तृष्णा | Kavita Trishna

तृष्णा

(Trishna )

तृष्णाएं सदा संतृप्त, नेह से संसर्ग कर

पगडंडियां व्याकुल दिग्भ्रमित,
उच्चवाचन मरीचि प्रभाव ।
सुख समृद्धि मंगलता दूर,
निर्णयन क्षमता अभाव ।
अथक श्रम सफलता चाहना,
विराम पल उत्सर्ग कर ।
तृष्णाएं सदा संतृप्त ,नेह से संसर्ग कर ।।

नैतिक आचार विचार,
नित विमल कामना स्पंदन ।
कपट रहित धवल छवि,
हृदय भाव अपनत्व वंदन ।
काम क्रोध वैमनस्य पटाक्षेप,
मूल कारण विसर्ग कर ।
तृष्णाएं सदा संतृप्त,नेह से संसर्ग कर ।।

दृढ़ संकल्पी ऊर्जस्वित कदम,
लक्ष्य बिंब दिव्य प्रस्ताव ।
आत्म विश्वास मैत्री निर्वहन,
प्रेरणा प्रदत्त शीतल छांव ।
धर्म कर्म अनंत आह्लाद,
जीवन प्रभा सम स्वर्ग कर ।
तृष्णाएं सदा संतृप्त, नेह से संसर्ग कर ।।

मान सम्मान आदर सत्कार,
हर मनुज मृदु अभिलाषा ।
सोच तरंग सकारात्मक,
जीवन यथार्थ परिभाषा ।
सुरभिमय हर पल श्रृंगार,
खुशियां संग संवर्ग कर ।
तृष्णाएं सदा संतृप्त,नेह से संसर्ग कर ।।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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