुष्य हर
दिन बेहतर होता जा
रहा है अनवरत नई
नई खोज कर ही रहा
है क्योंकि वह जानता
है एक आदर्श व्यक्ति
को बदलती दुनिया के
साथ बदलते हुए चलना
होता है पर उचित है
हम मानव अपनी
इस प्रगति की दौड़
में विवेक का सहारा
कभी न छोड़े वह अपनी
विवेक की लगाम को
थामे थामे ही हम इस
तथाकथित प्रगति
के घोड़े को सदैव
दौड़ाए यही हमारे
लिए काम्य हैं ।

प्रतिस्पर्धा

हमारे जीवन में हम
शुरुआत में विधा का
अध्ययन करते है वह
हम में से जो विभिन्न
विधाओं में विशेष रूप
से पारंगतता प्राप्त कर
लेते हैं उसका हम सही
से उपयोग कर विशेष
रूप से तरक्की करते हैं
लेकिन साधारणतया
हम अपने उस विशेष
हुनर को अपने विशिष्ट
ज्ञान को सीने से चिपका
कर रखते हैं ताकि दूसरा
कोई हमारी इस प्रतिस्पर्धा
में आगे न बढ़ जाए वह
हमारी बराबरी न कर ले
इसी जगह बस मानवता
के नाते हम यहीं भूल
करते हैं ऐसे में हम
अपने विशेष ज्ञान
को अपने वह सभी
पारिवारिक जन तक
ही उसको सीमित
रख अंत में यहाँ से
विदा हो जाते हैं इस
तरह हमारा यह
सम्पूर्ण विशिष्ट ज्ञान
हमारे अपनों तक ही
यह सिमटा रह जाता
है मैं समझता हूँ कि
यह एक मानवीय
अपराध है यह हमारा
पावन कर्तव्य है कि
हम अपने विशिष्ट
ज्ञान से हम तो
लाभान्वित हों ही
वह साथ में समाज
को भी हम समृद्ध
करें क्योंकि बाँट
बाँट कर लोगों को
भी आगे बढ़ने के
लिये हम सही से
प्रोत्साहित करें वह
ऐसा करने वालों का
समाज और राष्ट्र भी
समृद्ध होता है हमारी
भूल है कि हमारे ज्ञान
को निजी संपत्ति हम
मान कर चलते हैं
जबकि प्रतिस्पर्धा
प्रगति का एक
ऐसा सुंदर प्रतीक
है इस पर सही से
गौर करके हमारे
द्वारा चलने से
हमारा लक्ष्य बहुत
बनता नजदीक है
प्रतिस्पर्धा हममें एक
नए उत्साह व उमंग
का सृजन करता है
प्रतिस्पर्धा से हर
कार्य की नई नई
सौरभ के स्वर से
आगे की राह
संवरती है और
निखरता है हम
करते रहे आगे भी
निरंतर सही से प्रयास
क्योंकि प्रतिस्पर्धा में
से ही प्राप्त होगा
इस जीवन का
हमको नया विकास
व नया उल्लास
अतः तभी तो कहा
गया हैं कि जीवन
में विकास की राह
में होती ही है हमारे
प्रतिस्पर्धा और होनी
भी चाहिए इससे
मिलती रहती है
प्रगति को गति ।

अँधेरा

हमारे जीवन में अगर
धर्म ही न हो तो हमारा
जीना कैसा यह बिन
बरसात के हैं सावन
भादों के मौसम जैसा
न हरियाली बस शुष्क
नीरस है बेरंग सा
क्योंकि बारिश की
बूँदों की झंकार नहीं
है वह न कोई सुर
संगीत मधुर कहीं
है धर्म है प्राण जीव
के आत्मा जैसा
विहीन उसके हैं
जीवन जंगल जैसा
घना भयावह
संकट और से
भरा नहीं कोई
हैं क़ानून या
सकून बस राज
उसका जो है बलवान
ख़ूँख़ार सा छोटे मोटे
जीवों का दुर्भर हैं
जीना अशांति और
त्राहि त्राहि का छाया
अँधेरा घना ठीक इसी
तरह जीवन में बिना
प्रकाश के रहता ही
है यह सघन अँधेरा
माना कि मृत्यु पर
किसी का भी ज़ोर
नहीं पर साँसे हैं तब
तक शरीर तो हमारा
अपना है वह इसको
चाहूँ जैसे सही से
जीवन पा सकता हों
मौज मस्ती या रोष
रंजिश का या शांति
और प्रेम का अतः
हम यह चुन सकते है
कि मैं हीरा बन हो
बन जाऊँ सही से
कोहिनूर और देह
रहते बन विदेह इस
जन्म में खुले जब
इस तरह हमारे
भीतर के ज्ञान चक्षु
तो समझों उसी दिन
जल गयी बाती हमारी
आत्म रूपी दीप में वह
मिट जाएगा ये छाया
हुआ गहरा सघन
अँधेरा भोग विलास
और क्लेश का अप्रमत्त
हो मैं बन जाऊँगा
देह से विदेह ।

मन

हम जानते हैं कि
जब भी घर में एक
दो दिन झाड़ू नहीं
लगता है तो बिना
आज्ञा ही धूल गर्द
का साम्राज्य आकर
अपना अधिकार जमा
लेता है वैसे ही यदि
कभी कुछ दिनों के
लिए हमको घर बंद
कर जाना पड़े तो आने
पर देखते हैं हम कि
धूल की अच्छी खासी
परत हमारा स्वागत
करने को तत्पर रहती
है ठीक इसी तरह
हम अपने मन के
आँचल में जो सोचते
हैं वही तो सही से
पातें है मन एक
ऐसा हमारा उद्गम
है जिसके आँगन
में अनवरत होता
है विचारों का सही
से सम्प्रेषण हमारा
कार्य है करते रहें
निरन्तर उन विचारों
का गवेषण वांछनीय
उपयोगी चिन्तनों को
अमूल्य धरोहर की
नाईं रखें सुरक्षित
और जो हो व्यर्थ
अनुपयोगी तत्व
जो मन की माटी
पर हर पल गिर
रहे है तृष्णा का
लेकर जल और
घृणा का धुआँ
आदि जों कर
दिए जाएँ वो
अविलम्ब ही
निष्कासित
हमारे मन के
अन्दर भी कुछ
कुछ अवांछनीय
विचारों की गर्द
जमती ही रहती
हैं हमारे द्वारा
से रोजमर्रा के
संकल्पों व
प्रतिक्रमण के
झाड़ु आदि के
द्वारा सही से उसे
परिष्कृत करना
जरूरी होती है वह
सुविचारों को करते
रहें आपस में प्रेषित
सतत इनका उपयोग
है अपेक्षित धरा पर
तभी शांति का सही
से यहाँ साम्राज्य
होगा स्थापित वह मन
हमको अनवरत ही
दिखाता रहेगा सही से
उत्तम जीवन की राह ।

दर्पण

हम अपने जीवन में
जैसा सोचते हैं वैसा
ही हो जाता है हमारा
आगे का आचरण
हमारी सभी वृत्तियां
नीतियां व व्यवहार
ही है हमारे विचारों
के दर्पण अतः हम
शुभ सोचें पवित्र बनें
निर्मलता को विकसायें
संकीर्ण मलिन विचारों
को प्रश्रय न दे व न
आग्रह कोई भी पनपाएं
आचार्य महाप्रज्ञ जी की
है यह वाणी विचार कभी
भी नहीं जाता खाली यह
नही आवश्यक कि तत्काल
हो साकार कोई कोई विचार
लेता शताब्दियों बाद आकार
तुरंत साकार हो जाते कई
विचार हम कुछ भी सोचें
सोचे विवेक के साथ दृढ़
आस्था और निश्चय के
साथ करें अच्छा विचार
उसकी सफलता में नहीं
आ सकता कोई भी
कभी हमारे व्यवधान
अच्छे अच्छे विचारो का
करें संचय सदा अच्छा ही
होगा यह है निश्चय मन
चंचल है आते रहते शुभ
अशुभ विचार शुभ विचारों
का करें संचय उनको दें
बहुमान जब भी आये
अशुभ विचार सोचें
ये विचार मेरे नहीं है
मन में बोले तीन बार
हमारा दर्पण की तरह
सही से व्यक्तित्व ऐसा
बने कि हम उतर जाए
लोगों के दिल में जैसा
हम चाहते हैं वैसा का
वैसा जब तक हैं जिंदा
वह हम यह भी सोचें
दर्पण में तो देखते है
हम नित अपना ही
प्रतिरूप पर क्यूँ
नहीं आत्मा को
दर्पण बना देखे
निज असली रूप।

व्यक्ति नहीं

आदरणीय है व्यक्तित्व
हमारे द्वारा जन्म लेना वह
खाना-पीना जीवन जीना
और एक दिन विदा हो
जाना यह तो कोई चाहे
न चाहे जीवन का क्रम
होना ही होना है इस संसार
में अनगिनत लोग आते
हैं कुछ विशेष होते हैं
जो अपने सुकर्मों से
यह अमूल्य जीवन सही
से सँवार लेते हैं वह
जीवन सफल कर लेते
हैं कुछ ऐसे भी होते
हैं कि जो इसे यों ही
व्यर्थ गँवा देते हैं
और आयुष्य पूर्ण
कर चले जाते हैं
जाने के बाद किसी
को याद ही नहीं
आते हैं यह है हर
आम आदमी की
कहानी यह कैसी
है जिन्दगानी हमारे
जीवन की सार्थकता
तो है तब जब जीवन
हमारे द्वारा सही से
ऐसा जिया जाए कि
जाने के बाद भी लोग
हमको भूल न पाएँ वह
सामाजिकता की सभी
दरोदिवार पर हमारा
नाम अंकित हो जाए
हमारे प्रभावी आकर्षक
Body Language का
तो है यह एक आवश्यक
अंग और हमारी अच्छी रोग
निरोधक क्षमता भी तो है
मुस्कान के संग व्यक्तित्व
स्वतः प्रभावी बन जाता
है व्यक्तित्व की भी होती
है अपनी वाणी जो बिन
बोले ही कह देती है
जीवन की कहानी तो
बनाएं हम दर्पण की
तरह कि उतर जाए
लोगों के दिल में सही
से जैसा हम चाहते हैं
वैसा का वैसा इतना
सब करने के बाद भी
जब तक हैं जिंदा तब
तक लोग कुछ ना कुछ
कमियां तो निकालेंगे
उनकी सुनी अनसुनी
कर जाने दें वह मरने
के बाद जाने कहां से
इतनी अच्छाइयां ढूंढ
लाते हैं लोग और कैसे
पर वे हम तो ना जान
पाएंगे ना सुन पाएंगे
अतः उनसे हमें मतलब
नहीं वैसे इसको मैं
सरल भाषा में कह
सकता हूँ कि व्यक्तित्व
की भी अपनी वाणी होती
है जो कलम या जबान के
इस्तेमाल के बिना भी
लोगों के अंतर्मन को
छू जाती है वह उनके
दिलों में अपनी सही से
पहचान बना लेती हैं
तभी तो कहा है कि
व्यक्ति नहीं उसका
आदरणीय है आचरण
में आने वाला व्यक्तित्व
यही हमारे लिए काम्य
हैं ।

स्वर्ग की मुद्रा (Currency)

प्रायः प्रायः हर मानव
भागता रहता है और
और के पीछे वह
झेलता रहता है कैसी
कैसी परिस्थितयाँ सभी
अपने ऊपर नीचे भूल
जाता है वह नहीं ले
जा सकेगा साथ इस
कमाई की एक भी पाई
मानो फिर भी दिमाग में
सबके चढ़ी होती है एक
धुन कि कोई तो होगा
जो मुझे बता देगा किस
तरह मृत्युपरांत साथ ले
जाया जा सके यह कुछ
तो कमाया हुआ धन ताकि
वहॉं भी मन रहे प्रसन्न इस
बात को लेकर एक तरह
से पागल से हो गयें हैं
हमारे मन की खुराक
अपने ही है विचार वह
जैसा होगा हमारा विचार
वैसा ही होता हैं आचार
कैसा है व्यक्ति वह
बताती उसके विचारों
की सही से उसकी
अभिव्यक्ति जहाँ है
विचारों की मलिनता
वहां है नरक और जहां
विचारों की है ऊंचाई
वही है स्वर्ग वह साफ
सुथरे विचार से ही
बढ़ती आचार की
स्वस्थता और विकृत
विचारों से अतिक्रमित
होती है लिप्त व्यवस्था
परिस्थिति नहीं बनाती
व्यक्ति को सुखी और
दुःखी अच्छे व बुरे विचार
से ही बनता व्यक्ति सुखी
और दुःखी हम जैसा
सोचते हैं वैसा ही हो
जाता हमारा आचरण
हमारी वृत्तियां नीतियां व
व्यवहार ही है हमारे सही
से विचारों के दर्पण अतः
हम सही से शुभ सोचें और
पवित्र बनें वह निर्मलता
आदि को सही से अपने
जीवन में विकसायें संकीर्ण
मलिन विचारों को प्रश्रय
न दे व न आग्रह पनपाएं
हम देखते है कि जब
विदेश जाते हैं तो साथ
में कौन सी Currency
लेकर जाते हैं तो हम
सभी कहेंगे कि उस
देश की मुद्रा जिस
देश में जाते हैं यहाँ
रुपये दे कर बदले
में वह Currency
ले जाते हैं बस यही
तो तरीका है यहाँ
की मुद्रा ले जाने का
स्वर्ग में यानी हम
अपनी मुद्रा को
सही से उसको
Convert कर लें
स्वर्ग की और ले
जाने वाली
Currency में
वह Currency
है पुण्य स्वर्ग जाने
से पहले हम हों
जाए पाप से शून्य
कर कर दान धर्म
विसर्जन आदि से
कमा कमा कर
भरपूर पुण्य जो
समय गँवा दिया
सो तो गँवा दिया
आज से खूब दान
पुण्य धर्म आदि कर
स्वर्ग की Currency
यानी शुभ कर्मों की
Currency की
करें हम कमाई
वही तो है स्वर्ग की
Currency क्योकि
यही तो है स्वर्ग
की Currency जो
मरणोपरान्त साथ जाने
वाला हमारा सही से
असली धन ।

अनिष्ट

हम देखते हैं कि
विशेषतया अकस्मात
प्रसन्नता में त्वरित
वचन व क्रोध में
निर्णायक मन प्रायः
अनिष्टकारक ही
होते हैं अतः हम
अकस्मात हुई
अत्यधिक प्रसन्नता
में कभी वचन नहीं दे
वह मन को संयत होने
दें राजा दशरथ का
कैकेयी को वचन का
साक्षात उदाहरण ले
वह दूसरी तरफ क्रोध
सर्वप्रथम अपना विवेक
खा जाता है आदमी भी
बुद्धिहीन हो जाता है उस
समय का कोई भी निर्णय
बिना सोचे-समझे ही होता
है परिणाम प्रायः प्रायः
अनिष्टकारी ही हो सकता
है हर चीज हर स्थिति वह
परिस्थिति है परिवर्तनशील
पल-पल जो है आज वह
नहीं थी हुबहू कल इसका
साक्षात उदाहरण हैं युग का
परिवर्तन तथा हर जीव-
प्राणी का जीवन आ गए
हैं हम आज युगलिक
युग से एकदम परिवर्तित
युग में आज की भाषा में
तकनीकी युग में अनित्य
के सिद्धांतानुसार यह
परिवर्तन है सदैव सही
से अनवरत चलायमान
इतने सूक्ष्म रूप में कि
नहीं कर सकते बयान
इसका जीवंत उदाहरण
है जीव जाती का चाहे
मनुष्य जाती हो चाहे हो
अन्य प्रजाति का होता
रहता है परिवर्तित वह
दृश्य अदृश्य रूप में
जैसा था कल नहीं है
वह आज हुबहू उस
स्वरूप में शैशव से
होता हुआ परिवर्तित
बढ़ता रहता है वह
समाप्ति की ओर
नहीं रहता है
अकस्मात फिर
एक भोर हमारी
आस्था में हम ऐसे
रम जाएँ जहाँ
असीम आनन्द व
सुख हैं यह एक
ऐसा स्थान है जहाँ
राग – द्वेष चेतना
का जगत इससे
भिन्न हैं यहाँ न कोई
इष्ट हैं न कोई भी
अनिष्ट हैं न कोई
प्रिय हैं न कोई
अप्रिय हैं केवल
असीम आनन्द है |

स्वागत गीत


आचार्य श्री महाश्रमण जी के विक्रम संवत् 2082 अहमदाबाद चातुर्मास प्रवेश पर मेरे भाव

पाँव- पाँव चलने वाले धरती के सूर्य का स्वागत है ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है ।
सब मिल जुलकर मंगल गीत गाकर मन के दीप जलाते है ।
पलक पावड़े बिछाये इंतजार की घड़ी अब आयी है ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है ।
गुरूवर के आगमन से खुशी में झूमे सारे आनन्दमन बरसायें है ।
गुरुवर की सुख सन्निधि पाने का सुन फूले नहीं समायें है ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है।
प्रेक्षा विश्व भारती में समवसरण की छटा अनोखी छायेंगीं ।
चौथे आरे की सी रचना देख मन की कली- कली विकसायेंगी ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है।
23 वर्ष के इंतजार की घड़ी अब समाप्त होगी ।
शक्ति सम्पन्न गण माली से अपने अंश संवारे होगी ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है।
साठ हजार लगभग किलोमीटर की यात्रा कर देश- विदेश को संवारा है ।
सुदीर्घ लम्बी- लम्बी यात्रायें कर गुण- सुयश को खूब- खूब चढ़ाया है ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है।
गुरुवर ने दशों गुरुओं की श्री संपदा को खूब बढ़ाया है ।
नेमानन्दन की गौरव गाथा दिखे उतने फहरायें है ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है।
महाप्रतापी गुरुवर की कृपा संवायी है ।
अहमदाबाद की धरती के कण – कण पुलकायी है ।
अहमदाबाद के सकल समाज ने श्रद्धा थाल संजायी है ।
अहमदाबाद के जन- जन में खुशियाँ छाईं है ।
गुजरात की धरा दूसरा चातुर्मास पाकर हर्षायी है ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है।
पाँव- पाँव चलने वाले धरती के सूर्य का स्वागत है ।
साबरमती के तट पर नेमानन्दन का स्वागत है ! स्वागत है।

स्वागत गीत -2


आचार्य श्री महाश्रमण जी की विदुषी सुशिष्या साध्वी श्री मधुरेखा जी आदि ठाणा- 5 के विक्रम संवत् 2082 बोरावड़ ( मार्बल नगरी ) चातुर्मास प्रवेश पर मेरे भाव

रिमझिम रिमझिम सतिवर की बदली बरसे कर लो सब स्नान ।
पाप पंक धोने का गुरु कृपा से अभी अवसर मिला हैं महान ।
मिलजुल दशौं दिशायें बोरावड़ में आज स्वागत मनावै।
नंदा दीप जले घर-घर में मोत्यां चौक सब पुरावै।
सतिवर के आगमन से कली-कली विकसाई हैं ।
बोरावड़ की धरा का कण – कण हर्षाया हैं ।
उतरी नवयुग री धारा कण-कण में भरे उजारा ।
खुशिया का रंग है न्यारा गुलशन में स्वर्ग बहारा।
चैतन्य की हमारे में लौ जले ,जीवन में प्रकाश फैले ।
मिट जाए एक पल में हमारे सारे विचार मैले ।
लहराए सिन्धु की ज्यों सदभावना का सागर ।
रहने न पाएं कोई श्रद्धा की रिक्त गागर ।
कर्मों के बंधन कट काया बन जाती कुन्दन ।
राग – द्वेष के कण दूर हटते निर्मल होता चेतन ।
आ गई ऋतु अब चातुर्मास की भली ।
गूंजते हैं गीत धर्म के हर गली ।
नई उमंगें नई तरंगे जीवन में पावन बेला लाए।
श्रम सम शम रा पुजारी आत्मा की प्राप्ति करवाए।
सतिवर सिखलाए पेगाम अमर बन जाए।
सपने साकार बना सिद्ध वर हम सब पाए।
रिमझिम रिमझिम सतिवर की बदली बरसे कर लो सब स्नान ।
पाप पंक धोने का गुरु कृपा से अभी अवसर मिला हैं महान ।

प्रकृति के सानिध्य का आनन्द

हम प्रकृति के सानिध्य
का सही से आनन्द
तभी ले सकते है जब
हम प्रकृति के समीप
रह कुछ समय उसको
महसूस करे और
सही से सन्तुलित
जीवन जियें हम में
से क्या कितनों को
याद है कि हमने
कब लिया था वहाँ
नंगे पॉंव चलने का
सही से सुख पिछली
बार जूते उतार ? वह
क्या हमको याद है
कि हमने कब सही
से समंदर के किनारे
रेत पर आगे बढ़ती
मचलती लहर पर
पैर रखते हुए लिया
था चलने का आनंद
और कहा था अहा !
अहा! वह क्या हमको
याद है कि हमने कब
पार्क में बैठ कर बैंच
पर आस-पास चीं चीं
करती फुदकती उड़ती
चिड़ियों आदि को सही
से देख-देख वह सुन-
सुन हो गए थे एकदम
मंत्रमुग्ध और करने
लगे थे स्वयं भी साथ
में भाव विभोर होकर
के गुन -गुन क्या
हमको याद है कि
हम कब गुजरे थे
किसी जंगल से
और बहती सरिता
के ठंडे पानी को
छू छू कर हाथों
से हुए थे सही
से आनन्दित
प्रकृति हमारे
आस पास ही
है वह हमको
हर पल पर सही
से अलग अलग
रूपों में करती रहती
है एक ही अलग
सुखकारी मन
भावन आनन्द की
बहार पर हम अपने
गोरखधंधों से ही
कभी नहीं निकलते
बाहर तो उसको सही
से हम कैसे महसूस
करेंगे इसी स्थिति के
लिए तो कहा गया
है कि सकल पदार्थ है
जग माहीं पर कर्महीन
नर पावत नाहीं।

विधि का विधान

शास्त्रों का कथन
है जब भीतर में
सन्तोष है वही
आदमी का परम
सुख है समृद्ध होने
लिए भाग-दौड़
नही शान्तिपूर्वक
जो मिल जाए मान
लें वही है सही न
हो चाह धन का
अंबार लगाने की
न हो इच्छा
धनपतियों की
सूची में नाम
लिखाने की अतः
सदा आनंदपूर्वक
करें मुस्कुराते
हुए काम बस
यही है सुखी
होने की राह
सुख का मुकाम
हमारे जीवन में एक
चीज जो रोज घटती
उसकी तरफ हमारा
सही से ध्यान ही नहीं
जाता है वह है आयु
और इसी तरह एक
चीज जो हम देखते
है वह रोज बढ़ती
रहती है वह है
हमारी तृष्णा की
दूषित वायु इस
बीच हमारे जीवन
को जो करता है
रोज नियंत्रित वह
है हमारे कर्मों का
विधान जिसे हम
अज्ञानी होकर
टालते रहते हैं
अपने स्वार्थ से
कह कर कि
विधि का विधान
पर जैसा कि यह
ऊपर कहा गया
हम इन तीनों ही
बातों को सही से
प्रायः गंभीरता से
नहीं लेते इसीलिए
तो हमारे मनुष्य
जीवन को जैसा
चलाना चाहिए वैसा
चलाने की चेष्टा
हम बिल्कुल ही
सही से नहीं करते
हैं अन्यथा हमारे
जीवन में यदि सही
से घटती उम्र वह
बढ़ती तृष्णा व
कर्मों के विधान
आदि की हमारे
गंभीर चेतावनी लेने
की प्रवृति होती
तो हमें निश्चित
ही दूसरी तरह से
जीवन जीने की
प्रेरणा देती हैं
सुखी बनने का
सबसे बड़ा सूत्र
है संयम जिस
व्यक्ति का नहीं
होता अपनी
वृत्तियों पर सही
से नियंत्रण उसका
अपनी इच्छाओं पर
होता विनियंत्रण
योग्यता होती कम
महत्त्वाकांक्षा बड़ी
प्रमाद का जीवन
नहीं कर सकता
सदा मेहनत कड़ी
उसे कोई नहीं बना
सकता सुखी सुख व
प्रसन्नता का सरल
नियम है न अपेक्षा
और न ही उपेक्षा
सुखी बनने का
सबसे अच्छा सूत्र
है स्वावलंबन वह
परावलम्बी कभी
शांत और सुखी
नहीं बन सकता
अतः न रखे हम
कोई अपेक्षा
संयममय अप्रमादी
स्वावलंबी जीवन
जीना सीखें हम
अपने आप को
प्रसन्न व सुखी
आलेखें ।

तीन छोटी-छोटी बात : ध्रुव-1


तीन छोटी-छोटी बात आओ हम उनसे मुलाकात करें। हमारे द्वारा समय-काल की प्रतीक्षा में समय बर्बाद तो होता ही है। वह उनके लिए सही समय है जब हम अन्तर का अपना सकारात्मक नाद सुनते हैं।

वह ऐसे लोगों का विश्वास है कि शुरू कर दीजिए हम जब भी तैयार हों। वह उसके बिना नाना तरह के शंका और भय यदि करते रहेंगे और शुभ मुहूर्त का इंतजार बढ़ते रहेगा और कुछ भी नहीं कर पायेंगे । हम देखते हैं कि पश्चिमी राष्ट्रों में न कल था और न है आज इसका रिवाज कहॉं है ।

वह उनका विश्वास है कि एक बार शुरू करने से रास्ता अपने आप साफ हो जाता है। वह समय अपने आप ही शुभ हो जाता है। अतः हम स्वयं ही सही से अपना निर्णय कर लें कि कौनसी विधि अपनाएँ और मूल बात है काम में निर्बाध आगे बढ़ पाएँ ।वह हम चौदह सौ चालीस मिनट एक दिन-रात में होते हैं।

इनमें से अधिकतर को बेकार की बातों या कामों में यों ही नहीं खोयें । वह हम सदैव थोड़ा विवेक रखकर इनमें से कुछ अपने अन्तर के लिए उपयोग में ला सकते हैं ।

हमने तन धोया मन मलिन रहा और मन की मलिनता हेतु कषायों की सफ़ाई बेहद ज़रूरी है ।वह उन पर हमारा ध्यान के नियंत्रण का अंकुश और एकाग्रता के संकल्पों की झाड़ पोंछ हमेशा होनी चाहिए
क्रमशः आगे ।

तीन छोटी-छोटी बात : ध्रुव- 2

ताकि हमारा मन चंगा होगा तो कटौती में गंगा उतर आएगी ।हमारे मन का जब कचरा दूर हो जाता है तो अंतर का आनंद भरपूर आता है । हम देखते है कि बाहरी कचरा जितना नुकसान नहीं करता उतना नुकसान अंदर का कचरा करता है ।

वह अंदर का कचरा दूर होने से ही हमारे जीवन का आंतरिक ढांचा संवरता है । वह जहां सफाई का अभियान चलता रहता है तो इस जीवन का सदा मान बढ़ता है । हम किसी को बुरा-भला कहने से पहले बस ! खुद को अच्छा बना लें तो निश्चित ही दुनिया से एक बुरा इन्सान कम हो जाएगा ।

वह किसी को भी हम बुरा-भला कहने से पहले जरा यह भी सोचें ! कि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो बोल भी नहीं सकते हैं । हम सौभाग्यशाली है कि बोल तो सकते हैं तो उस वाक् शक्ति का दुरूपयोग क्यों करें।

अतः हम सं विषम हर परिस्थिति में सं रहतें हुवें अपनी इन्द्रियों कों अपने वश में करतें हुवें, हम भौतिकता सें सही आध्यात्मिक की और अग्रसर होतें हुवें, अपनी आत्मा कों उज्जवल करतें हुवें हम अपने परम् लक्ष्य की और अग्रसर हों। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

कमाल का ताना

हम से प्रायः प्रायः
यही कहते हैं कि
इतना भगवान का
कर रहा हूँ तो मुझे
सुख या वो वो नहीं
प्राप्त हो रहा है एक
बार इसी तरह किसी
भक्त ने भगवान को
जब यह पूछा उसने
इतने वर्षों से मैं आ
रहा हूँ और आपकी में
हर तरीके से जैसे
हों वैसे मैं स्तुति कर
रहा हूँ फिर भी मेरे
मन में संतुष्टि को
महसूस नहीं कर
पा रहा हूँ क्या
करूँ ? तो मिला
इसका भगवान से
उत्तर कि यहाँ पर
अकेले ही आते
हो तो वो बोला
मैं क्या कोई भी
हो वो अकेले ही
आयेगा तो भगवान
बोले हाँ कोई भी
हों वो अकेले ही
तो आयेगा लेकिन
वो अपने साथ में
मन को भी लाते है
लेकिन तुम मन को
कभी साथ नहीं लाते
हो यह सुनकर वह
एकदम से स्तब्ध हो गया ।

संवेदना कैसे जगायें

हम मानव प्रायः
दुःखी को वाणी
प्रदान कर करुणा
संवेदना के हिमायती
रहे है वह आज
जिसके मन में
संवेदना है और
करुणा के भाव है
उसकी नौली में
निन्यानबे रुपये हैं
और उसके विपरीत
जो हर तरह से
सम्पन्न है पर
कृपण वह
करुणाहीन
आदि है तो
उसकी नौली
में एक रूपैया
है और बाक़ी
निन्नयानबे हैं
इंसान संवेदना
का जीता
जागता प्रतीक
हैं और हम मानव
प्राणी मात्र के प्रति
दया एवं करुणा
का भाव रखते है
संवेदना है मानव
का मूल स्वभाव
अनुकंपा का रखे
जो भाव स्व-पर
सब पर होता है
इसका सही से
सकारात्मक प्रभाव
वत्सल भाव समर्पण
भाव सेवा भाव और
सहयोग भाव आदि
इन सबका न हो
ज़िन्दगी में कहीं
भी अभाव गुरुओं
ने कहा है कि
उदारता से ही
खुलता प्रभुता
का द्वार है वह
करुणादया के
भाव हैं जिनके
मन में उन्हें ही
महान कहलाने
का अधिकार है
पराई पीड़ को हर
के मन को संतुष्ट
करने की राह
दिखाता यह
विश्वप्रसिद्ध है
की हम एक चींटी
को भी नही मारते
केवल और केवल
उस जीवन देने
वाले के अलावा
किसी को कोई
भी अधिकार
नही किसी भी
निरपराध प्राणी
की हत्या करे
या उसे किसी भी
तरह से कोई दुःख
पहुँचाये संवेदना
जब तक है दिल
में हमारे तभी
तक है मानवता
वह जहाँ पर
अपनों के प्रति
जिसका उतार जाता
चोला संवेदना का
वो तो रहता है
ठूंठ की तरह खड़ा ।

दृढ़ संकल्प

हम देखते है कि
आवाज ही नहीं
व्यवहार भी सौम्य,
सरल , सादा आदि
होगा जिसका वही
होगा सबका चहेता
अतः उजलापन हो
हमारे चारित्र में
वह आकर्षण हो
आभामंडल में आंखों
में हों शर्म वाणी हो
नरम दिल में हो
करुणा मन में
हो सेवा भावना
उसी व्यक्ति की
होती सबको चाहना
वही व्यक्ति होता
है सुंदर सबको
लगता मनभावना
शास्त्रोक्त है कि
मनुष्य योनि ही
है मोक्ष का द्वार
एकमात्र साधन
मोक्ष जाने का
आधार अतः हमारे
द्वारा आवश्यक है
कि हो संसारिक
मोह से पूर्ण सही
से विरक्ति दृढ़
संकल्प एक ही
भक्ति और
कठोरता साधना
फिर भी बहुत
लंबा और कठिन
है यह रास्ता
नापना युग –
युगांतर ही नहीं
जन्म जन्मांतर
लगते हैं तब
कहीं पूर्व जन्मों
के कर्म कटते
हैं इसीलिए लोग
इस राह चलने
की हिम्मत नहीं
करते हैं वह
पारिवारिक
सामाजिक
कर्तव्य आदि भी
निभातें हैं हम
संसार में आए
हैं तो ये सब
भी करने हैं
अत: आम
आदमी के लिए
यही संभव है
कि यह सब
करते हुए निज
के प्रति हम
जिम्मेदारी न
भूलें वह हर
दिन हर पल
जितना हो सके
अपने साथ रहे
अपने साथ खुले
अगर इसमें मन
रमने लगा तो
रास्ता स्वयं आगे
का खुलता जाएगा
मोक्ष-द्वार तो
अकल्पनीय है
पर जीवन सही
राह पर सदैव
आगे चलता जाएगा।

जीवन का कड़वा सच

सोने की परत चढ़ा
पीतल खूब बिक
रहा बाजार में वह
सत्य को सिरहाने
रखना झूठ पर
क्यों करें विश्वास
अरे ! कैसे जी लेते
है लोग ऐसा झूठ
का जीवन मुझसे
तो दिखावे की
ज़िंदगी जी नही जाती
माना कि हम भी
वही होते हैं रिश्ते भी
वही होते हैं और रास्ते
भी वही होते हैं बदलता
है तो बस ! समय
एहसास और नज़रिया
कमियाँ हर किसी की
नज़र अन्दाज़ कर देता
हूँ पर झूठ-मूठ की
वाहवाही मुझसे ना
की जाती-ना सही
जाती भले ही सत्य का
मार्ग लम्बा हैं पर दिल
में ख़ुशी तो हैं मन में
कोई चोर तो नही
बाबा भिक्षु की
जीवनी याद आती हैं
सत्य सिराणे रखने
वालों त्यागी सब
सुविधावां आदमी
खूब श्रम कर
कमाता है धन वह
बनवाता है अपने
लिए आलीशान घर
रखता है कई कीमती
क़ीमती कार अनेक
नौकर-चाकर थमती
नहीं उसकी लालसा
करते हुए और ऊँचा
और ऊँचा तमन्नाओं
का सफर पर इन
सबके होते हुए भी
जब जाना पड़ता है
यह संसार छोड़कर
तो करना पड़ता है
उसे बाँस से बनी
अर्थी पर ही
अंतिम सफर।

बेटीयाँ

आज के समय
में बेटे- बेटी है
दोनों एक समान
हैं वह हमारी ज़िन्दगी
में बहुत अहम हिस्सा
भी बेटियॉं होती हैं
हमारे लक्ष्यों, सपनों
आदि को सही से
साकार करने में
सही भूमिका निभाती
हैं बेटियॉं वह सभी
तरह की भावनाओं
संवेदनाओं आदि को
सही से सम्हाल आगे
प्यार अपनापन से बढ़ा
ईंट, सीमेंट आदि से
बनी इमारत को घर
बना देती हैं बेटियॉं
क्योंकि अपनी दक्षता
क्षमता आदि से वह
रिश्तों का मर्म अच्छे
समझती हैं बेटियॉं
वह अपने गुणों से
दूसरे घर ससुराल
जाकर गैरों को भी
अपना बना लेती हैं
बेटियॉं वह जाने
अनजाने कभी भी
वह किसी को दुख
नहीं देतीं है बेटियाँ
क्योंकि मॉं सास
आदि की सबसे
अच्छी कोई भी
सहेली है तो
वह बेटियॉं है
क्योंकि वह अपनी
जिम्मेदारी सदा सही
से निभाती हैं और
कभी भी घबराकर
पीछे नहीं हटती है
बेटियॉं वह कठिन
रास्ते पर चलने को
तत्पर रह पुरुषों से
भी आगे बढ़ काम
सही से करके वह
अपनी दक्षता का
सजीव चित्रण रखती
है तो वह है प्यारी
दुलारी सहज सरल
ममतामयी बेटियॉं ।

बेटे

परिवार, कुल, वंश
आदि की वृद्धि में
सही से सम्भागी
बनते है बेटे शिक्षा
में भी सही से अच्छी
गुणवत्ता को सीख
अपने जीवन की
सही सुगम सुदृढ़
राह बनाने को
सम्भागी बनते
है बेटे पिता के
कन्धे का भार
उठाने को पता
ही नहीं चलता है
और वह उठा
मजबूती से खड़े
हो जाते है बेटे
वह किसी के भाव
को जोड़ आगे बढ़ते
रहते है वो है बेटे वह
परिवार में सभी बड़ो
का सम्मान रखते है
बेटे विनय और
वात्सल्य आदि का
अनुपान हैं बेटे
व्यवस्था या
व्यवसाय आदि
के हिसाब से
मजबूती देते है
बेटे वह मन में
अपनत्त्व भरपूर
है बेटे हमारी
आन बान और
पहचान है बेटे
सबसे बड़ी
समृद्धि है
परिवार बाद
में बाकी है
व्यवहार का
रखते ध्यान
है बेटे ।

जब आए संतोष धन : खण्ड-1

हम सब खाली हाथ आए हैं । वह सब खाली हाथ जाएंगे और कोई कुछ लेकर नहीं जाता बस ! इतनी सी बात को सही से पूरी जिंदगी सही से हम समझ नहीं पाते हैं ।

हम देख सकते है कि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो बोल भी नहीं सकते है । हम सौभाग्यशाली है कि बोल तो सकते हैं तो उस वाक् शक्ति का दुरूपयोग क्यों करें। हम अपने खाने के बारे में मीन-मेष निकलने से पहले एक क्षण ठहरें और सोच लें जरा कि दुनिया में ऐसे भी गरीब हैं जिन्हें दो जून का खाना भी नसीब नहीं हैं ।

हम अपनी जिंदगी के बारे में असंतोष प्रकट करने से पहले जरा चिन्तन कर लें कि दुनिया में ऐसे भी लोग थे जो हमारी आज की उम्र से पहले ही स्वर्ग सिधार गए। वह गाड़ी चलाते-चलाते गंतव्य की दूरी के बारे में शिकायत करने से पहले हम जरा सोचें कि बहुतों के पास इतनी दूर जाने के लिए गाड़ी ही नहीं है।

वह आपके पास गाड़ी तो है। हम किसी में कोई दोष निकालने से पहले जरा सोच लें कि क्या हम पूर्ण रूप से दूध के धोए हुए हैं? वह हमारे अन्दर कोई भी खोट या कोई भी दोष आदि नहीं है।

वह सार में यही कह सकते हैं कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमें यह जिंदगी मिली है और मनुष्य योनि मिली है। हम इसे संतोषपूर्वक बिना किसी शिकवो-शिकायत वह किसी भी प्रकार के दोष आदि निकालने के बिना सही से जिएँ।
क्रमशः आगे ।

जब आए संतोष धन : खण्ड-2

हम जीवन में हर स्थिति, हर परिस्थिति आदि जो भी आए, जब भी आए उसे प्रसन्न मन से स्वीकार करें । यह आज के समय में सबसे बड़ा रोग कि लोग क्या कहेंगे । वह इस रोग को अपने पर हमको हावी नही होने देना है क्योंकि लोगो का नजरिया तो एक औसत तक का है।

हमे तो अपना कार्य यही सोच के करना है कि हम जो भी कर रहे है सर्वश्रेष्ठ कर रहे है और परफेक्ट ही होगा भले ही वह परफेक्ट न हो । हम कितने लोगों से प्रेरणा लेते है,कितने ही लोगो से प्रेरित आदि – आदि भी होते है । हम मन में एक संतोष बनाये रखे जो किया अच्छा ही किया ।

वह हताश न हो और प्रयास जारी रखना चाहिए क्योंकि कभी तो पूर्ण बनेंगे ही। वह सुखी होने के लिए कोई त्याग करने की जरूरत नहीं है । वह जो मिल जाए उसी में खुश होने की जरूरत है।

वह यही तो आंतरिक समृद्धि का प्रतीक हैं । वह इससे बढ़कर और कोई सुख की लीक नहीं है । वह इसी तर्ज पर संत तुलसी दास जी ने सटीक कहा हैं कि गौ धन, गज धन, बाजी धन और रतन धन खान पर जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरी समान ।

समय

यह अनमोल जीवन
पाया हमने है
क्योंकि पूर्व जन्मों
के सद्कर्मों ने
अपना रंग दिखाया
है अब कैसे जीना
है इसे यह है हमारे
ही हाथों में और
इसके लिए इस
जन्म में हमारा
व्यवहार ही है
जिम्मेवार वह
नाना प्रतिकूल
परिस्थितियाँ
बहुधा हमारे
जीवन में आती
ही रहती हैं उन
सबसे सर्वथा जीवन
को बचाया तो नहीं
जा सकता है पर
सूझ-बूझ एवं सही
संयतभाव से प्रभाव
को कम अवश्य किया
जा सकता है वह
प्रतिकूलताएँ तो
जीवन में अपरिहार्य
हैं इनसे युक्तिपूर्वक
निपटना भी अनिवार्य
है इन से डरने की नहीं
तितिक्षा की जरूरत है
कोई भी परिस्थिति
स्थायी नहीं होती यह
समझ ही सहनशीलता
का मूल मंत्र है क्योंकि
समय है सबसे मूल्यवान
वह गया समय फिर नहीं
आता है तथा समय हमारे
पास हमेशा सीमित ही
होता है और तो और
हमारे जीवन की भी
एक सीमा है यद्यपि
कोई नहीं जानता वह
कितनी है इसलिए यह
हर पल जो समय
बीत रहा है वह
समय नहीं अपितु
हमारा जीवन रीत
रहा है अतः हम
समय को पूरे होश-
हवाश व सावधानी से
से करें खर्च दुरुपयोग
से बचें क्योंकि खोया
हुआ समय कभी भी
फिर नहीं मिलेगा चाहे
कितना ही कर लें रिसर्च।

मार्मिक

किसी ने एक दिन
बड़ा मार्मिक बोला
कि बहुत से लोग
नगर निगम का
कचरा ढोने वाले
ट्रक होते हैं वह
अपना बहुत सारा
कचरा दिमाग में
भरे हुए चलते हैं
वह क्रोध घृणा
चिन्ता निराशा
आदि – आदि को
ठसाठस अपने
दिमाग में पूरा
भर लेते हैं
वे अपना बोझ
हल्का करने के लिए
दूसरों पर इसे फेंकने
का मौका ढूँढ़ लेते हैं
पर ऐसे कचरे को कभी
भी मैं अपने ऊपर नहीं
लेता हूँ मैं इनके कचरे
से बच कर ही सदैव
चलता हूँ बल्कि हँस
कर अलविदा उनको
कह देता हूँ अन्यथा
मैं भी वही कचरे वाला
ट्रक बन जाऊँगा और
हर किसी से झगड़ा
करने लगूँगा वह बोला
आगे कि मैं समझता हूँ
मानसिक रोगी केवल
अस्पताल में ही नहीं
रहते बल्कि वह तो
कुछ हमारे आस-
पास भी घूमते रहते
हैं उनकी यह बात
सुन कर ऐसी सटीक
सकारात्मक बात कि
मैंने मन ही मन उसे
प्रणाम किया और पूरा
नहीं तो कुछ तो इसका
सही से अनुसरण करने
का प्रण लिया क्योंकि
मृत्यु जीवन का एक
अटल सत्य है इसका
चिंतन हमें यह सिखाता
है कि हमारा समय
सीमित है और हर पल
अमूल्य है यह हमें प्रेरित
करता है कि हम अपने
मन से क्रोध अहंकार
और लोभ जैसे विकारों
को दूर रखें और नैतिकता
के पथ पर चलें थोड़े से
जीवन के लिए गलत
रास्तों पर चलने का
कोई औचित्य नहीं है
यही हमारे लिए काम्य हैं ।

क्रोध

विडंबना कहें या
कहें हम इसको
एक वहम कि
जो होता है
मिथ्याभाषी
और करता
है क्रोध व
अहम पीता
है स्वयं ही
धीमा ज़हर
ढाता है
खुद पर ही
कहर ऐसे
अलग के
शोले है क्रोध
जो जिसके
मन में उभरे
तन वह मन
उसके दोनों
जला डाले है
उसी तरह असर
पर-बुराई का
सोचेंगे हम जितना
दूजे का बुरा तो
समझो उतना ही
जहर हमारे निज
के अन्दर भरा
अतः रखें सदा
हम विवेक पूरा
हम यह न भूलें
कि क्रोध की
आग घर वही
जलाती है
जिसमें आग
लगती है और
हम याद रखें
कि तन बदन
ही है हमारी
आत्मा का घर
वह है सुरक्षित
तभी तक जब
तक इसे है
सही से बुरे
कर्मों का डर
वह पानी को
कितना भी हम
गर्म कर लें पर
वह थोड़ी देर
बाद अपने मूल
स्वभाव में आकर
शीतल हो जाता
है इसी प्रकार
हम कितने भी
क्रोध में भय
में अशांति में
रह लें तो थोड़ी
देर बाद बोध
में निर्भयता में
और प्रसन्नता
में हमें आना
ही होगा क्योंकि
यही हमारा मूल
स्वभाव है कुछ
बोलने और
तोड़ने में केवल
एक पल लगता
है जबकि बनाने
और मनाने में
पूरा जीवन भी
लग जाता है
प्रेम सदा माफ़ी
माँगना पसंद
करता है और
क्रोध व अहंकार
आदि में रत सदा
माफ़ी सुनना
पसंद करता है ।

अग्नि

सोच का प्रभाव
होता है हमारे
मन पर वह
मन का फिर
होता तन पर
और तन-मन
दोनों का होता
है प्रभाव हमारे
सारे जीवन पर
जिन लोगों के
साथ हम रहते हैं
उठते- बैठेते हैं
समय बिताते हैं
उनकी सोच वह
उनके विचार
उनके चाल-चलन
आदि हमें यह
प्रभावित करते ही
करते हैं अच्छे व
विद्वान लोगों की
संगत हमें ऊँचाई
की राह दिखाएगी
इसके विपरीत
बुरे लोगों की संगत
हमें गर्त में गिराएगी
क्योंकि अग्नि वही
होती है जो चिता
को भी जला दे
और किसी में
लगाने पर उसको
भी जला दे निर्णय
इसका अब हमको
ही करना हैं जीवन
में धक्के तो हमको
लगते ही रहते हैं
लगते ही रहेंगे
किन्तु शांत व्यक्ति
कभी नहीं उफनेंगे
पर जिनके मन
में क्रोध ईर्ष्या
बेसब्री नफरत
कड़वाहट आदि
भरे होंगे तो उनमें से
ये ही सब तो छलकेंगे।।

अंक

अंक शब्द के
हिंदी में कई
अर्थ होते हैं
इसका मुख्य
अर्थों में संख्या
चिह्न गोद और
नाटक आदि
का एक भाग
आदि शामिल हैं
किसी भी कार्य
की सही से
जन्म स्थली
हमारे मन की
कल्पना ही होती
है जो हमारे मन में
ना जाने कितनी
कल्पनायें बनती
है और ख़त्म
होती है वह उन्हीं
में से एक़ाद
कल्पना मन में
स्थिर होती है
और फिर उसके
ऊपर चलता
है चिंतन-मंथन
कौनसा ज्ञान है
जो अंकों में
समाया नहीं है?
कौनसी विधा हैं
जो अंकों में
समायी हुई
नहीं है ?
कौनसा भाग्य
है जो अंकों
में समाया हुआ
नहीं है ? आदि
आदि कोई
अंतर्दृष्टा ही
होगा जिसने
अंको का विकास
किया है ।

अंगारा

जीवन वही जो
हमको प्रेरित करें
वह जिसके अपने
आदर्श हो और जो
बीते कल से आने
वाले कल को और
बेहतर बना कर जीने
के लिए प्रतिबद्ध हो
जो एक एक सांस
धुओं के छल्ले बन
कर नहीं अंगारा होकर
जिया जाए जीवन कुछ
भी न हो और किरदार
में आग ही आग हों
बस यही तो है मेरी
पहचान की बात कि
मेरा किरदार हो सही
से इतना गूढ़ कि लोग
समझें हाँ यह है
मनुष्य का रूप
ना किसी से हमने
सीखा न कोई हमने
दिखावा किया हम
संस्कार को अपनाए
और जीवन को
सही से जियें
आज मन व्यथित है
हल्की सी टीस है
कि मानव जीवन की
राह सही नहीं चल
रही है वह जीवन
पूज्य है वह जीवन
वंदनीय स्मरणीय
श्लाघनीय है उस
जीवन का इतिहास है
उस इतिहास का एक
एक अध्याय हर एक
पन्ना अनगिनत अंधेरों
में सांस ले रही जिंदगी
को उजालों का गर्व
सिखाता है वह अगर
मुसीबत को हमने
खुलकर ललकारा
बन जायेगा सही
से सुनियोजित
जीवन क्रम सारा
करो नियंत्रित ना भभके
हमारे मन का अंगारा
बन जायेगा सुनियोजित
हमारा जीवन क्रम सारा ।

आत्म-निरीक्षण है : आत्म-परिष्करण


हमारी आत्मा के साथ मन का बहुत ही गहरा रिश्ता है। वह आत्मा पर अच्छे-बुरे कृतकर्मों का सख्त पहरा है जो हमको प्रतिबिंबित हो रहा है जीवन दर्पण मे हर पल वो किसी दूसरे का नहीं हमारा ही अपना चेहरा है। हमारे द्वारा अपने कर्म अनुसार जन्म लेते ही धड़कनों की टिक टिक शुरू हो जाती है ।

वह जितना आयुष्य उतनी ही श्वासों की टिक टिक करते है। वह हमारा एक – एक कर श्वास कम होता जाता है । वह हमारा मृत्यु की तरफ चरणन्यास शुरू हो जाता है पर हम कब वे धड़कने सुन पाते हैं। हम संसार के मोह जाल में फंस आनंद मानते हैं। वह राग -द्वेष के बंधन में जकड़े रहते हैं।

कहते हैं कि सौ सुनार के वार धीरे धीरे लगते हैं पर जिस दिन लौहार का वार पड़ता है। वह हमारी श्वासों का खजाना खूट जाता है। वह हम इह भव पूर्ण कर नया जन्म पाता है। यही सिलसिला निरन्तर आत्मा का चलता है जब तक मोह कर्म का साथ रहता है।

अतः हम दिन के अंत में कुछ समय स्वयं से मिलें और दिन भर की चर्या का अपनी हुई भूलों का पुनरावर्तन , अंतरावलोकन आदि करें । वह आगे गलती न हो इसका निश्चय करना है । इस तरह यों आत्म-निरीक्षण हमारी आत्मा को परिष्कृत करता है ।

वह इस तरह हमार दैनिक शनै:-शनै: यह क्रिया जीवन को अलंकृत करती रहती है । हमारे द्वारा जिज्ञासा व पिपासा आदि के अभाव में ज्ञान का दुर्लभ खजाना हमें कहां मिल पाता है । अतः जानने की उत्सुकता के बिना कोई भी मानव ज्ञान शून्यता में ही भटकता रह जाता है ।

हमें इस विज्ञान की दुनियां में पहले ज्ञान व उसके बाद विज्ञान मिले क्योंकि इससे हमें जीवन के हर रहस्य की सही – सही पहचान मिलती हैं । वह हमारे जीवन में आत्मपोम्य की चेतना जिस क्षण जग जाती है । हमारी जिंदगी की दिशा उसी क्षण को बदल जाती है ।

वह जब ऋजुता का अंकुर प्रस्फुटित होता है तो हमको सारी दुनियां प्रेम से सारोबार नजर आती है । इस तरह यों आत्म-निरीक्षण आत्मा को परिष्कृत करता है । यह दैनिक क्रिया शनै:-शनै: जीवन को अलंकृत करती है । अतः हम समझें ! यह हमारे रोज की आदत होनी चाहिए । वह आत्म-निरीक्षण आत्म-परिष्करण जीवन का अलंकरण है ।

गुरु पूर्णिमा व 266 वाँ तेरापंथ स्थापना दिवस


तेरापंथ स्थापना दिवस की घड़ी सूखकार ।
भैक्षव नन्दन वन गण – गुलजार ।
चिहुँ दिशी छायीं खुशहाली हैं ।
सर्वत्र छायीं आनन्द की घड़ी हैं ।
नई सभ्यता एक और हैं ।
नयें प्रश्न हैं नया दौर हैं ।
हैं सदैव आधार स्वामीजी का ,
नयें मूल्य हम विकसाएं ।
श्रद्धा का यह सुंदर पथ हैं ।
अवितथ इसका इति अथ हैं ।
लक्ष्योंन्मुख हम बढ़ते जाएं ।
अश्लथ प्रणों का रथ हैं ।
ध्यान – साधना के प्रयोग हों ।
ज्ञान – तपस्या का सुयोग हों ।
हों उपयोग संघ के हित में ,
प्रकटे नित नई विधाएं ।
ज्ञान – दीप कर में लेकर ,
तम – सागर के पार उतरें ।
अब अपने अन्तर – मन को ।
गहरे पानी के पैठ जगाएं ।
तेरापंथ संघ हैं परम उपकारी ।
हम सबके है इसके आभारी ।
जयकरी जीवन – रण में ,
भैक्षव – शासन की महिमा अपार ।
तेरापंथ स्थापना दिवस की घड़ी सूखकार ।
भैक्षव नन्दन वन गण – गुलजार ।
चिहुँ दिशी छायीं खुशहाली हैं ।
सर्वत्र छायीं आनन्द की घड़ी हैं ।

आचार्य श्री भिक्षु का 300 वाँ जन्म दिवस एवं 268 वाँ बोधि दिवस – भाग-1

तेरापन्थ के आद्यप्रवर्तक क्रांतिकारी आचार्य श्री भिक्षु को मेरा कोटिशः वन्दन । आचार्य श्री भिक्षु जैसे महापुरुष होते है जो सभी बाधाओं व संघर्षों को चीरकर आगे बढ़ते है।

कंटीले रास्तों के बीच भी निर्भीकता से शिखर पर चढ़ते है , बाधाओं के आगे कभी भी हार नहीं मानते है, विजय के संकल्पों को पूरा करने की पक्की ठानते हैं , वह तर्क संगत सत्य के प्रति दृढ़ निश्चयी होते है , वह झुकते नहीं, वह रुकते नहीं निर्भय हों सत्पथ पर बढ़ चलते हैं , उन्हें कोई भय शास्त्रोक्त वर्णित सुपथ पर चलने से नहीं डिगा सकता हैं आदि – आदि ।

ऐसे गुणों से भरपूर महापुरुष आचार्य श्री भिक्षु को उनके 300 वाँ जन्म दिवस एवं 268 वाँ बोधि दिवस पर मेरा भावों से शत- शत नमन ! वन्दन । वह हम सब उनकी तरह अपने जीवन में हर पल हर क्षण ऊर्ध्वगमन करते रहें |

भिक्षु स्वामी ने उस समय आचार्य श्रुघनाथ जी के निर्देशानुसार राजनगर के श्रावकों को अपनी बुद्धिकुशलता के चातुर्य से समझाने की अपनी कार्यदक्षता कार्यकुशलता आदि से सम्पन्नता पर रात को दाह ज्वर की वेदना होने पर भी भीखण जी की आत्मा को झकझोर देने वाले चिंतन का मंथन से ही उस समय तेरापन्थ के बीज बोने का नवनीत प्राप्त हुआ है ।

वह आज हम सबके सामने वटवृक्ष बनकर तेरापन्थ धर्मसंघ में जान फूंक रहा है।हम सबके चिंतन में भी प्रत्येक पल उसी सत्य का साक्षात्कार हो एवं हम अपनी आत्मा को उनके पदचिन्हों पर चलकर ही उज्ज्वल बनाने का लक्ष्य रखें तो हम उनके सच्चे प्रतिनिधि अपने को कह सकेंगे ।

आचार्य श्री भिक्षु का जन्म एवं बोधि दिवस यहाँ इस युग में एक ऐसे महापुरुष का पादुर्भाव हुआ जिसने ऐसा पथ दिखलाया कि हर दिन ही आनंदोत्सव हैं । यह उनके जीवट की कहानी और बलिदानों की गौरव गाथा है । वह वीर भिक्षु के दृढ़ संकल्प व
क्रमशः आगे:-

आचार्य श्री भिक्षु का 300 वाँ जन्म दिवस एवं 268 वाँ बोधि दिवस – भाग-2


आगम सम्मत अवदानों की गहन मीमांसा है । आचार्य श्री भिक्षु में गजब का साहस था । वे गजब के दृढ़ निश्चयी थे । वह शास्त्र संगत बात ही नहीं उसको सही से निर्भय होकर कहने वाले थे । उनके कदम-कदम पर रोड़े अटके ।

उनका घोर विरोध हुआ। वह तिल भर भी विचलित नहीं हुए मानो तिनका भी उनके सामने मूसल बन गया। उन्होंने अनेकों कष्ट सहे परन्तु सही मार्ग को कभी भी नहीं छोड़ा। उन्होंने शांत भाव से कितनों को समझा-समझा इस पथ पर मोड़ा। उन्होंने संघ-संगठन में भी दूर दृष्टि से काम किया।

वह एक गुरु और एक विधान का कैसा सही से अमूल्य अवदान दिया। वह फिर उत्तरवर्ती आचार्यों ने कुशल माली का काम किया। वह जो बीज को भिक्षु ने रोपण किया उसको उन्होंने वट वृक्ष बना दिया। हे भिक्षु !!

हम आभारी हैं, यह पंथ जो आपने दिखलाया जिसने भी सच्चे मन से इसको अपनाया उसका निश्चित कल्याण हुआ। वह अनेक बाधाएँ आयी पर उन्हें डिगा न सकी ।

वह तेरापंथ की यह नदी अनवरत एक महानदी बन कर बहने लगी। आचार्य श्री भिक्षु का एक ही घोष था कि मर पूरा देस्या-आत्मा रा कारज सारस्या ।

वह मर्यादाओं के जन्मदाता आचार्य श्री भिक्षु के जीवन से हम अनुशासित जीवनशैली के गुणों आदि को अपना सही से जीवन में विकास कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करें और उन जैसे आचारवान बनने का सही लक्ष्य बनाकर उस पथ पर आगे बढ़ें तो हम आत्मा के अन्तिम लक्ष्य की और सुगमता से कदम रख सकेंगे ।

आचार्य श्री भिक्षु चेतना तप,संयम की पावन ज्योति है। वह उनकी चेतना दर्शन का उज्जवल मोती है। वह तभी तो कहते है कि हर शब्द सत्य का शिलालेख बन जाता है जिनके पास आचार्य श्री भिक्षु सी निर्मल चेतना होती है। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

पैसे का नशा

हम देख सकते
कि पैसे का नशा
किसी भी मनुष्य
को मदांध कर देता
है मनुष्य जन्म
का मूल उद्देश्य
ही भुला देता है
अर्थ की धूरी
पर ही लगता है
सारे तंत्र घूम
रहे हैं हाथ का
मैल बताने वाले
भी उसी दलदल
मे डूब रहे हैं बुद्धि
विवेक भी धुंधला
जाते है अगर
पैसा पास न
हो तो पैसे को
नशा बताने वाले
भी उसी के नशे
मे झूम रहे हैं
आदमी जब
अच्छा कमाने
लगता है तब
मन उसी में
गहरा रमने
लगता है
सिवाय
और और
के कुछ
नहीं दिखता
है फिर अपने
लिए समय
निकालने का
चिंतन ही नहीं
आता है यों समय
बीतता जाता है
और एक दिन
ऐसा आ जाता है
जब अकस्मात
बुलावा आ
जाता है और
रात-दिन श्रम
करके जो
इकट्ठा करता है
वह सब यहीं
छोड़कर जाना
पड़ता है बचपन
से ही बचत
हमदर्दी संवेदन
शीलता भरी है
कूट कूट कर
कहता हमको
जो प्राप्त है
वह सबको
नहीं है प्राप्त
फिर क्यों करे
हम बिन जरूरत
पैसे बर्बाद उनको
दें जिनको है
आवश्यकता बेहिसाब
अतः हम समझें
पैसे में है
आकर्षण जरूर
पर एक सीमा
के बाद है
यह भौतिक
मायाजाल का
मिथ्या ग़ुरूर
अतः जरूरी है
कमाई और
आध्यात्म में
संतुलन बना
रहे मनुष्य
जन्म के
मुख्य उद्देश्य
में मन रमा रहे।

नशा

नशा है एक
ऐसी घातक बीमारी
जों हमारे शरीर में
पैदा करती है अनेको
अनेकों ख़राबी
वह इससे जीवन
शैली हमारी भी है
लड़खड़ा जाती
नशे की क़ीमत भी
करने वाले को
चुकानी पड़ती भारी
नशा करने से यह
जीवन तो होता ही
है खराब वह आत्मा
को लगाना पड़ता
है संसार भ्रमण
का चक्कर कितनी
कितनी बार फिर
भी मद्यपान के
समान हीं तो
हैं मोह जिसे पी
सुध – बुध खों
बैठे करने वाले
वह जो करते
तम्बाकू गुटका
जर्दा पान पराग
ख़ेनी सिगरेट
शराब आदि
आदि इनका
नशा कर
ज़िन्दगी को ही
बर्बाद कर डाला
मोह तो हैं सब
कर्मों का राजा
जों ऐसी चाबी
है घुमाता जो
लगा देता मुक्ति
द्वार पर ताला
अतः यह गृहस्थ
जीवन है
दुधारू तलवार
संतुलन रखना
है सार नहीं तो
बिगड़े सारे काम
अर्थ और काम
पर धर्म का
अंकुश हो !
तो सुख शांति
से जीने का
निकलता सार

अंकुश

अपने तन, मन
और चिंतन को
स्वस्थ हम सही
से बनायें
वह हमको
जितनी भूख हो
उससे कम खायें
वह अपने
क्रोध व अहम
भाव को हम
सही से दूर
भगायें और
सुख – शांति
के साथ अपना
जीवन अच्छा
जीते जायें
वह जब हमारा
मन चिंतन ध्यान
में बस रम जाता
स्व या परकल्याण
में दूर पृथक हो
कषायों से मन
है प्रयोग शाला
करता प्रयोग
प्रयोजन सब
कोई अपनी
चिंतन धारा से
हितैषी व
सकारात्मक
सही से चिंतन
मंथन जहाँ होता
वहाँ मन अपना
मंदिर बन जाता
नहीं जिसके
अंकुश मन के
अश्व पर दौड़
लगाता वह
बेलगाम सा
नहीं रहता
भान उसको
हित अहित का
बस स्वार्थ और
कषाय के
रंग में रंग जाता
अच्छा भला मन
साधन जंगली
पागल घोड़ा वह
बन जाता
आत्मपोम्य की
चेतना जिस
क्षण जग जाती
हमारी जिंदगी
की दिशा उसी
क्षण को बदल
जाती वह
प्रस्फुटित होता
है जब ऋजुता
का अंकुर सारी
दुनियां प्रेम से
सारोबार नजर
आती क्योंकि
हम है सारथी
अपने रथ के
रख लगाम
मन घोड़े की
अपने अंकुश
में दौड़ा लें
सरपट मंज़िल
मुक्ति की पाने ।

अंकुर

आत्मपोम्य की
चेतना हमारे सही
से जिस क्षण
जग जाती है
जिंदगी की
दिशा उसी
क्षण को सही
से बदल जाती
है वह प्रस्फुटित
होता है जब
ऋजुता का अंकुर
सारी दुनियां प्रेम
से सारोबार हो
नजर आती है
क्योंकि त्याग
हमारे जीवन को
ऊर्जा देने वाला
प्राण है इससे
मिलता जीवन के
हर क्षण व कण
को सही त्राण है
आसक्ति छूटे
बिना अधूरा
होता है
केवल वस्तु
का त्याग
अहं के रहते
आत्म प्रवंचना
ही तो है
पूर्ण समर्पण
की बात वह
वैराग्य के
अंकुर का
जन्म होता है
अंकुर अंकुर
या सही नई
शुरुआत व
सम्यक् बोध
की धरा पर
स्वार्थी मन नहीं
निभा सकता है
कभी भी अंत
तक साथ वह
त्याग से ही
बनता है जीवन
सरस और सुरभित
त्याग ही से
होता हमारी
इस आत्मा का
कल्याण है ।

अज्ञेय

पानी की कुछ
बूँदों को हम हाथ
में ले सकते है लेकिन
सम्पूर्ण नदी के पानी
को हम हाथ में नहीं
ले सकतें है क्योंकि
वह अज्ञेय है और
आसानी से न
समझा जा
सकने वाला
गहरा रहस्यमय
अथाह है भले ही
नदी आगे जाकर
सागर में मिल जायें
और सागर महासागर
की अथाह में वह
समा जायें ठीक
इसी तरह आत्मा
और शरीर दोनों
अलग- अलग है
जीवन का सार
आत्मा का ज्ञान
प्राप्त करना है
न मन में मोह
न शरीर का ध्यान
सत्य में बसी है
आत्मा की शांति
की राह जिसमें
सिर्फ और सिर्फ
मोक्ष की मंजिल
की राह जीवन की
जो अज्ञेय है ।

अडोल

हर जागरूक
इन्सान चाहता
है कि उसका
जीवन हो सुन्दर
और सार्थक वह
बड़े भाग्य से
मिलने वाला
यह जीवन न
जाए निरर्थक
हम सही से करें
सख़्त अविचल
या पक्का आदि
आत्मावलोकन
रूपी दीप (द्वीप)
में प्रवेश क्योंकि
हमारा जीवन बीता
जा रहा है वह
क्या किया है
क्या अवशेष हम
करें समता धर्म
की सही से साधना
घटायें राग और द्वेष
भाव विशुद्धता बढ़ती
जाए हो जाये हमारे
भव शेष क्योंकि
भगवान महावीर का
जीवन है त्याग
संयम और चरित्र
का सही से दिखता
जाज्वल्यमान प्रतीक
सहिष्णुता साधना
आदि के प्रति
समर्पण भाव है
अद्वित हम जो
अनुकूल प्रतिकूल
परिस्थिति में रहे
अडोल और अडिग
शुक्ल ध्यान ध्याय
कर सिद्धत्त्व के
बने हम अडोल
पथिक जिसमें
कोई गति न हो
जो एक जगह
पर टिका रहे
हिलने-डुलने
वाला न हो
अपने निर्णय
या विचार पर
पक्का रहे जो
आसानी से न
टूटे या न हिले
रहे अडोल ।

अंह के नशे में मानव

बदलता परिवेश-
नशा मदांध कर रहा
मनुष्य जन्म का मूल
अंह के नशे में मानव
गया खुद को भूल
हर तरह का वक़्त
आता है ज़िंदगी में
तू मत अपनी
जड़ को भूल नशा
जहर का काम कर रहा
अहं का नशा हावी
तुझ पर जो हो रहा
तू पल रहते खुद
को संभाल ले
विवेक जो इसमें
तू खो रहा वह
अच्छी-खासी कमाई
कर बहुधा आदमी
में आ रहा अहम
मन में घर बना
रहा नफरत का
बीज बो रहा
बोली में भी उसके
अभिमान का है
नशा सर्वोपरि होने
का वहम अब
दिमाग में छा रहा
कल तक जो राजा
था आज वो रंक़ हैं
चकनाचूर अब हुआ
उसका घंमड है
कल तक जो भोगी
था आज वह योगी है
बदल गया ये
परिवेश संस्कारों में
लगी जंक है।

बदलता परिवेश

बदलता परिवेश
बारिस बुँदे जैसे
जीवन अमृत धार
फुहार राहत जैसे
सरस जीवन व्यवहार
कभी रिमझिम वर्षा
व कड़कती बिजली
पत्ते वृक्ष पर बूंद
ओस सी बदलता
मौसम ख़ुशी खास
अंदाज़ मौसम भी
बदलता है और
हमारे दिन भी
बदलते हैं पर
धैर्यवान और
विवेकशील हर
स्थिति व हर
हाल में चलते हैं
हमारा जीवन सुख
दुखों का संगम है
कुछ दिन खुशियों
मै हम जीते हैं तो
कभी गम को भी
हम सहते हैं
हमारा जीवन
सदैव एक जैसा
नहीं होता है
दिन-ब-दिन
बदलता रहता
हम मानव आशा
व विश्वास के साथ
में कई सुंदर सपने
देखते हैं वह सदैव
उत्साह उमंग से
दिन शुरू करते है
वह नया उमंग से
आगे बढ़ते जाते है
पग – पग में समस्या
झेलना वह समता
से रहना ही जीवन
हैं क्योंकि हमारा
हर दिन एक सवाल
जैसा है जो हमको
विश्वास और उत्साह
से निरन्तर भरता है
सरलता-सद्भाव ,
समता-सेवा-
सहयोग- नीति
सामंजस्यता आदि
के सुर हमारे जीवन
जीने कि एक कला
है वह इसमें सही से
पारंगत वही बन
सकता है जिसने
कुछ सहना सही
समय पर सहज
भाव से कुछ
कहना आदि सीखा
कभी पीया शब्दों
का अमृत तो
कभी सहा
बाण भी तीखा
जिसका ह्रदय
हो मनोमालिन्य
रहित हो सबके
प्रति प्रमोद भाव-
मैत्री भावना
सहित हम तत्पर हो
बदलते परिवेश में
चलने के लिए
संग विवेक और स्नेह
का सुदृढ़ सेतु ॥

जोश के साथ होश हो : खण्ड-1

कहते है कि मानव जोश के साथ होश में रहे तो वह हर चुनौती का सही से सामना कर सकता हैं । हमारा जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता है, सुख और दुख का आना-जाना लगा ही रहता है।

जिस प्रकार रात के बाद सुबह होती है, उसी प्रकार दुख के बादल छँट जाते है और खुशी के दिन आते हैं, रात दुख का प्रतीक है और दिन सुख का, जिस तरह पानी दो किनारों के बीच बहते हुए आगे बढ़ता है, उसी तरह जीवन में सुख और दुख दो किनारे हैं जीवन इन्ही के बीच चलता है ।

हम जीवन में मनचाहे को भी स्वीकार करे तथा अनचाहे को भी स्वीकार करे । दोनों ही स्थितियों में समता के भावों को मन व चिंतन मे उतारे ।अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही स्थितियों को हमें सही से अपने गले लगाना हैं । खारी व मीठी हर तरह की दवा को बड़े उल्लास के साथ गटक जाना हैं ।

मान तथा अपमान दोनोँ ही परिस्थितियों को जो समान समझता है, वह पथरीली राह में चलकर भी ना कभी थकता है और ना ही सिसकता है । वह जब हमारा मन पॉज़िटिव होगा, तब हमें दिव्यता का अनुभव होगा क्योंकि सकारात्मकता निर्मलता की निशानी है और मन की निर्मलता वही परम सुख है।

भगवान महावीर ने कहा है कि जो पॉज़िटिव रहेगा वही मोक्ष की ओर आगे बढ़ सकता है, इसलिए नेगेटिविटी से बाहर निकलना अत्यंत आवश्यक है।

अतः एक निराशावादी को हर अवसर में कठिनाई दिखाई देती है ,एक आशावादी को हर कठिनाई में अवसर दिखाई देता है । जीवन अगर बन जाए सकारात्मक तो जीवन में कोई गम न हो। हमको चाहे खुशी मिलें या न मिलें, समभाव में रहना चाहिये । मैं यह मानता हूँ कि कहना आसान है पर अमल करना मुश्किल, आत्मा की शुभ करनी व सरलता दुर्लभ है। पहाड़ पर चढना आसान है पर सदैव मुस्कुराहट रखना उतना ही कठिन हैं ।

जोश के साथ होश हो : खण्ड-2

मानव जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियां आती है जब मनुष्य समझ नहीं पाता की उसे किस तरह उस परिस्थिति का सही से सामना करना हैं । वह परिस्थितिवश उत्पन्न स्थिति स्वयं में इतनी उलझी होती है की अगर सूझ बूझ और दूर दृष्टि का सहारा न लिया जाये तो निर्णय गलत होने की पूरी सम्भावना रहती है ।

वह अनेको बार छोटी -छोटी बातें हमें गहरे तक प्रभावित करती हैं । ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर बेहतर तो यह है की हम शांति और धैर्य से उस परिस्थिति का विश्लेषण करें तथा उस स्थिति के पक्ष – विपक्ष दोनों के बारे में सोंचे क्योंकि प्रत्येक स्थिति के दो पहलू होते है , एक अगर सकारात्मक है तो दूसरा नकारात्मक अवश्य होगा ।

हमें परिस्थिति के गुण दोष के आधार पर निर्णय लेना चाहिए न की घबराकर कोई कदम उठाना चाहिए जिससे की हमारे पक्ष में होने वाली बात का भी विपरीत असर हो जाये ।वह सबसे बड़ी बात हमें किसी भी विपरीत स्थिति में धैर्य , सहनशीलता और शांति से निर्णय लेने की आदत डालनी चाहिए ।

अतः अगर ऐसा हुआ तो हम अपने जीवन में अवश्य सफल होंगे । धर्म सकारात्मकता से ही हमको हंसते रहना सिखाता हैं जैसे – कांटों में भी फूल की तरह खिलना , किसी से ईर्ष्या न करना , हीन भावना न रखना , शुभ भविष्य की कल्पना करना , बेटा -बेटी में फर्क न समझना आदि – आदि ।

यह सचमुच सकारात्मक की ही पहचान है ।अतः हमें विपदाओं से , कठिनाईयो से , हार से आदि हताश हुवें बिना, जोश के साथ होश रखते हुए , बिना रुके दुगुने उत्साह से अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाते रहना चाहिए, फिर देखें मंजिल (विजय) जीत,सफलता हमारें क़दमो में होगी।

अरुणोदय

कितना आकर्षक
शब्द है अरुणोदय
वह उदय भी अच्छा
नहीं होगा जो कोरा
ही ताप दे प्रकाश
नहीं दें हर आयु में
हम हँसें-हँसायें
सेहत की तंदुरुस्ती
पर गौर फ़रमायें
एक सक्रिय जीवन
शैली के साथ
सृजनात्मक क्रिया
में दिन बितायें
अरुणोदय से
अस्ताचल तक
हमारे दिवस को
हम उपयोगी बनाएँ
संतुष्टि के साथ चैन
की नींद हम
सही से सोएँ क्योंकि
ये तो हमारा
सौभाग्य है कि
हमारी जीवन चर्या
और पुण्य कर्मों ने
हमें उम्र का यह
पड़ाव भी दिखाया
अन्यथा कई लोगों
को तो आयु का
अर्द्धशतक आदि तक
नसीब न हो पाया
उम्र तो आनी है ही
और वो आयेगी
उसी के दायरे में
हम पलें – फलें
और अपनी ही
मौज में अपना
भी कार्य करते
चलें आसान सा
जीवन है हम
नकारात्मकता
की कोई भी ग़लत
सोच से उसको
कठिन क्यों बनाएँ ?
हम अरुणोदय की
तरह जीवन सौरभ
को सही से विकसायें
यह इसलिए आकर्षक
है कि इसके पीछे
प्रकाश हैं अतः हम
भी जीवन को
प्रकाशमय करतें
जायें और आत्मा
के मूल लक्ष्य
के निकट सही
से पहुँचते जायें
यही हमारे लिए
काम्य हैं ।।

अर्थ

हमारी मानव तन
संरचना एक ऐसी
है कि उससे दैनिक
आवश्यक कार्यों
के साथ-साथ
किये जा सकें
कारज हों जो
आत्म हितैषी
अर्थ हमारी सत्य
साधना या सही
से सत्कार सभी के
लिए है यह जरूरी
जब वह जीवन
यात्रा का साधन
बनता है जीवन
निर्वाह के लिए
हमारे आवश्यक
प्रयोजनों की पूर्ति
करता है तब वह
बनता है अर्थ
अंतर्दृष्टि के
जागरण के
लिए मस्तिष्क
के कुछ प्रकोष्ठों
को सक्रिय करना
आवश्यक होता है
आत्मा को व स्वयं
को जीत लेना
परम विजय है
अपने आप को
जीतने का बडा
महत्व है व
उसका अर्थ
आत्मा से है
वह जो सही
से अपने गुस्से
अहंकार को
जीतना व
अपने कर्मों का
संहार करना
मुख्य बात है
सबसे महत्वपूर्ण है
मोहनीय कर्म को
जीतना मोहनीय
कर्म को जीत
लेने के बाद
बाकी कर्मों का
अपने आप क्षय
हो सकता है
राग-द्वेष को
जीतना और
मोह कर्म को
क्षीण करना
परम विजय की
कोटि में आता है ।।

मनसा-वाचा-कर्मणा हो सकारात्मकता का शरणा


हमारे जीवन में सकारात्मक विचारों से, सकारात्मक वातावरण से ओर सकारात्मकता के वरण आदि – आदि से जो ऊर्जा प्राप्त होती है वह ही तो हमारा संजीवन है।

अतः हम नकारात्मक विचार हों या हों उस विचार के लोग उनके साथ अपने जीवन का संयोग कभी न बनाएँ क्योंकि जब हम नकारात्मकता से घिरे होते हैं तो अपनी प्रगति और शांति का शुभ योग खो देते हैं। यह सकारात्मकता ही तो है जो हमें प्रगति करने में सहयोग देती है ।

वह हमारे सुख, शांति और खुशहाली आदि का सही से सदैव वातावरण में सुयोग बनाती है । हमारे जीवन में जब सुंदर मनभावन प्रसंग आते हैं तब तो कोई बात ही नहीं स्वतः मन प्रसन्न रहता है।वह मन में सकारात्मकता का प्रादुर्भाव होता है।

प्रश्न उठता है कि क्या कोई विपरीत परिस्थिति में भी सही से सकारात्मक भाव सहित रह सकता हैं । ऐसी परिस्थितयों में भी क्या मन सन्तुलित व उद्वेग रहित रह सकता है । उदाहरणार्थ हमें किसी ने मूर्ख कह दिया । वह तब आमतौर पर प्रतिक्रिया मन ही मन होगी कि अच्छा! मुझे मूर्ख कहा मैं देख लूँगा।

यहाँ यह चिन्तनीय बात है कि जब किसी ने अपशब्द कहा वह तब तक हम पर लागू नहीं होगा, जब तक हमने उसे सही से स्वीकार नहीं किया। हमारे जीवन में दु:ख-सुख तो आते रहते हैं, उनसे कभी न घबरांऐं।

यह कुदरत का कतई नियम नहीं कि हम केवल सुख ही सुख पायें।अतः हम समझें कि दु:ख बिना सुख का कोई मूल्य नहीं है सो दु:ख से कभी ना घबराऐं। हम एक मंत्र याद रखें कि सोच का प्रभाव मन पर होता है।वह मन का फिर तन पर होता है ।वह तन-मन दोनों का सारे जीवन पर होता है।

अतःहम सदा अच्छा सोचें और खुश रहें।यह बिंदु हैं और कई भी उनका जिक्र अभी नहीं तो फिर कभी नहीं । यह सकारात्मकता ही तो है जो हमें प्रगति करने में सहयोग देती है।

वह वातावरण में सुख, शांति और खुशहाली आदि का सुयोग बनाती है।अतःहम सदा सकारात्मक सोचें , सदा सकारात्म बोलें, सदा सकारात्मक करें । मनसा-वाचा-कर्मणा सदा सकारात्मक का शरणा हो ।

सन्तोषी सदा सुखी


हम अमूमन देख रहे हैं कि आज हर कोई अपनी परिस्थिति से खुश नहीं है । वह यहाँ तक कि अच्छे-खासे धनाढ्य के चेहरे भी यही कहते है कि उन्हें भी सुख नहीं है । इसका कारण स्पष्ट है कि लोग अपने पास जो है उससे संतुष्ट नहीं है । वह भूल गए हैं कि प्राप्त ही पर्याप्त है वही सबसे बड़ा सुख है ।

वह हर समय दूसरों से तुलना करना और फलत: खुद को कम आँकना यही तो दु:ख को बुला-बुलाकर गले लगाना है । हम यह जान लें कि
संतोष का मतलब यह कभी नहीं है कि महत्वाकांक्षा न रखें
बल्कि इसका तात्पर्य है जो मिल जाए उसी में खुश तो रहें।
हमको दौलत से सिर्फ सुविधाएँ मिल सकती हैं सुख नहीं। वह दौलत से यदि सुख मिलता तो किसी भी धनपति के जीवन में कभी दु:ख आता ही नहीं।

अत: हमको धन से सुख मिल जाएगा यह भ्रम हम मन से हम मिटा दें क्योंकि करोड़पति के मन में होगा कि उसके पास एक अरबपति से कम है । हमारे अपने कर्म ही तो वास्तव में सुख-दु:ख के निमित्त है । यह दृष्टव्य है हमको सुख मन के सन्तोष से मिलता है ।

वह परिस्थितियों को सही से स्वीकार करने के आत्मतोष से है । वह सदाचार व सद्व्यवहार से है । वह अपनों के साथ से व आपस के प्यार से है । हमारे खुश रहने का तात्पर्य यह भी है कि जो प्राप्त हुआ है उसके लिए हम आभारी बनें। वह मन से कृतज्ञता प्रकट करें और भीतर से आनन्दित रहें।

वह हम दिल से मन ही मन इतना कहें कि साईँ इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाए। हम यह सदा स्मरण रखें कि संतोषी सदा सुखी। वह कभी न दुखी होता है इसीलिए तो कहते हैं कि सन्तोषी सदा सुखी।

अन्वय

हम देख सकते
है कि अन्वय
का मूल्य इसलिए
है कि उससे
बनती है सही
से विकास की
आगे से आगे
परम्परा विकास
का मूल आधार
है सही परम्परा
क्योंकि हम यह
अपने – अपने
अनुभव से सही
महसूस कर सकते
है कि जो ज्ञान
एक तक ही
सीमित हों और
जो पराक्रम एक
तक ही सीमित हो
उसका स्वीकार्य
वैश्विक महत्व नहीं
होता है जैसे जागरूक
जहाज में पानी
का प्रवेश नहीं
होता जागरूक
मन के अंदर आवेश
का परिवेश नहीं
होता जागरुकता
ही होती है इस
जीवन का विटाट
पाठ अगर जागरूक
रहे हमारा सही से अतः
स्थल तो नकारात्मकता
के घुसने का कभी आदेश
नहीं होता है वह
वैश्विक महत्व उसी
का होता है जिसका
अन्वय हो ।।

उपचय

जैसे निःशुल्क और
अमूल्य दोनो शब्द
में बहुत फर्क है
अकिंचन और
रंक में भी बहुत
फर्क है वैसे
ही उपचय
और अपचय में
भी बहुत फर्क है
हमारा मन स्मृति,
विचार और कल्पना
में उलझा रहता है
उसको लगानी होगी
संयम की लगाम
वह उसको जोड़ना
होगा भाव क्रिया
से सही ससम्मान
एकाग्रता साधने के
बहुत उपाय हैं
आसन, ध्यान ,
कायोत्सर्ग ,
अनुप्रेक्षा और
प्राणायाम आदि
रचनात्मक कार्य
( कला) भी है
एकाग्रता का
सुंदर आयाम
इन सबमें जब
जुड़ जाए भाव
क्रिया तो सोने
पे सुहागा वाली
बात हो जाये
अविराम हमारी
अपनी शक्ति
से हम सही
से करें परिचय
भाव क्रिया के
साथ करें उसका
हम उपचय विचारों
की अपने आप
हो जाएगी कम
भीड़ मिल जाएगा
हमको शांति का
नीड़ आनंद की
आएगी बहार कर
सकेंगे हम भव
सागर पार ।।

स्वस्थ जीवन शैली का नियम है उपवास : ध्रुव-1


हम क्या केवल कच्ची मकई बनकर ही जीते जा रहे हैं या उस अग्नि में कूदने का साहस रखते हैं जहाँ से वास्तविक रूपांतरण होता है? यदि नहीं तो मूल्य की आकांक्षा व्यर्थ है।

मूल्य वहीं उभरता है जहाँ संघर्ष, संयम और आत्मविजय का संगम होता है। वह जो न तप से निखरे तो रूप क्या, न ताप से गुज़रे तो रूपांतरण क्या? बीज तभी मूल्यवान बनता है जब वह मिट्टी में गलकर जीवन रचता है। वह जो अग्नि में तपते हैं वही दीप बन जलते हैं और जो जलते हैं वही पथ दिखाते हैं।

हमारे जीवन का मूल्य कभी भी उसकी उपस्थिति से नहीं बल्कि उसके परिश्रम तप और त्याग आदि से आँका जाता है। वह जैसे कच्ची मकई में क्षमता होती है पर मूल्य नहीं वैसे ही मनुष्य में प्रतिभा हो सकती है पर जब तक वह कठिनाइयों से जूझकर स्वयं को निखारे नहीं तब तक वह मूल्यहीन ही रहता है।

इसलिए हमारे जीवन की असली सार्थकता तभी संभव है जब हम चुनौतियों और संघर्षों से विचलित हुए बिना उन्हें स्वीकारें क्योंकि वही तप है जो अंततः हमारे जीवन को मूल्यवान बनाता है। कहते है स्वास्थ्य के हिसाब से काल- भाव के अनुसार जैसे जितना सम्भव हो कभी – कभी उपवास कर लेना चाहिए ।

हम प्रायः प्रायः इस चिन्तन में होते है कि अक्सर उपवास आध्यात्मिक दृष्टि से करने को कहा जाता है पर इसका हमारे स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अच्छा लाभ होता है इसी लिए तो कहा गया है FIRST WEALTH IS OUR HEALTH .
क्रमशः आगे ।

स्वस्थ जीवन शैली का नियम है उपवास : ध्रुव-2

वह समय-समय पर उपवास मन को हल्का और आत्मा को सही से ऊर्जावान बनाता है। हमारा आत्म निरीक्षण व इंद्रियों पर नियंत्रण का सहज अभ्यास उपवास है। वह उपवास केवल हमारी शारीरिक स्वस्थता ही नहीं इच्छाओं की चंचलता भी नियंत्रित करता है ।

वह उपवास केवल अन्न या अन्न-जल का त्याग ही नहीं आत्मानुशासन का भी अभ्यास उपवास है ।वह आत्म नियंत्रण का प्रथम पाठ भी उपवास है ।

हम सुख को भी पचा ले और दुख को भी पचा ले । वह जीवन की हर अनुकूल व प्रीतिकूल स्थितियों का बड़े आनंद के साथ मजा ले । हम हर स्थिति में सुख से जीना सीखे और सही से हर परिस्थिति में संतुष्ट दीखे ।

वह जब संतुष्टि ही हमारे सुख से जीने का राज है तो फिर हम ही क्यों इस संतुष्टि की सौरभ से नाराज है । वह निंदा व प्रशंसा दोनों में जो आनन्द मानता है, सुख से जीने के हर रहस्य को खूब अच्छी तरह जानता है।

खाद्य संयम में एक बिंदु यह भी है कि हमको बीच-बीच में लंघन करते रहना चाहिए जो हमारे तन को कंचन जैसे रखता है । हम समझें ! इसीलिए तो जैन धर्म में उपवास आधारित तपस्या पर बहुत जोर दिया जाता है ।

वह इससे हमारी मानसिक वृत्तियाँ सात्विकता की ओर गतिमान रहती हैं। अतः स्वस्थ जीवन शैली का यह बहुत खास नियम है ।

अनिमेष

माना कि हम
समय की गति
को नहीं रोक
सकते तो क्या
करे स्थिरता के
लिए? वह
निमेष के बाद
फिर हम अनिमेष
कैसे करें ?
एकाग्रता से कार्य
करना कार्य का
अभ्यास करना वह
अभ्यास के लिए
सही से श्रम करना
श्रम सफलता की
कुंजी होना वह
इससे जीवन सार्थक
बनता घड़ी की
टिक-टिक चारों
तरफ थी खामोशी
सन्नाटा छा रहा
सब वातावरण में
अचानक ध्यान गया
घड़ी की टिक-
टिक आवाज़ में
बडा आनन्द आने
लगा सुनने में
दिमाग में लगी
एकाग्रता सधने
धीरे-धीरे मन
जाने लगा आती-
जाती सांसो में
सघन एकाग्रता
बना देती है
आदमी को
अपलक और
अनिमेष ।।

अनिल

हमारे को जीवन
में जरूरी है
रोटी और पानी
उनसे भी ज्यादा
जरूरी है हवा
वर्तमान समय
में घर आंगन
भी मौन है खुली
हवा की मौज
कहाँ है अब
देखने को
धरती तपती
गांव में वह
शीतलता की
घड़ा कहाँ अब
उदपान भी मौन
है आम की बगिया
भी अब मौन है
प्रकृति की सुंदर
तरुवर व्याकुलता
आदि – आदि मौन
है पेड़ो की छाँव
में अब हम कहाँ
है मिट्टी का अब
खेल-खिलौना और
गुल्ली-डंडा सब
मौन है आदि-
आदि क्या हमारे
जीवन का सही
से आधार स्तम्भ
नहीं है हवा ।।

रात गई, बात गई


हम हमारे जीवन में कुछ भूलने वाली आदत बाते रात गई बात गई के समान रखें क्योंकि कुछ बातों को भूलना ही हमारे जीवन में आगे बढ़ने को लाभकारी है । हमारे जीवन में हमारी दैनिकचर्या में लोगों से व्यवहार में अच्छी-बुरी घटनाएँ हमारे स्वयं के आचार-विचार में घटती ही रहती हैं ।

वह कभी-कभी कुछ घटनाएँ स्वयं का व्यवहार हो या हो किसी और का आचार आदि – आदि अनचाहे ही नागवार हो जाते हैं। वे मन में बार-बार चुभती रहती हैं ।हमको अपने जीवन की निर्मलता के लिए उचित है उन्हें तुरन्त विस्मृत कर दिया जाए । वह तभी ही हमारे अंतर्मन में केवल और केवल सकारात्मकता का अमृत रहेगा ।

हमारे जीवन में घटनाएँ तो घटती रहती हैं कभी असफलता तो कभी सफलता आदि – आदि ।अतः हम यदि इनसे सीख लें तो, धैर्य के माध्यम से कई लोग उन परिस्थितियों में भी सफल हो जाते हैं, जो कि एक निश्चित असफलता जान पड़ती है।

हमारे जीवन में घटनाएँ तो घटती ही रहती हैं। वह कुछ ख़ुशियों से भरी हो सकती है तो कुछ अनहोनी भी घटित हो जाती है । हमारे मन का इन घटनाओं के साथ का उतार चढाव में झूलना तो सही नजरिया नहीं है।

हम हर परिस्थिति में सही से उतार चढ़ाव को गौण कर जीना ही सही जरिया है। हर एक के जीवन के सुख दुख तो हिस्से हैं। वह सबके जीवन में आने वाले ये कर्मों के क़िस्से हैं।

अत: हम घटनाओं को हावी क्यों होने दें। वह यही आत्मसात् कर जीएँ कि आज का दिन तो न कभी पहले आया था न कभी फिर आएगा। वही समझदार है जो इसका सही से अधिकतम आनन्द ले पाएगा। अतः हम उन सभी अवांछनीय घटनाओं बातों को दिमाग में कतई जमने न दें । यह मंत्र सदा ही रात गई, बात गई को याद रखें । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

मुहूर्त बनाम बिना मुहूर्त


जो उदित होता है,वह निश्चित ही एक दिन अस्त होता है। वह इस सच्चाई को जानने वाला कभी भी पस्त नहीं होता है।वह सृष्टि के इस नियम से कोई भी अच्छूता नहीं रह सकता है जो इस रहस्य को जान लेता है, वह कभी भी नहीं त्रस्त होता है।

मेरे मन-मस्तिष्क में एक प्रश्न घूमता ही रहता है कि मुझे जिसका समाधान समझ में नहीं आ रहा है कि हम हर शुभ काम के लिए शुभ मुहूर्त देखते हैं। वह उसी अनुसार आगे बढ़ते हैं फिर भी कोई गारंटी नहीं कि सफल होते हैं।

वह इसी संदर्भ में एक और प्रश्न मेरे मन में उठता है कि मनुष्य बिना मुहूर्त के ही जन्म लेता है और मृत्यु को भी बिना मुहूर्त के ही प्राप्त करता है । वह यद्यपि ये दोनों घटनाएँ किसी भी प्रकार से जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं । ये घटनाएँ बार-बार नहीं आती हैं ।

यह जीवन में केवल एक ही बार आती हैं तो फिर अन्य इनसे कम महत्व के कार्यों के लिए मुहूर्त देखने की सलाह क्यों दी जाती है। यह एक आम धारणा है कि या आम विश्वास है कि किसी विशेष काम को करने के लिए सही समय का इंतजार करें । वह तभी निर्बाध सब प्रकार से संपन्न होगा ।

उस घड़ी को शुभ मुहूर्त शुभ काल समझा जाता है । यह हमारा आन्तरिक विश्वास है तभी कमाल होता है। वह इसके विपरीत एक सोच यह भी है कि इस तरह किसी विशेष समय-काल की प्रतीक्षा में तो समय बर्बाद होता ही है । वह उनके लिए सही समय है जब अन्तर का सकारात्मक नाद सुनते हैं ।

ऐसे लोगों का विश्वास है कि शुरू कर दीजिए जब भी हम तैयार हों। वह नाना तरह के शंका और भय बढ़ते रहेंगे यदि शुभ मुहूर्त का इंतजार करते रहेंगे । उनका विश्वास है कि एक बार शुरू करने से रास्ता अपने आप साफ हो जाता है।

वह समय अपने आप ही शुभ हो जाता है। अतः हम स्वयं ही अपना निर्णय कर लें कि कौनसी विधि अपनाएँ। वह मूल बात है कि काम में निर्बाध आगे बढ़ पाएँ ।

कृतज्ञता ज्ञापन : है ख़ुशियों का स्थापन


हम सृष्टि के कण-कण के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करें। वह स्नेहमयी मधुर मुस्कान के साथ एक मौन संवाद स्थापित करें। हमारी जिन्दगी की सुखद बुनियाद हमारे अपने सात्विक कर्मों से जुङी है इसलिए हम हर पल सकारात्मक भावों से अपने आपको भावित करें।

हमारे जीवन में कृतज्ञता ज्ञापन का गुण होना सही से ख़ुशियों का स्थापन है । शेक्सपियर ने प्रभु से अपील कि कृतज्ञता से सरोबार मुझे दिल देवें । हम चाहते हैं कि उऋण बन सकें। वह आगे के लिए भार न रह जाये ।

कर्ज कर्ज ही होता है चाहे वह रुपये का हो या हो उपकार का आदि – आदि । रुपयों का कर्ज उतारना कठिन नहीं है पर उपकार की कृतज्ञता करना बड़ा कठिन है क्योंकि हर कोई ऐसा दिल नहीं पाता है इसीलिए शेक्सपियर ने यह अपील की थी ।

हम हर दिन सुबह उठते ही पुलकित मन, रोमांचित कण-कण में अपने इष्ट को स्मरण करें कि हमको जीवन का एक और सुनहरा दिन मिला और हम इसके लिए कृतज्ञता ज्ञापन करते है । वह तत्पश्चात हम मन ही मन मनन करें कि हमको क्या-क्या करना, आज का सही से यह दिन सुनियोजित कर कैसे बिताना है ।

अतः हम छोटी-छोटी बातों के लिए भी सही से कृतज्ञता ज्ञापन करें और ख़ुशियों से मन भरें। हम अपने जीवन में छोटी-छोटी बातों से जितनी प्रसन्नता बटोरेंगे हमारे उतनी ही बड़ी-बड़ी बातों की व्यथा दूर रहेगी। हमारे जीवन में अगर रहे यों खुशियॉं हमारे साथ तो मन में सदा प्रसन्नता की सरिता बहेगी और तनाव, गुस्सा, अवसाद आदि जैसी अवस्थाएँ पास ही नहीं आयेंगी ।

वह आगे धीरे- धीरे हमारे जीवन में खुश मन में और ख़ुशी पनपती है जब बात-बात में तो हमको कृतज्ञता ज्ञापन की आदत बढ़ती है। अतः हम हर छोटी-मोटी बात में भी कृतज्ञता ज्ञापन करते रहें और ख़ुशियों से अपने मन को भरते रहें । यही हमारे लिए काम्य है ।

क्षमा वीरस्य भूषणम्

हम मानव एक – दूसरे के साथ में रहते है तो साथ मे रहनें से मनमुटाव, बोलचाल, तकरार आदि – आदि होना तो स्वाभाविक हैं लेकिन सामने वाले से कोई गलती हो गई हो तो हमको सरल मन से माफ कर देना चाहिए ।

वह हमसे स्वंय से कोई गलती हो गई हो माफी मांग लेनी चाहिए । अतः गलती स्वीकार करना उस झाडू के समान है जो गंदगी को हटाकर उस सतह् को साफ कर देती है।

हम जब किसी की भूल धृष्टता या अशिष्टता आदि पर उसको क्षमा कर देते हैं तो सामने वाले की सद्भावनाएं तो प्रप्त करते ही हैं, वह अपने प्रति बहुत बड़े साहस का काम करते हैं। हमें ऐसी दयालुता धीरे-धीरे आत्मा की गहराइयों से जोड़ती है । वह हमें अंतर में अद्भुत शांति व्याप्त होती है।

यह एक ऐसी करुणा है जो आत्मा की कोमलता को पिघला देती है । वह अंतर की हर कठोरता यही तो उच्च कोटि की मानवता है । हम जब किसी की भूल पर दिल से क्षमा करते हैं तो हम ऐसा उसके लिए नहीं अपने दिल का भार हल्का करने के लिए करते हैं ।

वह हम अपने मन को घृणा की कड़वाहट से मुक्त करते हैं। वह अपने भीतर की नकारात्मकता को दूर करते हैं। हम
अपने आप को मन से हल्का और स्वतन्त्र स्वयं महसूस करते हैं। स्वतन्त्र कैसे ?

जो हुआ उसे पीछे छोड़ कर मन से भुलाकर आगे बढ़ना ही तो मानसिक घुटन से स्वतन्त्रता है क्योंकि हमारा प्रतिशोध से भरा दिल कभी खुश नहीं रह सकता है । वह बदले की भावना की फुसफुस चलती ही रहेगी ।

हमारे द्वारा क्षमादान जीवन को सरल और हल्का बनाती है क्योंकि बिना सरलता के क्षमादान की मानसिकता ही नहीं बन पाती है। यह भावना से बात तब हमारे भीतर में पनपती है जब हमको यह सही से समझ में आ जाती है कि सभी प्राणियों में एक जैसी आत्मा है ।

वह विद्वतजन ने कहा है कि हम क्षमादान करके स्वयं को ही बहुत बड़ा उपहार देते हैं। वह क्षमादान को वीरों का आभूषण कहा गया है। (क्षमा वीरस्य भूषणम्) । अतः हम कभी किसी की भूल पर गाँठ बाँध कर मन भारी न रखें तुरन्त शुद्ध मन से क्षमादान कर, हल्का कर लें। वह क्षमा करना एक अपूर्व साहस का काम है इसीलिए इसे वीरस्य भूषणम् नाम दिया गया है ।

Brain Drain युवा पीढ़ी शिक्षा के निमित विदेश में जाकर वही बसना : खण्ड-1

एक घटना प्रसंग दो दोस्त का एक ने कहा कि मैं अपने जीवन में लोगों की नजर में बहुत हो सफल व्यक्ति समझा जाता हूँ क्योंकि मेरी छोटी बेटी न्यूयार्क में डॉक्टर है । वह मेरा छोटा बेटा अच्छे पद पर ऑक्सफ़ोर्ड में है |

वह बड़ा बेटा और उसकी पत्नी दोनों ही टोरंटो कनाडा में काम करते हैं । वह बड़ी बेटी और जमाई सैन फ्रांसिस्को में है । इस तरह सब अच्छा कमाते खाते हैं वह Settled हैं। वह दूसरा दोस्त जो यह सब चुपचाप भाव-भंगिमा हो साथ ही साथ सुन रहा था दोस्त की और देख रहा था ।

वह कुछ क्षण बाद बोल पड़ा कि वाह मित्र! तुमने तो अपने बच्चों के जीवन का चित्र अच्छा खींचा हैं । वह यह मैं जानता हूँ कि भाभी तो कई साल पहले गुजर गई थी तो तुम यहॉं कहाँ अकेले रहते हो ? मेरे प्रश्न ने उसे चौंका दिया और मानो कह रहा हो यह मुझसे क्यों पूछ बैठा। वह मन में हिम्मत कर साहस बटोर कर बोला कि मैं यहाँ वृद्धाश्रम में हूँ । वह उससे आगे न कुछ बोल सका ।

वह दूसरे ने कुछ नहीं पूछा । हमारे भरोसे कोई भी दुनियां का काम नहीं रुकता है इसलिए तुरंत अपने व्यर्थ अहंकार पर पूरा विराम लगाओ। वह अहमियत व्यक्ति की नहीं होती उसकी गुणवत्ता की ही होती है ।आज की इस दिखावे की दुनिया मे,दिखावे के लिए लोग विदेश भ्रमण करने चल पड़ते हैं ।

कहने का तात्पर्य है कि सही से विवेक हो आवश्यक और अनावश्यक मे अंतर का उसकी पहचान का,नही तो अनावश्यक को भी जैसे लडाई-झगड़ा, कलह-फसाद आदि – आदि को भी आवश्यक समझ बैठे फिर तो यह काम हैवान का होता है।

हम आवश्यक और अनावश्यक का तो सही से विश्लेषण करते हुए आवश्यक कार्य का खाता बढ़ाते जाए और अनावश्यक कार्यो की संख्या घटाते हुए इस दुर्लभ मनुष्य जीवन को सार्थक बनाए। हम में से प्रायः हर कोई बाहर यानि भौतिक सुख सम्पदा में खुशीयों की तलाश करता है जैसे अच्छी नौकरी, अच्छे रिश्ते, अच्छा घर वह साल में एक – दो बार विदेश-भमण का सफर आदि – आदि ।
क्रमशः आगे ।

Brain Drain युवा पीढ़ी शिक्षा के निमित विदेश में जाकर वही बसना : खण्ड-2

वह ऐसा करने वाला समझदार नहीं है क्योंकि असली खुशी इन सब के अंदर नहीं है। हमारे भीतर ही तो सच्ची खुशी छिपी है । हम जब-जब भी खुशी तलाश करने बाहर निकलेंगे तो सिवाय निराश होने के कुछ नहीं पाएँगे ।

वह नाम, अहंकार, पैसा, रुतबा आदि – आदि पा कर भी स्थायी खुशी नहीं पा सकेंगे। एक कहावत है कि अपनी थाली की खिचडी में कितना ही घी चुपडा हो लेकिन पराई थाली में घी ज्यादा दिखता है। वह जिसकी दृष्टि अन्य को देखने में व्यस्त हो जाती है उसे अपनी सपंदा, अपना वैभव नजर नहीं आता हैं ।

वह तो अपनी सारी ऊर्जा ही उसी में खर्च कर देता है। हमारे जीवन में ज्ञान का बड़ा महत्व है व ज्ञान प्राप्ति के लिए विदेश में जाते है । हम भाषा, भुगौल, खगौल आदि का ज्ञान प्राप्त करते है जिससे हम लर्निंग के साथ अर्निंग करें ।

हर मानव अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहता है और बढ़ना भी चाहिए वह हम भी चाहते है कि आगे आने वाली युवा पीढ़ी आगे बढ़े अच्छी से अच्छी शिक्षा प्राप्त करें । माता-पिता व परिवार आदि ईमानदारी, सेवा, संयम जैसे गुणों को जीते हैं तो वे गुण बच्चों के स्वभाव का हिस्सा बनते जाते हैं।

हम आज की भागती-दौड़ती दुनिया में जब परिवार के साथ अर्थपूर्ण समय नहीं बिताते हैं तो भावी पीढ़ी के बच्चे भावनात्मक रूप से सुसंस्कार शून्य होते जाते हैं। वह माता-पिता व अभिभावकों आदि को सही से सचेत होने की जरूरत है कि परिवार में वातावरण ऐसा बनाए रखें कि वही भविष्य में संस्कारों का वट-वृक्ष बने।

हम बच्चों को कोरा उपदेश नहीं स्वयं का उदाहरण दें । वह उनमें जो संस्कार डालने हैं हम उन्हें स्वयं जिएँ । हम यह समझें कि आज की भावी पीढ़ी परिवार की ही नहीं अन्ततोगत्वा देश की आधारशिला है। वह उसे सुसंकारित करना हमारा जिम्मा है।

Brain Drain युवा पीढ़ी शिक्षा के निमित विदेश में जाकर वही बसना : खण्ड-3

यह सिलसिला तभी तो चलता रहेगा। एक बार उद्योगपति रतन टाटा ने लंदन में एक वक्तव्य दिया जिसकी सारभूत सुन्दर पंक्तियाँ सभी के लिए धारण करने योग्य सूक्तियाँ बन गई।

उन्होंने कहा कि अपनी भावी पीढ़ी को अमीर बनने के लिए हम कभी प्रेरित न करें बल्कि उन्हें कर्मशील एवं श्रमशील बनाएँ। वह श्रम-सह-कर्म करेंगे तो स्वतः ही अमीर हो जाएँगे इसमें कोई भ्रम नहीं है। आज की शिक्षा प्रणाली संस्कार युक्त हो |

हम मन में भर कर नहीं जियें बल्कि मन भरकर जियें । वह हमारी छोटी सी जिंदगी है हम हमेशा खुश रहें ,मुसकुराते रहें । वह जो प्राप्त है वही पर्याप्त है । वह इसी को जिंदगी का उसूल बनायें।

हमारी जिंदगी बहुत छोटी है जो हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं उन्हें धन्यवाद कहे जो अच्छा व्यवहार नहीं करते उन्हें मुस्कुराकर माफ कर दे क्योंकि हमारे जीवन में नकारात्मक चर्चा का असर दूसरों से ज्यादा स्वयं पर होता है इसलिए सकारात्मकता का जीवन स्वर्ग सा बन जाता है ।

हम सही से आत्मचिंतन करते हुए जीवन को उल्लासमय बनाते हुए समीक्षा करे ताकि हमारा आगे का रास्ता आसान हो जायेगा क्योंकि धूल से फूल बनने में समय तो लगेगा परंतु साथ में हमको संतोष भी मिलेगा ।

हम सांसारिक दृष्टि से देखेंगे तो कहेंगे जीवन में पद,प्रतिष्ठा और पैसा आदि कुछ काम के नहीं यदि तुष्टि ,संतुष्टी और कोई अपना नहीं है । वह खुशियाँ पैसों से नहीं मिलती है यह अपनों के अपनत्व से मिलती हैं।

हमारा जीवन दौड़-धूप करते-करते ही मरने के लिए वह तनाव लेकर जीना नहीं है बल्कि यह आनंद के लिए है । हम इसका सही से गहन चिन्तन कुछ पल आध्यात्मिक दृष्टि से करें तो brain drain युवा पीढ़ी शिक्षा के निमित विदेश में जाकर वही बसना यह सारांश में पाएँगे।।

हर कर्म ही बन जाए योग


हमें जीवन में आस्था से ही रास्ता दिखाई देता है । वह आस्था के अभाव में इस जीवन से भी हमारा वास्ता मिट जाता है ।हम देख सकते है कि कुछ जानकार योगी लोगों का कहना है कि योग नहीं है केवल आसन, ध्यान या प्राणायाम बल्कि हर काम में सजगता व समर्पण भाव लाना भी योग का नाम है।

वह पूर्ण लगन व ध्यान से किया गया कोई भी काम पूजा ही का काम बन जाता है क्योंकि पूरी जागरूकता से किया गया काम मन को व हृदय को निर्मल स्थिर करता है । वह इतना कि मानो गहन संतुष्टि का कमल खिल रहा है ।वह इस स्थिति के लिए भगवद्गीता में कहा गया है योग: कर्मसु कौशलम्।

हमारे जीवन मे जब भी विचार, स्पंदन आदि जो मन के स्तर पर पैदा करते हैं तब वो हमारे शरीर की केमेस्ट्री बदल देता है । वह हमेशा गुस्सा अकेला आता है मगर सारी अच्छाई ले जाता है।

वही सब्र भी अकेला आता है मगर हमें सारी अच्छाई दे जाता है । हम जानते है की रात भर गहरी नींद आना इतना आसान नहीं है उसके लिए हमको दिन भर ईमानदारी से जीना पड़ता है ।

वह ईमानदारी सबके लिए उत्तम भावना, उनकी पीड़ा नही मरहम की भावना आदि – आदि है । हम अपने किसी व्यवहार से, मन-वचन-काया आदि से हृदय में दुखी ना हो। हम किसी को खुशी दे ना दे पर अपने द्वारा किसी को गम ना मिले यह स्पंदन सदैव खुशी देगा खुद के जमीर को जिंदा रखेगा ।

अतः हम धर्म ध्यान, साधना,स्वाध्याय आदि करते हुवें सही से समय का सदैव पूरा सदुपयोग करें जिससे हम इस स्थिति से हर कर्म को पूरे ध्यान व लगन से करते हुए उसे जीवन में लाएँ व योग बना दें। वह हमारा जीवन स्वतः ही साधना बन जाएगा व ऐसा कर्म आत्मा की आराधना बन जाएगा।

अधृति

जब समय हमारा
जरा भी इंतजार
नहीं करता तो
हम समय का
व्यर्थ इंतजार
क्यों करें कुछ
व्यक्ति समय
के परिपाक
का मूल्य नहीं
जानते है वह
प्रतिक्षणीय की
प्रतीक्षा का भी
मूल्य नहीं जानते
हाँ बात समय की
है कि समय
है सबसे मूल्यवान
क्योंकि गया समय
फिर नहीं आता है
तथा समय हमारे
पास हमेशा सीमित
ही होता है और तो
और हमारे जीवन
की भी एक सीमा
है यद्यपि कोई
नहीं जानता वह
कितनी है समय
की महत्ता और
शक्ति को न
जानने वाले
जिन्दगी की
जंग हार जाते
है समय के साथ
कदमताल करने
वाले अपने गंतव्य
तक पहुंच जाते है
विज्ञ,प्रबुद्धजन समय
की नब्ज पहचानने
का मंत्र हमेशा
हमे समझाते रहें
है पर हम प्रमाद के
वशीभूत बन सच्चाई
और यथार्थ को
भूल जाते हैं वह
सफलता के
रहस्य को भी
सही से नहीं
जानते है
जिसमें धृति नहीं
है वह स्वयं देता
है असफलता को
निमंत्रण ।।

मानव अलंकार

आशा के दीप
हमारे मानव जीवन
में सही से जलते रहे
इसके अनेक सूत्र
है जैसे-
महापुरुषों की जीवनी
हमको प्रेरणा प्रदान
करती है वह
रात कितनी ही लंबी
हो प्रभात आयेगा
हमारा चिंतन
सकारात्मक सोच
जैसा बना रहें
सत्साहित्य का
हमारे द्वारा पठन
और सही से
साधुओं की
सत्संगत आदि –
आदि जो हमारे
जीवन में अंधकार
को चीरकर उजाला
प्रकट करता है यही
गुण मानव के
अलंकार है ।

बदलाव

क्या लेकर हम आए
थे और क्या लेकर
हम जाएँगे मुट्ठी बाँध
के आए थे हाथ
पसारे जाएँगे दो
दिन की जिन्दगी है
दो दिन का मेला
जानते हैं वह
समय के साथ सब
कुछ भी बदलता है
वातावरण बदलता है
हमारा लौकिक व्यवहार
भी बदलता है लोगों के
तौर तरीके भी बदलते हैं
यानी बदलाव तो सृष्टि
का नियम है विद्वानों ने
हमको पढ़ाया, बताया
आदि कि बदलाव तो है
जीवन का अभिन्न अंग
इस बदलाव की हवा में
कोई पुरानी मान्यताओं
तौर-तरीकों और
व्यवहार में ही
अड़ा रहता है
वह आगे नहीं
बढ़ सकता है
खड़ा ही रहता है
संसार में बदलाव
है जीवन यात्रा का
स्वभाव कोई भी चीज
कोई भी स्थिति
कुछ समय बाद
वही नहीं रहती
ऐसे व्यक्तियों को
एक चिन्तन यह
करना चाहिए कि
क्या आप समय
के साथ बालों को
सफेद होने से रोक
सकते हैं? नहीं ना?
क्या अंग-प्रत्यंगों को
हम क्षीण होने से
थाम सकते हैं?
नहीं ना ? तो फिर
समय- काल, भाव
के साथ समाज,परिवार
और पार्श्व वातावरण
को बदलने से कैसे
रोक सकते हैं और
यदि नहीं रोक सकते
तो ऐसे स्वाभाविक
बदलाव को स्वीकार
करने से हम क्यों
हिचकिचाते हैं
इस जगत में
कुछ भी स्थिर
नहीं रहता है वह
निरंतर बदलाव के
नियम से ही है चलता
पर प्रायः बदलाव
दृष्टिगत नहीं होता
इसी नियम से हम
भी बदलते रहते हैं
प्रति पल बूढ़े होते
रहते हैं पल-पल
बदलते हैं समाज के
रीति-रिवाज वे भी
कल नहीं थे जो
हैं आज अतः
सद्सलाह है यही
हमें भी पूर्ण विवेक
के साथ हॉं, पूर्ण
विवेक के साथ
उचित तरीक़े से
रहना चाहिए सही
से बदलते ताकि
जिससे हम रह
न जाएँ पिछड़ते
इसमें हठधर्मी की
कोई गुंजाईश नहीं
क्योंकि ब्रह्माण्ड का
नियम है यही।

भार-1

माना की ये आज के समय का स्वर्णिम सूत्र है
जहाँ हो पदार्थ सुख का प्रश्न
वहाँ फ़ार्मुला बैठता है यह फ़िट
जुड़ी होती हैं इसमें असीमित तृष्णा
जो होती आकाश सी अनंत
और एक के बाद एक – एक
करके जुड़ती रहती है यह कड़ी
न संतोष न शांति का कोई सीमा का पार
जैसे छोर समुद्र सा कोई आसार
ये भौतिक तृष्णा का नहीं कोई पार
बढाती है आत्मा के दुःख संसार
कर्मों का बढ़ता – बढ़ता जाता भार
दल -दल सा इसमें धसंता जाता मानव
निकल पाना होता इससे दुर्भार
मलहम वहीं लगे जहां पर घाव हो
इलाज उसी का करो जहां
व्यर्थ का कोई तनाव हो
भार मुक्त बनकर चलो
चलना आसान हो जाएगा
और मैत्री की सरस धारा का
स्वतः निर्माण हो जाएगा
जीवन मिला है ये मानव का
हो सारे कर्म ऋण मुक्त हो
करें निज आत्मा का उद्धार

भार-2

कहा जाता है हरेक
आत्म को सही से होना
चाहिए कर्मो से निर्भार
अधिकाधिक आत्मनिर्भर
असफलता-सफलता का
है मानव जीवन सोपान
शंकर को भी शंकर
बनने के लिए
करना पड़ा विषपान
जो कर सकता है
मुश्किलों का सामना
वही बन सकता है महान
सरिता को सागर बनने
के लिए राह में खानी
पड़ती है कितने – कितने
पत्थरों की ठोकर
चींटी पहुँचती है नीचे
से ऊपर दाना लेकर
कितनी बार गिर-गिर
कर गोताखोर कितनी
बार गोते लगाता है
अक्सर खाली हाथ
लौट लौट कर आता
है कभी कभार ही
वह मोती पाता है
इसलिए हम हमारा
सही से जीवन ! निर्भार
चलाते ! चलाते! चले
बाधाओं असफलताओं
से नहीं घबरायें वह
दुगुने उत्साह से बढते
जायें क्योंकि बढते
रहना ही है जिन्दगी
असफलताओं से हार
न मानना ही है हमारे
जिन्दगी की बंदगी
जीवन में कभी कोई
उलझन न हो ऐसा
कोई आदमी है ही नहीं
कोई मुस्कुराता रहता
है क्योंकि उसमें स्वभाववश
समस्याओं को सम्भालने
की क्षमता है और विपरीत
परिस्थितियों में भी समभाव
में रहने की कुशलता है
निश्चित ऐसे व्यक्ति मन में
ख़्वाहिशों का भार नहीं
रखते मन पर भार तो
इच्छाओं का होता है
जीवन तो अपने आप में
हल्का-फुल्का ही होता है
हो अपनी आवश्यकताओं
का सही से मूल्यांकन
आदर्श सिद्धांत है यह
करना चाहिए यथाशक्य
इसका अनुसरण जीवन
में रहे आनन्द ही आनन्द।

जीवन की घड़ी

समय की घड़ी चलती
रहती है यह न रुकती
है और न गति कम
व ज्यादा होती है ठीक
इसी तरह हमारे जीवन
की घड़ी भी चल रही है
एक नाविक की परीक्षा
तभी है जब वह तूफ़ान
में भी वो सही से कश्ती
को किनारे लगा ले
वह व्यक्ति की परीक्षा
तभी है जब जीवन में
वह किसी संकट की
घड़ियों को भी वो
धीरता से खुद को
सही से पार लगा दे
मुश्किलों को न मानें
हम अपना कोई व्यवधान
वो ही तो है हमारे कोई
भी आने वाली हर तरह
की चुनौती का आह्वान
जीवन में संघर्ष की
हमको हर घड़ी सही
से कुछ न सिखाती है
दिक़्क़तों को पार लगाने
की वह कला बताती है
काँटों में चलना हमको
वह सिखाती है जो हमें
तराश कुन्दन बनाती है
अनुभवों व आत्मविश्वास
से हमको भर जाती है
बस ! फिर क्या है वह
विवेक और धैर्य का
समागम हमको बनायेगा
प्रतिकूल में भी अनुकूल
वह हम अपने काल- भाव
से अपना हो सके वो
कोशिश को करते जायें
खिलेगा जिससे हर कदम
पर सफलता का फूल
हमारे बस ! कुछ करना है
इस अटल सिद्धान्त पर
रुकें न कभी कदम हमारे
जीवन की घड़ी को हम
नेक बना आगे बढ़ते जायेंगे ।

जीवन संघर्ष

हमारा जीवन है
सुख-दु:ख के
संघर्ष का झूला
जो चाहता है केवल
सुख ही सुख लगता
है वह इस शाश्वत
तथ्य को है भूला
कोई कुछ भी कर
लें जब तक चल रही
है साँस, कभी सुख,
कभी दु:ख के थेपेड़े
आते ही रहेंगे हमारे पास
अतः कोई भी कष्ट या संघर्ष
हैं तभी तक दु:ख जब तक
हम मानते हैं इन्हें विपरीत
परिस्थितियों का स्पर्श
जीवन में संघर्ष तो करना
ही पड़ता है यदा-कदा
नहीं है कोई ऐसा चलता
रहे जिसका जीवन बिन
संघर्ष सदा कोई चाहे
हो कितना ही अनुभवी
व बुद्धिमान बिना संघर्ष
के थपेड़ों के बन नहीं
सकता वह महान
समय-समय पर आने
वाले संघर्ष के दौर हमें
यह सीखाते हैं कैसे किया
जाए विपरीत परिस्थितियों
पर सकारात्मक गौर
जैसे कच्ची मिट्टी की
मूरत आग में तप कर
बन जाती है उत्कृष्ट
सूरत वैसे ही जीवन
के संघर्ष कराते हैं हमें
सही से श्रेष्ठता का
स्पर्श समय-समय पर
आने वाले संघर्षों की
चुनौती देती है हमें
हमारे भीतर छुपी
अद्वितीय क्षमता को
पहचानने की शक्ति
अत: हम अपने जीवन को
सुख-दु:ख का झोंका
समझें दोनों ही परिस्थिति
में समभाव रखें।

इंतजार

हम स्वयं को सही
से ऐसा बनायें कि
जहाँ हम है और
जहां से हम चले
जाएँ वहाँ पर अपनत्व
से हमको सब प्यार करें
हमारे प्रति अलग ही
सबका जुड़ाव हो
क्योंकि हमको
स्वयं ऐसा बनाना है
कि वहाँ हमको सब
याद करें जहाँ हम
पहुंचने वाले हो और
वहाँ पर सब हमारा
इंतजार करें हमारे
इस व्यवहार को देख
हर किसी को स्वतः
ही जीवन मूल्य के
हमारे आचरण से
स्थापित आदर्श
दिखायी दे क्योंकि
जब समय हमारा जरा
भी कहने बोलने करने
आदि से इंतजार नहीं
करता तो हम समय का
व्यर्थ इंतजार क्यों करें
इसलिए जीते जी हम
कुछ ऐसे नेक काम
करने को काल- भाव से
उत्सुक होकर प्रयासरत
रह जीवन के हर क्षण को
नेक कार्यों व गुणवत्ता के
मिठास से बराबर भरते रहें
जिससे कम से कम भव
में हमारी आत्मा मोक्ष
का वरण करे ।

हिचकिचाहट : ध्रुव-1


मनुष्य के कर्म अनेक प्रकार के होते हैं, कुछ कर्म तो वह अनिच्छापूर्वक बाध्यता के साथ करता है परंतु मनोयोग से किया गया कृत्य ही उसे सच्चा आनंद प्राप्त कराता है, इन समस्त क्रियाओं में अध्ययन सर्वश्रेष्ठ है, अतः अध्ययनप्रिय व्यक्ति स्वयं को सदैव प्रसन्नचित्त अनुभव करता है ।

हम अपने जीवन में बहुत बार वह काम करने से हिचकिचाते रहते हैं जो अपना सपना है। वह हमारा मन कहता रहता है कि असफल होने से तो अच्छा न ही करना है पर हम यह सोचें कि किसी भी कार्य की अगर हम कोशिश ही नहीं करेंगे तो क्या वह कभी होगा।

वह हमारे द्वारा कोशिश करके अगर नहीं होगा तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। हम देख सकते है इतिहास गवाह है
कि बहुत से क्रांतिकारी आविष्कार सफल होने से पहले बहुत बार असफल रहे हैं। वह कोशिश करने का उनका जज्बा उन्हें कोशिश करने में बार-बार धकेलता रहा है ।

अंततः वे एक आखिरी बार सफल हुए।वह ऐसे लोग जो महान बने है वे ऐसे ही नहीं बने उन्होंने बहुत कुछ खोया पर आखिर में अपने धैर्य का परिणाम सफलता में पाया है । विश्व विख्यात गणितज्ञ आइंस्टीन बचपन में बार-बार असफल होने पर अपने को दिमागी कमजोर मान लेते तो आज वह विश्व विख्यात नहीं होते ।

थॉमस एडिसन ने 1000 से भी अधिक असफल परीक्षण किया फिर भी जब कोई उनको असफलता के बारे में पूछता तो वह यही कहते मैंने बल्ब तैयार न होने के हजार फार्मूले बना लिए असफल तो कभी हुआ ही नहीं ।यही विश्वास रखकर अपनी असफलता को सफलता में बदला जा सकता है ।

जीवन में लगन और चिन्तन में सकारात्मकता सफलता की कुंजी है। हम अगर अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें दर्द को अपना दोस्त बनाना होगा । वह हमारा कॅरियर भी कुछ-कुछ जिंदगी जैसा ही होता है । क्रमशः आगे ।

हिचकिचाहट : ध्रुव-2


हमको जिंदगी के कॅरियर में भी काफी उतार-चढ़ाव, सफलता-विफलता आदि – आदि देखने के बाद ही कामयाबी मिलती है । हम हालांकि जिंदगी में जैसे-जैसे अपने सफर पर आगे बढ़ेंगे, वैसे ही स्वयं को ज्यादा खोया हुआ और निराश आदि महसूस करेंगे ।

हम ऐसे समय में अपने लक्ष्य से पीछे हटना चाहेंगे क्योंकि हमारा आत्मविश्वास डगमगा रहा होगा । वह यही समय होगा जब हमें अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहना होगा और स्वयं को सही से प्रोत्साहित करना होगा, अतः असफलता ही सफलता की जननी है।। नो हिणे नो अइरीत्ते यह आगम वाणी है ।

हम सफलता पर न फुलें और न अहंकार के भाव लाएं। वह असफलता पर हम हीन भाव से ग्रसित न बन जाएं। हम अपना समत्त्व भाव विकसायें । हमारी सफलता तब ही सही से सफल कहलाती जब वह विनम्रता बढ़ाती है । वह कुछ हासिल किया और अहंकार न आये, यह बहुत बड़ा आश्चर्य कहलाता हैं ।

वह इसके विपरीत अहंकार भाव से भाग्य ने हमारा साथ दिया तो शायद एकाध बार और सफलता पा जाए पर अगली बार फिसलता चला जाता है और निरंतरता नहीं रह पाती है ।

वह अहंकार एक ऐसा ढंका हुआ कुंआ है जो पता न चलता कब लुढ़क जाएं। अतः विनम्र सरल व्यक्ति ही सही से दिन प्रति दिन सफलता पातें और आगे बढ़तें जातें है और अपना लक्ष्य हासिल कर पातें है । अतः इसका तात्पर्य है कि जीतते वही हैं जो सही से जोखिम लेना जानते हैं।

वह जोखिम कोई तभी लेता है जब वह आत्मा की पुकार सुनते हैं।यह भी है कि आत्मा की पुकार सुनकर हिचकिचाहट हटा कर लिए गए जोखिम हमेशा ही कामयाबी में तब्दील होते हैं। अतः सदैव हिचकिचाहट हटाइए वह असफलता से मत घबराइए। वह जीवन के सही लक्ष्य को प्राप्त कर हम अपना जीवन सफल बनायें ।

आचार्य श्री महाप्रज्ञजी का 106 वां जन्मोत्सव


हम सब मिलकर उत्सव आज अनोखा मनाएंगे ।
महाप्रज्ञजी के जन्मदिवस पर मंगल गान गायेंगे ।
टमकोर के खुले आकाश में, सब मिल खुशियाँ मना रहे थे ।
विश्व पटल पर हर्ष छा गया महाप्रज्ञजी धरती पर आ गये थे ।
गुरु तुलसी को नया अभियान महाप्रज्ञ विद्वान मिल गये थे ।
महाप्रज्ञजी के ज्ञान का प्रकाश सर्वत्र छाने लग गया था।
महाप्रज्ञजी के पुण्य पर्व में , सबका दिल सरसाया हैं ।
धर्म में रमें आपके पाठ यह पठना और सबकों समझना हैं ।
सन्त का बाना लेकर मर्यादा को खूब निभाया था ।
तुलसी गुरु के पट्टधर ने संघ को खूब विकसाया था ।
साधु जीवन के लम्बे काल में शुद्ध संयम को उजला किया था ।
धर्म संघ को निरन्तर दशम अधिशाशस्ता ने बढ़ाया था ।
सब पर एक रूप हैं लागू , गण का खरा खजाना बताया था ।
तेरापंथ का है अजब अनुशासन सबको समझाया था ।
सार नहीं हैं कोरी बातें , संयम सार सुहाना कहा था ।
संयम ही जीवन हैं इसको सही से समझा फरमाया था ।
अजब बहार लगी शासन में , जन – जन ह्रदय लुभाया था ।
मिले कितने मुनि सतियां गतिविधि नाना आयोजन की थी ।
आषाढ़ कृष्णा तेरस का दिन सुंदर , सुखद स्मृति ले आता हैं ।
श्रद्धांजलि समर्पण करते ॐ श्री महाप्रज्ञ गुरुवे नम: का जाप हैं।

योग दिवस-ध्रुव-1


अब प्रश्न आता है कि योग क्या है ? सामान्य भाव में योग का अर्थ जुड़ना हैं यानी दो तत्वों का मिलन योग कहलाता है,आत्मा का परमात्मा से जुड़ना यहां अभीष्ट है, योग की पूर्णता इसी में है कि जीव भव में पड़ा मनुष्य परमात्मा से जुड़कर अपने निज आत्मस्वरूप में स्थापित हो जाए।

स्वयं का स्वयं के साथ मिलन योग है ।शारिरीक स्वास्थ्य के अर्थ में शरीर के साथ संयमपूर्वक, मिलजुलकर रहना भी योग है ।पारिवारिक व्यवस्था को बनाए रखने के अर्थ में परिवार से जूडना/मिलजुलकर रहना भी योग है।
पर्यावरणीय स्वास्थ्य के अर्थ में मानव का प्रकृति के साथ – साथ संवादित-लयबद्ध रहना भी योग है ।

अंतरात्मा के साथ एकाकार होने का अभ्यास योग हैं । योग का शाब्दिक अर्थ मिलन है । तात्पर्य ! शुद्ध सात्विक भावों के साथ एकाकार तन-मन के साथ मिलना । योग जीने की एक महान कला है । योग का सतत उपयोग करना जागरण का एक सशक्त सिलसिला है। योग हमें सही से जीवन जीना सिखलाता है ।

इस जीवन को जीने का अर्थ योग बतलाता है ।योग के माध्यम से चेतना की सशक्त रश्मियों के संचार से हमारा आत्म बल स्वयं से जाग जाता है , दीर्घ श्वास के सदा अभ्यास से हमारे में नव शक्ति का संचार होता है तब मन के हर निराशा और भय का सही से संहार होता है, उपसंहार होता है ।

स्वस्थ तन से और स्वस्थ मन से योग जब हमारे जीवन को सजाता है तब बड़ी ही सहजता से इस जिंदगी का हमें मधुर स्वाद आता है इसीलिए तो
क्रमशः आगे ।

योग दिवस-ध्रुव-2


में कहता हूं योग जीने की एक महान कला है ।योग का उपयोग जागरण का एक सुंदर सिलसिला है । योग करना यानी हमारे मन-मस्तिष्क में अच्छे गुणों को स्थापित करना जो हमें सही – ग़लत के मार्ग दर्शन में सक्षम बनाता हैं ।योग हमारे मन मस्तिष्क के स्पंदन को शुद्ध एवं पवित्र रखते हैं,स्फूर्ति एवं उत्साह का संचार होता हैं ।

गुरु महाप्रज्ञ जी की कालज़यी देन प्रेक्षाध्यानअपने आप में अचूक संजीवनी हैं जो भी प्रेक्षाध्यान-स्वाध्याय-योगा रूपी नौका अपने सही से गंतव्य, किनारे मंज़िल तट पाने में समर्थ रहेगा उसके आत्म स्पंदन के भावों में करुणा बहेगी। स्वस्थ जीवन का वरदान योग हैं ।

हमारे प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की गरिमा दी है ।योग को नियमित करने से शारीरिक मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य प्राप्त होता है। वह नियमित दिन चर्या से स्वयं अनुशासन स्फुरित रहता है ।

योग ध्यान,प्राणायाम का फलित दीर्घ और स्वस्थ जीवन है , शीतलता,निर्मलता आदि लिए सबके खातिर जीवन इससे उपयोगी बनता है।इस तरह से योग विचारों को भीतर की ओर मोड़ने का जरिया है ।हमारे जीवन की गुणवत्ता बदलने का साधन योग है ।

योग हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा दिया हुआ प्रदत्त अमूल्य ज्ञान हैं जो हजारों साल पूर्व का अवदान हैं ।सार में कहा जाए तो योग स्वस्थ ,संतुलित, मानसिक, शारीरिक जीवन की कला और विज्ञान है जो तन-मन को तनाव मुक्त एवं रोग-प्रतिरोधक क्षमतायुक्त रखता है ।

करते जाएँ सतत : अपडेट स्वयं को हम


हमारे जीवन का प्रारंभ और अंत तो कर्मों का परिणाम है पर दो घटनाओं के मध्यकाल में जीवन को कैसे जीना है तो निश्चित ही हमारा काम है । वह चिन्तनशील इसे स्मरणीय अनुकरणीय बना कर जीते हैं और युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। वहीं विवेकहीन इसे गफलत में गँवा देते हैं। हमारा हर दिन नया उच्चतर रूप में बनें ।

वह हर रोज हमारा सही से अपग्रेडेड स्वरूप निखरे। वह हमको अपना गुस्सा सतत थोड़ा कम करना होगा । हम हरदम विनम्रता को बढ़ाते जाएँ। वह दिल में कभी कोई गम न रखें । हमारा ध्यान-साधना का नित-क्रम हो। हम हर क्षण समय की कद्र करना सीखें ।हम ऐसे छोटे-छोटे अपडेटों से ही तो हरदम शक्तिशाली बनते जाएँगे ।

हम मानव कहलाते हैं । हमारा मूल स्वभाव मानवता है पर सभ्यता के विकास के साथ-साथ इस पर स्वार्थपरता व अन्य निषेधात्मक लक्षणों का प्रभाव पड़ता गया और यह मूल स्वभाव क्षीण होता गया । हमको आवश्यकता है यह स्मरण रखने की कि मानवोचित गुणों रहित कोई भी मानव कैसे हो सकता है।

दया धर्म का मूल है , पाप मूल अभिमान।तुलसी दया न छोड़िए जब लग घट में प्राण। संत तुलसीदास ने यही सटीक कहा है। हमारे द्वारा दया में कभी अहं भाव नहीं होना चाहिए । वह दया तभी सारभूत है जब सहज स्वभाव बन जाती है ।

वह यहाँ तक कि जिस वस्तु से हमें सरोकार है उसे सहज भाव से त्याग कर दे दी जाए जिसको उसकी दरकार है । हमको मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलता है । यह पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों से ही कमल खिलता है। यह हमारा जीवन तभी सार्थक है जब हम इस दुर्लभ जीवन को सार्थक व विवेकपूर्ण जिएँ, आध्यात्मिक उन्नयन की पृष्ठभूमि बनाएँ।

हम इस तरह हरदम विनम्रता बढ़ाते जाएँ। वह दिल में कभी कोई गम न रखें। हमारा ध्यान-साधना का नित-क्रम हो। हम हर क्षण समय की कद्र करना सीखें । वह हम ऐसे छोटे-छोटे अपडेटों से ही तो हरदम शक्तिशाली बनते जाएँगे । वह जो इंसान स्वयं को अपडेट यों बनाता जाता है , समय के साथ हर दिन प्रासंगिक ज्यों का त्यों रहेगा।

समय का सन्तुलन: है आनन्द धन


हमारे जीवन में हर कार्य में सही से समय का सन्तुलन आनन्द धन है । आज अधिकतर लोग या तो केवल मौज मस्ती में डूबे रहते हैं या अहर्निश काम की कश्ती में तैरते रहते हैं। यह संतुलन विहीन जीवन प्रायः घर-गृहस्थी में है | हमारे जीवन में कुशलतापूर्वक समय का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण है ।

यह सफलता के लिए वांछित गुण है । वह बिना समय-सन्तुलन के सुख भी दु:ख बन जाता है और सफलता तो उस तरफ रुख़ करती ही नहीं है ।अतः असली कला काम, परिवार, स्वास्थ्य व आत्मिक विकास में संतोषजनक संतुलन आदि है तभी जीवन आनन्दमय हो सकता है ।

आजकल के समय में पैसे के पीछे मानव इस तरह भागता है कि उसे अपना स्वास्थ्य गँवाने का भी भान नहीं रहता है और फिर उसी पैसे से खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करता है पर साधारणतया पा नहीं सकता है। वह केवल पैसे के पीछे भागना इतना कि रिश्तों के साथ मिलने-जुलने का भी समय नहीं निकाल पातें है ।

वह इसके विपरीत अगर केवल मौज-मस्ती और आराम ही करते रहेंगे तो समाज-परिवार में आत्म-गौरव खो बैठेंगे। वह हम अपने भविष्य को लेकर इतना चिंतित रहतें है कि आँखों पर पट्टी बाँधे बैल की तरह जीवन की घाणी का चक्कर लगाते रहते है और वर्तमान को भी ठीक से नहीं जी पातें है ।

वह हम यों ऐसे जीतें है जैसे हम मानव कभी भी नहीं मरेंगे है और अंत में मन में असंतोष लिए ही इस दुनिया से चलें जातें है। हमारे जीवन का परम उद्देश्य तो काम, परिवार, शरीर और इन सब के साथ बहुत महत्वपूर्ण आत्मा है ।

वह इन सब में समय का व्यवहारिक संतुलन रख खुश रहना होता है पर वह जीवन भर नहीं जान पाता कि कैसे ख़ुशी का जीवन व्यतीत करना है । अतः जीवन में सबमे समय का व्यवहारिक संतुलन रखना होता है। हम जीवन का संतुलन से ही असली आनंद ले सकते हैं।

बहुत जरूरी है गहरी नींद व अच्छा जीवन बनाना : खण्ड-1


हमको हमारे स्वास्थ्य के लिए विभिन्न काम जैसे आवश्यक है वैसे ही नींद भी गहरी बहुत जरूरी है । हम देख सकते हैं कि आज दादी की कहानी सुनानी किसको आती है। हम भूल गए कि जो कुछ चीजें, कुछ बातें लॉकर में बंद नहीं होती वह भी दौलत है बल्कि वह तो बेशकीमती दुर्लभ दौलत है।

यह उन बड़े बुजुर्गों की ही बदौलत है। आज हमने गुरु की जगह गूगल को दे दी। आज हमारा गूगल ही सत्यम शिवम सुंदरम हो गया। वह जो बता दे वही सत्य परम हो गया इसीलिए तो आज हमारे पास जानकारी ज्यादा पर समझदारी कम है।

वह पुराने लोगों को इसी बात का तो गम है। हम एक जरा सी बात अपने को समझा नहीं पाए कि क्या इसमें कोई गर्व की बात है कि हम चाँद और सितारों को तो छूकर आ गए पर अपनों से मिलने अर्से से नहीं जा पाए। हम घर से निकलते थे तो माँ की दुआएँ साथ चलती थी। अब B P और Sugar की गोलियाँ आदि – आदि हमारी जरूरी बिसात होती हैं।

वह भी कोई जमाना था जब तपती दुपहरी में पेड़ की छाँव में गहरी नींद सोते थे मीठे-मीठे सपनों में खोते थे। वह अब आज ! कीमती बिस्तर पर भी करवटें बदलते हैं पर वह गहरी नींद नहीं ले पाते हैं।

हमारे आज फेसबुक पर हजारों दोस्त हैं पर एक आवाज पर चार बुलाते थे, चौदह दौड़े आते थे वे जिगरी दोस्त कहाँ हैं। हमारे आज Balance Sheet में तो PROFIT बढ़ रहें हैं पर रिश्ते LOSS में डूबते जा रहें हैं। यह आज की दुनिया जिसके लिए शेखी बघारते हैं की हमने बनाई है ।
क्रमशः आगे ।

बहुत जरूरी है गहरी नींद व अच्छा जीवन बनाना : खण्ड-2

यह तथाकथित आधुनिक जिन्दगी जो हमने बड़ी जतन से सजाई है उसमें जितना शोर है तो उतनी ही खामोशी है। वह जितनी भीड़ है उतनी ही अंदर से तन्हाई है क्योंकिआज आदमी का दिल कहीं है दिमाग़ कहीं है।

वह जब हमारे पास कुछ नहीं था तो सब कुछ था और आज हमारे पास सब कुछ है पर देखा जाए तो जो पहले था वह आज कुछ भी नहीं है। मैं उससे आगे मैं उससे पीछे क्यों हम इसी दौड़ में खो गए ।

वह जिन्दगी के सारे लम्हें यों मानो कभी थे ही नहीं और हीं और जिन्दगी यूँ ही फिसलती गई। हम ऊर्जा के लिए व्यायाम, ध्यान आदि करते हैं व पौष्टिक आहार भी लेते हैं पर कम ध्यान देते हैं कि शरीर की ताजगी के लिए निश्चिंत गहरी नींद भी बहुत जरूरी है।

हमारे शरीर व मस्तिष्क की सही से हर मरम्मत जिसे हम Detoxification कहते हैं यानि विषहरण जो निश्फिक्र गहरी रात्रि निद्रा से ही पूर्ण होती है। वह आज की युवा पीढ़ी देर रात तक मोबाइल या टीवी में ही उलझी ही रहती है । वह नींद को समय की बर्बादी ही समझती है ।

वे नहीं जानते कि लगातार नींद की कमी कई बीमारियों की जन्मदात्री है। हमारी रात की गहरी नींद व ताकत दिन की सबसे बड़ी है हम इसे खोकर कुछ भी नहीं जीत सकते है । अतः हमारे द्वारा दिन रात की चर्या में निष्फिक्र गहरी नींद भी अति आवश्यक है ।

हर आत्मा का जन्म निश्चित है।हर आत्मा अपने पिछले जन्मों के करमों के अनुसार इस सृष्टि पर जन्म लेती है। वह उसी क्रम में एक मनुष्य जीवन आता है ।
क्रमशः आगे ।

बहुत जरूरी है गहरी नींद व अच्छा जीवन बनाना : खण्ड-3

हमारा जनम से लेकर मृत्यु तक का जीवन एक किताब की तरह होता है।वह जिसका पहला पेज मनुष्य का जन्म सूचक होता है और अंतिम पृष्ट इंसान की मृत्यु कहलाता है। वह पहले और अंतिम पेज के बीच के पंनों को हमको इस जीवनकाल में अच्छे या बुरे कार्यों द्वारा हम्हें ही भरना होता है।

वह अगर किसी किताब को पढ़ने में इतना आनंद आता है कि उसको बीच में छोड़ने का मन ही नहीं करता है ठीक वैसे ही इंसान को अपने जीवनकाल में ऐसे कार्य करने चाहिये कि लोग स्वतः ही आपकी और खिंचा चला आये।उसकी मौजूदगी ही भरी सभा में एक आकर्षण बन जाये।

वो तभी सम्भव होता है कि इंसान का मन बच्चे की तरह सच्चा,करण जैसा दानवीर, महात्मा गांधी जैसा अहिंसावादी और राम जैसा मर्यादा पालन आदि करने वाला हो।वह अगर ऐसा इंसान का जीवन होगा तो उस इंसान के जीवन की किताब का पहला और अंतिम पृष्ट तो क्या पूरी किताब ही बहुत सुंदर होगी।।

वह उसके ठीक विपरीत कार्य करने वाले व्यक्ति की किताब का पहला पृष्ट तो क्या कोई पेज पढ़ने का मन नहीं करेगा। हर आत्मा का जन्म से लेकर मृत्यु तक के किये गये कार्यों के आधार पर ही पुनः जन्म होता है इसलिए आज के समय का मुख्य बिंदु यह दर्शाता है कि कितने पुण्य कार्य किये होंगे हमको तब मनुष्य जन्म मिला हैं । वह जीवन के हर दिन हम्हें कोई ना कोई नेक कार्य करके इस जीवन से अलविदा होना है। यही हमारे लिए काम्य हैं ।

सरलता है मूल मन्त्र : ध्रुव-1


आजकल के जीवन में किसी को चैन कहाँ है । वह सब साधन-सुविधाएं होते हुए भी बेचैन रहते हैं । इसका मुख्य कारण प्राप्त को पर्याप्त न मानना तो है ही पर मानसिकता भी ऐसी हो जाती है कि स्वयं से अधिक प्रगति भी किसी की दुखदायी हो जाती है।हमारे मनुष्य जन्म प्राप्ति में किसी के गुणों का योगदान है तो वह सरलता आदि गुणों का होना है ।

यह तो अनुभवसिद्ध है कि हमारा जीवन जितना सरल होगा उतना ही वह आनन्ददायक होगा क्योंकि आदमी की अनवरत और-और की भूख उसके लिए मानसिक दुःख बन रही है। अतः हम यदि जीवन में सही से सादगी को अपनाएँगे तो निश्चित ही सही से जीवन का गहरा आनन्द ले पाएँगे।

वह सादगी का मतलब आवश्यकतानुसार चीज़ों में ही सन्तुष्ट रहना है और बाहरी चकाचौंध भरी दुनिया की दौड़ में खुद को न उलझाना है । हम जब ऐसा रहने का मन बनाते हैं तो आवश्यकताएं भी स्वतः समेट लेते हैं|

मेरे चिन्तन से इन्सान को मानव बनाने वाले ये पाँच गुण मुख्य हैं और भी गुण हो सकते है जैसे सहजता, सरलता, सादगी, सहृदयता और स्वीकार्यता आदि – आदि ।

अतः हमको इन गुणों जैसा सही से समझ अच्छे बनना है । ये पाँच गुण मेन जिनमें हैं उनके जीवन में सब समय अमन-चैन रहता है। वह सहजता का तात्पर्य सहज भाव से रहना है । वह व्यवहार में पेचीदगियों को कोई स्थान न देना है । वह समय काल भाव व वातावरण के अनुसार ढ़ल जाना है ।

वह सविवेक अपरिवर्तनीय परिस्थितियों को स्वीकार कर लेना है । हमारे जीवन में आगे बढते-बढ़ते, चलते-चलते आदि – आदि कुछ लोग स्व-दुष्प्रेरणा से, कुछ देखा देखी से इन मौलिक गुणों से दूर हो जाते हैं । वह उनके भरपूर दिखावा और आडम्बर हावी होने लगता है । हमारा इसी वजह से जीवन तनावों से और नाना प्रकार के अन्य भावों आदि से भर जाता है ।
क्रमशः आगे ।

सरलता है मूल मन्त्र : ध्रुव-2

हम तब व्यक्तिगत जीवन में न सही रह पाते हैं और ना ही व्यवहारिक जीवन में कुछ विशेष कर पाते हैं । वह बेहतर और अच्छा इन्सान बने रहने से दूर होते जाते हैं।

वह जीवन की मौलिकता खोने लगते हैं और मन अनमना सा रहने लगता है ।वह हम देख सकते है कि अधिकांश के साथ यही कहानी है पर इन दुष्प्रभावों से सब अनभिज्ञ रहते हैं। यह बहुत बड़ी नादानी है। हमारा जीवन सफलता के कितने ही शिखरों की ऊँचाई हो पर हमारे पैर धरती पर हों ।

हमारे अहं का दंभ नही हो वह केवल नम्र और विनम्र हो , वह उस व्यक्ति के प्रति दुनिया में सब सदभाव रखते हैं। व्यक्ति जितना अपने जीवन में गुणवान होगा वह उतना ही विनम्रवान भी होगा क्योंकि ज्ञान हमको सरलता की ओर ही ले जाता है।

व्यक्ति क्या है ? ये किसी से कहने की, चिल्लाने की, प्रभाव दिखाने आदि – आदि की कोई जरुरत नहीं है। हम वास्तव में क्या है ? स्वभाव और सरलता ही ये बताने के लिए बहुत है क्योंकि खुशवू को कितना भी छिपाओ वो छिपती नहीं हैं । वह जितना भी सृजन हुआ है वह टेढ़े लोगों से नहीं सीधों से ही हुआ है।

वह कोई भी सीधा पेड़ कटता है तो लकड़ी भी भवन निर्माण में या भवन श्रृंगार में उसी की ही काम आती है। वह मंदिर में भी जिस शिला में से प्रभु का रूप प्रगट होता है वह टेढ़ी नहीं कोई सीधी शिला ही होती है।

इस तरह सादगी न केवल हमारे जीवन को सरल बनाती है बल्कि वह हमारे मन को भी और-और की प्रवृति से दूर रखती है। वह हमारे जीवन को भी सुखी बनाती है। अतः जो व्यक्ति हमेशा ही सरलता के मूल मन्त्र से सरोबार रहा है उसने सबके दिलों में जगह बनायी है ।

बनाएँ भावी पीढ़ी को सुसंस्कारी : ध्रुव-1


हम देख सकते है कि भावी पीढ़ी को सुसंस्कारी बनाने की बात आती है तो हर मानव चिंतित हो जाता हैं । हमारे द्वारा भावी पीढ़ी को अच्छा से अच्छा करने की हर समय सही से कोशिश प्रयास अवश्य किए जाते है ।

हम बच्चों को बड़े लाड़ प्यार से पालते हैं। वह उन्हें थोड़ी सी भी तकलीफ होते ही हिफ़ाज़त पूरी करते हैं। वह उनके हम कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं।

माना कि बच्चों को स्नेह- दुलार देना हर मॉं-बाप का स्वाभाविक स्वभाव है पर बच्चों को दर्द सहने की आदत सिखाना भी हमारा कर्तव्य ही नहीं उनके संतुलित जीवन के लिए जरूरी आयाम है।

वह ताकि उनके जीवन में कष्ट की जरा सी ठेस लगते ही कॉंच की तरह टूट कर बिखर न जाएँ क्योंकि किसी का भी जीवन हर समय फूलों की शैय्या नहीं होती है ।

वह उसमें काँटे भी हैं तो राह में कंकड़-पत्थर भी जो चुभेंगे भी और दर्द भी देंगे। हमारा कर्तव्य है कि हम भावी पीढ़ी को इस के लिए तैयार करें । वह इतना लाड़-प्यार भी न दिया जाए कि कष्ट क्या है उन्हें पता ही नहीं है ।

वह थोड़ी सी तकलीफ में ही उनको लगने लगे कि मानो पहाड़ टूट पड़ा है और अब कोई रास्ता ही नहीं है । उनको जीवन में आगे बढ़ना है तो दर्द सहनी जरूरी है। वह उनकी सब माँगें पूरी मत करिये।

वह अभाव क्या होता है यह महसूस करने दीजिए। वह तभी वे दुनिया में खड़ा रह सकेंगे। वह नहीं तो ज़रा सी विपरीत हवा के
झोंके से ही गिर पड़ेंगे। हम अकसर बच्चों से कहते कि पढ़ लिखकर महान बनो ।वह उचित होगा कि उन्हें प्रेरणाः पढ़
क्रमशः आगे ।

बनाएँ भावी पीढ़ी को सुसंस्कारी : ध्रुव-2

लिखकर बनो शालीन , बनो विद्वान आदि दी जाए ।वह बिना शालीनता के विद्वता अहं का संज्ञान हो जाती है ।हम उन्हें समझाएँ कि शालीन होओगे तो स्वतः महान हो जाओगे ।

हम जिस तरीके से जीवन यापन करते हैं उन्हें संस्कार कहते हैं। वह संस्कार ऐसे बीज हैं जो शैशव काल में ही बल्कि तथ्य तो यह है गर्भावस्था से ही बोये जाने शुरू हो जाते हैं।

वह जो फलित होते रहते हैं तथा परिपक्व अवस्था तक सतत फलित होते रहते हैं। इसका माता पहली पाठशाला है तथा तत्पश्चात शनै:-शनै: परिवार, गुरुजन व सामाजिक वातावरण इसमें जुड़ते रहते हैं। इन सब इकाइयों में जैसा वातावरण होता है उन्हीं का संस्कारों में परिवर्तन होता रहता है ।

वह जब माता-पिता व परिवार ईमानदारी, सेवा, संयम आदि जैसे गुणों को जीते हैं तो वे गुण बच्चों के स्वभाव का हिस्सा बनते जाते हैं।

हम आज की भागती-दौड़ती दुनिया में जब परिवार के साथ अर्थपूर्ण समय नहीं बिताते हैं तो भावी पीढ़ी के बच्चे भावनात्मक रूप से सुसंस्कार शून्य होते जाते हैं इसलिए माता-पिता व अभिभावकों को सचेत होने की जरूरत है कि परिवार में ऐसा वातावरण बनाए रखें कि वही भविष्य में संस्कारों का वट-वृक्ष बने। वह हम बच्चों को कोरा उपदेश नहीं स्वयं का उदाहरण दें ।

वह उनमें जो संस्कार डालने हैं हम उन्हें स्वयं जिएँ । हम यह समझें आज की भावी पीढ़ी परिवार की ही नहीं अन्ततोगत्वा देश की आधारशिला है । हमारा जिम्मा उसे सुसंकारित करना है तभी तो यह सिलसिला चलता रहेगा।

उत्सुकता

हमारे सामने टेबल पर कुछ है
देखने वाला चक्षुष्मान है
फिर भी हमको दिखाईं
सही से नहीं दे रहा है
हम उसे सही से जानना
चाहते है वह कोशिश
भी करतें है लेकिन फिर
भी जान नहीं पातें है
इसका भी तो छिपा
हुआ एक कारण है
एक बूँद और एक
सागर हम सागर की
एक बूँद को हाथ
में ले सकते है
लेकिन समूचे सागर
को हम हाथ में नहीं
ले सकतें है क्योंकि
एक बूँद हमारे लिए
ज्ञेय हो सकती है लेकिन
समूचा सागर हमारे लिए
अज्ञेय बना रहेगा ।

गणाधिपति गुरुदेव श्री तुलसी के 29 वें महाप्रयाण दिवस


वन्दन ! एवं इस अवसर पर मेरे भाव –
गुरु तुलसी को श्रद्धा से नमन करे हम ।
धर्म के प्रति आस्था को सुदृढ़ करे हम ।
गुरुदेव के गौरव को शिखरों चढ़ाएँ हम ।
संघ को शिखरों चढाएँ हम ।
तुलसी गुरु को ध्यायें हम ।
तुलसी गुरु का धर्म क्रान्ति का सूत्र अनूठा ।
हम सबने उसको पहचाना ।
अन्धाग्रह को छोड़ सनातन ।
सत्य तत्व को हमने जाना ।
क्षीर – नीर – निर्णायक ।
मन को हँस बनाएं हम ।
नैतिकता को जीवन का आधार बनाया ।
अणुव्रत के छोटे – छोटे संकल्पों को बताया ।
जन – जन को धार्मिकता का बोध दिया ।
बढ़ती हुई विषमता में भी ।
समता को बसाने का बोध दिया ।
शास्त्रों के उच्चारण से धार्मिकता का बोध दिया ।
धर्म के मर्म को समझा अर्हता का मार्ग बताया ।
तदनुसार व्यवहार – दिशा जग दिखलाई ।
धर्म नहीं चिंता करता ।
परलोक बने सुखदाईं।
उसको चिन्ता जीवन में लाकर ।
हमारे में कितनी पवित्रता आई ।
यही घोष अध्यात्मवाद का ।
गुरु तुलसी ने हमको सुनाया ।

जैसा अन्न वैसा मन : खण्ड-1

हम जैसा अन्न खाएँगे हमारा मन भी तो वैसा ही होगा । हमारे जीवन पर ख़ान- पान का विशेष प्रभाव पड़ता हैं । हमारे जीवन का मुख्य आधार खान-पान है । हमारे सुस्वाथ्य के लिए शुद्ध, सात्विक, सीमित और स्वास्थ्यप्रद आदि – आदि खान-पान हो |

हम अपने जीवन में केवल स्वाद के लिए ही खाएंगे तो डॉक्टर के कमाऊ पूत बन कर रह जाएँगे और कष्ट भी पाएँगे। यह पूर्वजों का बहुत सुन्दर कथन है जिसके लिए हम उन्हें नमन करते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए क्षुधा से कम खाना है ।वह सुख-शांति के लिए नम जाना और प्रसन्न रहने के लिए गम खाना आदि – आदि है पर विडंबना है कि आजकल अधिकांशतः जीने के लिए नहीं खाते हैं वह खाने के लिए जीते हैं।

हम यह समझें ! कि शुद्ध, सात्विक आहार का मूल जिसे ओज कहते हैं से ही सुस्वाथ्य व सुंदर विचारधारा बना रहता है वह ओज के लिए स्वास्थ्यप्रद समुचित भोज चाहिए । एक अदृश्य बात है कि न्याय व नीति से अर्जित अन्न व प्रेम से पकाया हुआ भोजन का बहुत महत्व है जो हमारा स्वास्थ्य ठीक रखता है इसीलिए कहा जाता है कि जैसा खाए अन्न, वैसा ही बने मन।

वह एक और बात कि हम भूख लगे बिना खाना नहीं खायें । वह भूख से कम खाना ही सही है । वह दो वक्त के भोजन के बीच चार-पाँच घंटे का अंतर हो। वह सूर्यास्त से पहले खा लेना स्वास्थ्य का सुंदर मंत्र है । हमको स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए ही खाना है ।
क्रमशः आगे ।

जैसा अन्न वैसा मन : खण्ड-2

जैसा अन्न वैसा मन : खण्ड-2

वह भोजन सदा प्रसन्न मन से ही करना है । वह आजकल की समस्या क्या करें भूख ही नहीं लगती । वह हमको भूख लगे तो कैसे लगे शरीर से श्रम करना तो नीचा जैसे काम है। वह हमको दो कदम भी पैदल चलना नहीं है , वस्त्र हाथ से धो लें और अनाज घट्टी से पीस लें आदि – आदि तो कहीं छोटे नहीं हो जाएँगे ?

वह हमने श्रम को त्याग दिया तो हमारी भूख भी गई भाग। इस विषय पर ऐसे बहुत चिन्तन हैं । हमारे द्वारा आसान ज़िंदगी का राज अपनाना हैं मानो कामना कम और शान्ति ज़्यादा है ।

वह चिकित्सा के जन्मदाता कहते है कि दवाइयाँ ही स्वस्थ होने के लिए नही बल्कि विश्वास भी ज़रूरी है। वह जैसा खाए अन्न वैसा होवे मन और योग रोग भगाए ।हमारे अक्षय जीवन का राज-आयु-आरोग्य और धन है ।

वह रसोई में सेहत का राज है । हमारे द्वारा खान-पान की शुद्धि हमें निरोग और स्वस्थ बनाती हैं जिससे हम तनाव मुक्त जीवन वह रोग मुक्त जीवन जी सकते है इसीलिए तो कहा जाता है कि खाने को न केवल पेट भरने का जरिया बल्कि पूजा की क्रिया समझिए हम यह जानें कि हर निवाला शरीर को ही नहीं आत्मा को भी पोषित करता है।

अतः हम सदैव सही से सात्विक भोजन बिना कोई विचार लायें मन लगाकर करें । वह भोजन के प्रति हमारी जितनी ज्यादा जागरूकता होगी उतनी ही हम सही से पौष्टिकता पाएँगे।

बनाओ निज को अभीष्ट उत्कृष्ट : खण्ड-1

मेरे जीवन का घटना प्रसंग दिवंगत आध्यात्मिक शिक्षक शासन श्री मुनि श्री पृथ्वीराज जी स्वामी ( श्री ड़ुंगरगढ़ ) मुझे वैसे हर काम पर बात कह अपना उत्कृष्ट करने को तत्पर कराते रहते थें ।

उन्होंने मुझे एक बार स्वाध्याय कराते हुए अचानक से कहा कि प्रदीप तुझे सही से घर गाँव समाज वाले नहीं भी समझ पायें या कोई भी नहीं समझ पायें तो भी तुझे अपना सदैव उत्कृष्ट देने को सही से बिना रुके अग्रसर रहना ही है या तुझे मृत्यु के बाद भी जिन्दा रहना है ।

वह चाहें भले तेरे कितनी भी स्थिति विकट आ जायें अभी की तरह मजबूत और मजबूत सदैव रहना है । यह शब्द सुनकर मैं अवाक् रह गया तो फिर वो आगे बोले अपना सही से अच्छा करते जा प्रदीप और अपने करने में बढ़ता जा अभी की तरह तेरे लक्ष्य बड़े है वह ऐसे – ऐसे मुझे बोलते थे ।

खेर! मुनिवर तो अभी नहीं रहे लेकिन उनकी दी हुई शिक्षा मुझे अभी भी आगे बढ़ने को प्रेरित करती रहती है । हम देख सकते है कि जैसे पेड़ों का सारा दारोमदार जड़ों की मज़बूती पर है ।

वह मनुष्य की ज़िन्दगी की सुरक्षा,प्रगति एवं शोभा आदि सब मन की मजबूती पर निर्भर है। वह हीन भावना से अक्षमता, मन की दुर्बलता पनपती है। वह निश्चय ही हर क्षेत्र में सुधार
क्रमशः आगे |

बनाओ निज को अभीष्ट उत्कृष्ट : खण्ड-2


का प्रयत्न सदा ही वांछनीय और सही है पर मन में हमको उच्च मनोबल रखना चाहिए कि हम भी किसी से कम नहीं है । वह मनुष्य की जड़ें उसकी मनोवृत्तियाँ हैं । वह मनोवृत्तियाँ ही सही से हिम्मत, मनोनिष्ठा, लगन, श्रमशीलता जैसी अन्य प्रवृत्तियाँ हैं ।

ये सब यदि दृढ़ होंगे तो आसानी से जब जीवन में आँधी-तूफान या अन्य कोई अवरोध या व्यवधान आदि आते है तो उसका सामना किया जा सकता है । ये सब वृत्तियाँ ही काया की परिपुष्टता या दुर्बलता पर निर्भर नहीं है बल्कि मनोबल की प्रचुरता पर है ।

वह महात्मा गाँधी इसके साक्षात उदाहरण हैं जिनका मनोबल कभी नहीं डिगा यद्यपि कितने ही विपरीत कारण आए । इसी तरह वे ही मनुष्य विजयी होते हैं जिनका मनोबल अन्य वृत्तियाँ व प्रवृत्तियाँ दृढ़ कालजयी होती हैं।

हमारा जीवन में प्रस्थान से पूर्व, मंजिल की सम्यक् दिशा का अवबोध जरूरी है। वह दृढ़ संकल्प शक्ति और गतिमान चरणों के बिना हमारी जीत अधूरी है।

अतः जो अपनी जीवन यात्रा के पथ पर प्रबल मनोबल के साथ बढ़ते हैं, निश्चित ही उनकी मनोकामना सही समय पर पूरी होती है।हमारे द्वारा मनोबल के बिना तो चार कदम चलना दुर्भर है । हम मनुष्य श्रेष्ठ
क्रमशः आगे |

बनाओ निज को अभीष्ट उत्कृष्ट : खण्ड-3

विवेकशील जीव है। हम अपने मन का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों करने में सबसे ज्यादा सक्षम है। वह सिर्फ मनुष्य ही घोर कर्म कर्ता और क्षय करता है।

वह मनुष्य का मनोबल ऐसा साहसिक कार्य है,जिससे वह चट्टान जैसे बंधे हुए कर्मों के उदय को समभाव से सहन कर अपना आत्मोद्धार कर लेता है,जैसे – सबसे बड़े उदाहरण हमारे सामने गजसुकुमाल मुनि हुए हैं,जिन्होंने समभाव से वेदना को सहकर मुक्ति श्री का वरण किया आदि – आदि ।

हम भी उन जैसे अपना दृढ़ मनोबल बनाये रखते हुए अपने कर्मों को क्षय करने में सफल हो क्योंकि हम यह मान के चलें कि किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि दृढ़निश्चयी के पैरों में कोई बेड़ियाँ डाल सके। वह उनका मनोबल भी ऐसा दृढ़ होना चाहिए कि उन्हें आने वाली बाधाएँ कभी न रोक सकें।

हम यह भी याद रखें कि दृढ़निश्चयी मनुष्य अति बलशाली, मनोबली होता है। अतः हे मानव ! अपने आप को ऊँचा उठाओ। वह समझो ! तुम्हारे ही मुट्ठी में स्वर्ग है , तुम यथा अवसर खोलने में उसके द्वार पूर्णतया स्वतंत्र हो। अतः विवेकपूर्वक यथा समय यत्नपूर्वक उसे खोलो और अपना अभीष्ट उत्कृष्ट सही से पा लो।

जीवन की सच्ची पूँजी


हमारे जीवन की सच्ची पूँजी का जब पूछा जाता है तो प्रायः प्रायः का यही जवाब होता है कि अर्थ ही हमारे जीवन की सच्ची पूँजी है । इस तन को सुसज्जित करने से भी बड़ा मन को सजाने का काम है क्योंकि इसके निश्चित मिलने वाले कुछ अकल्पित शानदार परिणाम है । वह हमारे जीवन के साथ रहने वाली हमारी पूँजी है ।

हमारे जीवन की सच्ची संपत्ति हमारा पद-प्रतिष्ठा नहीं है अथवा नोटों से भरा तिजोरी की कुँजी आदि – आदि नहीं है । यह हमारे तन की तन्दुरूस्ती एवं आदर्श चरित्र की पूँजी है ।

किसी ने अंग्रेजी में क्या सटीक कहा है कि When Wealth Is Lost, Nothing Is Lost When Health Is Lost, Something Is Lost. When Character Is Lost Everything Is Lost. सत्य, ईमानदारी, मिलनसरिता,करुणा, कर्तव्यनिष्ठा आदि जैसे चारित्रिक गुण हैं जो हमको सही से लोगों के दिल से प्रतिष्ठा दिलाते हैं ।

इन आधारभूत गुणों से रहित पद-प्रतिष्ठा दीखने में चमक की प्रतिष्ठा लग सकती है पर उसमें लोगों की दिल से निष्ठा नहीं होती है। वह शक्‍ल से खूबसूरत लोग दिल से भी खूबसूरत हों ऐसा जरूरी नहीं है, आत्‍मा की सुंदरता पाने के लिए तो व्यक्ति में गुणों का होना जरूरी है ।

वह दिखने में बुरा होते हुए भी अगर कोई गुणवान और प्रतिभावान हो तो उसे कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता है क्योंकि जीवन की लंबी दौड़ में साँझ की तरह ढलते रूप की नहीं बल्कि सूरज की तरह अँधेरे में उजालों को रोशन करने वाले गुणों की कद्र होती है ।

हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जो बाहरी खूबसूरती के पैमाने को परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहतें हैं, अतः दुनिया में भीतर की खूबसूरती का एक ही पैमाना है और वह आत्मा से पवित्र और सुंदर होना है ।

अतःजीवन का असली धन लोगों के हृदय से निकला आदर है जो हमारे जीवन मूल्यों के कारण हमारा सम्मान जो हमारा सर ऊँचा रखते हैं।यही हमारे जीवन की सच्ची पूँजी है ।

सर्वश्रेष्ठ तीर्थ


दुनिया में धर्म के बहुत तीर्थ है लेकिन इन सबसे अच्छा भी एक तीर्थ है वह है हमारा हृदय । हम जीतने अधिक निर्मल पावन होंगे उतने ही अधिक अपने आप के पास होंगे । जीवन मे आत्मोत्थान का बरसता रहे हमारे सावन जिसने राग-द्वेष कामादिक आदि जीते सब जग जान लिया ।

सब जीवों को मोक्ष – मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया ।बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो । भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो। और भक्ति में रमते रहे और बनकर सार्थक स्वर्ण कसौटी पर खरे उतरे । मीरा की तरह जिसका ज़हर भी अमृत हो गया था।

जान ले हम आत्मा में शक्ती हैं । मीरा सी भक्ति हैं। हमें भीतर में रहना हैं । बाहर से कहना हैं। जीवन समंदर हैं । जीना भी अंदर हैं। तन धोया मन मलिन रहा, मन की मलिनता हेतु कषायों की सफ़ाई बेहद ज़रूरी है ।उन पर ध्यान के नियंत्रण का अंकुश और एकाग्रता के संकल्पों की झाड़ पोंछ हमेशा होनी चाहिए।ताकी मन चंगा तो कटौती में गंगा।

विरासत में अपने जीवन में हो स्वच्छता भरे विचारों की शृंखला जो हम ऐसे रखे की जिसके लिए मन में भाव हो सिर्फ़ अर्पण और समर्पण का। यह हमारे मन का असंतोष ही तो है हम को लोहा मिलता है किन्तु हम सोने के पीछे भागने लगते हैं।

पारस की खोज करते हैं ताकि लोहे को सोना बना सकें। और असंतोष रूपी लोभ से ग्रसित होकर पारस रूपी संतोष को भूल जाते हैं ।जिसके लिए हमें कहीं जाना नहीं पड़ता बल्कि वह तो हमारे पास ही रहता है। बस आवश्यकता है तो उसे पहचानने की।मानसिक, वाचिक,कायिक आदि हिंसा का अतिक्रमण हुआ हो ।

जान या अनजान में किसीका भी दिल दुखाने में हुआ हो व्यतिक्रमण आदि तो सामने वाले से हम क्षमायाचना कर ले । क्योंकि भूल होती पीठ की तरह जो दूसरों की तो दिख जाती हमें लेकिन नहीं होता स्व निरीक्षण ।हम समता भाव का कर विकास करे आत्म परीक्षण ।

जो हुई गलतियां अब तक उसे आगे से न हो ऐसे दे हृदय से स्वयं को प्रशिक्षण । जितना निर्मल,निश्छल और निष्पाप आदि हमारा हृदय होगा हम होंगे उतने ही पास सर्वश्रेष्ठ तीर्थ के वह हमारे शून्य होंगे संताप ।

असली अमीरी


हमारे में से अगर किसी के पास हीरे-जवाहरात,बैंक बैलेंस आदि का भण्डार है किन्तु हमारा तन-बदन असाध्य रोगों से बीमार रहता है तो वह सारी दौलत एकदम बेकार है । मनुष्य की असली पूँजी स्वस्थ तन, स्वस्थ मन है तभी यह सारा धन आनन्द दे सकता है ।

यह कहा भी गया है कि पहला सुख निरोगी काया दूजा सुख घर में माया आदि-आदि है । वह अगर किसी के पास दुनिया की सारी दौलत है पर जब अंतिम समय आता है तो वह सारी दौलत एक पल की भी मोहलत नहीं खरीद सकती है ।

Health is wealth पहला सुख निरोगी काया, धन से दवा खरीद सकते है पर स्वास्थ्य नहीं ख़रीद सकते है । यह तो सच्चाई है। प्रतिरोधात्मक शक्ति जब तक कार्य करती है तब तक स्वास्थ्य के प्रति किंचित लापरवाही से बचा जा सकता है।

जब स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही का नतीजा सामने आता है तब health is wealth का स्वर स्वत मुखर हो जाती है। सामान्य स्वास्थ्य की लापरवाही को देखकर यह लग सकता है कि क्या यह सही है health is wealth . हमारे जीवन में सुख और दुःख , धूप-छाया की तरह सदा साथ रहते हैं ।

हमारी लंबी जिन्दगी में खट्ठे-मीठे पदार्थों के समान दोनों का स्वाद चखना होता है । वह सुख-दुःख के सह-अस्तित्व को आज तक कोई मिटा नहीं सका है । हमारे जीवन की प्रतिमा को सुन्दर और सुसज्जित बनाने में सुख और दुःख आभूषण के समान है ।

वह इस स्थिति में सुख से प्यार और दुःख से घृणा की मनोवृत्ति ही अनेक समस्याओं का कारण बनती है और इसी से जीवन उलझनभरा प्रतीत होता है । अतः जरूरत है इन दोनों स्थितियों के बीच संतुलन स्थापित करने की और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की आदि – आदि ।

आज लोग कैरियर और पैसे की दौड़ में स्वास्थ्य की ओर ध्यान ही नहीं देते हैं। वह जंक फूड खाना और देर रात तक जागना दिनचर्या बना लेते हैं और स्वास्थ्य पर ध्यान देने की बात को तो ताक पर टांग देते हैं।

हम इन सब का परिणाम देख ही रहे हैं कि कहाँ जाना है और कहाँ जा रहे हैं। अतः हम पहला सुख निरोगी काया पर ध्यान दें , यही असली अमीरी है जान लें।

रहें प्रकृति के साथ : ध्रुव-1

हम हमारे जीवन में सदैव प्रकृति के साथ रहें । हमको सृष्टिकर्ता ने प्रकृति से हमारा प्राकृतिक रूप से आनन्दित जुड़ाव किया है पर अफसोस! हमने उस ओर सही से ध्यान ही नहीं दिया है।

हम अपने जीवन में अधिकांश समय व्यर्थ की भाग-दौड़ में ही व्यतीत कर रहे हैं और किया है। हम अपने जीवन में जरा अनुभव करके देखें तो सही प्रकृति हमें जीवन के सरल, सहज और वास्तविक सुखों आदि का आनन्द प्रदान करती है और हमारे जीवन को प्रसन्नता से भरती है।

वह जीवन जीने की कला सिखाती है। अनादि काल में एक बार पैड़ के फल तोड़कर खाने से ३,४ दिन भूख नहीं लगती थी इतनी शरीर की फल से तृप्ति होती थीं ।

वह फिर धीरे- धीरे प्रकृति का दोहन होने लगा या यूँ कहे पेड़ की कटाई होने लग गयीं तो पैडों के फल की मिठास भी कम होने लग गयी और दिनो दिन हालत बद से बदतर हों रहीं हैं जिससे शुद्ध हवा , पानी का अभाव तो दिख हीं रहा हैं । वह साथ – साथ में नित नयी असाध्य बीमारियाँ भी आ रहीं हैं ।

वह हमने यदि सही से इसको नहीं रोका और अपने कदम बड़ी दृढ़ता और शीघ्रता से और अगर यहीं हालत रहें तो पूरी मानव जाति का अंत दूर नहीं है ।हम देख सकते है कि प्रकृति बहुत धनवान है और साथ ही कृपावान और उदार है । वह हर समय हर किसी के लिए उसका द्वार खुला रहता है । वह जब भी कोई चाहे, जैसे चाहे , जितना
क्रमशः आगे ।

रहें प्रकृति के साथ : ध्रुव-2


चाहे अपना भण्डार लेकर भर ले। प्रकृति का हर अंश कुछ न कुछ संवाद मनुष्य के लिये लिये हुये है । हम सूरज की ही बात करें । हमको हर शाम को अस्त होता सूरज यह सौग़ात देता है कि हे मानव ! हर किसी का सूरज सदा चमकता ही नहीं रहता है ।

वह हर किसी के जीवन में कभी न कभी एक ऐसा दौर आता ही आता है जब वह अस्त होता ही होता है पर हर भोर का सूरज जब उदित होता है तो अपनी सुनहरी लालिमा लिए तब बड़े गर्व से कहता है कि हे मानव! जो भी ऊँचाईयों से गिरा है वह गिरा ही नहीं रहता है ।

वह कभी न कभी पुनः उठ कर ऊँचाईयॉं को छू सकता है । यह उत्थान, पतन की प्रक्रिया तो जीवन की स्वाभाविकता है। अत: हमको इन्हें स्वाभाविक रूप में ही लेना चाहिए। वह हमको अपने जीवन के उत्थान में न अति प्रसन्न व पतन में अधिक अवसाद नहीं होना चाहिए। यह सब तभी हो सकता है जब हम उसके साथ नित कुछ समय व्यतीत करें।

हम यदि हम शहर में हैं और जहाँ जगह की तंगी है तो घर पर ही कुछ पौध लगा लें। वह उनकी देखभाल करें। वह इन
नन्हें पौधों को रोज बढ़ता देख न केवल हमारे मन को शांति मिलेगी बल्कि आत्मा को भी ऊर्जा मिलेगी। अतः हम प्रकृति के साथ रहेंगे तो हमको जीवन जीने की और ही बात होगी ।

जीवन का शाश्वत सत्य

जीवन का शाश्वत सत्य
आत्मा अजर अमर अविनाशी
शुद्ध रूप है ये दिव्य प्रकाश
निज आत्मा में ही हैं परम सूख
हो यह सम्यक् चिंतन हमारा
सात्विक जीवन उच्च विचार
से आत्मा को जीत कर हम
तोड़ जन्म मरण की बेड़ियां
मुक्त बनायें हम अपने को
मार्ग निर्देशन सद्गुरु
के ही चलकर
सही से कर सकते है
राग- द्वेष को प्रतनु और
परिष्कृत जन्म मरण को
हो जायेंगे सभी भव पार
यह जीवन का शाश्वत सत्य हैं ।

अंतराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस : खण्ड-1


सकारात्मक प्रशिक्षण से ही हम अपने मस्तिष्क को उर्वर बना सकते हैं । अज्ञात दिशा मे अपने जीवन की नैया को व्यर्थ मे हम न भटकाएं।यह सच है कि वृक्षारोपण से पर्यावरण की विशुद्धि होती है पर इसके लिए कंटीली झाड़ियां नहीं, फल देने वाले पेड़ उगाएं ।

पर्यावरण जिसको हमारी तथाकथित आधुनिक सभ्यता ने तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं रखी है । पर्यावरण को जो क्षति हुई है और हो रही है वह सामान्य नहीं हैं पर अत्यंत खेद की बात है हमारा ध्यान भी इस ओर कहीं नहीं जाता हैं ।

आज हमें न पाखी की चहचहाट सुनाई देती है, न पहले की तरह इतनी अधिक संख्या में इनका पेड़ों पर बैठना दिखाई देता है । न उनका तिनका-तिनका जोड़ जोड़ कर घोंसला बनाते देखा जाना। इस तरह देखा जाये तो हम बिना जाल बिछाये ही इनका शिकार कर रहें हैं।

पेड़ों को काट काट कर, जलाशयों (Water Bodies) को भर भर कर । तृणमूलों पर कंकरीट बिछा कर आदि – आदि , और हम हमारी यह असंवेदनशीलता महसूस ही नहीं करते कि हम पर वह कितनी भारी पड़ रही है। प्रकृति भी हमारे लिये अपनी जगह कम करती जा रही है।

भविष्य में इनका परिणाम यह होगा कि हमारे देखने के लिये न अच्छे दृश्य रहेंगे,न सुनने को कर्णप्रिय आवाजें। और तो और साँस लेने के लिये भी ऑक्सीजन के भी टोटे पड़ जाएँगे। हमने प्रकृति के उपहार की क्या हालत की हैं ।पंछी का हाल बेहाल हुआ हैं क्योंकि मनुष्य के दूषण से जीना उसका मुहाल हुआ हैं ।
क्रमशः आगे |

अंतराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस : खण्ड-2

वायु को प्रदूषित करने में हमको लाज नहीं आ रही है , हम दानव सरताज बने , नदियाँ संजीवनी थी उसमें कचरा,मैला डाल कर नीर को हमने मलिन कर दिया हैं , पंछी तो पानी चोंच भर पी उड़ जाता है पर हमारी लिप्सा पानी की व्यर्थ बह रही है ।

हमने हर खिड़की मूँद ली,भर-भर पत्थर ईट,पंछी के घर छीन लिए जो पेड़ पर बसेरा कर खुले आकाश में उड़ते,धरती मैली नही करते-थोड़े जल आस, सुख सुविधा हेतु हुआ प्रकृति का ये क्या हश्र कर दिया हैं ?

प्रकृति की उदारता हमें सदैव निःशुल्क प्राप्त हुई है जो हमारे जीवन का आधार बनी हैं लेकिन उसकी उदारता का मानव ने दुरुपयोग करते हुए दोहन, शोषण प्रारंभ कर दिया ये चिंतनीय है आखिर मानव स्वभाव इतना स्वार्थी क्यों ? प्रकृति को यदि हम संरक्षण और संवर्धन नहीं दे सकते तो उसके दोहन से हमको दूर रहना चाहिए ।

हमको यह समझना होगा कि जंगल है तो प्राण वायु है, बादल है पानी है जो हमारे जीवन का आधार है । अतः जीना है तो पर्यावरण के प्रति जागृत हो हमें इसकी रक्षा करनी होगी वरना प्रकृति जब अपने संतुलन के लिए अपना रौद्र रुप दिखलाएगी तो हमारे प्राण संकट में ही होगें ।

उत्तम स्वास्थ्य-शांतिपूर्ण -शुद्ध हवा का जीवन हमको पेड़ों से ही प्राप्त होते हैं । प्रकृति और हम एक दूसरे से ऐसे जुड़े है की जीवन कि रक्षा अगर हमको करनी है तो पर्यावरण को सुरक्षित करना होगा । यही हमारे लियें काम्य हैं।

स्मृति-विस्मृति


प्रकृति ने हम इन्सान को स्मृति और विस्मृति दोनों ही गुण दिए है । आदमी ने दोनों को ही आवश्यकतानुसार अपने काम में लिए हैं। वह दोनों ही यथावस्था उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इसका स्पष्ट तात्पर्य है कि केवल आलस्य और आरामतलबी में ही नहीं, उसने अपने दिमाग का मालिक बनकर कहीं अधिक उपयोग किया है और दुनिया को कहाँ से कहाँ लाकर बिठा दिया है।

हमारे जीवन में सफलता के लिए आत्मविश्वास उतना ही आवश्यक है, जितना मानव के लिए ऑक्सीजन तथा मछली के लिए पानी, बिना आत्मविश्वास के व्यक्ति सफलता की डगर पर कदम बढ़ा ही नहीं सकता है ।

वह आत्मविश्वास एक ऐसी ऊर्जा है जो सफलता की राह में आने वाली अड़चनों,कठिनाइयों एवं परेशानियों आदि से मुकाबला करने के लिए व्यक्ति को साहस प्रदान करती है ।

हमें वर्तमान समय में अगर कुछ पाना है, किसी भी क्षेत्र में कुछ करके दिखाना है, जीवन को खुशी से जीना है आदि – आदि तो इन सबके लिए आत्मविश्वास का होना परम आवश्यक है क्योंकि आत्मविश्वास में वह शक्ति है जिसके माध्यम से हम कुछ भी कर सकते है, आत्मविश्वास से हमारी संकल्प शक्ति बढ़ती है और संकल्प शक्ति से हमारी आत्मिक शक्ति बढ़ती है ।

अतः मधुमक्खी कण-कण से ही शहद इकट्ठा करती है, उसे कहीं से इसका भंडार नहीं मिलता है । उसके छत्ते में भरा शहद उसके आत्मविश्वास और कठिन परिश्रम का ही परिणाम है। आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय सफलता का सोपान है। यह हमारे जीवन के लिए प्रेरणा भी है और इसे हासिल करने के सूत्र आदि – आदि भी है ।

वह संकल्प शक्ति का विकास भी एक उपाय बताया गया है। यह निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि हम अगर अपने दिमाग का स्वयं मालिक बनकर मन में संकल्प लेकर काम करें तो कुछ भी किया जा सकता है बशर्ते संकल्पबद्ध निष्काम भाव हों ।

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस


नशा एक घातक बीमारी है । वह हमारे शरीर में अनेको ख़राबी पैदा करती है । नशे से हमारी जीवन शैली भी लड़खड़ा जाती है और नशे की क़ीमत भी खाने वाले को भारी चुकानी पड़ती है ।

आज के समय की सबसे बड़ी हानिकारक समस्या कोई है तो वह तम्बाकू सेवन है । यह स्वास्थ्य के प्रति भी सही नहीं है । यह ज्यादातर उत्पात में निरन्तर आदत में रहने आदि जैसे पदार्थ रहते है जिससे खाने वाला इसका शिकार हो जाता है ।

वह अपनी जीवन लीला को समय से पहले समाप्त कर अगले भव चला जाता है । वह ऐसा नहीं है कि खाने वाले नहीं जानते बल्कि वो इसके नशे में रत हो गए है । वह चाहकर भी इसको नहीं छोड़ पातें है । हम देख सकते है कि जागरूक जहाज में पानी का प्रवेश नहीं होता है ।

वह जागरूक मन के अंदर भी आवेश का नशे का आदि – आदि परिवेश नहीं होता है । हमारे इस जीवन का विटाट पाठ जागरुकता ही होती है ।हमारा अतः स्थल अगर जागरूक रहे तो नकारात्मकता के घुसने का आदेश नहीं होता है ।नशे में रत मानव को न आँखों को चैन, न दिमाग़ को आराम होता हैं ।

वह उसे हर समय उसकी मौजूदगी का ठप्पा लगाने की लत यही हो गई है । नशे की आदत को छोड़ कर सही से वर्तमान में जीना जीवन की एक बड़ी कला है ।

यह हमारे जीवन में समय प्रबंधन का एक अति उत्तम सिलसिला है । हमको गये जो समय को याद कर उसकी अतीत की स्मृतियों में भटकते रहने से बताओ क्या मिलेगा ?

हमारा यदि वर्तमान अच्छा होगा तो भविष्य भी अच्छे परिणाम देगा । वह जो वर्तमान के हर पल क्षण का सही उपयोग करता है, उसका वर्तमान तो आनंदप्रद बनता ही है और भविष्य भी अनेकानेक नई निष्पतियों के भंडार भरता है । अतः हमको इस अवसर पर इस नशे की प्रवृति को सही से छोड़ कर अपने जीवन को खुशहाल करना चाहिए । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

महाराणा प्रताप – खण्ड-1

रोशनी ने हमेशा ही
अंधेरे के घमंड को
दम-खम को तोङा है
शरीर से भी ज्यादा
ताकतवर होता
मन का बेलगाम
घोङा है जरूरी है
अभय की चेतना
का सही से विकास
डर से मुक्ति के लिए
साहस के चाबुक ने ही
तो भय के भूत को
सही से हमेशा भगाया
है हमारे जीवन में
बात इतनी गंभीर नहीं
ये शब्द कहे ओशो ने
किसी प्रवचन में
मन को किसी
भी परिस्थिति में
साहस प्रदान
करने के लिए
एक गुरुमंत्र के
रूप में एक श्रोता
ने कहा यह छोटा
सा वाक्य जम
गया मेरे जेहन
में गहरा भीतर में
हर बड़ी से बड़ी
कठिन से कठिन
परिस्थिति में भी
करता है बहुत
क्रमशः आगे ।

महाराणा प्रताप – खण्ड-2

प्रोत्साहन का काम
उसे संभालने में
हमारा पवन से भी तेज़
गति वाला मन सकारात्मक
या नकारात्मक वह बहता
निरंतर मन पर जब
बुद्धी का होता मिश्रण
तब मस्तिष्क लगता हैं सोचने
नकारात्मक सोच से
बीमारी उदासी व खिन्नता
सकारात्मक सोच से साहस
आशा व जागरुकता
नकारात्मक सोच हैं हिंसा
सकारात्मक सोच हैं अहिंसा
अहिंसा परमो धर्म:
बुद्धि सदैव सकारात्मक
मन का करें संचालन
नकारात्मक सोच व मन
का हों सदैव शमन
गोलकीपर की तरह
बुद्धि को रहना चाहिये
सतर्क व सावधान
अगर है हमको
अपने मन की
गहराई में विश्वास
तो महाराणा प्रताप
की तरह हमारा
सही से अवश्य फलेगा
सफलता का प्रयास
हैं यह उदाहरण
असंभव लगने पर भी
मिली जिन्हें सफलता
मन के गहन
विश्वास के कारण है ।

जुड़ें नित्य आत्मा से


भारतीय संस्कृति का दर्शन कहता है कि जीवन के सार को खोजना अपने भीतर की सच्चाई है । वह इसके लिए जरूरी दैनिक कार्यक्रम को उस ओर मोड़ना है । हम देख सकते है कि आज हर कोई बाहर की दुनिया को तन से लेकर सदन आदि ।

सभी भौतिक वस्तुओं को सुंदर से सुंदर सजाने में आकर्षक बनाने में लगा है । वह आदमी भूल जाता है कि इन सबका कोई मायने नहीं जब तक भीतर की दुनिया बिखरी पड़ी है। वह सच्ची शांति के राह में मन की अशांति रोड़ा बने खड़ी है । हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था ।

मन में हजार प्रश्न आ रहे थे कि क्या है जीवन? क्या है संसार? मेरे मन में सहसा विचार का चिन्तन आया कि तीर्थंकर केवली आदि -आदि ने सुख त्याग दिए , भोग त्याग दिए ऐसे सन्त स्वयं से संयोग करने संयम के पथ पर आत्मा के कल्याण को निकले क्योंकि उनको न धन चाहिए, न वैभव , मान आदि – आदि ।

वह मोह माया से भरे इस जगत में सही से सद्गति खोज रहे थे । उनको सिर्फ और सिर्फ आत्मा का सम्पूर्ण ज्ञान केवल ज्ञान चाहिए था । वह वन में गए । वहाँ उन्होंने बैठकर , खड़े रहकर सदैव मौन रहकर वृक्ष के नीचे जगह – जगह घूमकर आदि तप करना प्रारम्भ किया । उनका मन शांत था ।

वह आत्मा के चिंतन में लीन थे क्योंकि उनके हर श्वास में ब्रह्मज्ञान छिपा था। वह जब साधना पूर्ण कर सम्पूर्ण ज्ञान या केवल ज्ञान को प्राप्त कर जब प्रबुद्ध हुए तो धीमे से बोले कि जीवन में दुख है पर उसके उपाय भी मीठे है । वह जीवन में करुणा हो, ध्यान हो, सत्य संगी हो, अहिंसा जीवन के रंगो से बने आदि – आदि हो ।

वह उसके आत्म प्रकाश का इसका न ग्रंथों में, न शास्त्रों आदि – आदि में कही से भी सही से सत्य नहीं मिला क्योंकि वह स्वयं जगा और जगाया और जहाँ जिसने सही से इसको जाना मैं कहाँ वह सिद्ध बनने की राह पर आगे बढ़ साधना कर केवली बना । हमारी सच्ची शांति की राह में मन की अशांति रोड़ा बने खड़ी है।

अतः ज़रूरी है कि हम नित्य नियमानुसार कुछ समय ध्यान, प्रार्थना, जप, साधना आदि – आदि इन सबसे आत्मा को सशक्त बनायें और नित्य आत्मा से जुड़े रहें । हम उस पथ पर चले जहाँ शांति है, जहाँ मन नहीं बस आत्मा ही शेष है। हम तीर्थंकरों की यह वाणी सही से अपने जीवन में अपनाएं वह अपने भीतर के अंधेरे को मिटाएं।
यही हमारे लिए काम्य हैं ।

जो दिखाता है हिम्मत पाता है वही कीमत : खण्ड 1


हमेशा रोशनी ने ही अंधेरे के घमंड को, दम-खम आदि को सही से तोङा है। हमारे शरीर से भी ज्यादा ताकतवर हमारा मन का बेलगाम घोङा होता है। अतः हमारे द्वारा जरूरी है कि अभय की चेतना का विकास डर से मुक्ति के लिए हो क्योंकि साहस के चाबुक ने ही तो हमको किसी भी तरह के भय से लड़कर भागने की हिम्मत दी है ।

वह कहते है कि हिम्मत से आदमी बड़े से बड़े संकट का सामना कर उससे निकल जाता है । हमको भी क्या डर लगता है? हम डरते कब है? हम जब यह कल्पना करने लगते है कि ऐसा करेंगे तो क्या होगा!

वैसा करेंगे तो क्या होगा । हम बस ! यही सोच सोचकर अपने दिमाग में डर को हावी कर देते है। हमारे चाहे कैसी भी परिस्थियी आये हमको डरना नहीं है वह डर का मुकाबला करना है क्योंकि डर के आगे जीत है।

हमारे द्वारा सागर के किनारे खड़े होकर लहरों को निहारना एक बात है और समंदर के भीतर उतरकर लहरों के साथ खेलना अलग बात है । अतः जाहिर है कि जो खतरे उठाकर समंदर में उतरते हैं वही मोती पाते हैं। वह जो किनारों पर खड़े-खड़े लहरों को निहारते रहते हैं, उनके हाथ कंकड़-पत्थर ही आते हैं।

यह कुदरत का नियम है कि जो जितने खतरे उठाएगा वह उतना ही बड़ा पुरस्कार पाने का अवसर पाएगा। कहते है कि वो जीवन ही क्या जिसमें उतार-चढ़ाव ना आये।वह जब प्रतिकूल समय का हम सामना करेंग़े और उस दर्द को सहने की हिम्मत जुटायेंगे तब ही अनुकूल समय की ख़ुशियाँ व उसका अनुभव सही से महसूस कर पायेंगे।

हमारे इस जीवन में हर वस्तु परिवर्तन शील है।पानी वो ही होता है पर फ्रिज़र में रख देंगे तो बर्फ़ बन जाती है और फ़्रीज़ के बाहर रख देंगे तो वापिस पानी। भगवान ने मनुष्य को वो समझ दी है कि जब समय विपरीत हो तो थोड़ा संयम धारण करे।हम मन में यही चिंतन करे कि जब एक दिन उदय
क्रमशः आगे ।

जो दिखाता है हिम्मत पाता है वही कीमत : खण्ड 2

होने से लेकर वापिस दूसरे दिन उदय तक कितने पहर देखता है ठीक वैसे ही जीवन में बदलाव आये तो हमारा यही चिंतन रहे कि वह भी स्थायी नहीं रहेगा।हर अमावस्य की घोर अंधेरी रात आयी है तो कुछ दिनो बाद पूनम की चाँदनी भी दिखायी देगी। यह कहा जाता है कि डर के आगे जीत है।

वह खुद के डर पर काबु पाने वाला व्यक्ति जीवन के हर लक्ष्य को आसानी सें हल कर लेता है। वही डरने वाला व्यक्ति जीवन भर अपनी क्षमताओं को जान नही पाता है। हमको अपने जीवन की किसी भी हार को अगर दूर करना है तो अपने भीतर के साहस को जगाना होगा।

हमारा आत्मविश्वास बढ़ाना होगा । वह खुद के डर पर काबू पाने वाला व्यक्ति जीवन के हर लक्ष्य को आसानी से जीत सकता है। हार व जीत मनुष्य की मानसिकता है। हमारे में कितनी ही सबलता है, मगर मानसिक रूप से हम कमजोर है तो उस पराजय व हार को कोई नहीं बचा सकता है ।

इतिहास गवाह है कि जो डर से पार निकल गया उसने विश्व में कारनामे किये है व इतिहास रचा है। वह भय से बाहर निकलने के लिए दिल व दिमाग में दृढसंकल्प पैदा करे व सकारात्मक सोच रखे।

हम अपने आप पर अटुट विश्वास पैदा करे। वह जो भय मुक्त हो गया उसे कोई नहीं हरा सकता है क्योंकि मुसीबतों से घबराने से कोई भी बाधा पार नही होती है । वह कोशिश करने वाले की कभी हार नहीं होती है ।

हम होगे कामयाब एक दिन यह हौसला सदैव रखना भी डर के आगे जीत है क्योंकि जो हिम्मत दिखाता है वही इसकी सही से कीमत पाता है , इसीलिए तो साहस और शौर्य को विजेताओं का आभूषण कहा जाता है। वह इन आभूषणों को धारण करने के लिए भय को जीतना पड़ता है।

इच्छाएँ : ध्रुव-1

मन अंतहीन इच्छाओं का जन्मदाता हैं । वह कभी कुछ,कभी कुछ चाहता ही रहता हैं पर सब कुछ मन मुताबिक हो यह संभव ही नहीं हैं । सब इच्छाएँ जिसकी हों पूरी ऐसा कोई व्यक्ति ही नहीं हैं क्योंकि सब इच्छाएँ किसी की न आज तक पूरी हुई हैं, न होती हैं। यह तथ्य है कि इच्छाएँ अन्तहीन हैं जबकि शास्त्र वचन है जब तक इच्छाएँ अनन्त हैं आदमी शान्ति विहीन है।

इच्छाओं का मकडजाल के घेरे में जब घुसते हैं तो उससे निकलने के लिए फिर कहीं मार्ग नहीं है। इच्छायें फिर ऐसा ताना बाना बुनती है कि उसका फिर समुद्र के दो किनारों की तरह कोई ओर छोर नहीं हैं ।

इन्सान की इच्छापूर्ति कभी पूरी नहीं होती हैं । एक पूरी हो भी जाये तो दुगुनी इच्छा मुँह बायें सामने खड़ी रहती है , तभी तो कहते हैं कि इच्छाओं का आसमान अन्तहीन है। एक बाबा थे।

उनके पास पहनने को सिर्फ़ एक लँगोटी थी। एक दिन एक भक्त जो कपड़ों का व्यापारी था आया और कुछ कपड़ा लेने का बहुत आग्रह किया। बाबा ने सोचा इतना आग्रह कर रहा है एक लँगोटी जितना कपड़ा रख लेता हूँ। एक धोकर सूखाऊँगा दूसरी लँगोटी काम आ जायेगी।

एक दिन लंगोटी घास पर सूख रही थी चूहे ने काट ली। दूसरे दिन फिर दूसरी भी चूहे ने काट ली। भक्त को पता चला तो बिल्ली रखने की सलाह दी। पालतू बिल्ली पाल ली।
क्रमशः आगे

इच्छाएँ : ध्रुव-2


ली। अब बिल्ली म्याऊँ म्याऊँ करने लगी तब लगा इसको तो पीने के लिए दूध चाहिये , तब गाय की चाह पैदा हुयी। भक्त ने गाय ला दी। अब गाय दुहने वाली चाहिये , तो बाबा ने शादी कर ली ।परिवार बढ़ा।

एक बार पुराने भक्तों की टोली बाबा के दर्शन करने पहुँची। वहाँ खेल रहे बच्चों से पूछा – यहाँ बहुत पहले एक अकेले बाबा रहते थे वो कहाँ है ? इतने में बाबा आये कहा- मैं ही वो बाबा हूँ पर सिर्फ़ एक चाह ने केवल आश्रम की जगह गृहस्थ आश्रम बना दिया।

अत: यही शिक्षा जीवन में उतारनी चाहिये कि छोटी सी चाह भी बहुत बड़ा संसार बढ़ा देती है। इच्छाएँ आकाश के समान अनंत होती है जैसे आकाश अंतहीन होता है वैसे ही इच्छाओं का भी अंत नही होता है ।

इच्छाएँ बढ़ – बढ़ कर जितनी आँनलाइन होती जा रही है ,सुख की नींद उतनी ही ज़्यादा – ज़्यादा आँफलाइन होती जा रही है ।

एक कहावत सुनी थी कि जिसके पास दांत है उसके पास चने नही और जिसके पास चने है उसके पास दांत नही है अर्थात जिसके पास पैसा तो है उसके पास करने को साथ में काम नही है और जिसके पास करने को काम है उसके पास साथ में पैसा नही और जिसके पास काम और पैसा दोनो है लेकिन काम सही से करने का तरीका नही है आदि – आदि । क्रमशः आगे

इच्छाएँ : ध्रुव-3

जीवन में कुछ न कुछ कमी सबके पास है और इस मृग मरिचिका को पाने इंसान इच्छाओं की लम्बी – लम्बी कतार या आशाओं के ऊँचे – ऊँचे अम्बार लगाता हैं परंतु सही से प्रसन्नता का ताला केवल और केवल आत्म संतुष्टि की चाबी से ही खुलता है।

इसलिए ये उपाय हैं -हम आवश्यकताएँ हो सके जितनी कम करें और सही रहकर परिस्थितियों से लगातार तालमेल बिठाएँ। इंसान जितना हल्का होता हैं उतना ऊपर उठता हैं पर हमारा समूचा जीवन अतिअपेक्षा से भरा है।

भोजन-मकान-वस्त्र तो न्यूनतम आवश्यकतायें हैं ।शिक्षा-चिकित्सा की सुविधा भी चाहिए पर जब अति हो जाए तो समस्याएँ आती हैं। सोने के महल में भी आदमी दुखी हो सकता है यदि पाने की इच्छा समाप्त नहीं हुई हो और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो तो , हम अनुकूल व प्रतिकूल दोंनो में संतोष रखें, सुख का संबंध साधनों व धन से नही होता है , जिसका मन संतुष्ट उसके लिए सब जगह संपदा होती है ।

हम संतोष की साधना में आगे बढ़े, इच्छाओं का व भोग-उपभोग का सीमाकरण हो,पूर्णतया इच्छा खत्म होना मुश्किल है पर ज्यादा लालसा भी न हो, संतोष जीवन में हो,अतः इच्छाओं का अल्पिकरण करने से जीवन में शांति आ सकती है।
क्रमशः आगे

परहित सरिस धर्म नहीं भाई


मनुष्य ने अपनी तार्किकबुद्धि का तो बहुत विकास कर लिया है लेकिन वह भावनात्मक विकास में उतना ही पिछड़ रहा है | हम अपने निज स्वार्थ तो सभी सिद्ध करते है पर जो पर-कारज को प्राथमिकता देते है वे बहुत बड़ी कमाई कर लेते है । ऐसे छोटे-छोटे कर्म दूजों के दिलों में सदा-सदा के लिए अपनी जगह बना लेते है ।

वह उनके मूक कृतज्ञ भावों से जीवन सराबोर कर लेते है । गोस्वामी तुलसीदास जी की एक चौपाई है कि परहित सरिस धर्म नहिं भाई पर पीड़ा सम नहीं अधमाई ।

वह शास्त्रानुसार भी पर सेवा हमारे जीवन की पवित्र कमाई है । हम अपनों की सेवा करें वह कोई बड़ी बात नहीं हैं लेकिन पीड़ित मानवता की सही से निष्काम सेवा करना ही असली कमाई है ।

हम यह याद रखें कि सृष्टि में सिर्फ इन्सान को ही ईश्वरीय मन मिला है जिसमें सहानुभूति का कमल खिल सकता है । हम इसका सही से यथोचित उपयोग करें यह उचित है जिससे आधिकाधिक लोग लाभान्वित हों। प्रकृति मे भी सहयोग का,सेवा का आदि का सहज गुण विद्यमान है।

मनुष्य मे इसकी पराकाष्ठा हो सकती है इसलिए वह महान् है। हम अनासक्त भाव से अपनी इस क्षमता को सदैव विकसित करते रहें क्योंकि उपयोग शून्य वस्तु का होना न होना एक समान है। अतः हम कभी भी भलाई के काम को छोटा न समझें ।

वह निष्काम भाव से इसको करते जाएँ क्योंकि यह अदृश्य मोटा लाभ है । एक पुरानी पुरातन कहावत है कि परहित सरिस धर्म नहीं भाई इसीलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि परहित सरिस कर्म नहीं भाई।

स्व : श्रीमती माणक देवी बेगवानी


धन्य है माणक देवी ज्येष्ठ बदी 4 विक्रम संवत् 2082 को उच्च भावों से संथारा पूर्ण किया
41 दिन की तपस्या का साथ में योग मिल भव भ्रमण कम कर निज आत्मा का उद्धार किया
31 की तपस्या में संथारे के भाव को उच्च मनोबल से जागृत किया
7 मई को गुरु आज्ञा से साध्वी श्री गवेषणा श्री जी से संथारा पच्ख लिया
संथारा श्रावक की मनोकामना का तीसरा महान चरण है
इसके द्वारा सम्भव आत्मा के चरम लक्ष्य का वरण है
जीवन को सार्थक करने का उत्तम चिन्तन किया
निर्भय बन जाने का यह सुन्दर उपक्रम किया
भावों की निर्मलता में आत्मा को उच्च मनोबल से लीन किया
संसार है दुख का दरिया इसको सही से महसूस किया
शारीरिक अनुकूलता में भी संथारे का भाव जागृत किया
संथारा कर अपने कुल पर स्वर्णिम कलश को चढ़ाया
संथारा कर हैदराबाद की धरा को पावन किया
साध्वी श्री गवेषणा श्री जी का सुखद संयोग प्राप्त किया
94 वर्ष की उम्र में धर्म संस्कार पुष्ट थे
धर्म करने में उम्र का पड़ाव सहभागी बने थे
सादगी करुणा ममता से धर्म में आप्लावित थी
मोह से दूर सम्भाव में जीवन को खुशहाल करी थी
मनुष्य भव का सही से सार निकाल आत्मा के “प्रदीप “के निकट पहुँची
आप जैसे विरले व्यक्तित्व धर्म का आनन्द पा संथारे के सुख के पास पहुँची
धन्य है माणक देवी ज्येष्ठ बदी 4 विक्रम संवत् 2082 को उच्च भावों से संथारा पूर्ण किया
41 दिन की तपस्या का साथ में योग मिल भव भ्रमण कम कर निज आत्मा का उद्धार किया

न समझो खुद को कमजोर


कहते है कि वक्त कहता है मैं फिर न आऊँगा , मुझे खुद पता नहीं तुझे हँसाऊँगा या रुलाऊँगा, अतः जीना है तो इस पल को जी ले क्योंकि मैं किसी भी हाल में इस पल को अगले पल तक रोक न पाऊँगा | हमारे जीवन का सबसे बडा गुरु वक्त होता है क्योंकि जो वक्त सिखाता है वो कोई नहीं सीखा सकता है ।


हर व्यक्ति के जीवन में समस्याएं आती है किंतु महान वही होता है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने मन को कमजोर नहीं करता है । स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि खुद को कभी कमजोर नहीं समझो।

तुम भी तो ईश्वर के अंश हो। उनका इस बात में संकेत था कि शारीरिक के साथ-साथ मानसिक व भावनात्मक रूप से भी मजबूत रहो। वह उनकी दृष्टि में आत्मनिर्भर बने रहना उसका सबसे बड़ा आशीर्वाद निःस्संदेह, निर्विवाद आदि है क्योंकि असंभव भी संभव होने लगता है जब हम सही से अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने लगते हैं ।

हमारा जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता है, सुख और दुख का आना-जाना लगा ही रहता है । वह जिस प्रकार रात के बाद सुबह होती है, उसी प्रकार दुख के बदल छँट जाते है और खुशी के दिन आते हैं, रात दुख का प्रतीक है और दिन सुख का, जिस तरह पानी दो किनारों के बीच बहते हुए आगे बढ़ता है,उसी तरह जीवन में सुख और दुख दो किनारे हैं जीवन इन्ही के बीच चलता है ।

अतः हमें विपदाओं से कठिनाईयो से हार से हताश हुवें बिना, बिना रुके दुगुने उत्साह से अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाते रहना चाहिए, क्योंकि असंभव भी संभव होने लगता है ।

हम जब अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने लगते हैं । वह इसके लिए ईश्वर में हमारी दृढ़ आस्था रहे। वह इस कदर कि हर सफलता का श्रेय उसी को है क्योंकि हम तो मात्र निमित्त हैं । वह जो कुछ भी हैं वह ईश्वर प्रदत्त शक्ति में ही तो सीमित है । अतः फिर हम देखें मंजिल (विजय) जीत, सफलता आदि हमारें क़दमो में होगी।

मन के जीते जीत


हम देख सकते है कि दुनिया मृत्यु से ज्यादा भयभीत मृत्यु की आहट से है । वह वर्तमान की समस्या से अधिक चिंतित आने वाले कल से है । हर प्राणी की कमोबेश यही कहानी है,यही हकीकत है । वह हम सच्चाई को सही से आत्मसात कर सकें इसकी बङी जरूरत है।

हमारे जीवन में सही से सकारात्मक सोच व आत्मविश्वास ही मनोबल बढ़ाता है । वह नकारात्मक सोच व अस्थिरता ही मनोबल घटाता है । वह जीवन के संग्राम में जिनका मनोबल प्रचंड है उसे जमाना भी नहीं रोक सका है ।भगवान महावीर आदि प्रत्यक्ष उदाहरण है। बल के तीन प्रकार मन, वचन और शरीर है । हमारे मन की गति सबसे तीव्र है।

वह वचन और शरीर तो उसके सहवर्ती है । हमारा मन नही तो वचन और शरीर भी निरर्थक है क्योंकि मनोबल ही तो हमको सही से आगे बढ़ने को प्रबल बनाते है ।

अतः हमारा दृढ़ मनोबल ही हमको सफल बनाता है वह ये ही हमारी सफलता का राज है । हम देख सकते है कि जमीन से लेकर आकाश में जितने भी आविष्कार हुए है वह कठिन से कठिन काम में भी आसान बने है । हमारे दृढ़ मनोबल में ही तो असम्भव भी सम्भव बन जाए के सही से राज छिपे हैं । हमारे दृढ़ मनोबल में अद्भुत चमत्कार है । वह सफल बनने के सपने को साकार करता है ।

वह उसके सफल परिणाम हर समय दिखाई देते है । यह माना कि हमारी ज़िंदगी काँटों से भरा सफर है पर इससे गुज़र जाना ही असली पहचान है । हमारे जीवन में बने बनाये रास्तों पर तो सभी चलते हैं पर स्वयं के लिए रास्ते जो बनाये वही तो इंसान है । हमारे यह हमेशा ध्यान में रहे की हमारा सफल होने का संकल्प किसी भी और संकल्प से महत्त्वपूर्ण है ।

अतः महान सपने देखने वालों के महान सपने मनोबल दृढ़ ईच्छा शक्ति आदि – आदि से हमेशा पूरे होते हैं। संत कबीर ने क्या खूब कहा है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।कह कबीर हरि पाइए मन ही के परतीत। वह जब तक हमारा मन चंचल एवं अशांत रहेगा तो हमको सोच व चिन्तन भी मन में भ्रांत करते रहेंगे ।

वह सही निर्णय तभी लिए जा सकते हैं जब हमारा मन स्थिर और शांत हो और अशांत मन तो उलझनों से क्लांत रहेगा । वह हमारे स्थिर मन को ही हर उलझन आसान लगेगी ।

बाँटें दूजों के संग खुशी


वो जीवन ही क्या जिसमें उतार-चढ़ाव ना आये।वह जब प्रतिकूल समय का हम सामना करेंग़े और उस दर्द को सहने की हिम्मत जुटायेंगे तब ही अनुकूल समय की ख़ुशियाँ महसूस कर पायेंगे।

हम देख सकते है कि इस जीवन में हर वस्तु परिवर्तन शील है।पानी वो ही होता है पर फ्रिज़र में रख देंगे तो बर्फ़ बन जाती है और फ़्रीज़ के बाहर रख देंगे तो वापिस पानी।

भगवान ने मनुष्य को वो समझ दी है कि जब समय विपरीत हो तो थोड़ा संयम धारण करे।वह मन में यही चिंतन करे कि जब एक दिन उदय होने से लेकर वापिस दूसरे दिन उदय तक कितने पहर देखता है।

वह ठीक वैसे ही जीवन में बदलाव आये तो यही चिंतन रहे कि यह भी स्थायी नहीं रहेगा।हर अमावस्य की घोर अंधेरी रात आयी है तो कुछ दिनो बाद पूनम की चाँदनी भी दिखायी देगी। हम हमारे जीवन में आनन्दमय परिवार के साथ रहना चाहते है तो उसका मूलमंत्र है कि परिवार में दूजों के संग खुशी बाँटें जिससे खुद भी सुखी होंगे ।

परिवार के प्रसन्न, सुखी होने का तो यह मूल आधार है कि हर सदस्य में पारस्परिक प्रेम, त्याग , समर्पण और सेवा आदि का भाव हो जिससे हर सदस्य प्रसन्नमुखी हो । हमारे जीवन की बड़ी मूल्यवान पूंजी प्यार और सौहार्द भरे रिश्ते है । वह परिवार के सभी सदस्यों के आपस में हों ।

हमारे अच्छे व मधुर रिश्ते खुशी व प्रसन्नता के स्रोत होते हैं। वह जीवन को आनन्द से ओत-प्रोत कर देते हैं। वह ऐसे रिश्तों में प्यार और सम्मान होता है और इनसे स्वार्थ और अभिमान दूर रहता है।हम देख सकते है बिना रिश्तों की सहभागिता के कोई भी उत्सव हो या उपलब्धि आदि सब अधूरे हैं।

हमारे जीवन में अपनों के बिना कोई भी प्रगति माने नहीं रखती है इसीलिए तो कहना यही है और सही भी है कि रिश्तों की मिठास जैसा जीवन का कोई भी स्वाद नहीं है । यही तो संयुक्त परिवार की अटूट शक्ति है वह इसी से पारस्परिक एकत्व भाव की प्रभावना उत्पन्न होती है और आत्मिक संतुष्टि की भावना बढ़ती है।

रहे सदा क्षणभंगुरता का भान


हमारा जीवन क्षण भंगुर है इसका हमको सदैव स्मरण रहे । इस जग में जीते तो सभी हैं पर बेहतर वही जी पाता है जो जीवन की क्षणभंगुरता का बराबर अहसास रखता है।

हमको मानव भव मिला है । वह ज्ञानी संतो की वाणी मिली है और सत्य और अहिंसा की शक्ती आदि – आदि मिली है पर इसका क्या लाभ ? हम तो भौतिकवाद और उपभोक्तावादी चकाचौंध मे फँस गये है । हमने ख़ुद को संसार की इस क्षणभंगुरता में जकड़ लिया है और इसका कोई डर-भय नही है ।

हम क्यों इतना जानने के बाद समझने के बाद मन मे जीवन में दिशाहीन है । वह जब की हम जानते है की मनुष्य जन्म अनमोल रे, मिट्टी में मत रोल रे अब जो मिला है फिर ना मिलेगा,कभी नही-कभी नही , फिर भी हम आदमी इच्छा पूर्ति के लिए समुद्र पार दौड़ रहें है ।

वह समझ ही नही रहें है और- स्वर्ग पाताल राज करो , तिसना अधिकी अति आग लगेगी , इस मानव जन्म रूपी स्वर्णथाल का उपयोग धूल फेंकने के लिए , अमृत का उपयोग पैर धोने के लिए, उत्तम हाथी का उपयोग लकड़ियों की ढुलाई के लिए तथा चिंतामणिरत्न क़ौआ उड़ाने के लिए फेंकने वाला आदि – आदि कर रहें हैं।

वह क्यो हम इस मानव जन्म का सही लाभ नही उठा पा रहें है । वह जो व्यक्ति इस ध्रुव सत्य यानि जन्म के साथ मृत्यु अवश्यंभावी है को सदा स्मरण रखता है वही जीवन की वास्तविकता का वरण कर सकता है । वह तब समझ लेता है मृत्यु तो एक अटल सत्य है । वह एक न एक दिन अवश्यम्भावी घटित होने वाला तथ्य है।

