डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार की कविताएं | Dr. Preeti Singh Parmar Poetry
“कुंभलगढ़ के शेर”
(महाराणा प्रताप पर समर्पित एक भावनात्मक, प्रेरणादायक और गौरवपूर्ण कविता)
कुंभलगढ़ की गोद में जन्मा, मेवाड़ का लाल,
वीर प्रताप, सिंह सा गर्जे, जिसने रण में ढाया काल।
धूप-छाँव में पला बढ़ा वो स्वाभिमानी माटी का गौरव
राजपूताना की शान बना, जो झुका नहीं, बना प्रमाण।
पिता उदयसिंह के आँगन में,
जयवंता की गोद फूल खिला,
राजपुताने की रग-रग में, प्रतिशोध का दीप जला।
बचपन से ही तलवारों संग खेला बाका शूरवीर,
धोखा, डर और दगाबाज़ी इससे था वो दूर अधीर।
हल्दीघाटी की रणभूमि में, जब झंकारा रणघोष,
तो चेतक पर चढ़ वीर बोला — नहीं सहूँगा द्रोह।
अकबर की सत्ता को ललकारा,
झुकना नहीं उसने स्वीकार,
त्यागा सुख-सिंहासन सब ,
चुनी कठिन कंटीली राह
घाव लगे, पर हार न मानी,
झुकाने की उसने ना ठानी
पराधीनता स्वीकारी ना
शेरों सी हुंकार भरी हां।
नाम से काँपे दुश्मन सेना
मेवाड़ का था वह गहना
कुंभलगढ़ की मिट्टी बोले
प्रताप मेरा तू अमर रहे
शूरवीर पराक्रमी ऐसा।
दीपक सा उजियारा करता।
अंधियारा डर दूर वों करता।
ना झुका, ना रूका ना बिका, ना टूटा,
स्वाभिमान की थी यह रीत,
जन-जन के दिल का वह राजा,
प्रताप, तू अमर पुनीत!
आज भी जब मेवाड़ हँसता, गूंजे गाथा तेरी,
शौर्य, त्याग, बलिदान की, चिरंजीव कहानी घनेरी।
हे महाराणा! तुझको नमन, तू भारत का भाल,
तेरी गाथा पढ़ हर नर-नारी, बन जाता है लाल।
वीर शिरोमणि महाराजा छत्रसाल
(बुंदेल वीर रस महाकाव्य)
भाले पे सूरज दमक रहा, टाप धरे भल्ले भाई,
छत्रसाल बुंदेला गरजे, रण में बिजली सम छाई॥
प्राणनाथ चरणों में लगे, आत्मबल का दीप जला,
धर्म, भक्ति, पराक्रम जागा, बना शिव का बांकुरवा॥
आई जमुना उत्तर तट, जब बुंदेला बढ़ा मगन,
काहू में ना देखी समता, काँपे मग, काँपे गगन॥
भूषण बोले असीस दे, “बान निके संग छूटी जान”,
तुरकन दल के उर काँपे, जब छत्रा बढ़े वीर महान॥
धक-धक धरती डोले रे, जब छत्रसाल चढ़े घोड़े,
हर मुट्ठी में आग बहे, ज्यों बिजली सम तोड़े मोड़े॥
वीर शिरोमणि, धर्मरक्षक, तलवार-क़लम के धनी,
बुंदेलों की माटी बोले – “जय हो महाराज छत्रसाल बनी॥”
जनमे जब बाँदा भूमि में, दीप जले अपार ,
लाड़कुवर, चंपतराय सुत कुल नाम दिया उजिजार॥
गुरु बने साहेब सिंह वीर, महोबा के रत्न महान,
रणकौशल की दीक्षा दी, बन गए शूरवीर प्रखर ज्ञान॥
शिवाजी को पूजें मन से, मानें देव समान,
स्वराज्य भावना फूटी, तब जागा नव हिंदुस्तान॥
रग-रग में था तेज समाहित, आँखों में स्वप्न स्वराज,
धार पर चलकर भी रच डाला, भारत का नव राज।
देवमाला बनी सहचरी, पुण्य परिणय धन्य,
बुंदेलखंड में गढ़े राज्य, पन्ना बनी राजधानी अनन्य॥
जब औरंगजेब ने भेजा दूत, कहा – “सिर अब झुकाओ”,
छत्रसाल गरजे – “रज नहीं दूँगा, तलवार उठाओ!”
रण जला फिर बुंदेल में, सत्तर बरसों बाद,
भल्ले भाई पर चढ़ दौड़े, धरती बनी अग्निकाय॥
एकाकी लड़े वर्षों तक, ना विचलित, ना रुके कहीं,
जब संकट गहराया तब, पेशवा आए धन्य वहीं॥
बाजीराव बने सहायक, मित्र धर्म युद्ध रचाया,
मुगल सल्तनत के अभिमान को, रण में धूल चटाया॥
न्याय, धर्म, नारी-सम्मान – प्राणों से पाला धर्म,
छत्रसाल न भूले भारत को, न भूले गौरव मर्म॥
धर्म पर अडिग, न्याय में निडर, स्वराज्य का दीप जलाया,
छत्रसाल वो वीर जहाँ, सिंह भी शीश झुकाया॥
बुन्देली माटी अंग लगाए, जहाँ धर्म की धार बही,
गुरु ने शस्त्र सिखाए, रणकौशल की रीत सही॥
बुंदेलों की पुण्य भूमि में, गूंजे जयकारों की ताल,
सदा अमर हो नाम तेरा – जय वीर केसरी छत्रसाल!
“अहिल्या – धरती की धैर्य-दीपिका”
अहिल्या थी, अडिग नारी,
धैर्य की दीपिका, पुण्य की सवारी।
ना गहनों में शक्ति देखी,
ना महलों की जय-जयकार की पाती लेखी।
मालवा की माटी में जन्मी वो,
पर हर नारी के मन में रमती वो।
न पत्नी रही, न बहू भरमाई,
राजधर्म में जोत जलाई।
पति को खोया, आँसू पिए,
दामाद-बेटा, सब दुःख लिए।
शोक की छाया में न डिगी,
राजा बन, कर्तव्य में ठनी।
महेश्वर की घाटों पर संजीवनी छिड़की,
हर मूर्त तोड़ी गई जहाँ, पुन निर्माण किया वहाँ
काशी, गया, द्वारका, मथुरा —
भक्ति की दीप जलाई हर धरा।
न स्त्री का शोक था, न रानी का घमंड,
थी तो एक “प्रशासिका”, भारत का गर्वबिंदु।
बिना युद्ध की बूँद गिराए,
शांति से शासन चलवाए।
शिव की भक्त, पर न्याय में कठोर,
हर पीड़ित के लिए बनती थी ढाल और भोर।
धर्म, न्याय और नीति की मिसाल बनी,
हर युग की नारी को दिशा वही बनी।
सादा जीवन, उच्च विचार,
धर्म और कर्तव्य में अपार।
सिंहासन पर बैठी पर योगिनी सी रही,
मातृरूपा अहिल्या, हर युग की देवी रही।
“बेटियाँ – भावों की सरगम”
पिता की पलकों का सपना होती हैं बेटियाँ,
माँ के अंचल की उजली सी किरणें होती हैं बेटियाँ।
कभी रुला जाएँ तो कभी हँसा जाएँ,
सावन की घटाओं-सी बरस जाएँ बेटियाँ।
गुड़िया के संग रचें संसार,
आँगन में खेलें सपनों का त्यौहार।
अपने ही हाथों से रोटियाँ बनाती,
पिता को परोसकर मुस्कुराती – बेटियाँ।
फूलों की बगिया, महक का संदेश,
हर घर को बना दें ये प्रेममय देश।
कभी तितली बन उड़े मन के रंग में,
कभी चिड़िया बन चहके जीवन संग में।
पत्थर के पिचकुटे खेल में रम जाती,
गुड्डे गुड़िया का ब्याह रचाती आंगन में पंछी को दाना खिलाती।
पायल की रुन झुन से घर को गुंजाती ,
ना जाने कब चुपचाप सयानी हो जाती,
खेल से निकल, जिम्मेदारियों में रम जाती बेटियाँ।
अपने घर का आँगन छोड़,
दूसरे घर को करती है आलोकित और जीवन को देती एक नया मोड़।
नए रिश्तों में बाँध लेती खुद को,
हर कर्तव्य को निभा लेती निशब्द स्वरूप को।
बेटियाँ सिर्फ़ देह नहीं, आत्मा का गीत हैं,
जीवन के हर मोड़ पर मधुर संगीत हैं।
जिन घरों में हों उनका सम्मान,
वहीं खिलता है सच्चा स्वाभिमान।
भाग 1 – फल मंडी का लोकतंत्र
(एक हास्य-व्यंग्य)
फल मंडी में आज बड़ी हलचल थी।
सभी फल इकट्ठे हुए थे एक जरूरी मीटिंग के लिए।
विषय था —
“हमारी उपेक्षा और आम की वंशवादी राजनीति!”
चीकू गुस्से में बोला –
“मैं भी मीठा हूँ, मुलायम हूँ, पर कोई मुझे पूछता तक नहीं! बस आम-आम-आम!”
गाजर ने समर्थन दिया –
“मुझसे रस भी बनता है, हलवा भी, फिर भी मुझे ‘सब्जी’ कहकर भुला दिया जाता है!”
पपीता मुस्कराया –
“मैं तो पेट साफ करता हूँ, सौंदर्य बढ़ाता हूँ। लेकिन लोग मुझे ‘बीमारों का फल’ कहकर टाल देते हैं!”
खरबूजा तरबूज आपस में भिड़ गए –में में यह उल्लेख एर
“तू ज्यादा पानी वाला!”
“तेरा स्वाद फिका!”
अंगूर चुपचाप बुदबुदाया –
“हम तो गुच्छों में रहते हैं, फिर भी एकता की मिसाल माने नहीं जाते!”
सेब अंग्रेजी में बोला –
“An apple a day keeps the doctor away! मैं तो क्लासिक चॉइस हूं!”
केला आराम से टेक लगाए बैठा था –
“मैं पूजा में भी आता हूं, भूख मिटाने में भी। मुझे तो सबकी ज़रूरत है!”
तभी आम आया – ठाठ से मुस्कराता हुआ।
“भाइयों, मैं क्या करूं अगर जनता मुझे राजा मानती है?”
चीकू बुदबुदाया –
“लोकतंत्र में सब बराबर हैं, पर स्वाद और शोहरत का भेदभाव भारी है!”
अनानास बोला –
“मैं विदेशी हूं, मगर पाचन का पंडित हूं। पर मुझे सजावट तक सीमित कर दिया गया!”
संतरा बोला –
“विटामिन C का खजाना हूं, फिर भी लोग ठंड में मुझे ठुकरा देते हैं!”
मौसमी दुखी थी –
“मुझे ‘बीमारों का संतरा’ कहकर अनदेखा कर दिया गया!”
खिन्नी बोली –
“मैं भी इम्युनिटी बढ़ाती हूं, फिर भी मेरी खटास से डरते हैं लोग।”
लीची मुस्कराई –
“मैं VIP हूं! पर कुछ ही दिन के लिए आती हूं, इसलिए कद्र होती है मेरी।”
अनार बोला –
“मैं खून बढ़ाता हूं, पर मेरे दाम सुनते ही लोग मुंह फेर लेते हैं!
चीकू गुस्से में बोला –
“मैं भी मीठा हूँ, मुलायम हूँ, पर कोई मुझे पूछता तक नहीं! बस आम-आम-आम!”
गाजर ने समर्थन दिया –
“मुझसे रस भी बनता है, हलवा भी, फिर भी मुझे ‘सब्जी’ कहकर भुला दिया जाता है!”
पपीता मुस्कराया –
“मैं तो पेट साफ करता हूँ, सौंदर्य बढ़ाता हूँ। लेकिन लोग मुझे ‘बीमारों का फल’ कहकर टाल देते हैं!”
खरबूजा तरबूज आपस में भिड़ गए। खरबूजा,,,,, एर, को कर मैं मैं ,,,फीका
और। “तू ज्यादा पानी वाला!”
“तेरे दांत काले पर मेरे सफेद मोती जेसे!!!
अंगूर चुपचाप बुदबुदाया –
“हम तो गुच्छों में रहते हैं, फिर भी एकता की मिसाल माने नहीं जाते!”
सेब अंग्रेजी में बोला –
“An apple a day keeps the doctor away! मैं तो क्लासिक चॉइस हूं!”
केला आराम से टेक लगाए बैठा था –
“मैं पूजा में भी आता हूं, भूख मिटाने में भी। मुझे तो सबकी ज़रूरत है!”
