उसे पास बुलाते क्यों हो
उसे पास बुलाते क्यों हो
टूटने है जो मरासिम वो निभाते क्यों हो
दूर जाता हो उसे पास बुलाते क्यों हो।
वक्त माकूल नहीं हो तो बिगड़ती चीज़ें
दौर-ए-तूफाॅं में चिराग़ों को जलाते क्यों हो।
तुम हमारे हो फ़कत है ये नवाज़िश हम पर
बस गिला ये है कि एहसान जताते क्यों हो।
आइना सबको दिखाकर के गिनाकर ख़ामी
दरमियां दिल के यूॅं दीवार उठाते क्यों हो।
दिल ही टूटा है बड़ी बात भला क्या इसमें
आसमाॅं रोके भला सर पे उठाते क्यों हो।
बात रखनी है ज़माने से जो भी पोशीदा
ये कहो दोस्तों से उसको बताते क्यों हो।
राह कर ली है जुदा जब तो नयन ये पूछे
सरकशी ऐसी भी क्या ख़्वाब में आते क्यों हो।

सीमा पाण्डेय ‘नयन’
देवरिया ( उत्तर प्रदेश )
मरासिम – रिश्ता संबंध
माकूल – ठीक अनुकूल
दौर -ए- तूफां – बुरा वक्त
फ़कत – सिर्फ़, केवल
नवाजिश– कृपा
दरमियां – बीच में
पोशीदा – गोपनीय
सरकशी – अवज्ञा
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