Kahe Kailoo Mai

Hindi Poetry On Life | Kavita -काहे कइलू माई एतनी बज्जर क छतिया

काहे कइलू माई एतनी बज्जर क छतिया 

( Kahe Kailoo Mai Etni Bajjar Ka Chatiya )

 

काहे कइलू माई एतनी बज्जर क छतिया।
पेटवा में मारऽजिन गिरइ द धरतिया।।

 

कबहुं नाहीं धरती बोवल बीजवा के मारे।
बाहर अंकुरवा करे पेंड़ बने सारे ।।
जननी जीवदान तोहसे मांगे तो हरी बिटिया ।।पेटवा।।

 

कामकाज घरवां क साफ औ सफाई।
झाड़ू पोंछा नाहीं कबहुं बेटवा लगाई।।
जनि बनऽ माई अब तूंहू बेटी घटिया।। पेटवा.।।

 

डा.इंजीनियर आज बिटिया बनेली।
बेटा से जादा देखऽ सेवा भी करेली।।
हमहूं के देखै देतू जग में दिन रतिया।। पेटवा.।।

 

ममता के मूरति माई बन न कसाई।
पटवा में मारै ख़ातिर खातू न दवाई।।
शेष चाहे निर्धन के दइ दिहू अक्षतिया।। पेटवा.।।

 

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कवि व शायर: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”
प्रा०वि०-बहेरा वि खं-महोली,
जनपद सीतापुर ( उत्तर प्रदेश।)

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