वह जीत ही क्या जब तक हार न मिले
वह जीत ही क्या जब तक हार न मिले

°°° जीत – हार और खुशी °°°

वह जीत ही क्या जब तक हार न मिले

वह खुशी ही क्या जब तक दुख न मिले ।

 

वो होंठों की हँसी ही क्या है

जबतक चेहरे की नमी न दिखे ।

 

जीत, खुशी, हँसी तब दुगनी हो जाती है जब

दुख और हार का सामना जिंदगी में हो जाता हैं ।

 

हार ही हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं

दुख सह के ही खुशियों से झोली बाद में भरती है ।

 

जिस प्रकार रात के बाद दिन एक सुहाना पल

लगता है, हर सुबह उमंग से बाहर जाती है ।

 

इसी तरह जब हम कुछ पाना चाहते हैं

और उसे पाने में नाकाम अगर हो जाते हैं तो ।

 

नींद-चैन त्याग दिल दिमाग़ सब कुछ अपने

सपनों को पाने में लगा देते हैं ।

 

उसके बाद जब हमें सफलता मिलती हैं

वह खुशी पहले से भी दुगनी लगती है ।

 

लेखिका – के. फातिमा

 (  रिसर्च स्कॉलर, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी )

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