सुदामा

सुदामा | Kavita

सुदामा

( Sudama )

 

त्रिभुवनपति के दृगन में जल छा गया है।
क्या कहा ! मेरा सुदामा आ गया है।।
अवन्तिका उज्जयिनी शिप्रा महाकालेश्वर की माया,
काशी वासी गुरु संदीपन ने यहां गुरुकुल बनाया।
मथुरा से श्रीकृष्ण दाऊ प्रभास से सुदामा आये,
गुरु संदीपन विद्यावारिधि को सकल विद्या पढ़ाये।।
शास्त्र पारंगत विशारद पवित्रात्मा आ गया है।।
क्या कहा!०
एक दिन की बात गुरुकुल में ही कुछ चोर आये,
एक वृद्धा के द्वारा अभिशापित चावल साथ लाये।
पर छिपा करके उसे अन्यत्र कहीं चले गये थे
ऊषा बेला में गुरु मां को वो चावल मिल गये थे।।
वही चावल खाने वाला विशुद्धात्मा आ गया है।।
क्या कहा!०
उस चावल का भोगकर्ता दीन अतिनिर्धन होजाये,
इसी कारण से सुदामा मुझसे थे चावल छिपाये।
जो हमारे हित में निज श्री हीनता अपनायेगा,
वो भला क्या चोरी से चावल के कण खा पायेगा।।
आज मेरे महल में वही महात्मा आ गया है।।
क्या कहा!०।
बदन थर थर अश्रु झर-झर नंगे पग सुखधाम दौड़ै,
स्वर्ण मुक्ता मणि सिंहासन छोड़कर श्रीधाम दौड़े।
हे सुदामा! हे सुदामा! सुदामा अभिराम दौड़ै,
लटपटाते छटपटाते योगेश्वर निष्काम दौड़ै।।
कण्ठ स्तंभित नैन में गहन घन घहरा गया है।।
क्या कहा!०
द्वार पर देखा ! न पाया रक्त कण चमके हुये है,
पृथ्वी ! क्या ये सुदामा के पांव से टपके हुये हैं।
करूण क्रंदन देख कर पृथ्वी बहुत घबरा गयी,
रूद्र मरूत त्रिदेव आये शक्तियां सब आ गयी।
देखकर यह प्रेम प्रभु का सूर्य भी रुक सा गया है।।
क्या कहा!०
वह सुदामा जा रहा है दौड़ कर घनश्याम पकड़े,
प्रेम सरिता बह चली आलिंगन में हैं दोनो जकड़े।
कहां थे मेरे हृदय तुम किस तरह जीवन बिताये,
इतने दुःख सहते रहे पर मित्र से मिलने न आये।।
मेरे किस अपराध बस इतनी निष्ठुरता पा गया है।।
क्या कहा!०
कहा थे प्रियवर सुदामा विह्वल हो श्रीधाम रोये,
चक्षुजल अविरल बहाकर दोनों पग ब्रजधाम धोये।
अपने आसन पर बिठा चरणों में निज आसन लगाये
दीप पूजन और प्रतिष्ठा शास्त्रोचित विधि से कराये।।
द्वारिका नगरी में कैसा ये प्रेमात्मा आ गया है।।
क्या कहा!०
जिस सिंहासन के लिए देवादि मन ललचाते हैं,
उसका सुख देखो सुदामा प्रेम के वस पाते है।
सुवसन स्वादिष्ट भोजन हाथ पांव प्रभू दबाये,
दे दिया दो लोक जब दो मुटठी चावल केशव खाये।।
दो सखाओं का मिलन यह ‘शेष’के मन भा गया है।।
क्या कहा!०

?

कवि व शायर: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-नक्कूपुर, वि०खं०-छानबे, जनपद
मीरजापुर ( उत्तर प्रदेश )

यह भी पढ़ें : 

तुम्हारे बिन जहां किस काम का है | Shayari Tumhare Bin

Similar Posts

  • मोह | Kavita Moh

    मोह ( Moh ) दौड़ रहा वीथिका-वीथिका, सुख सपनों की मृगमरीचिका, थोड़ी देर ठहर ले अब तू, कर ले कुछ विश्राम। भले पलायनवादी कह दें, रखा नहीं कुछ मोह में। सारी दुनिया नाच रही है, जग के मायामोह में। मोह बिना अस्तित्व नहीं है, बात पुरानी नई नहीं है। सारा जगत इसी पर निर्भर, कितनों…

  • कई उलझने हैं सुलझाने को | Poem Kai Uljhane hai Suljhane ko

    कई उलझने हैं सुलझाने को ( Kai uljhane hai suljhane ko )    नये रास्ते हैं आगे बढ़ जानेको सुंदर नजारे दिल मे समानेको नजर उठती है ठहर जाने को बेखौफ नदी जैसे बहजाने को रंजो गम को दबा जाने को महफूज जगह रुक जाने को बेपनाह मोहब्बत पा जाने को नैनों में ख्वाब सजा…

  • क्या खूब दिन थे!

    क्या खूब दिन थे! बड़ा मजा आता था बचपन में,खलिहान हमारा घर हो जाता,सुबह से लेकर रात तक,मस्ती ही मस्ती सुहाती! धान की सटकाई,पोरे की बँधाई,आटा सारे बँध जाने पर,पुआल का गाझा बनता! शाम पहर धान के गट्ठर पर,गोबर का पिण्ड रखा जाता,सांझ के दीपक से,मॉ अन्नपूर्णा को पूजा जाता! खलिहानों में दोपहर में,महिला मजदूरों…

  • चाभी | Kavita Chabhi

    चाभी ( Chabhi ) कौन कहता है ताले नहीं खुलते केन कहता है रास्ते नहीं मिलते चाभी खोजकर तो ज़रा देखिये तहखाने मे उतरकर तो देखिये हर चीज है मुहैया आपकी खातिर हर ताज के सिक्के बरामद होंगे कौन सी राजशाही चाहिए आपको आपके पुरे हर मुराद होंगे कम नहीं कुदरत के खजाने में आपको…

  • रे आदमकद | Re Aadamkad 

    रे आदमकद !  ( Re aadamkad )    हो गया है तू कितना बौना! तुझे हर वक्त चाहिए सुख सुविधाओं का बिछौना! भूल गया है तू इस पुण्य धरा में कहांँ-कहांँ महान सभ्यता- संस्कृति के गौरव चिन्ह छुपे हुए हैं अपने मन से पूछ क्या तूने कभी खोजें हैं! अधुनातन रंग में रंग गया है…

  • पाषाण युग | Pashan Yug par Kavita

    पाषाण युग ( Pashan yug)    स्वर्ण युग बीता रजत युग वो ताम्र युग चले गए। कलयुग में नर भांति भांति पग पग पे छले गए। पत्थर दिल लिये लो आया अब पाषाण युग। प्रस्तर ही पूजे जाते हैं शिलालेखों में बीते युग। दुख दर्द भाव भावना पीर पराई जाने कौन। वक्त खड़ा चुप्पी साधे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *