आखिर क्यों | Aakhir Kyon

आखिर क्यों

( Aakhir Kyon ) 

 

युगों से उठ रही थी आँधियाँ
न जाने क्यूं ओले बरसै
क्यूं तूफानों ने किया रुख मुझ पर,
क्यूं, आखिर क्यों ?
क्या ईश्वर को था मंजूर
जो ले बैठा परीक्षा मेरी
मैंने तो अपने मन-वचन से
किया था सब वरण
फिर मेरी साधना पर,
प्रश्न चिन्ह आखिर क्यों ?
न जाने क्या लगा गलत
जबकि मैंने सतकर किया था पुण्य
न रखा कोई भाव भेद का
माने सारे सब एक रूप
फिर मेरी पूजा पर
उठाई गई उंगलियाँ,
क्यूं ,आखिर क्यों ?
मैंने मौन का लिया था सहारा
न कहा किसी से कुछ
सोचा था शांत मन से
किस बात की अपराधी मैं
आखिर क्यों नही रखा अपना प्रतिपक्ष,
क्यूं, आखिर क्यों ?

 

डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’

लेखिका एवं कवयित्री

बैतूल ( मप्र )

यह भी पढ़ें :-

दीप | Deep

Similar Posts

  • गाँव बिखर गया | Kavita Gaon Bikhar Gaya

    गाँव बिखर गया ( Gaon Bikhar Gaya ) जिंदगी का अब कोई भरोसा नही। कब आ जाये बुला हमें पता नही। इसलिए हँसते खेलते जी रहा हूँ। और जाने की प्रतिक्षा कर रहा हूँ।। जो लोग लक्ष्य के लिए जीते है। उनकी जिंदगी जिंदा दिल होती है। और जो लोग हकीकत से भागते है। जिंदगी…

  • भोलेनाथ है मतवाला | Kavita Bholenath

    भोलेनाथ है मतवाला ( Bholenath Hai Matwala )   औघड़ दानी शिव भोले हैं वरदानी। भस्म रमाए बैठे शिवशंकर ध्यानी। काशी के वासी बाबा है अविनाशी। बम बम भोले शिवशंकर हे कैलाशी। शिव डमरू वाले हैं बाघाम्बर धारी। सर्पों की माला शिव महिमा है भारी। जटा गंग साजे चंद्रमा मस्तक साजे। शंकर गौरी संग बैठे…

  • पडोसन | Padosan

    पडोसन ( Padosan )    लगा ली छत पें मैने बाग, पडोसन के आते ही। कोई पूछे नही सवाल, लगा ली मैने खूब उपाय॥ मुझे दिन मे दिखता चाँद, पडोसन के आते ही…. सुबह सबेरे योगा करने जब वो छत पर आती है। ठंडी हवा की खुँशबू बन, अन्तर्मन को महकाती है॥ मेरे दिल को…

  • भजन हनुमान जी का | Hanuman Bhajan lyrics

    भजन-हनुमान जी का   ओ भोले हनुमान मैं निशिदिन करूँ तुम्हारा ध्यान। सियाराम के प्यारे सबका करते तुम कल्यान।। प्रभु के संकट में भी तुमने उनके काज बनाए राम मुद्रिका सीता मय्या तक तुम ही पहुँचाए जला के लंका हिला दिया था रावण का अभिमान।। सियाराम के—– अपने भक्तों की विपदा में तुरंत दौड़ कर…

  • टुन्न टुन्नू की होली | Kavita Tunn Tunnu ki Holi

    टुन्न टुन्नू की होली ( Tunn Tunnu ki Holi )   अबकी बेरिया होली मइहां, टुन्नू भइया पीकर भंग। चटक मटक होरिहारन संग, दिन भर रहे बजावत चंग। सांझ भई तो घर का पहुॅचे, देखि भये बड़कउनू दंग। मंझिला भौजी मिलीं दुवरिया, नैन मटक कर खींची टंग। छमिया भरी बाल्टी उड़ेली, ढलकि गये तब सगरे…

  • प्रतिशोध | Kavita pratisodh

    प्रतिशोध ( Pratisodh )   प्रतिशोध की उठती ज्वाला जब अंगारे जलते हैं सर पर कफ़न बांधे वीर लड़ने समर निकलते हैं   जब बदले की भावना अंतर्मन में लग जाती है तन बदन में आग लगे भृकुटियां तन जाती है   तीखे बाण चले वाणी के नैनों से ज्वाला दहके प्रतिशोध की अग्नि में…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *