Kavita gyaan anamol khazana hai

ज्ञान अनमोल खजाना है | Kavita gyaan anamol khazana hai

ज्ञान अनमोल खजाना है 

( Gyaan anamol khazana hai )

 

ज्ञान अनमोल खजाना है

बांट सका है कौन इसे ?

 

न भाई बंधु जमाना है

अनमोल रतन है हर रत्नों में

 

पर इसको नहीं छुपाना है

ज्ञान की ज्योति जले घर-घर में

 

ज्योति से ज्योति जलाना है

घर-घर महके ज्ञान की खुशबू

 

ज्ञान का अलख जगाना है

ज्ञान बिना मानव जीवन भी

 

पशु सा खाकर मर जाना है

व्यवहार वचन संस्कार भला

 

 

बच्चों को खूब बताना है

क्या बचपन क्या बृद्धापन ?

 

न इससे हमें घबराना है

लूट सको तो लूट लो इसको

?
रचनाकार -रामबृक्ष बहादुरपुरी
( अम्बेडकरनगर )

 

यह भी पढ़ें :-

सुख और दुःख | Poem sukh aur dukh

Similar Posts

  • वक़्त का पहिया | Waqt ka Pahiya

    वक़्त का पहिया ( Waqt ka pahiya )   वक्त का पहिया कभी न रूकता ये चलता ही रहता, सर्दी-गर्मी ऑंधी तूफ़ान यह बारिश में नहीं थकता। मेहनत करनें वालों को सदा मिलती यही सफ़लता, जिसमें है ये चार गुण वह हर दिल पर राज करता।। सबको आदर देता हो व विनम्रतापूर्वक बात करता, माफ़ी…

  • आश्चर्य नहीं होता | Roohi Quadri Kavita

    ” आश्चर्य नहीं होता “ ( Ashcharya nahi hota )   “आश्चर्य नहीं होता” आश्चर्य नहीं होता…. जब देखती हूं तुम्हें असहज परिस्थितियों में भी सहजता से मुस्कुराते हुए। हार -जीत के मन्थन से परे, परिवार के सुख के लिए अपने सपनों को गंवाते हुए। आश्चर्य नहीं होता….. जब तुम रखती हो अपनी अभिलाषाओं की…

  • मकर संक्रांति का आगमन

    मकर संक्रांति का आगमन पूस माह कीठंडी ठिठुरती रातेंऔर मकर संक्रांति काआगमन,लोहड़ी, बिहू, उगादि, पोंगलदेते दस्तक दरवाजों पर,मन प्रसन्न हो उत्सवके जश्न में जुट जाता,समझा जातातिल, गुड़, खिचड़ी,दान- धर्म – पुण्यके महत्व को।छोड़ सूर्यदेव दक्षिणायन को,प्रस्थित होते उत्तरायण में।थमें हुए समस्त शुभ-कार्यप्रारम्भ होतेइस दिन से।इसी दिन त्यागी देह,भीष्म पितामह ने,माँ यशोदा नेव्रत अनुष्ठान किया।माँ गंगा…

  • शख्सियत | Poem shakhsiyat

    शख्सियत ( Shakhsiyat )     बेवजह  ना  हमें आजमाया करों। बात दिल पे सभी न लगाया करों।   टूट जाएगी रिश्तों की जो डोर हैं, रोज ऐसे ना दिल को दुखाया करो।   साथ जब दो मिलेगे अलग शख्सियत। तब अगल ही दिखेगी सभी खाशियत।   हमकों जबरन ना खुद सा बनाया करो, हुस्न…

  • हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai

    हरिशंकर परसाई ( Harishankar Parsai )    बाईस अगस्त चौबीस में लिया जन्म जिला होशंगाबाद, दस अगस्त पिचानवे पाई वफात रहे जीवन भर आबाद। हंसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे हैं संग्रह कहानी, जवाला और जल, रानी नागफनी नावल है उनकी जुबानी। प्रेमचंद के फटे जूते,आवारा भीड़ के खतरे ये भी संग्रह निबंध…

  • Ghazal | दर्द की व्यथा

    दर्द की व्यथा   दर्द इस कदर,  बेहाल था, थी उम्मीद सहारा दोस्त हैं, कुछ मायूस कर चले, कुछ को थी खबर , उंगलियां फोन तक न चले, कुछ तो थे साथ मरहम ले चले कभी जिनका  थे सहारा, आज वही बेसहारा कर चले, दर्द इस कदर  बेहाल था कुछ अपने परिजन घरों में चला,…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *