सुनहरी सुबह

सुनहरी सुबह  | Kavita

 

  सुनहरी सुबह  

( Sunahri subah )

 

 

 सुनहरी सुबह नि:स्वार्थ भाव से प्रतिदिन सुबह आती है ||

आँख बंद थी अभी, खोए थे मीठे सपनों में |
कुछ हंसीन प्यारे पल थे, हमारे अपनों में |
तभी सुनहरी धूप ने दस्तक दी, नींद टूट गई |
अंगडाई ले कर उठ गए, और नींद छूट गई |

सुनहरी सुबह नि:स्वार्थ भाव से प्रतिदिन सुबह आती है ||

सुबह की शुरुवात हुई, चिडियों की सरगम से |
मन में एक लहर दौडी, मुक्त थे अभी सारे गम से |
पानी के कुछ छींटे मुंह मे पड़े, तारावट सी आ गई |
कुछ महक सी आई, देखा तो गरम चाय आ गई

 सुनहरी सुबह नि:स्वार्थ भाव से प्रतिदिन सुबह आती है ||

मदहोश करती शीतल हबाएं, मन ताजा हो गया |
चल रही चुस्कियां चाय की,सोने मे सुहागा हो गया |
झूम उठा मन बच्चों को देख, मुझे भी बचपन याद आया |
अंठ-खेलियां करते बच्चों मे, अपने आप को मैने पाया |

 सुनहरी सुबह नि:स्वार्थ भाव से प्रतिदिन सुबह आती है ||

कुछ और पल गुजरे ही थे, मैं बागीचे मे आ गया |
मुस्कुरा रहे हैं सुन्दर फूल, मानो मेरा साथ दे रहे हैं |
ओह् ये छुई-मुंई की पत्तियां, स्पर्श करो सकुचाती हैं |
सुनहरी सुबह की बात निराली, अंग-अंग महकाती है |

सुनहरी सुबह नि:स्वार्थ भाव से प्रतिदिन सुबह आती है ||

कवि :  सुदीश भारतवासी

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