तर्क-ए-आम ना कर मुझसे मुहब्बत का
तर्क-ए-आम ना कर मुझसे मुहब्बत का

तर्क-ए-आम ना कर मुझसे मुहब्बत का

( Tark-e-aam na kar mujhse muhabbat ka )

 

सच का खिदमत भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

कभी खैरियत भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

तर्क-ए-आम ना कर मुझसे मुहब्बत का

अब इबादत भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

बे-बसर ज़िन्दगी का बसर क्यों ढूँढ़ते हो

कोई रिबायात भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

छोड़ देंगे गुज़ारा कोई एहतियात के बगैर मगर

कभी कोई कैफियत भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

में वाक़िफ़ हूँ कुदरत के हर अक्स, हर पहलुओं से

सिलसिला-ए-क़ायनात भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

ज़िंदा हो हर दिल में वो संजीदगी बिन दवा का

और मासूमियत भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

हालात दुनिया को मजबूर कर देता है सजदा के लिए

इसका कोई सहुलियत भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

‘अनंत’ बे-अंदाज़ तैयार है अपनी मौत से गले मिलने को

हम पर कोई लानत भी हो तो कुछ इश्क़ की तरह

 

 

शायर: स्वामी ध्यान अनंता

 

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