अंतर लहरें उठ रही हैं

अंतर लहरें उठ रही हैं, नेह के स्पंदन में

अंतर लहरें उठ रही हैं, नेह के स्पंदन में

 

मन गंगा सा निर्मल पावन,
निहार रहा धरा गगन ।
देख सौम्य काल धारा,
निज ही निज मलंग मगन ।
कर सोलह श्रृंगार कामनाएं,
दृढ़ संकल्पित लक्ष्य वंदन में ।
अंतर लहरें उठ रही हैं, नेह के स्पंदन में ।।

नवल धवल कायिक आभा,
स्नेहिल मृगनयनी दृष्टि ।
प्रसूनी बहार परिवेश उत्संग,
असीम नेह ज्योत्सना वृष्टि ।
मंत्रमुग्ध अंतरतम भावनाएं,
दिव्य मिलन अभिनंदन में।
अंतर लहरें उठ रही हैं, नेह के स्पंदन में ।।

आशा उत्साह जोश उमंग,
अंतर्मन अथाह संचरण ।
नेह अनुबंधित पथ गमन,
खुशियां अनंत अवतरण।
अतरंगी तिमिर अवसानित,
प्रकाश बिंब अनुपम मंडन में ।
अंतर लहरें उठ रही हैं, नेह के स्पंदन में ।।

विखंडित वैमनस्य वैर भाव ,
अखंड यशस्वी प्रेम पथ ।
प्रणय उपमित अनुभूति,
आनंद पर्याय जीवन रथ ।
घट सुरभित स्वर लहरी,
हाव भाव सम प्रियल रंजन में ।
अंतर लहरें उठ रही हैं, नेह के स्पंदन में ।

महेन्द्र कुमार

नवलगढ़ (राजस्थान)

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