माना कि तुम
माना कि तुम

🌸  माना कि तुम  🌸

माना कि

इन हाथों की

लकीरों में तुम नहीं….……..

फिर भी मुझमें

तुम शामिल हो,

🌸

लकीरें तो उनके

हाथ में भी नहीं होती

जिनके हाथ नहीं होते।

तुम मुझे हासिल नहीं

फिर भी मुझसे तुम

दूर तो नहीं हो।

🌸

इन हाथों की लकीरों में न सही

मेरे दिल में तो हो तुम

वो धड़कन बनके

जो धड़कती रहती है

मेरी हर साँसों में

एक जुनून बन कर।।

🌸

 

कवि: सन्दीप चौबारा

( फतेहाबाद)

 

यह भी पढ़ें : मैं चाहता हूं बस तुमसे 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here