Author: Admin

  • क़ुबूलनामा | Qubool Nama

    क़ुबूलनामा ( Qubool nama ) प्यार छुपाना क्यों बताती क्यों नहीं, अपने जज़्बात तुम जताती क्यों नहीं, मिलना न मिलना बात है मुकद्दर की अपना हूँ एहसास कराती क्यों नहीं। इश्क़ में आँसू नहीं हम चाहते है खुशी, बात ये अपनों को समझाती क्यों नहीं। दुश्मन है जो भी हमारी मोहब्बत के, बग़ावत में आवाज़…

  • हुस्न का गुलाब | Husn ka Gulab

    हुस्न का गुलाब ( Husn ka gulab )    हुस्न का है गुलाब वो आज़म शक्ल से लाज़वाब वो आज़म फ़ूल लेता नहीं वहीं मेरा दें निगाहों में आब वो आज़म चाहता हूँ अपना बनाना वो एक खिलता शबाब वो आज़म दीद हो किस तरह भला उसका ओढ़े है जो नक़ाब वो आज़म शक्ल से…

  • सोच रही शकुंतला | Soch Rahi Shakuntala

    सोच रही शकुंतला ( Soch rahi shakuntala )   जल में रख कर पाव सोच रही शकुंतला ले गए ओढ़नी मेरी दे गए गहरी पीर मोहे कब आओगे प्रियवर तकत राह ये नैन हूं अधीर बेचैन जल लेने को आई थी जल नैनों से छलके रे विरहन इस अगन को जल से ही शीतल करे….

  • मौके का वक्त | Mauke ka Waqt

    मौके का वक्त ( Mauke ka waqt )      मिल जाता है मौका भी कभी-कभी उन अपनों को आजमाने का जो भरते हैं दंभ अपनेपन का लगा देते हैं शर्त वक्त की   वक्त के प्रवाह से बचा भी नहीं कोई वक्त ने डुबाया भी नहीं किसी को वक्त देता है मौका सभी को…

  • टूट गई | नवगीत

    टूट गई | नवगीत   साँप मरा ना घुन खायी सी , लाठी टूट गई . जिनकी खातिर आँख फुड़ाई , कहें वही काना . उतना ही वह दुःख भोगता , जो जितना स्याना . चने उगें भी नहीं बतीसी , पहले टूट गई . सीना चीर दिखाया लेकिन , गई नहीं शंका . कंलक…

  • मधुर अहसास | Madhur Ehsaas

    मधुर अहसास ( Madhur ehsaas )   अलौकिक स्पंदन से,अभिस्वीकृत अर्चनाएं मृदुल मधुर अहसास, विमल उर श्रृंगार । चाहत पर राहत, भाव कूप मन आगार । अपनत्व अनूप संबंध, सादर अर्पित याचनाएं । अलौकिक स्पंदन से,अभिस्वीकृत अर्चनाएं ।। आकलन निज भूल त्रुटि, बेझिझक अब स्वीकार । दृढ़ संकल्प भावी जीवन , अनैतिक कृत्य दुत्कार ।…

  • सुबह तो होगी कभी | Subah to Hogi

    सुबह तो होगी कभी ! ( Subah to hogi kabhi )   मेरा भारत है महान, जग को बताएँगे, इसकी जमहूरियत का परचम लहरायेंगे। सबसे पहले लोकतंत्र,भारत ईजाद किया, इस क्रम को और गरिमामयी बनाएंगे। विशाल वट-वृक्ष तो ये बन ही चुका है, करेंगे इसका सजदा,सर भी झुकायेँगे। कभी-कभी छाता है घना इसपे कुहरा, बन…

  • राशनकार्ड ( लघुकथा ) | Ration Card

    एक दिन ईशा रसोई के सारे डिब्बे साफ करके बड़े खुश थी सोच रही थी के पहिले के जमाने में कितने बड़े कंटेनर होते थे परंतु आजकल आधुनिकता के चलते सुपरमार्केट या मॉल में से सिर्फ पैकेट ही प्राप्त किए जाते हैं । वजन ढोने के चलते लोग उतना ही पैकेट या समान ले लेते…

  • व्यर्थ की सोच | Vyarth ki Soch

    व्यर्थ की सोच ( Vyarth ki soch )    लक्ष्य सर हटकर अलग एक दिन की भी व्यर्थ सोच कर सकती है भ्रमित आपको बहक सकते हैं गैर की संगत से बदल सकती है मार्ग की दिशा और आप जा सकते हैं अपने उद्देश्य सर दूर आपकी प्रमुखता आपसे नही आपके कर्म से ही होती…

  • डरते – डरते | Darte -Darte

    डरते – डरते ( Darte -Darte )    एक ट्रक यूँ सटकर गुजरा , बचे हैं मरते – मरते . आगे – पीछे देख पुनः अब , चले हैं डरते – डरते . जाने किसका मुँह देखा था , न पड़ा पेट में दाना . सूरज बैरी सा चढ़ आया , मिला ना पता-ठिकाना ….