बड़े ख्वाब

बड़े ख्वाब | Bade Khwaab

बड़े ख्वाब

( Bade Khwaab )

अक्सर मैंने बड़े ही
ख्वाब देखे हैं,
परन्तु ,
बहुत से गुमनाम
देखे है,
ये भी देखा है,
कि कहाँ ईश्वर है,
कहाँ फ़कीर खाली है,
मैंने उन पदचिन्हों के
भी निशान देखे है।
किस तरफ रूख करूँ अपना,
चलने से पहले सैकड़ों सवाल
देखे है।
जवाब कहाँ से पाती,
कहीं कोई निशान नही उनका,
ये समझ आ गया
जिम्मेदारियों तले
सभी ख्वाब टूटते भी देखे है,
सच है—
कुछ ख्वाब – ख्वाब ही
रह जाते है,
और हम फिर
इस मुफलिसी दुनियां
में सिमटकर
रह जाते है।।

डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’

लेखिका एवं कवयित्री

बैतूल ( मप्र )

यह भी पढ़ें :-

Similar Posts

  • मैं चाहता हूं बस तुमसे | Prem kavita in Hindi

       मैं चाहता हूं बस तुमसे ( Main chahta hun bas tumse )   मैं चाहता हूं बस तुमसे थोड़ा सा प्यार थोड़ा-सा मन थोड़ा-सा सुकून थोड़ा-सा अहसास।   मैं तुमसे चाहता हूं बस थोड़ी-सी हँसी थोड़ी-सी खुशी थोड़ी-सी बातें थोड़ी-सी शान्ति।   मैं तुमसे चाहता हूं बस थोड़ा-सा दर्द थोड़ा-सी तकलीफ़ थोड़ी-सी बैचेनी थोड़ी-सी…

  • हमनवा | Humnava par kavita

    हमनवा (  Humnava )   तुम प्रेरणा हो मेरी मैं संगिनी तुम्हारी तुम प्रियवर हो मेरे मैं प्रियतमा तुम्हारी तुम कविता हो मेरी मैं कलम तुम्हारी तुम श्रंगार हो मेरे मैं संगिनी तुम्हारी तुम जीवन हो मेरे मैं धड़कन तुम्हारी तुम प्राणश्वर हो मेरे मैं दामिनी तुम्हारी तुम मनमोहन हो मेरे मैं मोहिनी तुम्हारी तुम…

  • नदी का किनारा

    नदी का किनारा बहती नदी संग मैं ठहरा सा बैठा,तेरी राहों में उम्मीदों को समेटा।लहरें भी अब तो कहने लगीं,दिकु, लौट आओ,इन्हीं दुआओं के धागों से हूँ मैं लिपटा। धूप-छाँव का ये खेल भी सुना सा है,तेरी हँसी के बिना हर रंग धुंधला सा है।पानी में देखूँ तो चेहरा तेरा उभरे,तेरी आहटों का हर साया…

  • बटवारा

    बटवारा   बूढ़े बरगद के चबूतरे पर घनेरी छांव में। देखो फिर एक आज बंटवारा हुआ है गांव में।। कुछ नये सरपंच तो कुछ पुराने आये, कुछ बुझाने तो कुछ आग लगाने आये। बहुत चालाक था बूढ़ा कभी न हाथ लगा, पुराने दुश्मनों के जैसे आज भाग्य जगा। पानी कब तक उलचें रिसती नाव में।।…

  • भवंर | Bhanwar

    भवंर ( Bhanwar )    चित्त का भवंरजाल भावनाओं की उथलपुथल एक बवंडर सा अन्तस में और हैमलेट की झूलती पक्तियां टू बी और नाॅट टू बी जद्दोजहद एक गहन.. भौतिक वस्तुएं आस पास रहते लोग सामाजिक दर्जे और हैसियत क्षणिक और सतही खुशी के ये माध्यम नही करवा पाते चित्त को आनन्द की अनुभूति……

  • गुस्ताखी | Gustakhi

    गुस्ताखी ( Gustakhi )    कलियों के भीतर यूं ही , आ नही जाती महक समूचे तने को ही , जमीं से अर्क खींचना होता है चंद सीढ़ियों की चढ़ाई से ही, ऊंचाई नही मिलती अनुभवों के दौर से गुजर कर ही, सीखना होता है सहयोग के अभाव मे कभी, मंजिल नही मिलती अकेले के…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *