Poem On Ganesh Ji

बप्पा आ जाओ | Poem On Ganesh Ji

बप्पा आ जाओ

( Bappa aa jao )

 

बाप्पा आ जाओ
कष्ट हर जाओ

झोली भर जाओ
मूषक पे होके सवार

घर मेरे तुम आ जाओ
दस दिन रहो तुम

अंगना में मेरे
ओ गौरी नंदन

मोदक ग्रहण कर
विघ्नमेरे हर जाओ

विद्या बुधि दे जाओ
मन की पीड़ा हर जाओ

फैली कुरीति और भ्रष्टाचार
ऐसे विकार दूर कर जाओ

लंबोदर आशीष दे जाओ
कदली का भोग पा जाओ

पान बताशा इनको चढ़ाओ
चंदन अक्षत रोली लगाओ

हरी हरी दूर्वा ,लड्डू खिलाओ
मानव में साहस भर जाओ

बाप्पा आ जाओ
मन में प्रीत जगा जाओ

❣️

डॉ प्रीति सुरेंद्र सिंह परमार
टीकमगढ़ ( मध्य प्रदेश )

यह भी पढ़ें :-

बदला | Dr. Preeti Singh Parmar Ki Kalam Se

Similar Posts

  • वैसाखी का पर्व सुहाना | Kavita Baisakhi ka Parv

    वैसाखी का पर्व सुहाना ( Baisakhi ka Parv Suhana )   खेतों में खड़ी फ़सलें पक गई हैं, सबके घरों में ख़ुशियाँ चहक रही हैं; आओ, मिलकर छेड़े कोई मधुर तराना देखो,आ गया वैसाखी का यह पर्व सुहाना । मेला घुमने जा रहे हैं सब सज-सँवरकर, सुंदर बालाएँ चलती ज़रा-सी इठलाकर; बच्चों की मुस्कान-सा, प्रकृति…

  • कोई प्रहरी | Geet Koi Prahari

    कोई प्रहरी ( Koi Prahari ) कोई प्रहरी काश लगा दे,ऐसा भी प्रतिबंध । किसी ओर से बिखर न पाये,धरती पर दुर्गंध ।। दिया हमीं ने नागफनी अरु,बबूल को अवसर क्यों बैठे हम शाँत रहे, सोचा कभी न इस पर कभी तो कारण खोजो आये,कैसे यहाँ सुगंध ।। गुलमोहर -कचनार-पकड़िया , आम -नीम-पीपल आज चलो…

  • अपरा शक्ति नारी | Nari shakti par kavita

    अपरा शक्ति नारी ( Apara shakti nari )   आज की नारी तेरी यही कहानी          कदम से कदम मिलाकर चलती हो     नारी तुम हो इस जगत  की महारानी                  मोहताज नहीं पौरुषता की तुझे     किसी आश्रय की मोहताज नही       …

  • मन की पुकार | Man ki Pukar

    मन की पुकार हर धड़कन तेरे नाम से धड़कती है,तेरी यादों की लौ दिल में चमकती है।आज भी तेरी हंसी का दीवाना हूँ मैं,तुझसे बेशुमार प्यार निभाना चाहता हूँ मैं। तेरे कदमों की आहट अब भी सुनाई देती है,मेरे ख्वाबों में हर रात तू ही दिखाई देती है।तेरे बिना हर लम्हा अधूरा सा है मेरा,आज…

  • मुक्तिपथ

    मुक्तिपथ चल पड़ा हूँ मैं,बंधनों की राख से उठकर,स्वप्नों के नभ को छूने जहाँ विचार, वाणी और विवेकस्वाधीन साँसें लेते हैं। नहीं चाहिए अबवह शांति,जो चुप्पियों की बेड़ियों में बंधी हो,न वह प्रेम,जो स्वार्थ के कटघरों में सज़ा काटे। मैं चाहता हूँएक उजासजो भीतर से फूटे,एक सत्यजो भय से नहीं, आत्मा से उपजे। संस्कारों की…

  • गुरुर | Gurur

    गुरुर ( Gurur )  ( 2 )    समझ ले कोई प्रेम को हर किसी के वश की बात नही मित्रता मे भी कृष्ण जैसी सुदामा से कोई मुलाकात नही… महज ,प्रेम को ही प्रेम कह देना ये तो सांसारिक दिखावा है यादों की तड़प मे दिल रहे मगरुर यही तो गर्व से कहने का…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *