श्रृंगार

Hindi Poetry On Life | Hindi Ghazal -श्रृंगार

श्रृंगार

(Shringaar )

मधुर स्वर कोकिलार कूकन कामिनी जस रति बदन सी।

जड़ित मुक्ता मणित अगणित स्वर्ण कंगन खनखनन सी।।

 

   कमलदल बल विकल लखि अधरन की आभा,

   दृगन खंजन चुभन चितवन मलयज सुलाभा,

करत जात निनाद सरिता अनवरत कलकल वचन सी।।

जड़ित ०।।

 

   कर्ण कुण्डल में भूमण्डल नथनी में ब्रह्मांड लटके,

  लट की लटकन विकट कानन वारिमुक्ता जैसे चमके

पुष्पगुच्छ सुलक्ष सुरभित हार सृष्टि उपवनन सी।।

जड़ित ०।।

 

कटि की करधनि नीलमणि सम पंचतोरी रची सारी,

भानु शशि खद्योत दीप अशेष भाषत हैं खुमारी,

यमन भैरवि राग गावति नुपूर की ध्वनि झनझनन सी।।

जड़ित ०।।

 

?

कवि व शायर: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
जमुआ,मेजा, प्रयागराज,
( उत्तर प्रदेश )

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