तभी आम आया – ठाठ से मुस्कराता हुआ।
“भाइयों, मैं क्या करूं अगर जनता मुझे राजा मानती है?”
चीकू बुदबुदाया –
“लोकतंत्र में सब बराबर हैं, पर स्वाद और शोहरत का भेदभाव भारी है!”
अनानास बोला –
“मैं विदेशी हूं, मगर पाचन का पंडित हूं। पर मुझे सजावट तक सीमित कर दिया गया!”
संतरा बोला –
“विटामिन C का खजाना हूं, फिर भी लोग ठंड में मुझे ठुकरा देते हैं!”
मौसमी दुखी थी –
“मुझे ‘बीमारों का संतरा’ कहकर अनदेखा कर दिया गया!”
खिन्नी बोली –
“मैं भी इम्युनिटी बढ़ाती हूं, फिर भी मेरी खटास से डरते हैं लोग।”
लीची मुस्कराई –
“मैं VIP हूं! पर कुछ ही दिन के लिए आती हूं, इसलिए कद्र होती है मेरी।”
अनार बोला –
“मैं खून बढ़ाता हूं, पर मेरे दाम सुनते ही लोग मुंह फेर लेते हैं!”
जामुन गहरी आवाज में –
“मैं डायबिटीज का डॉक्टर हूं। मगर लोग मेरी सादगी से भागते हैं।”
सभा शांत हो
फल मंडी में भी राजनीति है,
स्वाद है, इर्ष्या है, पर एकता नहीं।
शायद इसीलिए सलाद में सब कटे-फटे होकर ही साथ आते हैं!
जामुन गहरी आवाज में –
“मैं डायबिटीज का डॉक्टर हूं। मगर लोग मेरी सादगी से भागते हैं।”
सभा शांत हो
फल मंडी में भी राजनीति है,
स्वाद है, इर्ष्या है, पर एकता नहीं।
शायद इसीलिए सलाद में सब कटे-फटे होकर ही साथ आते हैं! स्वरचित डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
सब्ज़ियों की न्यायसभा
(एक कोर्ट रूम हास्य – व्यंग्य कविता)
मंच: सब्ज़ियों का न्यायालय,
न्यायाधीश: महामहिम बैगन बहादुर (सर पर चमकता ताज),
वाद संख्या: 100 किलो बनाम स्वाद का घोटाला!
घंटी बजी… सब्जियाँ आ जुटीं…
कुर्सियाँ खड़कीं, बेलपत्र गिरी, और सब बोले –
“आज होगा फैसला – कौन है सबसे स्वाद की रानी!”
आलू – वादी पक्ष से खड़ा हुआ:
“माई लॉर्ड! मेरे बिना हर सब्ज़ी है अधूरी,
मैं संग में आ जाऊँ, तो बन जाए ज़िंदगी पूरी!”
“भुजिया हो, दम हो, या छोले का खेल,
मेरे बिना तो लगे जैसे संसद बिना बेल!”
बैगन – न्यायाधीश, आत्ममुग्ध स्वर में:
“ठीक है आलू, तू हर थाली में पाया जाता है,
पर राजसी ठाठ-बाट तो मेरे सिर सजता है!”
“मुझे देखो – चिकना, चमकदार, रंगीला,
‘भर्ता’ कहो या ‘नवाबी करी’, हर रूप में मैं झमकीला!”
भिंडी – बचाव पक्ष की अधिवक्ता:
“माई लॉर्ड, मेरे मुवक्किल मूली जी को लोग तीखा कहते हैं,
पर मैंने खुद देखा – सलाद में सबसे पहले इन्हीं को उठाते हैं!”
“रसोई में कोई दंगे हों, या स्वाद की जाँच,
मूली के आते ही सब्ज़ियाँ करतीं हैं सांठ-गांठ!”
गाजर – शालीन गवाह:
“मेरे बिना तो हलवे की मिठास ही खो जाए,
और दादी कहती थीं – ‘गाजर खाओ, आँखों की ज्योति बढ़ जाए!’”
फूलगोभी – स्वघोषित VIP:
“मैं हूँ अंग्रेज़ी गोभी, इटालियन मंचूरियन की जान,
अगर मुझ पर मसाला चढ़े – तो सब कहें ‘वाह रे पकवान!’”
प्याज़ – आहत भाव से:
“मैं सबका आँसू बहाऊँ, पर खुद कभी न रोता,
मुझे तलो, भूनो या काटो – मैं थाली में खूब सोता!”
“पर कोई subsidy नहीं, कोई भावनात्मक लाभ नहीं,
अब मैं आंदोलन करूँ क्या? बताइए न्यायप्रिय गण!”
पत्ता गोभी – शिकायत दर्ज कराता है:
“मुझे सब सस्ते में खरीदते हैं, पर कभी आदर नहीं देते,
मैं तो ठंड के दिनों में जीवन देता हूँ, फिर भी कोई ‘वाह’ नहीं कहते!”
तुरई – आत्मदया में डूबी:
“लोग कहते हैं – बेस्वाद, भला बताइए दोष किसका?”
“मैं तो कहती हूँ – थोड़ा प्यार से पकाओ, फिर देखो चमत्कार किसका!”
न्यायमूर्ति बैगन – निर्णय की घड़ी:
“बहुत बहस सुन ली, अब निर्णय सुनाइए:”
“ना कोई सबसे बड़ा, ना कोई सबसे छोटा,
थाली में सब बराबर, यही लोकतंत्र का कोटा!”
“स्वाद की अदालत में सबका सम्मान,
जो न माने, उसकी सब्ज़ी बनाना ‘तानाशाह’ की पहचान!”
फैसला जारी:
“आलू को मिलेगा राष्ट्रीय सब्ज़ी पुरस्कार,
भिंडी को नाजुकता सम्मान,
मूली को तेजस्विता चक्र,
और कटहल को वीरता पदक!”
सब्ज़ियाँ तालियाँ बजाती हैं,
और सब्ज़ीवाले बाबा गाते हैं –
*”आलू-बैगन साथ चलें, प्याज़ करे तड़का!”
“हम सब्ज़ियाँ एक हैं, हमारा स्वाद बड़का!”
उपसंहार:
“हास्य की थाली में सब्ज़ियाँ परोसीं,
व्यंग्य का नमक और कविता की चटनी चोखी।
रसोई हो या राजनीति – ‘सब्ज़ियाँ’ हमें सिखा जाती हैं,
कि मिलजुल कर ही स्वाद आता है, नहीं तो ज़िंदगी फीकी हो जाती है!”
“माँ-बाप का बुढ़ापा: एक मौन विलाप”
बुढ़ापा बन गया अब एक अभिशाप देखो ।
दो रोटी को तरसते माँ-बाप हैं देखो।
जिनसे जीवन मिला, वो आज बेहाल हैं।
अपने ही घर में आज मेहमान हैं देखो।
जिनकी गोदी थी कभी शीतल छाँव सी,
अब उन्हीं की आँखें हैं, आँसू की नाव सी।
जिसे झुलाया था बाँहों की पनाह में,
वही संतान अब बात नहीं करता चाह में।
जिसको लोरी गाकर गाकर रातों में सुलाया,
खुद भूखा मुस्कुराया उसे कौर-कौर खिलाया।
हाथ पकड़कर जिसने चलना सिखाया,
आज वही हाथ तन्हा, काँपता, लजाया।
बेटा अब कहता “घर छोटा है माँ-पिता के लिए”,
और पत्नी मुस्कुराती है वृद्धाश्रम के लिए।
वो आँगन जहाँ गूंजती थी माँ की हँसी,
अब वहाँ सन्नाटा है, आँखें हैं भीगी-सी।
पिता जो वज्रवत थे, रीढ़ की तरह अडिग,
अब मौन हैं, कमर झुकी, हृदय में बस पीर।
माँ जो कभी छुअन से दुख हर लेती थी,
आज खुद उपेक्षा की आँच में जलती है।
समय है ठहरो, सोचो, समझो कहीं देर न हो जाए जीवन
के इस बँधन को यूं मत तोड़ो।
माँ-बाप स्वर्ग का द्वार हैं, उनके चरण तीर्थ मत छोड़ो
बिना उनके जीवन अधूरा, अस्तित्व को न मिटाओ
समय रहते युवाओं संभल जाओ
संस्कारों का दीपक मन में जलाओ,
उठो अपने माँ-पिता को दिल से लगाओ।
हों न कभी ऐसा कि वे कहते रह जाय
हमने ही जीवन दिया पर तुझे बुढ़ापा न आए।
जिंदगी का सफर इतना था रह गए बस साये।








