Thaharaav

ठहराव |Thaharaav

ठहराव

( Thaharaav )

 

मुझे तो चलना ही होगा
आप चले या ना चलें
आपके खातिर मैं रुक नहीं सकता
हालांकि आपको छोड़ना भी नहीं चाहता

सफर दूर का है फासला बहुत है
भरोसा नहीं कल के फजर का
मगरिब से पहले पहुंचना है मुकाम तक
चलना है मुझे इसी जिद्दी से

भरम पालकर बैठे हैं आप
अपना भी वक्त आएगा की उम्मीद में
वक्त खुद से भला पुकारेगा क्यों आकर
उसे तो आपको ही माकूल बनाना होगा

चलता हुआ देखकर साथ हो लेंगे लोग
करेगा नहीं कोई इंतजार आपका
सभी के अपने दायरे हैं मुखातिब
आपके तो फैसला ही अभी बाकी हैं

ठहरने से ठहरता ही नहीं, मर जाता है कल
कल के लिए आज की जिंदगी जरूरी है
सांस तो मिली है गिनती की ही
आज हो या कल ,आप उन्हें बढ़ा नहीं सकते

 

मोहन तिवारी

( मुंबई )

यह भी पढ़ें :-

पाकीज़गी | Pakizagi

Similar Posts

  • मेरे मन के आंगन में आज | Mere Man ke Aangan mein

    मेरे मन के आंगन में आज ( Mere man ke aangan mein aaj )    मेरे मन के आंगन में आज मेरी मां की छवि समाई है जिसके पावन आंचल में मेरी सारी खुशियां समाई हैं हर मुश्किल की घड़ी में मैंने मां का आंचल थामा है जिसकी छाया ने मुझको हर पल जीना सिखाया…

  • चले आओ मेरे गांव में | Geet chale aao mere gaon mein

    चले आओ मेरे गांव में ( chale aao mere gaon mein )     ठंडी ठंडी मस्त बहारे मदमस्त बहती मेरे गांव में चौपालों पर लोग मिलते बरगद की ठंडी छांव में चले आओ मेरे गांव में   सुख दुख के हाल पूछे मिल दुख दर्द सब बांटते मिलजुल कर खेती करते मिलकर फसल काटते…

  • डॉ. सत्यवान सौरभ की कविताएं | Dr. Satyawan Saurabh Hindi Poetry

    “ये कांवड़ उठाने से कुछ नहीं होगा” कांवड़ उठाए घूम रहा है,कंधों पे धर्म लादे जा रहा है,गांव का होनहार मर गया,माँ बेटे की राख छू रही है……और सरकार चुप है। शिक्षक था बाप, फिर भी मौन रहा,सिखा न सका—कि आस्था नहीं, पढ़ाई बचाती है!पर वो चुप रहा…क्योंकि आस-पास मंदिर थेऔर इलेक्शन नज़दीक था। बच्चा…

  • योगी बन | Kavita Yogi Ban

    योगी बन ( Yogi Ban )   ध्यान धर चिंतन कर योगी बन तू कर्म योगी बन नित नव नूतन हर पल कर सफल अपना जीवन योगी बन नश्वर जगत नश्वर काया स्थिर नहीं कुछ सब माया सूक्ष्म अणु रूप प्राण पाया कर प्रज्ज्वलित मन चेतन योगी बन यह अनुपम जीव यात्रा देह जैसे अक्षर…

  • आओ रोएँ

    आओ रोएँ ०जिसको खोया उसे याद कर बिलखें कलपें नयन भिगोएँआओ रोएँ०जो न खो गए उनको भूलेंखुशी दफ़्न कर, मातम वर लेंनंदन वन की जमीं बेचकरझट मसान में बसने घर लेंसुख-सपनों में आग लगाकरदुख-दर्दों के बीजे बोएँआओ रोएँ०पक्ष-विपक्ष नयन बन जाएँभूले से मत हाथ बँटाएँसाथ न चलकर टाँग अड़ाएँफूटी आँख न साथी भाएँनहीं चैन से…

  • पग बढ़ाते चलो

    पग बढ़ाते चलो ***** कंकड़ी संकरी पथरीली, या हों रास्ते मखमली। हृदय में सदैव जली हो अग्नि, स्वार्थ हमें सब होगी तजनी। सेवाभाव की मंशा बड़ी, रास्ते में मुश्किलें भी होंगी खड़ी। पर जब करने की मंशा हो भली, बाधाएं दूर हो जातीं बड़ी से बड़ी। खुदा के वास्ते न देखो पीछे मुड़कर, बस तू…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *