• बड़ा ही नेक | Bada hi Nek

    बड़ा ही नेक बड़ा ही नेक वो परिवार होगातभी अच्छा मिला संस्कार होगा कभी हमने न सोचा अपने घर मेंमुझे करना खड़ी दीवार होगा जमीं तो बाँट ली तुम सबने मेरीलवारिस अब हमारा प्यार होगा घरों की बात थी इतना न सोचायही कल भोर का अख़बार होगा अदब से बात जो करते हैं बच्चेउन्हीं का…

  • मेरे हिस्से का प्रेम

    मेरे हिस्से का प्रेम मैं तुम सेदूर हूँधूप और छाँव की तरहपुष्प और सुगंध की तरहधरा और नील गगन की तरहदिवस और निशा की तरहजनवरी और दिसम्बर की तरहसाथ-साथ होते हुए भीबहुत दूर- बहुत दूर परन्तुप्रति दिन मिलता हूँतुम सेतुम्हारी नयी कविता के रूप मेंनये शब्दों के रूप में जीवन मेंकभी कोई सुयोग बना..तोमैं तुम…

  • अपनी दुनियां | Apni Duniya

    अपनी दुनियां इस दुनिया के भीतर भी अपनी एक दुनिया होनी चाहिएमन के राज वहीं पर खोलना चाहिए इस दुनिया में जिसकी अपनी नहीं होती एक दुनियावह विचरता रहता है भ्रम और जाल मेंदुखी होता रहता है संसार के अंदर लेकिन जिसके भीतर अपनी एक दुनिया होती हैवह सदा मस्त रहता है अपने ही भावों…

  • बोली नहीं, हिंदी की सहभाषा है हरियाणवी : डॉ. रामनिवास ‘मानव’

    फूहड़ सांगों, अश्लील रागनियों और भोंडे चुटकुलों से बढ़ना होगा आगे हरियाणवी बोली प्राचीन काल से ही अत्यंत समृद्ध रही है तथा पालि, प्राकृत आदि अन्य भाषाओं की भांति, इसका विकास भी सीधे संस्कृत से हुआ है। स्पष्ट है कि बोली नहीं, हिंदी की सहभाषा है हरियाणवी। भाषा के आधार पर ही, पंजाब से अलग…

  • कोकिला उपवन क्यों न आई

    कोकिला उपवन क्यों न आई कोकिला उपवन क्यों न आईखिली बहारें यहां रुत पतझड़ीकिसलय ने अश्रु बूंदें टपकाईकोकिला उपवन क्यों न आई काली आंखें काला वस्त्रपहन कौन तू देश गईतेरे गीतों तेरी धुनों सेसजी क्या महफिल नईकोमल – कोमल पत्ते डालीचुप थे तुझ बिन न खड़खड़ाएफाख्ता उदास अमलतास पर बैठीउसने पंख न फड़फड़ाएआम्र मंजरी रूठी…

  • ये क्या हुआ

    ये क्या हुआ तू सत्य की खोज में चल मानव,क्योंकि हर तरफ दिख रहा है दानव।। सब एक दूसरे को खाने में लगे हुए हैं,रईस गरीब को सताने में लगे हुए हैं।। मानवता बिकी पड़ी है बाजार में,यह दुनिया फंसी फरेबी मक्कार में।। ये बाप और बेटे रिश्ते भूल गए हैं,बच्चे संस्कार वाले बस्ते भूल…

  • ज़िंदा तो हैं मगर

    ज़िंदा तो हैं मगर ख़ुद की नज़र लगी है अपनी ही ज़िन्दगी कोज़िंदा तो हैं मगर हम तरसा किये ख़ुशी को महफूज़ ज़िन्दगानी घर में भी अब नहीं हैपायेगा भूल कैसे इंसान इस सदी को कैसी वबा जहाँ में आयी है दोस्तों अबहालात-ए-हाजरा में भूले हैं हम सभी को हमदर्द है न कोई ये कैसी…

  • हमसे अब नाराज़गी अच्छी नहीं

    हमसे अब नाराज़गी अच्छी नहीं आँखों में इतनी नमी अच्छी नहींहमसे अब नाराज़गी अच्छी नहीं बज़्म में बैठे वो नज़रें फेर करइश्क़ में  ये बेरुख़ी अच्छी नहीं हौसला ता-ज़िंदगी रखना बुलंदइस क़दर आज़ुर्दगी अच्छी नहीं वो सराबों में ग़ज़ालों की तरहइश्क़ की  सर गश्तगी अच्छी नहीं पास रखिए अपनी उल्फ़त का ज़राप्यार में आवारगी अच्छी…

  • मेहनत का मोल | लघु कथा

    अरूण स्वाभिमानी लड़का था। वह कक्षा‌ में सदैव प्रथम आता था। सब पूछते ” अरूण तुम घर में कितने घंटेपढ़ते हो आखिर रोज ? वह बोलता ” मुझे घर पर समय ही कहां मिलता है।दो गायें और एक भैंस है। उनको सानी पानी देना और फिर घूम घूम कर दूध बेचना आदि में व्यस्त हो…

  • मेरे ख़ुलूस को | Mere Khuloos ko

    मेरे ख़ुलूस को मेरे ख़ुलूस को चाहो अगर हवा देनामेरे ख़िलाफ़ कोई वाक्या सुना देना कभी तो आके मेरी ख़्वाहिशें जगा देनावफ़ा शियार हूँ तुम भी मुझे वफ़ा देना तमाम उम्र ये मंज़र रहेगा आँखों मेंनज़र मिलाते ही तेरा ये मुस्कुरा देना जिधर भी देखिए रुसवाइयों के पहरे हैंमेरे ख़ुतूत मेरे साथ ही जला देना…