• मैं जानती हूं | Main Janti hoon

    मैं जानती हूं ( Main janti hoon )    मैं जानती हूं की मैं कौन हूं क्या हूं पता है मुझे ,मेरी वास्तविकता….. मैं ,कोई तस्वीर या श्रृंगार का सामान नही ना ही ,यादों को संजोकर ना याद रखनेवाली भुलक्कड़ लड़की हूं और ना ही कोई भटकती हुई आत्मा हूं…. मैं , मतलब की पुड़िया…

  • सोच की संकीर्णता | Soch ki Sankirnata

    सोच की संकीर्णता ( Soch ki sankirnata )    पानी है अगर मंजिल तुम्हे, तो कुछ फैसले कठोर भी लेने होंगे जिंदगी की हर ऊंचाई का पैमाना निश्चित नही होता.. कभी कभी सोच की संकीर्णता स्वयं की प्रतिभा को ही निखरने नही देता…. बढ़ाएं तो आएंगी ही कभी अपने से कभी अपनों से और कभी…

  • नफरत नही | Nafrat Nahi

    नफरत नही ( Nafrat nahi )    नफरत नही हमे किसी धर्म,पंथ या मजहब से हमे नफरत है तो बस अमानवीय कृत्यों से उनके विचारों से सोच से दरिंदगी भरे कामों से…. आतंकी उनकी विचारधारा से हमे नफरत है बहन बेटियों की इज्जत से करते खिलवाड़ से गला घोटने से टुकड़ों तक मे बांटने से…

  • आग | Aag

    आग ( Aag )    शाम को अभी और ढल जाने दो जरा बर्फ को अभी और पिघल जाने दो जरा अभी अभी ही तो ली है अंगड़ाई तुमने दिल को अभी और मिल जाने दो जरा अभी अभी ही तो मुस्कराए हैं लब तेरे अभी अभी ही तो शरमाई हैं आंखें तेरी अभी अभी…

  • जागते रहो | Jagte Raho

    जागते रहो ( Jagte raho )    ये जागने के दिन हैं जागते रहो… दिन रात भागते रहो ठहरो न पल भर के लिए भी क्या पता उस पल ही कोई कर जाए छल संग तेरे डाल दे डेरा अपना घर तेरे! देख रहे हो देश दुनिया में क्या क्या हो रहा है? मनुज बन…

  • गंगा मइया | Ganga Maiya

    गंगा मइया  ( Ganga maiya )    गंगा मइया कै निर्मल लहरिया, नहाये चला काशी शहरिया। राजा भगीरथ ने गंगा को लाया, रोज -रोज करती पावन वो काया। छोड़ा ई रोज कै बजरिया, नहाये चला काशी शहरिया, गंगा मइया कै निर्मल लहरिया, नहाये चला काशी शहरिया। शिव की जटा से निकली है गंगा, धो करके…

  • साईबर ठगों का आतंक | Cyber Thagi

    साईबर ठगों का आतंक ( Cyber thagon ka aatank )    आज बढ़ रहा है तीव्रता से साईबर ठगों का आतंक, अपने-आपको समझ रहें है वह सभी से बड़े दबंग। फैला रहें है जो जाल धनाधन ऐसे अनेकों है शैतान, जाल झूठ छल-कपट हेरा फेरी से कर देते है दंग।। करते है मोबाइल सिम बदलकर…

  • संविधान का निर्माता | Samvidhan ka Nirmata

    संविधान का निर्माता ( Samvidhan ka nirmata )    ख़ुदा का नूर बनकर आया वह संविधान का निर्माता, सबको समान अधिकार मिले जिनका ये अरमां था। चुप-चाप गरल पीता रहा पर दिलाकर रहा समानता, ख़ुद पढ़ो फिर सबको-पढ़ाओ ऐसा जो कहता था।। तुम आज झुक जाओ कागज की पुस्तकों के सामने, फिर कल को देखना…

  • नोचे वही वरक़ | Noche Wahi Varak

    नोचे वही वरक़ ( Noche wahi varak )   बाक़ी हुरूफ़ जो ये मेरी दास्तां के हैं अहसान यह भी मुझ पे किसी मेहरबां के हैं रह रह के बिजलियों को है इनकी ही जुस्तजू तिनके बहुत हसीन मेरे आशियां के हैं क़ुर्बानियाँ शहीदों की भूले हुए हैं लोग गुमनाम आज नाम उन्हीं पासबां के…

  • इश्क़ का कर्जा | Ishq ka Karz

    इश्क़ का कर्जा ! ( Ishq ka karz )    अपनी लौ से तपाए ये कम तो नहीं, आए गाहे – बगाहे ये कम तो नहीं। सुर्ख होंठों से मिलता रहे वो सुकूँ, दूर से ही पिलाए ये कम तो नहीं। मेरे तलवों से कितने बहे हैं लहू, आ के मरहम लगाए ये कम तो…