Kavita Bin Thokar ke

बिन ठोकर के अक्ल न आती | Kavita Bin Thokar ke

बिन ठोकर के अक्ल न आती

( Bin thokar ke akal nahi aati ) 

 

गुरु का डंडा और राह की ठोकर,
दोनों दरवाजे कामयाबी खोलती।
जिस जिसको भी लगा यह दोनों,
उसे मंजिल तक पहुँचाकर रहती।।

बदल ही जाती तकदीर सभी की,
कलम फिर सरपट चलने लगती।
तलाश ना करो तुम मुस्कराने की,
बिन ठोकर के अक्ल नही आती।।

प्रकृति सभी को यह पाठ पढाती,
कौन आगे बढ़ता पहाड़ हटाकर।
कही पे कांटे एवं पत्थर बिछाती,
आगे वह बढ़ते चलते सभंलकर।।

बुरा समय जब किसी का आता,
तब बुद्धि घास चरने चली जाती।
मनुष्य सही निर्णय नही ले पाता,
बिन ठोकर के अक्ल नही आती।।

 

रचनाकार : गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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