साथ | Sath
साथ ( Sath ) वह साथ ही तुम्हे कभी साथ नही देता जिस साथ मे साथ की निजी लालसा हो दीवार कभी भी इतनी ऊंची न उठाओ की पड़ोसी के चीखने की आवाज सुनाई न दे ऊंचाई के भी हर पत्थर तो पूजे नही जाते तलहटी की शिलाओं मे भी भगवान बसते हैं तुम…
साथ ( Sath ) वह साथ ही तुम्हे कभी साथ नही देता जिस साथ मे साथ की निजी लालसा हो दीवार कभी भी इतनी ऊंची न उठाओ की पड़ोसी के चीखने की आवाज सुनाई न दे ऊंचाई के भी हर पत्थर तो पूजे नही जाते तलहटी की शिलाओं मे भी भगवान बसते हैं तुम…
अवध में राम आये है इस नाम के प्रथम संस्करण का सफलतापूर्वक प्रकाशन माह जून 2023 में हुआ है यह पुस्तक ब्राइट एम. पी. पब्लिशर 1081 ए चाचा चौक नियर एन. आई. टी. फरीदाबाद हरियाणा 121005, मुद्रण एस. आर. एन. पी. प्रिंटर्स 1070 ए, राजीव नगर गुड़गाॅंव, हरियाणा- 122001 द्वारा प्रकाशित किया गया है जिसका…
हाल-ए-दिल बताना है ( Haal-e-dil batana hai ) हाल -ए – दिल उसे बताना है। आज कुछ भी नहीं छुपाना है। प्यार करके ये दिल बहुत रोया, और पीछे पड़ा ज़माना है। आँसुओं से लिखे है ख़त मैने, क्यूँ बना वो रहा बहाना है। बेवफ़ा वो नहीं पता मुझको, जान है वो उसे मनाना…
बंधित ( Bandhit ) कल वो फिर नही आई मेरी काम वाली बाई और मैं सोचती रही क्या हुआ होगा पेट दर्द, सिर दर्द, हाथ दर्द या पैर में पीड़ा.. रोज सुबह चाय का कप साथ पीने के बहाने जब बैठा देती हुँ उसे काम के बीच रोककर देखती सुनती हुँ उसे तब उठती…
खेल ये है तमाम रोटी का ! ( Khel ye hai tamam roti ka ) सबसे ऊँचा मुक़ाम रोटी का हर कोई है गुलाम रोटी का अर्ज़ है सबके वास्ते कर दे ऐ ख़ुदा इंतज़ाम रोटी का मुफ़लिसों के लबों पे रहता है ज़िक्र बस सुब्ह ओ शाम रोटी का और कोई न कर…
हो गई खता यूँ ही ( Ho gayi khata yoon hi ) हो गया कितना बावला यूँ ही आँख से हो गई खता यूँ ही लोग मिलते रहे जुदा भी थे साथ में चलता काफिला यूँ ही याद फिर रोज वो लगे आने पहले जिनको भुला दिया यूँ ही चाह थी गर तो कह…
आंखों में जिसका सपना है ( Aankhon mein jiska sapna hai ) आंखों में जिसका सपना है ? दूर कहीं वो मुझसे रहता है कौन करे किससे यार वफ़ा उल्फ़त में होता धोखा है छोड़ सताना तू मुझको ही उल्फ़त में ही दिल टूटा है हाल कहूँ मैं किससे दिल का दोस्त न कोई…
पाती धड़कनों की ( Pati dhadkano ki ) दिल की स्याही में पिरो- पिरो कर जज़्बातों का रस घोल- घोल कर – भाषा का मधु उड़ेल कर मोती जड़े अक्षरों का जादू बिखेर कर- छलकती- महकती जब पहुंँचती थी चिठिया पाने वाला इस रंगीन जादू से तरबतर हो जाता था खुद महकता- परिवेश को…
उसका सितम इनायत से कम नहीं! ( Uska sitam inayat se kam nahin ) सैकड़ों तीर उसे चलाना आ गया, जैसे मेरे घर मयखाना आ गया। बढ़ती जब तलब आती है मेरे घर, उसको भी दिल लगाना आ गया। छोटे – सी थी अब हो गई है बड़ी, वादा उसे भी निभाना आ गया।…
मेरे आस पास में ( Mere aas paas me ) कोई नादान हो रहा है मेरे आस पास में, उम्मीदों को बो रहा है मेरे आस पास में। बारिशों से कहिए कि पूरा झूम के बरसें, कोई ख़्वाब धो रहा है मेरे आस पास में। वो ज़माने भर के सैंकड़ों भंडार छोड़ के, हसरतों…