वह मृत्यु का भान बन तब जीवन की इस क्षणभंगुरता को सही से समझने का ज्ञान जाता है । हमारा जीवन तो नश्वर है वह एक न एक दिन समाप्त हो ही जाोएगा। इस अटल सत्य को जान कर जीने वाला सदा सार्थक जीवन जिएगा। वह पल-पल हर क्षण जागरूक रहेगा जीवन का सदुपयोग करेगा।

2

स्व : श्रीमती माणक देवी बेगवानी के संथारा पूर्ण होने पर मेरे भाव-
धन्य है माणक देवी ज्येष्ठ बदी 4 विक्रम संवत् 2082 को उच्च भावों से संथारा पूर्ण किया
41 दिन की तपस्या का साथ में योग मिल भव भ्रमण कम कर निज आत्मा का उद्धार किया
31 की तपस्या में संथारे के भाव को उच्च मनोबल से जागृत किया
7 मई को गुरु आज्ञा से साध्वी श्री गवेषणा श्री जी से संथारा पच्ख लिया
संथारा श्रावक की मनोकामना का तीसरा महान चरण है
इसके द्वारा सम्भव आत्मा के चरम लक्ष्य का वरण है
जीवन को सार्थक करने का उत्तम चिन्तन किया
निर्भय बन जाने का यह सुन्दर उपक्रम किया
भावों की निर्मलता में आत्मा को उच्च मनोबल से लीन किया
संसार है दुख का दरिया इसको सही से महसूस किया
शारीरिक अनुकूलता में भी संथारे का भाव जागृत किया
संथारा कर अपने कुल पर स्वर्णिम कलश को चढ़ाया
संथारा कर हैदराबाद की धरा को पावन किया
साध्वी श्री गवेषणा श्री जी का सुखद संयोग प्राप्त किया
94 वर्ष की उम्र में धर्म संस्कार पुष्ट थे
धर्म करने में उम्र का पड़ाव सहभागी बने थे
सादगी करुणा ममता से धर्म में आप्लावित थी
मोह से दूर सम्भाव में जीवन को खुशहाल करी थी
मनुष्य भव का सही से सार निकाल आत्मा के “प्रदीप “के निकट पहुँची
आप जैसे विरले व्यक्तित्व धर्म का आनन्द पा संथारे के सुख के
पास पहुँची
धन्य है माणक देवी ज्येष्ठ बदी 4 विक्रम संवत् 2082 को उच्च भावों से संथारा पूर्ण किया
41 दिन की तपस्या का साथ में योग मिल भव भ्रमण कम कर निज आत्मा का उद्धार किया

(17-5-2025)

सदा दिवाली सन्त के


मुझे मेरे जीवन के अनेकों घटना प्रसंग इस विषय पर याद आ रहे है । मुझे एक बार प्रसंगवश किसी ने सन्त और अपने जीवन की खुशी के बारें में पूछा तो मैंने उसके भावों को समझते हुए कहा अपने दिवाली कब आती है तो उसने कार्तिक माह का कहा तो मैंने कहा सन्त के सदा दिवाली है ।

वह पूछा कैसे तो मैंने उसको विस्तार से बात को स्पष्ट कर बताया । चाहे जैन आगम हों, चाहे हो श्रीमद् भगवद्गीता दोनों ही बताते हैं कि शरीर केवल साधन है तथा वह नश्वर है और आत्मा अजर-अमर है ।

वह सही से जिसने भी इस मर्म को समझ लिया उसे फिर मृत्यु का क्या डर है , तब जीवन की हर समस्या छोटी लगने लगती है । वह बल्कि हम कह सकते हैं कि समस्या कोई समस्या ही नहीं लगती है । हर समस्या तब तन तक ही सीमित रह जाती है ।

हमारे कर्म जिसके लिए निमित्त हैं । वह हर दु:ख-सुख सब नगण्य लगने लगते हैं। हर बात या घटना को कर्मजन्य
समझ लेते हैं । हमारी जीवन यात्रा के दौरान कई ऐसे प्रसंग घटित होते हैं कि हमारा सुख-चैन समाप्त हो जाता है।

वह जो हमारे पास में है उसका सुख भोगने के बजाय जो अप्रिय घटित हुआ उसी तरफ़ हमारा मन बार-बार जाता है और हम व्यथित होने लगते हैं। मुझे किसी महापुरुष ने काफ़ी अरसे पहले कहा था कि अगर तुम्हारा किसी ने रुपया हड़प लिया तो ग़म मत करो क्योंकि वह अगर तुम्हारा है तो वापिस मिल जायेगा और नहीं तो भूल जाओ।

वह जीवन में और आगे काल- भाव से सही से अच्छी पूँजी साथ में ले जाने वाली का कमाने की सोचो ठीक वैसे ही अगर किसी ने हम्हें चुभती बात कह दी तो दिल से ना लगाओ क्योंकि जिसके पास जो होगा वो ही देगा।

वह उस जगह आप यह सोचो कि अगर हमारी कोई कमी है तो उसे सुधारें और नहीं तो उसे प्रेरणा स्वरूप मान कर आगे बढ़ें।जैसे भगवान आदि कितने हुए उनको कितने लोग बुरा-भला कहते थे उस समय वो बिना परवाह किये आगे बढ़ते जा रहे थे ।

वह कभी-कभी इंसान को असाध्य रोग लग जाता है , मन में यही सोचो कि मेरे कर्म कट रहे हैं।वह जब मैंने कोई कर्म बांधे हैं तो उनको काटना भी मुझे ही हैं।वह चाहे हंस कर काटो या रो कर उसका निर्णय हम्हें करना है इसलिये तो यह सही उल्लेख किया है कि सदा दिवाली संत की आठों पहर आनंद, फिर तो चाहे कुछ भी घटित हो, यंहा तो है सब समय परमानंद ।

जाकी रही भावना जैसी

हमारी जैसी भावना होगी वैसी ही हमारे जीवन की परिभाषा व मन की अभिलाषा आदि होगी यानी जब हमारा अंतर सुंदर भावों से सुसज्जित होगा तो हम जो कुछ भी कहेंगे वह सही से हमारे सकारात्मकता से सज्जित होगा।

वह हमारी सोच में,बात में, काम में आदि – आदि सकारात्मकता ही परिलक्षित होगी। हमारे भावों की दुनियां, विचारों के दर्पण मे प्रतिबिंबित होती है और भावों की तरगें अपने कृतकर्मों के भार को ही ढ़ोती है फिर सभी की सोच को एक जैसी मानना तो अति कल्पना है क्यूंकि हर व्यक्ति की वेदना, संवेदना व्यक्तिगत होती है।

हमारी सोच का सीधा असर मन पर पड़ता है।वह मन का त्वरित प्रभाव तन पर होता है क्योंकि हमारी सोच जैसी होगी वैसे ही हमारे विचार होंगे। वह जैसे हमारे विचार होंगे वैसा ही हमारा आचार होगा और जैसा आचार होगा , वैसा ही हमारा व्यवहार होगा ।

हमारा व्यवहार ही जीवन का मुख्य आधार है । अत: हम सदा सोच रचनात्मक रखें । वह हम स्वपन देखें बड़े पर व्यवहारिक भी हो जिससे जो भी हम कार्य करें वह मन से चाह कर छोटी – मोटी बातों को गौण कर करें । हमारे पुद्गल होंगे व बनेंगे आदि वैसे ही जैसी हमारी सोच होगी ।

अतः हमको जरूरत है पल-पल जागरूकता की जिससे कहीं नकारात्मक विचार हमको दबोच न लें। इस तरह यों हमारा जीवन सदा रचनात्मक रहेगा और व्यवहार भी सबके प्रति संवेदनात्मक, भावनात्मक आदि रहेगा ।

वह जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि के अनुसार हमारे जीवन संचालक हमारे भाव ही होते हैं। अतः कहते भी तो हैं जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम सदा सुस्वभाव में रहें, सबसे सद्व्यवहार करें यही अपेक्षित है । वह जीवन की सार्थकता, सफल जीवन की यथार्थता यही है ।

रहे सदा क्षणभंगुरता का भान


हम सब अपने – अपने कर्म अनुसार जन्म लेकर आयें है । इस जग में जीते तो सभी हैं पर बेहतर वही जी पाता है जो जीवन की क्षणभंगुरता का बराबर अहसास रखता है। वह सदा स्मरण करता रहता है कि मैं अपने सुकर्मों के सुफल से इस जग में आया हूँ और कुछ लेकर नहीं अपितु खाली हाथ आया हूँ तथा यहाँ से आयुष्य पूर्ण कर खाली हाथ ही जाऊँगा यही अलिखित शाश्वत नियम है।

आदर्शों का आभूषण मात्र बनने से जीवन आदर्श नहीं होता, आदर्श आचरण के रूप में घटित हों तो वह आदर्श जीवन निश्चित है। दुनिया के सारे सुख-वैभव-ऐश्वर्य फीके यदि मन में शांति नही है । मन को साधना बहुत ज़रूरी है जिससे हमारी अपनी असीमित इच्छाओं पर अंकुश लगे ।

हमारे मन की शांति को जिन चीजों से खतरा है, हमें उन चीजों से भी बचकर रहना चाहिए । वह हम अपने मन को थोडा बड़ा और मजबूत बनाएँगे तो मन की शांति के प्रवेश के लिए विवेक द्वार सदा खुला रहेगा। वह जो व्यक्ति इस ध्रुव सत्य यानि जन्म के साथ मृत्यु अवश्यंभावी है को सदा स्मरण रखता है वही जीवन की वास्तविकता का वरण कर सकता है ।

वह तब समझ लेता है कि मृत्यु तो एक अटल सत्य है और एक न एक दिन घटित होने वाला अवश्यम्भावी तथ्य है । वह मृत्यु का भान तब जीवन की क्षणभंगुरता को समझने का ज्ञान बन जाता है। हमारा जीवन तो नश्वर है वह एक न एक दिन समाप्त हो ही जाोएगा।

वह जो इस अटल सत्य को जान कर जीने वाला सदा सार्थक जीवन जिएगा और पल-पल जीवन का सदुपयोग करेगा , हर क्षण जागरूक रहेगा। वह यह सब हमारे संज्ञान में हर क्षण रहता है तभी हम धर्म-अधर्म के ज्ञान से जी सकते हैं।

ज्ञान सम कोई नेत्र नहीं : ध्रुव-1


एक घटना प्रसंग दिवंगत शासन श्री मुनि श्री पृथ्वीराज जी स्वामी ( श्री ड़ुंगरगढ़ ) मेरे को सदैव कहते थे कि प्रदीप सदैव जीवन में झुककर चलना और विनम्रता आदि को शिरोधार्य करना व ज्ञान प्राप्ति की सदैव ललक रखना और अपना स्वभाव अभी जैसे अच्छा रखना और अच्छा का प्रयास करते रहना आदि – आदि क्योंकि जीवन में ज्ञान ही आदमी के आचरण को झलकाता है जो तेरे व्यवहार से स्पष्ट परिलक्षित होता है ।

यह अच्छी प्रकृति तेरे को जीवन में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती रहे व लेखन के कार्य को सही से आगे बढ़ करते रहना जिससे उचित लक्ष्य ( जो मुनि श्री द्वारा इंगित) तुझे प्राप्त होते रहे । मुनिवर तो अभी नहीं रहे लेकिन उनकी दी हुई शिक्षा मुझे सदैव आगे बढ़ने को सही से प्रोत्साहित करती रहती है ।

कहते है कि अपने ज्ञान से विवेक को जिसने हमसाथी बना लिया उसने सही से अपना जीवन सुखी बना लिया है । वह सभी पहलुओं को जानकर स्वयं को समझा लिया उसने सत्यांश कहकर कर्मों से स्वयं को बचा लिया है । वह किसी अपने का दिल नहीं तोड़ा है वह जीवन के जीने का मकसद सुखद् पा लिया है ।

सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र रूपी त्रिवेणी ही स्वर्ग है और इसके विपरीत मिथ्यादर्शन,मिथ्या ज्ञान और कथनी करनी की एकरूपता आदि न होना ही नरक है। हमारी कथनी और करनी एक जैसी हो । हमारी सभी प्रवृतियां सही से शुद्ध भावकिर्यापूर्वक हो,स्वर्ग यही है और इसके विपरीत अशुभ प्रवृति मन,वचन और काया की नरक रूप है,दुःखदाई होती है। वह जीवन उसका स्वर्ग से कम नहीं जिसके मन में ज्ञानार्जन की
क्रमशः आगे

ज्ञान सम कोई नेत्र नहीं : ध्रुव-2

रुचि रही हो ।एकमात्र अंतर-प्रकाश ज्ञान है जिससे जीवन के वास्तविक स्वरूप का, हित-अनहित का, लाभ-हानि का,अच्छे-बुरे आदि – आदि सभी का भान होता है। ऐसे बहुमूल्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए सबसे प्रथम साधन स्वाध्याय है । हमारे मनीषियों , ज्ञानी मुनि जनों आदि ने अपने ज्ञान से इतने दुर्लभ शास्त्र तैयार किए हैं कि जिनमें जीवन के हर पहलू पर सही से अनुभवसिद्ध ज्ञान का भंडार है ।

वह जिनको आज भी ऐसे मनुज के सत्संग का सुयोग मिलता है, उनके लिए तो स्वर्णिम योग है। हमें वर्तमान समय में अगर कुछ पाना है, किसी भी क्षेत्र में कुछ करके दिखाना है, जीवन को खुशी से जीना है, तो इन सबके लिए ज्ञान का होना परम आवश्यक है,ज्ञान में वह शक्ति है जिसके माध्यम से हम कुछ भी कर सकते है, ज्ञान से हमको आत्मविश्वास आता है ।

वह इससे हमारी संकल्प शक्ति बढ़ती है और संकल्प शक्ति से हमारी आत्मिक शक्ति बढ़ती है । अतः मधुमक्खी कण-कण से ही शहद इकट्ठा करती है, उसे कहीं से इसका भंडार नहीं मिलता है।

वह उसके छत्ते में भरा शहद उसके आत्मविश्वास और कठिन परिश्रम का ही परिणाम है ठीक इसी तरह ज्ञान , आत्मविश्वास और दृढ़ निश्चय सफलता का सोपान है। यह कहा भी गया है कि ज्ञान के समान नेत्र नहीं और जिसको ज्ञानार्जन की रुचि नहीं उसका तो जीवन ही सार्थक नहीं है।

वह बात यह भी है कि जिस ज्ञान से मनुष्य के अंतःकरण का देवत्व जागरण न हो उसे व्यर्थ में ही ज्ञान ना कहो। अतः तभी तो कहा गया है कि ज्ञान सम कोई नेत्र नहीं है।

संथारा


आत्मा और शरीर ये दोनों भिन्न हैं। अगर हम मानव यह समझ ले तो मृत्यु का दुख और भय ही नही रहेगा। संथारा पूर्वक मृत्यु को प्राप्त करने का मतलब है कि अन्य सभी इच्छाओं का दमन करते हुए सिर्फ मोक्ष प्राप्ति की कामना करना। उपवास यदि निर्जरा का साधन बनता है तो भोजन भी निर्जरा का साधन बन सकता है।

बशर्ते भोजन का उद्देश्य स्पष्ट हो। जीने के लिए भोजन किया जाए ‌।भोजन के लिए ना जिया जाए। निर्जरा के 12 प्रकार बताए गए हैं। उनमें पहला भेद है- अनशन। अनशन के दो प्रकार प्रज्ञप्त है/ इत्वरिक और यावत्कथिक।वर्तमान काल के परिप्रेक्ष्य में उपवास से लेकर 6 महीने तक की जो तपस्या की जाती है वह इत्वरिक अनशन कहलाता है।जीवन पर्यंत के लिए जो अनाहार की साधना स्वीकार की जाती है वह यावत्कथिक कहलाता है।

अनशन की साधना सबके लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती है ।कुछ विरले मानव होते हैं जो मृत्यु का महोत्सव मनाते हैं। संसार असार को सही से समझ कर आगे के भव की चिंता करते हैं और नश्वर काया का मोह त्याग कर सहर्ष देह त्याग का प्रण लेते हैं। कष्टों से घबरा कर व हताश होकर ऐसा नहीं करते हैं बल्कि आत्मकल्याण के लिए शुद्ध भावों से सचेत अवस्था में करते है ।

मृत्यु तो शरीर की होती है आत्मा की नहीं आत्मा तो अजर -अमर है | आत्मा हमारें कर्मो के हिसाब से एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को धारण कर लेती है । शरीर की मृत्यु तो एक पड़ाव है, जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र को त्यागकर नये वस्त्रों को ग्रहण कर लेता है ।

न और स का अंतर ही तो हमारे मिथ्यात्व और सम्यक्त्व के आढ़े आता है।नकारात्मक दृष्टिकोण हमेशा हमारे भीतर संदेह पैदा करता है और सम्यक्त्व का बाधक बनता रहता है ।

हम सब जानते है कि एक दिन तो जन्म के बाद मृत्यु निश्चित है तो उससे डरने की बजाय श्रावक के अंतिम मनोरथ को पूरा करने के लिए हर पल विवेकपूर्ण तरीके को अपनाते हुए अप्रमत्त रहने के साथ अंतिम संलेखना संथारा पूर्वक अपने पंडित मरण की तैयारी तैयार करें और मृत्यु महोत्सव हो हमारे लिए ये सकारात्मक सोच के साथ हलुकर्मी होते हुए हिंसा का अल्पीकरण करते हुए अपना जीवनयापन करें।

साधना के द्वारा इस शरीर से सार निकालते रहे और पौष्टिक और कम आहार करते हुए जागरूकता पूर्वक अपनी प्रवृतियों को समेटते हुए निवृतिमय जीवन जीकर अपना मृत्यु महोत्सव मनाएं। हम अपने जीवन के कल्याण के साथ मृत्यु का भी कल्याण करें और दोबारा जन्म न लेना पड़े दो से ज्यादा आत्मा को यही हमेशा हम सही से करने का प्रयास करें।

संथारा करने वालों के लिये तभी तो कहते है संथारे की सही से डोर पकड़कर किया निज जीवन का उद्धार ।समता की पतवार पकड़कर करदी जीवन की नैया पार ।

चंद्रमा-खण्ड-1

वैशाख पूर्णिमा को
चंद्रमा अपनी पूर्ण
रोशनी को बिखेर कर
मंद-मंद बयार में
धरती के कण- कण
में मानो शीतलता
और विनम्रता के साथ
अपनी चाँदनी से हम
सबको हर्षित कर
खुशी प्रदान कर रहा
है मानो हमको
कलयुग में भी
सतयुग सी आभा
बिखरने वाली
चंद्रमा की चांदनी
यह संदेश दे रही है कि
आत्मा का पूर्ण ज्ञान ही
आत्मा का परम लक्ष्य है
आज के समय में
आकाश में फैल रहा
अंधकारमय वायुमंडल
फिर भी चांदनी तो देती
हमको अपने स्वभाव से
सदा ही सुखद ठण्डक
आज के दिन वैशाख
पूर्णिमा का संयोग
क्रमशः आगे

चंद्रमा- खण्ड-2

मानों जैसा नाम वैसा
हो जीवन का बागबान
मानव के भीतर चल रही
आँधियाँ ये स्वार्थ कीं
क़षायों ने किया अंधकार
फिर भी चाँदनी चंद्रमा की
शीतलता को दे रही आभास
हम मानव चंद्रमा से सीख कर
कैसे फिर हों चाँद की तरह
रात की चाँदनी का दीदार
मानव के जीवन में अभी
प्रेम स्रोत जा रहा सूख
अब नहीं गाता कोई
राग प्रेम मल्हार !
कब उतरेगा मानव के
स्वार्थ व क़षाय का भूत
चंद्रमा तक पहुँचने की
चाह ने ही तो राह दिखाई
तभी तो वहाँ के धरातल पर
मानव द्वारा ध्वजा फहराई गई
एवरिस्ट पर जाना हो या
सागर की नापनी गहराई
दुर्लभतम से दुर्लभतम
चाह ने ना जाने कितने
आश्चर्य कर राह की
क्रमशः आगे

चंद्रमा- खण्ड-3

अपनी शक्ति दिखाई
मानव दिमाग़ में है
अनंत शक्ति उस
शक्ति का कितना
प्रयोग करे व्यक्ति के
यह बस की बात
दिमाग़ में तरंगे
वैसी चाह हो जैसी
चाह रूपी तरंगो को
ऊँचाइयों को छूने के
लिये ज़रूरी है
सफलता रूपी राह
को पहचानना
अदम्य साहस ,
सकारात्मक सोच
आत्मविश्वास रूपी
शक्तियों को साथ में
रखना तब वह दिन
दूर नहीं होगा जब
मन चाही चाह का
सही राह पकड़ कर
पूर्ण हो जाना मानव
जीवन में धवल
चाँदनी रात में
शांत पयोधि पर
क्रमशः आगे

चंद्रमा- खण्ड-4

फैली चाँदनी चादर
की तरह शीतल सी
जो यादें हमेशा
सही से आसपास
बिखरी रहती है
ज़रूरत है उन्हें
उचित समय पर
उचित देखभाल की
ताकि वह बनी रहे
स्मृतियां दृष्टिपटलों पर
और करवाती रहे एहसास
हमें हमारे बीते हुए
अच्छे खुशगुज़ार
लम्हों का हम
इस पूर्णिमा में
भर दे रंग ज़िन्दगी में
इंद्रधनुष की तरह
और हमेशा हम
आत्मा के परम
लक्ष्य की और
अग्रसर हो ऐसे
प्रसन्न रहे जैसे
किसी पिटारे में
बंद रत्नों का
है खजाना ।

मातृ ( माँ ) दिवस


माँ शब्द कितना प्यारा हैं जिसका कोई किनारा नहीं हैं । माँ विधाता की अदभुत अद्वितीय कृति है । यह ऐसी अद्वितीय है कि बिना माँ न महात्मा पूर्ण है , न आत्मा पूर्ण है , न स्वयं परमात्मा पूर्ण है आदि – आदि । माँ केवल एक शब्द नहीं है । माँ शब्द में बहुत कुछ समाया है ।

माँ में इतना कुछ हैं कि इसकी महिमा अभी तक कोई माप न पाया हैं । माँ मन्दिर है ,माँ पूजा है , माँ से बढ़कर कोई भी दूजा नहीं हैं । माँ के मीठे बोल अमृत भरे होते हैं जो अपने जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं । माँ ममता की महासागर हैं जिसने अपने बच्चे के मन को सागर से भरा हैं । हर सुख – दुःख में माँ सदा साथी होती हैं ।मन का अंधेरा हरने वाली ज्योति माँ होती हैं ।

माँ से बढ़कर कोई दुजा नहीं होता हैं । हम सब बड़े खुशनसीब हैं जिन्होंने अपनी – अपनी माता की गोद में जन्म लिया हैं । प्रेम , स्नेह , समर्पण के भावों से ओत – प्रोत माँ होती हैं । माँ ममता का ऐसा महासागर हैं जो सहनशीलता के अनेकों गागर को अपने में समायें हुए हैं । उगते सूरज की उष्मा, चाँद की शीतलता आदि माँ के आँचल में है । माँ कोयल का गीत है तो सचमुच प्यार का संगीत भी माँ है ।

माँ हर जगह अपने बच्चों की खुशी के लिए अड़िग रहती हैं । माँ खुद पीड़ित होकर भी अपने बच्चों को सदैव खुशी देती हैं । जीवन में कितनी ही बड़ी से बड़ी जटिलता आ जाये , आँखों में पानी आ जाये आदि – आदि लेकिन वह बच्चों के जीवन में सदैव खुशी ही बाँटती हैं जिससे बच्चों का जीवन उज्ज्वल हों ।

माँ अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए कई रूप को धारण करती हैं । माँ अपने बच्चों के अरमानों को शिखर पर चढ़ते देख जीत का जश्न निहारती हैं ।सचमुच माँ इस धरा पर बच्चों का जीवन स्वर्ग बनाती हैं । माँ सदैव प्रेम , स्नेह , समर्पण भाव आदि से भरी होती हैं जो सदैव जग की सारी खुशियाँ देती हैं ।

इस जगत में माँ से बड़ा कोई भी नहीं है । अपना दिन जो माँ को प्रणाम कर शुरू करता है तो उसकी सोई निहाल हो जाता है। तीर्थंकरों की जननी भी माता हैं क्योंकि जो जगत विधाता थे वे किसी माँ की कोख से ही जन्मे थे जैसे – राम और कृष्ण आदि । माँ से ही संसार सम्पूर्ण होता हैं। माँ पर सारा घर बार टिका है।

माँ तुम ही भावी पीढ़ी की निर्माता हों । माँ तुम ही गुरु हों । माँ सरस्वती भी तुम्हें ही कहते हैं । माँ शक्ति की प्रतीक है । माँ सुसंस्कृति की लीक है । माँ के बलिदान के आगे सारा संसार नतमस्तक हैं ।

माँ से ही हम इस संसार में सूरज देखे हैं ।इस तरह कहने को और बहुत कुछ हम माँ के लिए कह सकते हैं । हमारी एक जिन्दगी भी कम पड़ जाती है माँ का कर्ज नहीं उतार पाती है। आज मातृ दिवस पर माँ तुम्हें शत शत नमन ।

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी का 52 वां दीक्षा दिवस (युवा दिवस)

तेरापंथ के गणमाली , महानता के आसन पर आसीन , विनय शिरोमणी , भव्य आत्माओ के भीतर संयम का दीप जलाने वाले , अध्यात्म तत्व वेता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी को 52 वां दीक्षा दिवस (युवा दिवस) पर मेरा शत – शत वन्दन व इस अवसर पर मेरे मन के उदगार श्री चरणो में –
वैशाख शुक्ला चतुर्दशी विक्रम संवत 2031 का पावन दिन था ।
उस दिन के वो पल निश्चित ही और दिनों से भिन्न थे ।
बालक मोहन ने 12 वर्ष की अल्पायु में संयम जीवन स्वीकार किया ।
साधुचर्या के कठोर नियमों को अंगीकार कर जीवन को पावन किया ।
संयम जीवन के प्रथम दिन से ही आप होनहार हैं ।
अपरमत्तता का साधुचर्या के प्रति जागरूक आपका जीवन हैं ।
साधु हो तो मुनि मुदित जैसा गुरु तुलसी ने फ़रमाया हैं ।
आँखों में करुणा का भाव,तेजस्वी मुख मंडल, संयत वाणी आपका कौशल हैं ।
पापभीरुता, शांति प्रियता, चिंतन में गंभीरता,व्यवहार कुशलता आपका जीवन हैं ।
ॠजुता, मृदुता, आध्यात्म निष्ठा, आचार निष्ठा आदि गुणों से आप परिपूर्ण हैं ।
आज आपके 52 वें दीक्षा दिवस पर यही भाव हम जताते हैं।
दिन दुना रात चौगुना गण का भंडार भर आप कोटि दिवाली राज करें।
आप दीर्घायु हों, निरामय रहकर अपने आशीर्वचनों की अनवरत वर्षा कराते रहें।
इन्हीं शुभ भावों के साथ हम सविनय वंदन ! आपको करते हैं ।

जरूरी है धर्म और सत्य की पहचान : खण्ड-1


हमारे जीवन की सार्थकता में धर्म और सत्य की पहचान है । कहते है कि ज्ञान में अहंकार उसी प्रकार मिश्रित होता है जिस प्रकार दूध में पानी, वास्तविक ज्ञानी हंस के समान होता है, जो ज्ञान तो प्राप्त करता है किन्तु उसके साथ मिश्रित अहंकार त्याग देता है ।

हमारे द्वारा ज्ञान प्राप्त करने से जीवन का पथ सही से आलोकित बनता है। वह ज्ञान का सूरज हर कदम पर साथ चलता है पर अहंकार का राहू जब डस लेता है तो सूरज को भी भरी दुपहरी मे भी सबकुछ धुंधला लगता है। अतः अहंकार रहित ज्ञान ही आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग है जिस पर चलता हुआ व्यक्ति ईश्वर साक्षात्कार के लक्ष्य तक पहुँचता है।

वह संकल्प मन पर नियंत्रण का सुखद अहसास है , संकल्प जीवन की सार्थकता का एक अटूट विश्वास है । हमारे मन की स्थिरता संकल्प से बढ़ती है । हमारे जीवन के पल – पल को परिमार्जित करने वाला एक संकल्प विन्यास है। हमको महाभारत के एक विशेष पात्र कर्ण का जीवन एक विशेष उद्बोधन देता है ।

उसे माता कुंती ने लोकलाज के भय से त्याग दिया। वह उन्हें गुरु द्रोणाचार्य ने भी धनुर्विद्या देने से इन्कार कर दिया लेकिन कर्ण ने इन सब विपरीत व्यवहार के बावजूद स्वयं को अपने दृढ़ निश्चय व पुरुषार्थ से धनुर्विद्या के ज्ञान से निपुण कर लिया।

वह उनकी शायद यह भूल रही कि उन्होंने गलत व्यक्तियों के प्रति अपनी निष्ठा रखी। वह उन्होंने सही से परिस्थितियों की सही-गलत की पहचान करने में भूल की और वास्तविकता की अनदेखी करी । उनके जीवन से हमको सबक यह है कि सार्थक जीवन में धर्म और सत्य की पहचान जरूरी है ।

हम देख सकते है कि किनारे पर खङे झूमते दरख्तों मे दरिया की महत्ता तब नजर आती हैं जब खलिहानों में झूमती डालियों के संग नन्ही सी चिङिया चहचहाती है ।

वह किसी के जीवन की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितने दिलों मे विश्वास और प्रेम की निर्मल ज्योत जला पाती है। कहते है कि अपनी मूर्खता पर पछताने से अच्छा है कि सही समय पर अपनी जिज्ञासा का समाधान मिल जाए। यह देखा गया है की मूर्खता
क्रमशः आगे

जरूरी है धर्म और सत्य की पहचान : खण्ड-2


का प्रारंभ, स्वयं को बुद्धिमान समझने से होता है इसलिए- Before fool for life- Lets take small steps . FAIL होने पर कभी भी हार न मानें क्योंकि F.A.I.L. (First Attempt In Learning) का अर्थ होता है सीखने की आपकी पहली कोशिश है ।

वह भी अंत नहीं होता, क्योंकि E.N.D.(Effort Never Dies) का अर्थ होता है और कोशिश कभी बेकार नहीं जाती है । वह NO में आपको जवाब मिलता है तो भी कोई बात नहीं क्योंकि N.O. (Next Opportunity) का अर्थ अगला अवसर होता है । वह इसलिए हमेशा POSITIVE बने रहिए ।

हमारे जीवन में धर्म,धन,विद्वता आदि अर्थहीन है यदि इसमें श्रद्धा,प्रामाणिकता और शिष्टता आदि ना हो | वह ज्ञान में विवेक का मर्म अनिवार्य है क्योंकि कोरी पढ़ाई का अहम् क़तई स्वीकार्य नहीं होता है ।

वह इसी तरह हमारे जीवन का हर क्षेत्र सुभावों की हरीतिमा से हरा-भरा हो ताकि हमारा जीवन सही अर्थों में ,वास्तविक सार्थकता से भरा-तरा हो । वह हमारी जिन्दगी की गाड़ी में जीवन के मूल सि्द्धान्तों का ईंधन सदैव रहें । हमारी वाणी दो प्रकार की होती है।

एक शब्द मुख से निकलकर औषधि के समान काम करता है और एक शब्द लोगों के मन में घाव कर देता है, जो आजीवन निकल नहीं पाता है ।

हमारी वाणी एक अमूल्य रत्न है इसलिए तराजू में तोल कर ही उसे मुंह से बाहर आने देना चाहिए। हम देखते है कि आदमी चाहे कितना भी धनी हो ,काया कितनी भी सुंदर हो अगर उसके वाणी में माधुर्य और कोमलता नहीं है तो वह प्रभावहीन हो जाता है।

वह ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए जो औरन को शीतल करें, आपहुँ शीतल होय। हमारे द्वारा वर्तमान में जीना जीवन की एक बड़ी कला है, यह समय प्रबंधन का सही से एक अति उत्तम सिलसिला है ।

हमको अतीत की स्मृतियों में भटकते रहने से बता क्या मिलेगा ? हमारा वर्तमान यदि अच्छा होगा तो भविष्य भी अच्छे परिणाम देगा । वह जो वर्तमान के हर पल क्षण आदि का सही उपयोग करता है, उसका वर्तमान तो आनंदप्रद बनता ही है और भविष्य भी अनेकानेक नई निष्पतियों
क्रमशः आगे

जरूरी है धर्म और सत्य की पहचान : खण्ड-3

के भंडार भरता है । हमको हमारे मन से अहंकार अभिमान एवं अहम् की भावना आदि का त्याग कर के मीठी वाणी बोलनी चाहिए । वह जिस वाणी में आदर प्रेम एवं सम्मान आदि की भावना सही से निहित होती है, ऐसी वाणी दूसरों तक पहुंचे तो उन्हें शीतलता प्रदान करती है और साथ ही हमें भी सुख की अनुभूति होती है।

हमको हमारे जीवन में सही से सफलता प्राप्त करने के लिए सदैव सही लक्ष्य की और निष्ठा रखनी चाहिए। हम सही से परिस्थितियों की, वास्तविकता आदि की अनदेखी नहीं करे ।

वह सही-गलत की पहचान करने में भूल नहीं करे । हमारे सार्थक जीवन में धर्म और सत्य की पहचान जरूरी है अन्यथा योग्यता और प्रतिभा भी कभी-कभी विपरीत परिणाम दे देती है चाहे व्यक्ति कितना ही दक्ष और महान हो । यह शरीर और हमेशा सांसारिक कार्यों में ही मग्न रहना चाहता है आत्मा के हित हेतु विभिन्न बहाने हर समय तैयार रहते हैं और इस प्रकार यह अमूल्य मानव जीवन नष्ट हो जाता है ।

हमारा जीवन आयाराम या गयाराम नही बल्कि एक ठहराव हो एक लक्ष्य हो तभी सार्थक है।वह कहने को तो जीवन में सब कुछ पाया जा सकता है मगर सब कुछ देने पर भी जीवन को नहीं पाया जा सकता है क्योंकि संबुज्झह किं न बुज्झह संबोहि खलु पेच दूल्हा ।णो हुवणमंति राईओ, णो सुलभं पूणरावी जीवीयं ।

हे भव्य जीव बोध प्राप्त करो, बोध क्यो प्राप्त नही करते ? परलोक में सम्यक बोध प्राप्त करना दुर्लभ है । वह बीती हुई रात फिर नही आती, इसी तरह मनुष्य जीवन, संयमी जीवन फिर सरलता से मिलता नही है । हमारा जीवन एक अवसर है श्रेष्ठ बनने का, श्रेष्ठ करने का, श्रेष्ठ पाने क आदि – आदि ।

वह जीवन की दुर्लभता जिस दिन किसी की समझ में आ जाएगी उस दिन इसकी सार्थकता होगी। हमें अपनी इन्द्रियों (शरीर) एवं मन पर नियंत्रण कर सद्कर्म , धार्मिक कार्य,एवं आत्म ध्यान हेतु समय अवश्य निकालना चाहिए ताकि हमारा उद्धार हो सके । वह तभी मानव जीवन की सार्थकता है । यही हमारे लिए काम्य है ।

विश्व विभूति : कवींद्र रवींद्रनाथ टैगोर


कहते है कि संकल्प के बिना कोई मुक़ाम कभी हासिल हो यह सम्भव नहीं है । वह बिन इच्छा शक्ति के हम योग्य होते हुए भी कोई भी कार्य नहीं कर सकते है जैसे – आत्मा कभी भी परमात्मा नहीं बन सकती है आदि – आदि ।विश्व विभूति कवींद्र रवींद्रनाथ टैगोर !

एक संवेदनशील व बहुआयामी व्यक्तित्व तो थे ही साथ में वे एक उच्च कोटि के कहानीकार, निबंधकार,
संगीतकार, चित्रकार आदि भी थे । उनका जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था ।उनके पिता का देबेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था ।

उन्होंने ब्राइटन, इंग्लैंड में एक पब्लिक स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानून का अध्ययन करने के लिए लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन इसे छोड़ दिया था । उन्होंने कविता, उपन्यास, नाटक, संगीत और निबंधों सहित विभिन्न विधाओं में लिखा।

उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में गीतांजलि , गोरा , चोखेर बाली और घरे बाइरे आदि शामिल हैं । उनकी रचनाएँ जन गण मन ( भारत का राष्ट्रगान) और आमार सोनार बांग्ला (बांग्लादेश का राष्ट्रगान) दो देशों के राष्ट्रगान हैं । आपने शिक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उन्होंने 1901 में शांतिनिकेतन की स्थापना की जो बाद में विश्व भारती के रूप में विश्वविद्यालय बन गया था । वे एक प्रसिद्ध समाज सुधारक थे और उन्होंने सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह और दहेज प्रथा के आदि के खिलाफ आवाज उठाई । उन्होंने भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने और पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के बीच संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

उन्होंने बंगाली साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया । उन्हें 1913 में भारतवर्ष में सर्वप्रथम उनकी काव्य कृति गीतांजलि पर उन्हें साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार मिला था । उनको इसी पर महात्मा गाँधी ने गुरुदेव की संज्ञा दी थी । 7 अगस्त, 1941 को जोरासांको हवेली (कोलकाता) में उनका निधन हो गया था ।

भारतीय शिक्षण पद्धति पर आधारित शिक्षा केन्द्र शांतिनिकेतन में विश्व भारती की स्थापना उनकी चिर स्मृति के रूप में अमर यादगार है जिससे प्रति वर्ष विभिन्न विधाओं में शिक्षा प्राप्त विद्वान निकलते हैं जिनके हृदय से कृतज्ञता के उद्गार निकलते हैं।

कहते है कि अगर मरने के बाद भी यों जीवित रहना है तो इनमें से एक काम जरूर करना है , या तो ऐसा कुछ कर जाना जिससे हम सदैव लोगों के दिलों में बसें रहें या गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर की तरह कालजयी रचनाएँ अपने भावों से अपने लेखन में काल- भाव की अनुकूलता से लिख जायें कि लोग हमको सदा पढ़ने को लालायित हों।

इन्ही शुभ भावों से ऐसी विरल विभूति कवींद्र रवींद्र को आज उनकी जन्म जयंती पर हम भाव भरी श्रद्धांजलि श्रद्धासिक्त भावांजलि देते हैं ।

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी का 16 वां पट्टोंत्सव दिवस


महाश्रमण गुरुवर को मेरा वन्दन शत- शत बार है ।
ग्यारहवें आचार्य प्रवर को वन्दन शत- शत बार है ।
नेमा माँ के लाल दुलारे दुगड़ कुल उजियारे
तेरापंथ धर्मसंघ के भाग्य सितारे जन- जन के गुरु रखवारे ।
निर्मल मन से सत्य का सन्देश जन- जन को दे रहे ।
लाखों- लाखों व्यक्तिय दर्शन प्राप्त कर रहें ।
जन-मन की पीर घटाने को गुरुवर ने जन्म लिया ।
मानव- मानव को धर्म की सही राह का मार्ग दिखाया ।
गुरुवर मानवता का मान बढ़ाने को सदैव तत्पर ।
अहिंसा के द्वारा हिंसा का प्रतिकार करने को तत्पर ।
महाश्रमण गुरुवर की आर वाणी को हम जीवन में धारें ।
जन्म- मरण के चक्कर को कम कर मोक्ष पथ धरें ।
दिव्य ज्योति का नित प्रति हम उठ ध्यान करे ।
गुरुवर के उपदेश को हम गुणगान करें ।
महाश्रमण गुरुवर को मेरा वन्दन शत- शत बार है ।
ग्यारहवें आचार्य प्रवर को वन्दन शत- शत बार है ।

भगवान महावीर केवलज्ञान कल्याणक दिवस


सर्वत्र छाईं खुशियाँ कण – कण में भरा उल्लास ।
अर्हत – वाणी का अमृत पिये हैं शीतल चन्दन ।
महावीर हैं भगवान भक्तों के आस्थान ।
महावीर प्रभु का जग हैं पुजारी ।
महावीर के चरणों में करते है वन्दन ।
आते ही आज का दिन ख़ुशियों से होते सरोबार ।
तप त्याग क्षमा मैत्री की हरियाली मुसकाती ।
मन उपवन में इठलाती बासंती छटा सुहानी ।
हमें भी उबारो तारो करुणा – सदन ।
अनेकांत दर्शन करता सबके उजाला ।
सत्य के महासागर का नीर हैं निराला ।
राग द्वेष की ज्वाला का करता शमन ।
अधिकार मोक्ष का सबको होता ।
उपदेश अहिंसा का हैं सुखकारी ।
हिंसा की आगे बुझाने में हैं सातकारी ।
कोई न अधम उतम सबक होते समान ।
श्रद्धा भर सुमनों से आरती उतारें ।
आस्था के आस्थान की गुण – गाथा गायें ।
रूं – रूं में पुकारे महावीर शाम सवेरे ।
महके फुलवारी में श्रद्धा के भाव हमारे ।

युगप्रधान परमाराध्य आचार्यश्री महाश्रमणजी का 64 वां जन्मदिवस


( युगप्रधान परमाराध्य आचार्य श्री महाश्रमणजी के 64 वें जन्मदिवस पर मेरा सविनय कोटिशः वंदन एवं इस अवसर पर मेरे भाव – )


सच में यह दिन है परम सौभाग्यशाली ।
धन्य हो गए माँ-तात नेमा – झूमर ।
भैक्षवगण के सक्षम एकादशम पट्टधर का हुआ जन्म ।
धन्य हैं यह तेरापंथ मिला आप जैसा आचार्य ।
हम सब हैं सौभागी आपश्री सा धीर-गंभीर मिला विरल संत।
आप ज्योति – पुंज बन इस धरा पर आए ।
नई कल्पना नई उमंगें ,नव चिंतन का प्रवाह लाती धन नई तरंगें ।
गणनायक ! आप शांतिदूत बन , सर्वत्र अभिनव जागृति लाए ।
आप निर्भय है , अमल ह्रदय हैं ,इसलिए तो हम सभी प्रसन्न हैं ।
सीधी सच्ची पगडंडी वह ,जन – जन इसको पाए ।
बोध बीज बोया जिस श्रम से , रात दिवस जगने के क्रम से ।
फलीभूत यह भैक्षव नंदन , रोम – राजि सब विकसाए ।
दिव्य दीवाकर आप हैं , अगम उदधि आप युग – आगम हैं ।
साम्यवाद के मूर्तरूप आप , यह जीवन – वृत्त आपका हैं ।
जिनवाणी का आश्रय लिया , दृढ़ निश्चय में चलते जाते ।
कहनी करनी एक रूप यह नूतन पाठ सबको समझाते पढ़ाते ।
उन्नयन श्रमण – संस्कृति का , यही लक्ष्य गति मति कृति का हैं ।
आस्था समर्पण कर प्रभु पथ पर , आगे चरण आप बढ़ाए ।
प्रगति पथ पर धर्म संघ बढ़ा , आगे – आगे बढ़े संकल्प सभी के ।
महाश्रमण जी की निश्रा में संघ प्रमुदित , श्रद्धा सुमन संजाए ।

संगत की रंगत- ध्रुव-3


उत्साह और उमंग कितना आदि – आदि है । वह किसमे कितना जीवन में आत्म विश्वास है और कितना आध्यात्मिक संग है यह बताओ । बहन ने उसी तात्पर्य से बताया ,आपका पोता जन्म से ही धार्मिक , आत्म विश्वासी और धैर्यवान है , आपके बेटे ने अभी एक साल से समता भाव धारा है ।

आपमें सेठजी ! अभी तक खास परिवर्तन नहीं आया है इसलिए बहन ने ये सब बात मेरे पूछने पर बताई । अतः हमारे द्वारा जितना जीवन सद्कार्यों में और समत्त्व भाव , उमंग ,ऊर्जा व स्फुर्तिमय आदि जीया जायें वही सही उम्र होती है। वर्ष 50 आये या साठ, वह उम्र नहीं कहलाती है जो ऊर्जावान होता वही युवान होता है ।

सहवास मनुष्य का सहज स्वभाव है, वह इसके साथ ही सबके साथ जीने का सदा भाव जुड़ा रहता है । हमारा सहवास शांत, स्नेहिल और सरस हो, इसके साथ स्नेह का सुखद रस हो जो टपकता रहे ।

हमारे जीवन में भी जिन लोगों के साथ हम रहते हैं, उठते- बैठेते हैं, समय बिताते हैं, उनकी सोच, उनके विचार, उनके चाल-चलन, हमें प्रभावित करते ही करते हैं। हमें अच्छे व विद्वान लोगों की संगत ऊँचाई की राह दिखाएगी। वह इसके विपरीत,बुरे लोगों की संगत हमें गर्त में गिराएगी।

अतः हम सदा सद्पुरुषों की ही संगत करें । वह निस दिन जीवन में उच्च कोटि की रंगत लाएँ । संगती से अच्छे/ बुरे कोई से भी गुण आ सकते है । अतः हमको सदा सत्संग का योग जीवन में मिले इसी में जीवन का सुखद संयोग निहित होता है।

संगत की रंगत – ध्रुव-2


सबमें घुल सके क्योंकि नेक लोगों की संगत से हमेशा भलाई ही मिलती है तो बहते पानी की तरह भलाई करते रहिए, बुराई खुद ही कचरे की तरह किनारे लग जाएगी । वह मन की गलियों में कभी शोर नही होगा , स्वर्णिम सूरज की संगत में आराम होगा।।एक घर में संत भिक्षा काज के लिए पधारे ।

उन्होंने अपने स्तर से घर के सदस्यों की उम्र का राज़ जांचना चाहा। उस समय बहुरानी रसोई में थी । वह बड़ी सयानी थी और संत भी ज्ञानी थे । संत ने बहू से पूछा कि तुम्हार बेटा कितने साल का है ?

वह बोली- आठ साल का। वह आगे संत ने पूछा तुम्हारा पति ? बहू बोली- उनकी उम्र एक साल है । वह आगे संत ने पूछा तुम्हारे ससुरजी ? तो बहू बोली- वे तो आज भी अभी तक पालने में झूल रहे है ।

यह सुनकर ससुरजी को गुस्सा आया । वह बोले मैं इतना बुढ्डा हो गया हूँ कहाँ पालने में झूल रहा हूँ , मेरा बेटा 45 साल का है उसको एक साल का बता रही है बहू बिल्कुल झूठा बोल रही है । वह यह क्या रोज बहू आ आ कर साधुओं की संगत में उनकी ही रंगत में रंग गई और झूठ बोलना सीख गई ।

वह घर की मान मर्यादा भूल गई आदि – आदि ऐसे ससुर जी बोल रहे थे । संत बहुत धैर्यवान थे । वह बोले आप सही बोल रहे हैं। बहू के संत संगत का असर जरूर हुआ है तभी तो आप इतना कुछ बोल रहे ,यह गरूर नहीं कर रही है । वह आगे संत बोले कि मेरा पूछने का तात्पर्य था कि यह बताओ धर्म में कौन कितना समझता है , किसमें सकारात्मक चिंतन कितना और
क्रमशः आगे

संगत की रंगत -ध्रुव-1


कहते है कि हमारे जीवन में जैसी संगत होगी हमारा आचरण भी वैसी ही रंगत का होगा । यह सटीक तथ्य है कि जैसी होगी किसी की संगत, वैसा ही उसका स्वभाव होगा वह उसकी रंगत होगी । पानी की एक बूँद यदि गर्म तवे पर पड़ेगी तो वह वाष्प बनकर उड़ जाएगी।

वह यदि कमल-पत्र पर गिरेगी तो मोती की तरह उस पर चमकेगी और यदि किसी सीप के मुख में स्वाति नक्षत्र में पड़ेगी तो फिर कहना ही क्या, खुद ही मोती कुछ ही कालांतर मे बन जाएगी। पानी जीवन जीने का आधार है। पानी से पौधा खिलता हैं।

यह तो एक उदाहरण है कि किसी के जीवन में संगत का कितना महत्वपूर्ण कारण होता है। अतः हम सदैव सही संगत को अपनाये। एक घटना प्रसंग दिवंगत शासन श्री मुनि श्री पृथ्वीराज जी स्वामी ( श्री ड़ुंगरगढ़ ) मेरे को सदैव कहते थे कि प्रदीप

तेरे जीवन में परिस्थिति कैसी आ जायें लेकिन तुझे हर समय चौकन्ना रह जीवन में आगे बढ़ना है । वह अपने कार्य में अपने प्रति विश्वास रख और तुझे मरने के बाद भी लोगों में जीवित रहना है ।

वह तुझे अपने सिद्धांत से कभी भी विमुख नहीं होना है ।मुनिवर तो अभी नहीं रहे लेकिन उनकी शिक्षा मुझे सदैव ऊर्जा प्रदान करती है ।

हम देखते है कि कीचड़ मे कमल खिलता हैं, काँटों में गुलाब और चंदन पर सर्प लिपटे आदि – आदि फिर भी यह संगत नेक होने से कोई जहर कभी भी किसी को नहीं मार सकता है । हमारे जीवन में सरलता इतनी रहे की सब हमसे मिल सकें और हम तरल इतने रहे ताकि हम
क्रमशः आगे

लें अंतर में आनंद की लहर


अगर अंतर में आनंद की लहर है तो चिन्तन आता हैं कि वहाँ प्रसन्नता सदैव रहेगी । आनंद की लहर इतनी प्रभावशाली होती है कि वह आत्मा को उज्जवल से उज्ज्वलतम करती रहती हैं ।

जन्म लेने के बाद आगे का जीवन कैसे ज़िना है वो बहुत कम लोग ही जानते हैं। बचपन तो अल्हड़ बाजि में बीत जाता है।पर जैसे ही निन्यानवे के फेर में पड़ते हैं,जीवन जीने की कला से दूर होने लगते हैं। शादी के बाद हमारी कई ज़िम्मेवारियाँ बढ़ जाती है।

कभी घर में बच्चों का टेंशन तो कभी व्यापार या नौकरी का टेंशन।जब कुछ धन कमा लेते हैं तो धन का ऐसा नशा चढ़ता है कि इंसान अपने जीवन की ख़ुशियों को तिलांजलि देकर धन अर्जित करने की होड़ में लग जाता है। और जब शरीर के अंग काम करना बंद कर देते हैं तब आता है होश।फिर जगने से क्या फ़ायदा जब चिड़िया चुग गई खेत।

हम यह चिन्तन अवश्य करे कि यह मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ से मिलता है।जब जीवन मिला है तो जीवन के हर पल को विभाजित करके जीयो।काम है तो काम, अपने परिवार के लिये भी समय निकालो और मुख्य बात अपने लिये भी समय निकालो।जीवन में जब अवसर मिले तो उसका भरपूर आनंद उठाओ।

साथ कुछ जाना नहीं है।तो जब जो मन में आये अपने हर को सोख पूरा करो।ताकि जब जाने का समय आये तो मन में यह अफ़सोस ना रहे कि मैंने अपना जीवन तो जिया ही नहीं। स्वयं की खोज में जब दूर तक हम पहुंच जाते है, स्वयं को स्वयं की हर बात हम खुद ही बताते है । स्वयं की गलतियों का जब हमें अहसास होता है, परिस्कृति की दिशा में क्षण बड़ा वह खास होता है ।

अपने अंतस को जितना सम्भव हो सके उतना ज्यादा चिड़ियों की चरपरहाट की तरह भीगने दें और उसे मन ही मन इधर-उधर की ओर से आ रही मिठास भरी तान से व किसी मनपसंद घंटियों की तान से जोड़ लें जिससे सदैव आनंद की लहर अंतर में ठहर-ठहर दौड़ती रहेगी।

अहंकार : विश्वास


हमारा जीवन सुख या दुःख के संवेगों में बह जाता हैं जो वो उन रंगों में रंग जाता हैं । सुख में अहंकार और उन्माद , दुःख में परेशान और हताश और सदैव इस पार या उस पार झुलता रहता हैं ।

प्रायः अक्सर होता आया हैं कि परिवार और समाज दोनों ही बर्बाद होने लगते हैं जब समझदार मौन और नासमझ बोलने लगते हैं । अगर वाक़ई में थोड़ा विवेक थोड़ी समझ आ जाए तो शायद हममें दृढ़ता आए जिद नहीं ,बहादुरी रहे जल्दबाजी नहीं, दया हो कमजोरी नहीं , ज्ञान हो अहंकार नहीं , करूणा रहे प्रतिशोध नहीं , निर्णायकता हो असमंजस नहीं , जोश जज़्बा-होश आदि -.आदि रहे जिससे जीवन में हम आगे बढ़े और सफलता का परचम लहराए।

सीधी सी बात हैं की हम भीड़ की राह न चलें अपने विवेक से राह चुनें और सही समय पर सही समझ और सही विवेक की शुद्ध कसौटी से जीवन में खरे आगे बढ़े इस मास्टर चाबी से अहंकार को तिलांजलि दे।

यह तो सही बात है कि हर समय एक नया अवसर है और इस बात को किसी ने कुछ इस प्रकार कहा हैं कि एक निराशावादी हर अवसर में कठिनाई देखता है। एक आशावादी हर कठिनाई में अवसर ।जीवन का सुंदर स्वरूप किसी भी प्रकार से देख सकते है और उसे मनचाहा आकार दे सकते है ।

जीवन रूपी समरांगण म् पतझड़ और बसंत आते रहेंगे , हंस-हंस सहते हर विपदा में हम वीर कहलायेंगे । सुख का रथ रुक जाए चाहे घोर निराशा और दुख के बादल छाए पर जीवन का हर क्षण पौरुष के जल झरने समान बहता जाए । सावधानी रखने के बावजूद टूटती जीवन डाली को विनय-विवेक की अमृत प्याली से सींचना है ।

हर अवसर को विश्वास के श्रेयस्कर सिद्धान्तों से आगे बढ़ाना है ।रिश्तों के लिए कितनी मार्मिक बात हैं कि कुछ रिश्ते कभी खत्म नहीं होते वो किसी के दिल में आस बनकर, काश बनकर या फिर मिलने का विश्वास बनकर हमेशा रहते हैं ।

गृह प्रवेश !


हर मानव का एक सपना होता हैं की मेरा ख़ुद का आशियाना हों इसी कड़ी में आज माससा, मासीसा ( मंगलचंद जी , किरण देवी डूंगरवाल) ने अपने नूतन आशियाने “आशीर्वाद “ में आज प्रवेश किया हैं । सर्वप्रथम इनको मैं मेरी और से ख़ूब – ख़ूब बधाई देता हूँ ।

ननिहाल की भूमि छोटी खाटू में गृह प्रवेश हो रहा है तो मेरे को खुशी बहुत- बहुत हैं । वर्षों पहले आप दोनो ने सपना संजोया था की छोटी खाटू में हमारा मकान “आशीर्वाद “ के रूप में ख़ुद का हों जायें । आज (वैशाख शुक्ल 12 , 25-4-2025 ) को वो सपना “आशीर्वाद “ के पल के रूप में पूरा होने को आज आ गया हैं और आप दोनो की वर्षों पुरानी इच्छा भावना आदि – आदि पूरी हुईं है ।

आपकी ममता, करुणा, स्नेह आदि – आदि आज भी प्रदीप के लिए वैसी है जैसी मेरे बचपन में ननिहाल थी वह घर में जो आप देते थे ।आपका यही मेरे प्रति स्नेह आशीर्वाद आदि के रूप में सदैव बना रहें । इस अवसर पर कूछ लाइनें हैं दोनो के प्रति इस हर्षित वैला पर –

वर्षों से दिलों में ख़्वाब लियें
आज गृह प्रवेश का दिन आया
ख़ुद के मकान
“आशीर्वाद “ की
आस के रूप में
आज भितर की ख़ुशी से
माससा , मासीसा का
मन खूब- खूब हर्षाया ।
एक अरमान था माससा
मासीसा के मन में की चैन्नईं
की तरह यहाँ भी हमारा
छोटी – खाटू में भी एक
घर होगा घर आँगन
“आशीर्वाद “ होगा
बगिया महकेंगे ख़ुशियों
का रैन बसेरा होगा ।
तन स्वस्थ मन स्वस्थ
रहे स्वस्थ चिन्तन हर दम
आओ मिल बढ़ाये कदम
सदैव खुशहाल सुखकारी
घर की मंजिल की ओर ।
अपनापन के अरमानों से यह
घर खड़ा किया जो कह रहा है
की आओ मुझ में रच बस जाओ
स्वागत को उत्सुक होकर खड़ा । -2

अक्षय तृतीया


युग रा आदि जिन केवली हुया तीर्थंकर जगभाया, दियो जीणे रौ सुज्ञान अरु विज्ञान नाभि अंगज री जयकार ।छोड़ घरबार चाल्यां साधना स्युं करने जीवन रो कल्याण, हाल्या चरणां पाछे अगणित राजकुमार जुड़ग्यो प्रभु स्यु अंतर तार| भगवान ऋषभ प्रभु जब कर्मक्षेत्र से घर्मक्षेत्र में आये, अशन ( भिक्षा खाने की मिलने की) की आशा में जगह- जगह घूम रहे थे पर कौन उन्हें खाने का आहर बहराये ।

भगवान को कोई कहता है कि सोना ले लो , चांदी ले लो , कन्या साथ मे झेलों आदि – आदि आपके कष्ट अपार थे। वो बोल रहे थे कि करल्यों भावना भगतां री थे स्वीकार पर कोई भी सही से रोटी री मनुहार व्रत निपजाने की भगवान ऋषभ प्रभु से नहीं कर रहा था ।

भगवान ऋषभ प्रभु बिना आहार के इस तरह घूम रहे थे तभी कुछ समय बाद उनके पोत्र राजा श्रेयांस को एक सपना आया कि अमृत से मेरु सिंचन होगा । वह उन्होंने अपने सपने के लिए चिन्तन किया कि प्रभुवर यह मेरा स्वप्न कैसे साकार होगा ।

वह इस तरह चिन्तन करते- करते राजा श्रेयांस गहराई में गये तब उनको जाति स्मृति ज्ञान हो गया । वह उनका मन भावों में तरुणाई ले , प्रभु भक्ति से भावित हो गया और उन्होंने अपने हाथों से गन्ने का रस भगवान ऋषभ प्रभु को अर्पित किया ।

वह उनको पारणा करवाया उस समय के लिए यह कहा जाता है कि अक्षय तृतीया शुभ आई तप की लेकर तरुणाई प्रभु ऋषभ देव की गुंजी घर – घर जय शहनाई तभी से यह अक्षय तृतीया पर्व की शुरुआत हुई |

वह यह पर्व निरंतर चल रहा है । अक्षय तृतीया पर्व हमको भावित करता है । हम आज के दिन अपने आपको अक्षय के समान पावित कर अपने जीवन को उज्जवल बनाये यही हमारे लिए काम्य है ।

जीवन का मार्ग

दो जगत है एक पदार्थ का
व एक आत्मा का जगत
पदार्थ जगत के है तीन
परिणाम- भय,
तनाव और अतृप्ति
आत्मा के भी है तीन
परिणाम-अभय ,
तनाव-मुक्ति और
सहज तृप्ति
करें हम कुछ देर
अपने भीतर देखने
का सही से अभ्यास
तो अपने आप प्राप्त
हो जाएगा हमको
स्वतः ही समाधान
कितनी समस्याओं का
संसार की सुंदरता
है भ्रम जाल
हर सुख के पीछे
दुःख आता है तत्काल
सिकंदर चौंका और सोचा
कौआ कह रहा सत्य बात
वासनाओं का लोभ का वह
तृष्णा का कोई अंत है न पार
अतृप्ति से भरा है संसार
समझ आ गई सही से बात
सिकंदर के दिमाग में यह
तभी वह उन्हीं पैरों लौट
पड़ा अपने स्थान क्योंकि
कभी तृप्त न होती कोई
भी आकांक्षा वासना आदि
क्योंकि जीवन का सही
मार्ग है उपासना।

धरती- खण्ड-1

धरती सी विनम्रता
और सहनशीलता
और किसी में
नहीं पाई जाती
सहनशील मानव
रहते जग में
वे ही सच्चे
ज्ञानी कहलाते
जो आँधी तूफान
दुख घोर निराशा
और में भी
न घबराने
वाले होते
सागर की लहरें
सब कुछ सहती
फिर भी शांत
बनी रहती
धरती सारे जगत
का भार उठाकर
हर मौसम में
सुख देती आदमी
अपने स्वार्थ के लिए
इस पर क्या-क्या
न सितम ढाता है
इसे खोदता है
इस पर गगनचुंबी
अट्टालिकाओं का
क्रमशः आगे

धरती- खण्ड-2

भार लादता है
कभी आग जलाता है
तो कभी कुछ और
जुल्म ढाता है
पर यह धरती
चुपचाप सब
कुछ सहन कर लेती
है धरती सी विनम्रता
और सहनशीलता
और किसी में नहीं
पाई जाती धरती
जग में प्यार लुटाती
सहनशीलता वही
गुण है जो एक
इंसान को फरिश्ता
बनाता जो भी व्यक्ति
अपनाए जीवन में
पथिक सच्चा कहलाता
सच्चाई और सहनशीलता
का स्वाद ऐसा लगता है
वह तो इन्सान नहीं
है इस धरती पर
एक अपवाद हैं
पृथ्वी को संसार में
समझा जाता है
सर्वाधिक सहनशील
और विनम्र हैं ।

कैसे रहें ऊर्जामय सदा


हम देखते है कि रात भर के आराम की गहरी निद्रा के बाद ब्रह्म मुहूर्त में जब समय अंगड़ाइयां लेता हुआ जागता है तो वातावरण में स्वत: प्रकृति द्वारा जीवन-ऊर्जा का उत्साह भरने लगता है।

उस ऊर्जा से भरी तरंगों में जब हम अपनी चेतना को सराबोर होने छोड़ देते हैं तो हमारी चेतना को भी ऊर्जा से भरी महसूस करते हैं इसीलिए तो हमारे ऋषि मुनि विशेषत:ब्रह्म मुहूर्त में ध्यानमग्न होते थे और सारे दिन ऊर्जामय रहते थे। हम यदि चाहते हैं कि हमारा दैनिक जीवन उद्देश्यपूर्ण सक्रिय नव दिन हो तो हमें रोज ऊर्जा से भरा जीवन जीना होगा ।

हमारा खुश रहना हर काम में, हर बात में सकारात्मकता अपनाना आदि – आदि तब स्वतः ही सहज हो जाएगा । यही तो सफलता की राह पर चलना है ।हम प्रातः सूर्योदय से पहले उठ कर इष्ट को स्मरण कर दिन की शुरुआत करें। वह साथ ही प्रकृति प्रदत्त शुद्ध वातावरण एवं अनुभूतियों का सुखद अहसास करें ।

हमको वे दिन भर अन्तर में तरंगित करती रहेंगी और मानो मनहर ऊर्जामय संगीत बज रहा हो । हमारा उगते सूरज और खुले आसमान को देखना, कर्णप्रिय विभिन्न आवाजों में नाना पक्षियों का चहचहाना आदि – आदि सारा प्राकृतिक वातावरण, ऊर्जा से ओत-प्रोत कर देता है जो हमको दिन भर सक्रिय रखता है।

यह ऐसा बेशकीमती सुबह का समय हमको लगेगा जो ऊर्जा व आनन्द का अमूल्य खजाना है हमको इसे यूं ही न गँवाना है। आज भी तो प्रातः भ्रमण, शारीरिक व्यायाम, ध्यान, प्राणायाम आदि – आदि ऊर्जा संवर्धन के प्रातः कालीन आयाम माने जाते हैं ।हम नित इनका प्रयोग करें वह नव उर्जा का सुयोग पाएँ ।यही हमारे लिए काम्य है ।

मजबूत मन, सफल जीवन


हम देख सकते है कि जिसका मन मजबूत होता है उसका जीवन सफल होता है । वह जिस तरह लोहे को आग में तपाकर चोट मार-मार कर आकार दिया जाता है और मजबूत हो जाता है, वैसे ही हमारा मन भी कठिनाइयों से गुजर कर जीवन की चुनौतियों का दृढ़ता से सामना कर-कर मजबूत बनता जाता है।

अत: हमको जीवन में आने वाली चुनौतियों से घबराकर भागने की बजाय उनका दृढ़ निश्चय से सामना करना सीखना चाहिए। वह सदैव सकारात्मकता से उन्हें पार कर हमारे दृष्टिकोण में शुभ भविष्य देखना चाहिए।

हम जब तक अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक हम अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते है । हम देख सकते है कि ताश के पत्तो से ताजमहल नहीं बनता, नदी को रोकने से समुन्दर नहीं बनता आदि – आदि लड़ते रहो ज़िन्दगी में हर पल क्योंकि एक जीत से कभी कोई सिकंदर नहीं बनता है ।

दुनिया की हर चीज़ ठोकर लगने से टूट जाया करती है पर एक कामयाबी ही है जो ठोकर खा के ही मिलती है । हमारी नकारात्मक सोच का परिणाम बाधाएं असुविधाएं है ।भगवान महावीर ने हमें अनेकांत का सुंदर स्वरूप समझाकर सही से शिकायतमुक्त जीवन जीने का उपहार दिया हुआ है ।

हमारे जीवन में परिवर्तन मूल है और द्वंद उसका हिस्सा है ।हमारे जीवन मे पक्ष है तो प्रतिपक्ष भी है । वह सम्यकदृष्टि शिकायत नहीं करता बल्कि शिकायतों से समझौता कर लेता है फिर शिकायत जीवन में रहती ही नहीं है । अतः हम याद रखें कि मन की मजबूती ही सफल जीवन की आधारशिला होती है ।

तेरापंथ संघ के दशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का 16 वां महाप्रयाण दिवस


( आचार्य श्री महाप्रज्ञ के 16 वें महाप्रयाण दिवस पर मेरी सभक्ति श्रद्धासिक्त भावांजलि )

समता , करुणा , ममता की अदभुत कृति थे ।
प्रवचन शैली ज्ञान से परिपूर्ण सबको आकर्षित करती थी ।
दशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी सबके मनभावन थे ।
तप पावन तीर्थं तप से कल्मष धूल जाते हैं ।
तप सुर नर तिर्यंच आदि सबको पार लगाता हैं ।
तप से अनुराग बढ़ता तप ही तारणहार हैं ।
तप की पतवार करती भव सागर से पार हैं ।
तप शिवपुर का द्वार हैं तप से होती जय जयकार हैं ।
जन्म पूर्ण समाधिमय था ।
मरण पूर्ण समाधिमय था ।
आधि – व्याधि उपाधि में भी ।
सन्तुलन समरस निहारा ।
जीवन में समता की सौरभ से बही धारा थी ।
ह्रदय में करुणा छलाछल थी ।
वीर – वाणी का अमित बल था ।
तम घटाओं को कुचलकर
ज्योतिमय सूरज उतरा ।
सत्य समता की अविरल बही धारा थी ।
सत्य समता के तटों से ,
बही उन्मुक्त धारा थी ।
उस सनातन युग – पुरुष को ,
महात्मा महाप्रज्ञ को ,
आज के दिवस पर
कोटि – कोटि शत वंदन हमारा है ।

सुखी परिवार के दो मापदंड


हम देख सकते है कि सूखी परिवार के बहुत मापदंड होते है । यह कोई मायने नहीं रखता कि घर कितना बड़ा है। वह मायने यह रखता है कि परिवार कितना संगठित, कितना सुखी है, कितना खुश है तथा काम पड़े आपस में मिलजुल कर खड़ा है, कि नहीं खड़ा है आदि – आदि ।

बहुत वर्षों पहले किसी से इस आशय की बात सुनी थी :- अरे नादान, अपनी उम्र के इजाफे को न देख, मजमून को पढ़, लिफाफे को न देख । वे शब्द सचमुच मोती होते है जो जीवन को मोड़ देते है और उन शब्दों की कीमत मोतियों से कम नहीं होती है ।

हम देखते है कि परिवार रिश्ते में उतार- चढ़ाव आते रहते है वह मौसम बदलता है और हमारे दिन भी बदलते हैं पर धैर्यवान और विवेकशील हर स्थिति व हर हाल में परिवार के साथ सही से चलते हैं। हम अपने जीवन में सिर्फ परिवार रिश्तों में संतोष ढूँढे क्योंकि आवश्यकताऎ तो कभी समाप्त नही होंगी।

वह गलत सोच और गलत अंदाजा इंसान को हर रिश्ते से गुमराह कर देता है। अतः तुलना के खेल में मत उलझिए क्योंकि इस खेल का कहीं कोई अंत नही है औऱ केवल इतना ही नहीं होता है , जहाँ से तुलना की शुरुआत होती है वही से आनंद और अपनापन भी खत्म होता है ।

अतः परिवार में सबको आपस में समझ मिल कर रहना , सुख दुख समझ रहना आदि सुख का मापदंड है । हम परिवार में आपस में सदस्यों की गलत बात या चिन्तन को सही से समझ नकारात्मकता से बचें ।

वह खुद को निर्दोष बना लें। हम बिना सोचे-विचारे ही कह देते हैं, फलाँ बहुत बुरा है, उसने यह कर दिया उसे धोखा दिया आदि-आदि। हम स्वयं अपने अंतःकरण के वातायन में झाँके , मन ही मन प्रभु शरण में जाकर अपने आपसे पूछें कि क्या कभी कोई हमने गलत काम नहीं किया ?

अतः हम इसके विशेष विस्तार में नहीं जाकर यही करें, खुद को निर्दोष बना लें, स्वतः ही दुनिया से एक बुरा इंसान कम हो जाएगा । यह कटु सत्य है पर यह तथ्य है।

परिवार-ध्रुव-1


परिवार
है संजीवन जीवन का
हमको जो सदैव
सही गलत का
ज्ञान देता है
संस्कारों का सही
से बीजारोपण कर
विकास में बढ़ाता है
हमारी पहली स्कूल
परिवार ही होती है
नम्रता का हमको
पाठ परिवार से
सीखने को मिलता है
आपस में मिल-बैठ कर
प्रेम-भाव से बात कर
रहना समझना
प्यार विश्वास स्नेह
आदि परिवार ही
हमको सिखाता है
वह दैनिकचर्या में
सही से हमको खुश
रहना परिवार
ही सिखाता है
वह छोटी-छोटी
क्रमशः आगे

परिवार-ध्रुव-2

बातों से खुशी बटोरना
भी परिवार सिखाता है
मृदु वाणी का सदैव
उपयोग करना
परिवार सिखाता है
जीवन में सभी
परिस्थिति से सही
से सामना करने का
ज्ञान परिवार देता है
कहते है कि हमारा
खाया पिया अंग लगेगा
दान नदिया संग चलेगा
बाकी बचा जंग लगेगा
धन घर तक साथ चलेगा
परिवार श्मशान तक
साथ चलेगा और
साँसे समान परिवार
जीवन में धागा
बन सबके सपने
रिश्ते-नाते सब बुनती है
वह सब करीब है
अपनापन है का
अहसास देता है ।

प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

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