Dupaharia par Kavita

दुपहरिया | Dupaharia par Kavita

दुपहरिया

( Dupaharia )

 

तमतमाती चमक

लपलपाती लपक

लू की गर्म हवाएं

बहती दायें बायें

छांव भी गर्म

पांव भी नर्म

जल उठते थे

नंगे जब चलते थे।

दुपहरिया को क्या पता?

गरीबी है एक खता?

मेहनत ही उसकी सजा

उसके लिए

क्या जीवन क्या मजा

पेट के लिए वो तो

हमेशा ही जलते हैं।

मजदूर भी फसल की तरह

असहनीय तेज लू में

पक सा जाता है

पर फसल पकता है

व्यक्ति जलता है

यही तो खलता हैं।

दुपहरिया रहम कर

चल सहम कर

न जला न जल

रोक ले

ये कहर का पल

रोज तो वैसे ही

नंगे कितने मरते हैं।

तुझसे कौन जीत सकता है?

इसीलिए तो हर कोई

बाहर निकलने से डरता है।

रचनाकार रामबृक्ष बहादुरपुरी

( अम्बेडकरनगर )

यह भी पढ़ें :-

सिन्दूर पर कविता | Poem in Hindi on Sindoor

Similar Posts

  • इंसानियत की राह पर | Insaniyat ki Raah Par

    इंसानियत की राह पर ( Insaniyat ki Raah Par )   इंसानियत की राह पर इंसान जब चलने लगेगा ! हृदय में तम से घिरा जो नूर है स्वयं ही दिखने लगेगा!! मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे चर्च में तुमको नहीं दिख पाएगा! दीन दुखी निबलों विकलों की सेवा में वो मिल जाएगा !! मंत्र, जप- तप,…

  • संत कबीर दास | Kabir Das

    संत कबीर दास ( Sant Kabir Das )    भारत की इस पावन धरती पर, जन्में थें ऐसे महान‌ संत कबीर। जन्म स्थान था लहरतारा ताल, पुत्र-पुत्री थें कमाली व क़माल।। माता थी नीमा व नीरु था पिता, पत्नी का नाम था उनकी लोई। कर्मभूमि इनकी काशी बनारस, कवि महान ये समाज सुधारक।। सूत काटकर…

  • राजपाल सिंह गुलिया की कविताएं | Rajpal Singh Golia Poetry

    उसके मुँह से बात निकली उसके मुँह से बात निकली,बात क्या औकात निकली. थक गया भिखारी दुआ दे,तब कहीं खैरात निकली. घूस समझा था जिसे वह,सा’ब की सौगात निकली. करवटें बदली हजारों,तब कहीं वो रात निकली, नेक समझा था सभी ने,नार वह बदजात निकली. नाव थी महफूज़ वह जो,धार के अनुवात निकली. उसको देखा तो…

  • परिन्दे | Parinde par Kavita

    परिन्दे! ( Parinde )    परिन्दे ये तारों पे बैठने लगे हैं, बेचारे ये जड़ से कटने लगे हैं। काटा है जंगल इंसानों ने जब से, बिना घोंसले के ये रहने लगे हैं। तपने लगी है ये धरती हमारी, कुएँ, तालाब भी सूखने लगे हैं। उड़ते हैं दिन भर नभ में बेचारे, अपने मुकद्दर पे…

  • आदिवासी समाज

    आदिवासी समाज संस्कृतिमें हमारीप्रेम अपार है,प्रेम से ही सुगन्धितसारा संसार आदिवासी समाजने पहलकी प्रकृतिकी, प्रकृतिके बिना खवाबोंका नकोई आकार है…”“समय आने परदिखा देना किआपने क्या किया है मानवता की खातिरजरूरत सेज़्यादा मौनआपके पक्ष कोकमज़ोरसाबित करता है…“जंगल के जीवों सेआपका उचित हैव्यवहारजिससे आपके यश काहोता है विस्तार…”“माटी ने आवाज़दी है साथियों, आजफिर एक रण लड़ा जाएप्रकृति…

  • इश्क़ जुगनू-सा | Ishq Jugnu sa

    इश्क़ जुगनू-सा ( Ishq Jugnu sa ) जीवन के अंधियारे तिमिर में तुम जुगनू की तरह टिमटिमाये पल भर-प्रेम का दीवा जलाकर फिर कुहासा छाये जलते-बुझते जुगनुओं-सा नेह तुम्हारा पलता है ना आता है ना जाता है बस हल्का-सा स्पंदन देता है। जुगनू जैसे– जलता-बुझता वैसा तुम्हारा प्रेम दिखता है और— वैसे ही तुम भी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *