रमाकांत सोनी की कविताएं | Ramakant Soni Hindi Poetry
जलजला हूं
जलजला हूं आग की भांति जला हूं।
सच्चाई की डगर पे अब बढ़ चला हूं।
हौसलों से लिखूं संघर्षों की कहानी।
आंधियों तूफानों में निर्भय पला हूं।
काव्य रस घोलती कलम सयानी।
भावों की धारा बहती उर सुहानी।
कुंदन बन सांचे में तपकर ढला हूं।
महफिलों में कारवां लेकर चला हूं।
वीरों का गुणगान गाता हूं गीतों में।
प्रीत भी निभाता रिवाज़ो रीतों से।
चाहे अपनों से पल-पल छला हूं।
रोशनी का दीप लिए बढ़ चला हूं।
खुशियों का पैगाम बांटती लेखनी।
जिंदगी को राहें नई हमको देखनी।
सौरभ दिलों में महकाने मिला हूं।
सुदर्शन सृजन भरा सिलसिला हूं।
त्रिकालदर्शी शिव महादानी
नीलकंठ महादेव प्रलयंकर,
तांडव नृत्य महा भयंकर।
नाच रहे हैं नटराज शंकर,
डमडम डमरू बाजे हर हर।
त्रिनेत्र है त्रिशूल धारी बाबा,
त्रिकालदर्शी शिव महादानी।
छम छम चिमटा बाज रहा है,
धूनी रमाए शिव औघड़ दानी।
जल थल व्योम चहूं दिशा में,
ओमकार का गूंजे घननाद।
हर हर महादेव शिवशंकर,
भाग रहे सब विषम विषाद।
अद्भुत लीला अलौकिक,
विश्वनाथ शंभु कैलाशी।
भूतनाथ महाकाल भोले,
सदाशिव घट घटवासी।
तांडव करे सदाशिवशंकर,
आदिदेव देवों के देव।
सकल जगत कर्ता भोले,
बाबा औघड़ दानी महादेव।
सृष्टि में संहारक भोले,
कृपा सिंधु है दया धारी।
गले सर्प की माला सोहे,
शीश चंद्र शिव गंग धारी।
भंग पी बाबा मतवाले,
भक्तों के शिव रखवाले।
भस्म रमाएं ध्यान लगाए,
अविनाशी भूरी जटा वाले।
डाक्टर जादू तेरी अदा का
धरती के भगवान तुम ही जीवन के रखवाले हो।
रोगों से रक्षा करते शरीर प्राण फूंकने वाले हो।
चीरफाड़ कर शल्य चिकित्सा पीर सारी हरते हो।
घायल को भी तंदुरुस्त हूनर के दम से करते हो।
हर बीमारी महामारी में आ देवदूत बन जाते हो।
निज कौशल से जग में कैसा जादू दिखलाते हो।
रोगी सारा रोग भूलता जब हंसकर बदलाते हो।
मौत के मुंह से बच जाता वक्त पड़े मिल जाते हो।
पूजा जाता नाम जगत में ख्याति बढ़ती जाती है।
हाथों को वरदान मिलता दवा असर दिखाती है।
संतापो का दमन करके कायाकल्प कर देते हो।
आयु आरोग्य जीवन रक्षा का संकल्प लेते हो।
हाव भाव चेहरा पढ़ते हो रग रग की पहचान है।
मरीज की सारी सुनते हो अधरों पर मुस्कान है।
चिंता की रेखाओं को पलभर में कहां भगाते हो।
रोता रोता रोगी आए हंसाकर तुम भिजवाते हो।
बड़े जोर की कविता आई
आगे कुआं पीछे खाई सज-धज घर टुनटुन आई।
भावों की बहती गंगा बड़ी जोर की कविता आई।
डमडम डगभर चलती आंगन क्या धरा हिलती है।
दो दिलों का संगम है सिन्धु से सरिता मिलती है।
जब हंसे तो फुलझड़ियां घर में रौनक आती है।
टीवी ट्यूबलाइट मिक्सी एक साथ चल जाती है।
मेहमानों के खातिर भोजन बड़े चाव से बनता है।
जैसे राजा के घर भोजन करे नगर की जनता है।
ठाठ बाट है बड़े निराले सूट बूट है काले काले।
कारे कारे नयनों से मृगनयनी ऐसा जादू डाले।
ऐसा लगता अंबर में घिर घनघोर घटाएं छाई है।
शब्दों में ढलकर बड़ी जोर की कविता आई है।
मीठी मीठी बातें मिश्री सी घुलमिल जाती सबसे।
मोटी ताजी हष्ट पुष्ट पत्नी झेल रहा हूं मैं कब से।
पूरे घर को थामें रखती गूंगी दीवारें थर्राती सारी।
मुझको लोग बधाई देते कितनी सुंदर पाई नारी।
योग दिवस हम सब मनाएं
उमंग उत्साह तन मन जगे योग आरोग्य प्रदाता।
आत्मा का पावन संगम चेहरे पर खुशियां लाता।
स्वस्थ सुखी काया कंचन तन पुलकित हो जाए।
नित्य नियम जीवन में जब योग मनुज अपनाए।
योग साधना जो करें संयम शील रहे आचार।
रोग रहित तन मन रहे सुशील हो मन विचार।
प्राणायाम की ओर चले करे योग साधना साथ।
सांसों का स्पंदन सुने स्वास्थ्य सुधरे हाथों हाथ।
अनुलोम विलोम का प्रति दिवस करें अभ्यास।
जरा जड़ से विमुक्त हो रोगों का शीघ्र हो नाश।
चुश्ती फूर्ति ताजगी योगी ह्रदय हिलोरें खाएं।
रग रग में भरो नव चेतना रोम रोम हरसाए।
योगासन ध्यान साधना ऋषि मुनियों की देन।
सनातन है संस्कृति हमारी योग करो दिन रैन।
योग दिवस हम सब मनाएं नवजीवन की भोर।
चमक उठे भाग्य सितारे उजियारा हो चहूंओर।
टूट गई अब घर की देहरी
खड़ी हुई दीवारें घर में बंट गया आंगन सारा।
टूट गई अब घर की देहरी कैसा यह बंटवारा।
अपनी अपनी ईंट ले चले कैसा कुनबा जोड़ा।
भाईचारा अपनापन सब रिश्ता नाता तोड़ा।
स्वार्थ की आंधी में सब बह गया प्रेम पुराना।
घर में खुशियों की बारिश होठों पर मुस्काना।
नैन उगलते अंगारे अब दूरियां पड़ी दिलों में।
अल्फाजों में तीर तीखे बाण शिकवा गीलों में।
साख कमाई दुनिया में पर मैं अपनों से हारा।
विनय भाव धारे रहता फिर भी लगता खारा।
मौन रहे कोई कब तक तानों को सुन सुनकर।
कैसे सुखी रहेगा कोई जाल झूठ का बुनकर।
छल छद्मों के सहारे जो संकट खड़ा कर देते।
कलह करें दिन रात जो बवाल बड़ा कर देते।
हो जाती मजबूरी तब स्वयं घर छोड़ना पड़ता।
नई आशाएं लेकर मनुज कीर्तिमान को गढ़ता।
पिता
बैठ पिता के कंधों पर मैं राजा बन जाता था।
सारी दुनिया देख नजारा मंद मंद मुस्कांता था।
जिनकी उंगली पकड़ पकड़ हमने चलना सीखा।
पढ़ा लिखाकर योग्य बनाया भाग्य सारा लिखा।
जिनकी एक आहट से सारे घर में दौड़े आते।
सपनों का सामान जुटाकर लदे हुए सब लाते।
वटवृक्ष की ठंडी छाया पिता है प्रेम का झरना।
खुशियों का खजाना है ख्याल सबका धरना।
जब रूठे पिता मनाते क्या क्या चीजें घर लाते।
खेल खिलौने विविध भांती पाकर हम इतराते।
बच्चों के संग बच्चे बन हंस हंसकर वो बदलाते।
कथा कहानी परियों की पिता रोज हमें सुनाते।
सदा सादगी की मूरत पिता संघर्षों की परिभाषा।
पिता का साया सिर पर हो पूरी होती हर आशा।
पिता संग हो जीवन सफर में हौसला बढ़ जाता।
रखते सिर पर हाथ-पिता कीर्तिमान गढ़ जाता।
समय तू धीरे-धीरे चल
कैसी चली वक्त की आधी,
बीत रहा पल पल।
बदल रहा है जर्रा जर्रा,
कैसी यह हलचल।
अपनापन अनमोल छूटा,
मधुर सुहाना सा वो कल।
बीत गया वो बचपन सारा,
भोलापन पावन निश्चल।
समय तू धीरे-धीरे चल
तरुणाई ने भरी उड़ानें,
उन्मुक्त मगन हो चंचल।
शिखर चूमती तमन्नाएं,
मिले नया सवेरा कल।
समय तू धीरे-धीरे चल
मुंशी प्रेमचंद
धनपत राय श्रीवास्तव प्रेमचंद नाम से जाने जाते।
रंगभूमि कर्मभूमि गबन गोदान उपन्यास में आते।
जाने कितनी रची कथा बनारसी लेखक बाबू ने।
जिनकी कलम चलती रही वक्त रहा नहीं काबू में।
देशभक्ति रचना सोजे वतन राष्ट्रधारा भाव भरा।
अंग्रेजी सरकार रोकी कलमकार था खरा खरा।
छोड़ सरकारी नौकरी मुंशीजी लेख सृजन में रमे।
हिंदी पत्रिका माधुरी मर्यादा हंस में भी खूब जमे।
फिल्म नगरी माया नगरी प्रेमचंद रास नहीं आई।
चर्चित मजदूर की कहानी जनमानस खूब भाई।
लेखनी का उजियारा सामाजिक सारा चित्रण है।
जो कलम के जादूगर दुनिया का पूरा विवरण है।
हर पात्र को पिरो दिया साहित्य सुमन किरदार में।
दलित किसान आम आदमी उभरा था संसार में।
हिंदी उर्दू दोनों भाषा का वरदहस्त वरदान दिखा।
पूस की रात पंच परमेश्वर बड़े घर की बेटी लिखा।
इतिहास गाता सृष्टि में उपन्यास सम्राट कहलाते।
लेख कहानी नाटक समीक्षा संपादन हृदय भाते।
दौर प्रेमचंद युग बना चित्रण समाज समाया था।
छुआछूत बाल विवाह विधवा विवाह आया था।
कैसी कही समर यात्रा संग्राम कायाकल्प किया।
नवनिधि पांचफूल कृति सेवासदन विकल्प दिया।
आदर्श से यथार्थ का सफर स्वाधीनता कथाकार।
राष्ट्र प्रेम भरी लेखनी राष्ट्रधारा भरे उच्च विचार।
कोई सानी नहीं कलम का अद्भुत थे रचनाकार।
चिर चिरंतर चली लेखनी जगमग ज्योति अपार।
सादर वंदन करूं लेखनी भावन लेख हजार हुए।
अगणित अनमोल कृतियां प्रेमचंद मन भाव छूए।
सात फेरों से सातों जन्म
सात फेरों से सातों जन्म साथ निभाएंगे।
प्यार किया है प्रियतम हम करते जाएंगे।
गुल गुलशन गुलजार हम प्यार महकाएंगे।
प्रेम तराने मधुर सुहाने हम गीत सुनाएंगे।
अधरों पर मुस्कान मधुर होठों पर लाएंगे।
हमसफर हो तुम हमारी दिल में बसाएंगे।
नाजो नखरे तेरे सनम हम सहते जाएंगे।
दिल की हो धड़कन हमारी तान सुनाएंगे।
घर आंगन की फुलवारी पुष्प खिलाएंगे।
प्रेम तरानो का उमड़ता सावन बरसाएंगे।
प्रेम महल की हो रानी राजमहल बनाएंगे।
खुशियों भरा समां सारा हम गीत सुनाएंगे।
दो दिलों की धड़कनें गाती स्वर तान गाएंगे।
हंसी वादियो में सनम हसीं मुस्कान लाएंगे।
ढूंढेगा सारा जमाना प्रीत खुशबू बिखेराएंगे।
महकती जिंदगी प्यारी मिल हसीं बनाएंगे।
सुखनवर
काव्य कलश सुधा मोती चुन शिल्पकार कहलाते।
कल्पनाओं को संजोकर सुखनवर कविता बनाते।
कलम करती चित्रण ऐसा उर उमड़ता सावन हो।
गीत रचती लेखनी मधुर शब्द सुरीले भावन हो।
शब्दों की माला में मोती भावों का सागर बहता है
छंद गीत मुक्तक दोहों में वाणी का जादू रहता है।
कलम की स्याही कागज पर जब रंग दिखाती है।
अंधियारे में दीप लेखनी जग रोशन कर जाती है।
काव्य कृति वाणी उपहार सृजनशील रचनाकार।
मनन करो मन विचार कविता है जीवन आधार।
नवरस भरा सुधारस बहती है भावों की रसधार।
शब्द सुमन सजीले सुंदर गुल गुलशन गुलजार।
शेरनिया तैनात खड़ी अब सरहद पर
युद्ध के बादल मंडराए है अब सर पर।
शेरनिया तैनात खड़ी अब सरहद पर।
नारी शक्ति है रणचंडी बनकर टूट पड़े।
हिम्मत हौसले है साहस उर बहुत बड़े।
बिजली बनकर तूफानों से टकराती है।
महा समर में शौर्य शेरनी दिखलाती है।
पराक्रम देख दुश्मन जो डर जाते सारे।
बैरी कांपे थर थर पूरा देखे दिन में तारे।
गरजती सिंहनी कोई ज्वाला फूट पड़े।
दुश्मन पे बन महाकाल कोई टूट पड़े।
शेरनिया सरहद पर बुलंद हुंकार भरे।
जांबाज सिपाही है हाथों में बंदूक धरे।
रण में रणचंडी जब जौहर दिखलाती।
गोला बारूद अस्त्र शस्त्र भीषण लाती।
महासमर में बेटियां लड़े लड़ाई बढ़कर।
शत्रु का विनाश करती मैदान में डटकर।
शौर्य धरा है शेरनियां जब गर्जना करती।
अरिदल कांपती छाती सोई आत्मा मरती।
आंख से आंसूओं को विदा कीजिए
आंख से आंसूओं को विदा कीजिए।
फेक बैसाखियां अब चला कीजिए।
जंग के खिलाफ जंग लड़ा कीजिए।
हौसले बुलंद दिल जरा बड़ा कीजिए।
लबों पे मुस्कान थोड़ी सजा लीजिए।
जिंदगी का यार थोड़ा मजा लीजिए।
प्यासे को पानी थोड़ा पिला दीजिए।
सजा ही सही ना कोई गिला कीजिए।
तिरछी नजरें यूं थोड़ी झुका लीजिए।
ना ही किसी को कोई धोखा दीजिए।
लफ्जों के मोती माला बना लीजिए।
गीत सुहाना प्यारा कोई सुना दीजिए।
हंसी है वादियां आप भी घूम लीजिए।
खुशी का इजहार थोड़ा झूम कीजिए।
नेह की गंगा निर्मल मधु बहा दीजिए।
काव्य की सरिता पावन नहा लीजिए।
सशस्त्र जांबाज सिपाही
सिंहासन हुंकार भर रहा चले सिपाही बॉर्डर पर।
ऑपरेशन सिंदूर चला एक दिल्ली के आर्डर पर।
सशस्त्र जांबाज सिपाही हाथों में लिए हथियार।
तीनों सेनाएं सजग है शत्रु पर करने तीखा वार।
शौर्य पराक्रम दिखलाएंगे सरहद के रखवाले वीर।
आंख दिखाएं जो हमको बैरी का देंगे सीना चीर।
अदम्य साहस से टकराते हौसलों की भर उड़ान।
बेरी थर थर थर्राते रण में चले वीर योद्धा जवान।
जो बारूद में खेल खेलते शोलों से भीड़ जाते हैं।
तूफानों से टक्कर लेते सीमा पर शीश चढ़ाते हैं।
गर्व हमें जांबाजों पर सर्वस्व समर्पण करते वीर।
भारत मां के लाडले वीर साहसी शूरमां रणधीर।
जिनकी जुबां पे जयहिंद घट राष्ट्रप्रेम की धारा है।
देश के सच्चे रक्षक वीरों का वंदे मातरम् नारा है।
जल थल वायु सेना में सिपाही सौगंध खाता है।
राष्ट्र हित सर्वोपरि मुझको मां मेरी भारतमाता है।
यह समर भूमि है
यह समर भूमि है रणयोद्धा लड़ने को तैयार खड़े।
शौर्य पराक्रम वीरता दिखलाने प्रहरी अटल अड़े।
शंखनाद हुआ रण का सुनकर बैरी की ललकार।
कूद पड़े सब महा शूरमां हाथों में लेकर हथियार।
गोला बारूद से भिड़ जाते तूफां से टकराते वीर।
नैन दिखाएं जो भी हमको पल में देते सीना चीर।
जो भी खेले खून की होली शोणित धार बहा देंगे।
बलिदानी वीर वसुंधरा आतंकी ठिकानें ढहा देंगे।
राष्ट्र मुखिया राष्ट्रभक्त हो सेनाएं हमलावर होती।
थर्राती है दुश्मन सेनाएं जो देशभक्त जनता होती।
ईंट से ईंट से बजादे शूरवीरों का स्वाभिमान रहा।
सिंदूर उड़ाने वालों पे विनाशक सिंदूर प्लान रहा।
आतंकी अड्डे तहस-नहस अफरा तफरी बैरी दल।
हम शांति के कायल रहे नैन दिखाते हमको छल ।
देश प्रेम उमड़ा हर हृदय बहे राष्ट्रप्रेम की धारा है।
शेर पलटवार कर दे तो हिल जाए दुश्मन सारा है।
ऑपरेशन सिंदूर
आतंकवाद की जड़े हिलाई भारत के विमानों ने।
सिंदूर लूटने वालों को सिंदूर दिखा दी जवानों ने।
शौर्य पराक्रम वीरता का शंखनाद हुआ सुन लो।
समरभूमि योद्धाओं का आगाज हुआ है सुन लो।
आतंकी हर ठिकानों को मिट्टी में मिलाने वाले हैं।
सिंहनाद करेगा भारत भुजबल दिखाने वाले हैं।
पहलगाम हमला करके दुश्मन ने ललकारा था।
नाम पूछकर एक-एक गोली से जिंदा मारा था।
रक्त बहाया निर्दोषों का खौफनाक नजारा था।
आतंक मिटायेंगे जड़ से देश का एक नारा था।
ऑपरेशन सिंदूर आतंकी ठिकानों का दुश्मन।
सुहाग उजाड़ने वालों काल चला करने मर्दन।
लहू बहाने वालों को शोणित का रंग दिखाएंगे।
खौफ क्या होता है अरि को स्वयं ज्ञान कराएंगे।
सदियों से युद्ध लड़े हैं रणवीरों ने हुंकार किया।
अतिथि आदर सदा बैरियों का बंटाधार किया।
शब्द शिरोमणी फनकार
शब्द शिल्पी काव्य मोती समां महकाने वाले हैं।
शेखावाटी के सृजनकार रसधार बहाने वाले हैं।
नवल धरा नवल कविता झंकार सुनाने वाले हैं।
गीत गजल माहिर पारखी रस बरसाने वाले हैं।
शब्दाक्षर मंच सुशोभित शब्द शिरोमणी फनकार।
शेखावाटी का गौरव है अगणित गुणी रचनाकार।
उमड़ रही काव्य धारा साहित्य संगम मनभावन।
गीत गजल छंद वर्षा भावों का बरसता है सावन।
शब्द शिल्पी सम्मेलन है काव्य की मधुरम फुहार।
शारदे सुवन मंगल गीत गाते मिलकर मंगलाचार।
सृजन का सम्मान हो रहा साहित्य यशगान यहां।
ज्ञान ज्योति आभामंडल श्रेष्ठ सुधी का मान यहां।
हंस वाहिनी कृपादायिनी सजा मां गायत्री दरबार।
शब्द सुमन अर्पण करने पूजन करते कलमकार।
मन मुदित पदाधिकारी कवि सारे आने वाले हैं।
मंच माला माइक सज्जित सभा सजाने वाले हैं।
हाथों में छाले है
हाथों में छाले है फिर भी सपनों को पाले हैं।
दिन भर करते दौड़ धूप पाने को निवाले हैं।
मजदूरी करके खाते हैं स्वाभिमान से जीते हैं।
कड़वे मीठे घूंट जीवन में हंस हंसकर पीते हैं।
खून पसीना बहा बहाकर रोजी रोटी कमाते हैं।
परिवार पालन पोषण परदेश भी हम जाते हैं।
चढ़ जाते ऊंची मिनारें महल अटारी करने को।
आंधी तूफान से टकराते जेबें खाली भरने को।
महंगाई ने कमर तोड़ दी आटा दाल भूल गए।
बच्चे कैसे पढ़ने जाए हम मजबूरी में झूल गए।
नीले अंबर तले बिछोना रात रात भर जगते हैं।
मेहनती पसीना देख सुख के दिन भी भगते हैं।
शिल्प कला हुनर के दम जग में नाम कमाते हैं।
ठेकेदारों के चंगुल में हम अक्सर पीसे जाते हैं।
सड़क पूल भवनों की शोभा नींव के है पत्थर।
मजदूर है इस दुनिया में हालत हमारी बदतर।
गीत गुनगुनाते चले
कुछ तुम लिखो कुछ हम लिखे भावों की है धारा।
तुम कहो कुछ हम कहे सुरों का है संगीत प्यारा।
महफिल महकाते चले महकता समां सजाते चले।
गीत गुनगुनाते चले यूं तराने दिलों के सुनाते चले।
कुछ तुम हंसो कुछ हम हंसे हसीन मोती प्यारे।
तुम बोलो कुछ हम बोले सपने दिलों में हमारे।
धड़कनों की राग से अनुराग बरसाते चले हम।
प्रीत की सुहानी डगर सुमन बिखराते चले हम।
तुम चलो कुछ हम चले प्रगति पथ बढ़ते चले।
तुम पढ़ो कुछ हम पढ़े जीवन के अध्याय नये।
आओ गढ़ले कीर्तिमान कुछ आगे बढ़कर यहां।
काव्य रच ले परवान चढ़े साहित्य सरिता जहां।
शब्दों का जादू छा जाए अथरों पर मुस्कान आए।
चेहरा तेरा खिल जाए हंसी नजारा मन को भाए।
कुछ तुम सुनो कुछ हम सुनाएं धड़कनों की तान।
कुछ तुम गाओ कुछ हम गाएं दिल का मधु गान।
पल दो पल के लिए
पल दो पल के लिए मुस्कुराओ जरा।
धड़कता दिल तुम पास आओ जरा।
सजी महफिल तुम्हारे आने में सनम।
गीत प्यारा कोई हमको सुनाओ जरा।
कह रही हमको हंसी वादियां झूमके।
तुम पलटकर तो देखो हमको घूमके।
दिल के तारों ने छेड़ी है सरगम प्रिये।
डालियां पत्तों फूलों को झूमी चूमके।
कोई दीवाना ही होगा तो आवाज दो।
गीत पुराना ही कोई बजा वो साज हो।
महक रहा समां आज सुहाना दिलों में।
मुरली की झंकार बजी तेरे आगाज से।
फूल खिलने लगे हैं मधुर मुस्कान से।
होंठ भी हिलने लगे तेरी अदा शान से।
मधुर तराने अधर जादू कर छाने लगे।
प्रीत के मोती रसधार यूं बरसाने लगे।
पल दो पल को पास प्रिये आओ जरा।
सुहाना है सफर हमें यूं बतलाओ जरा।
हंसना जिंदगी है तुम गुनगुनाओ जरा।
प्यारा सुहाना गीत सुनाती पावन धरा।
हर रोज जिंदगी के जंजाल में हम
हर रोज जिंदगी के जंजाल में हम।
फंसते जा रहे निकला जा रहा दम।
टूट रही रिश्तो की डोरी परिवारों की।
हालत हो रही नाजुक किरदारों की।
बदल रहे हाल दूरियां बढ़ती जाती।
मतलब की आंधी है असर दिखाती।
दिखावे का बढ़ रहा बाजार तेजी से।
मत पूछो अब भाव किलो केजी से।
कमर तोड़ महंगाई परवान चढ़ी है।
पीर पराई जाने किसको क्या पड़ी है।
मुंह आगे आदर पीछे पड़ी है बुराई।
दिखावटी मुस्कान फिर लबों पे आई।
कैसी चली बयार सबको स्वार्थ ने घेरा।
गटक पराया माल उदर पर हाथ फेरा।
गाड़ी मोटर यहां सफर में चलते जाना।
बनावटी हसीं लबों पर कभी ना लाना।
याद करेगी सारी दुनिया
अपने सामर्थ्य की भी सीमा जरा जानिए।
कौन है अपने कौन पराए जरा पहचानिए।
क्या है आप दुनिया में क्या करने आए हैं।
क्या आप दे सकते कितना आप पाए हैं।
कितनी साख कमाई क्या लक्ष्य बनाया है।
किसमें में रुचि रखते क्या कर दिखाया है।
मन वचन वाणी से शुभ काम करते जाइए।
सही राह चुन लीजिए मंजिलों को पाइए।
अपनी क्षमता का आंकलन भी कीजिए।
नव विचारों का हृदय चलन होने दीजिए।
मुश्किल में औरों का थोड़ा साथ दीजिए।
धीरज धरकर घूंट कड़वे थोड़े पी लीजिए।
हर किसी को यहां कभी पैसों में ना तोलना।
रिश्तों की डोर टूटे जरा मीठा-मीठा बोलना।
अपने उसूल नीति नियम डटकर बनाइए।
कीर्ति पताका जग में धर्म ध्वजा लहराइये।
पद प्रतिष्ठा वैभव यश बढ़ता चला जाएगा।
मानव मानवता के जब काम गर आएगा।
करके दिखाना नर जग में भलाई के काम।
याद करेगी सारी दुनिया होगा तेरा भी नाम।
अक्षय तृतीया
अनंत अक्षय तृतीया आखातीज फल दायक है।
जो कभी क्षय नहीं हो सदा सहायक रघुनायक है।
परिणय संस्कार सुविधा सौभाग्य अखंड पाता है।
महालक्ष्मी पूजा होती सुख वैभव यश आता है।
शुभ कार्य संपन्न दिवस अक्षय भंडार भरा रहता।
गृह प्रवेश भू पूजा व्यापार अगणित वृद्धि करता।
भगवान परशुराम धरा अक्षय तृतीय तिथि आए।
जटा लपेटे शिवशंकर पावन गंगा धरती पे लाए।
तीर्थ स्थल बद्रीनारायण बांके बिहारी पट खुलते।
श्रद्धा भक्ति भाव आस्था स्वर्णिम खजाने मिलते।
अक्षय कलश पान सुपारी नारियल घट वंदन हो।
गणपति का ध्यान धर मंगल कार्य अभिनंदन हो।
अक्षय तृतीया मुहूर्त शुभ विवाह सौभाग्यशाली।
शिक्षा व्यापार नव गृह मंगलमय हो वैभवशाली।
नव विचार नई उमंगे नवाचार घट घट उपजे।
नई बहारें नई रोशनी नई फसलें धरा निपजे।
राम आयेंगे
राम आएंगे तो
पत्थर बनी अहिल्या पूछेंगी
भ्रष्ट बलात्कारी इंद्र जैसे देवराज का क्या करेंगे?
क्या ऐसे भ्रष्ट लोग
पद पर बने रहेंगे,
आखिर स्त्री कब तक,
पत्थर बनकर जीवन गुजारती रहेगी,
गौतम ऋषि को भी कटघड़े में खड़ा होना पड़ेगा,
क्यों जीवन भर पत्थर बनकर जीने को मजबूर किया?
क्यों दिया श्राप?
अहिल्या आज फिर पूछ रही पुरुषवादी समाज से,
शीलभंग करने वाला पुरुष,
श्राप देने वाला पुरुष,
मुक्ति देने वाला भी पुरुष
आखिर स्त्री का अस्तित्व ही क्या है ?
स्त्री त्रेता युग में भी,
अस्तित्व हीन थी,
आज भी अस्तित्व हीन हैं।
राम आएंगे तो,
सीता भी पूछेंगी,
आखिर स्त्री कब तक,
देती रहेगी अग्नि परीक्षा,
कब तक उसे,
मात्र अफवाहों के,
गर्भवती होते हुए भी,
वन वन भटकना पड़ेगा?
राम राज्य में इससे प्रजा,
क्या सीखेंगी?
मात्र अफवाहों के कारण,
स्त्री को जंगल में छोड़ देना,
मर गई या फिर जीवित हैं,
इसका भी कभी पता न लगाना,
अपने बच्चों के बारे में कभी न सोचना,
पिता होते हुए भी,
पिता के प्यार से जीवन भर बच्चों का वंचित रहना,
क्या राजा इतना निर्मोही होता है?
राम आयेंगे तो,
शूद्र शंबूक भी पूछेगा,
क्या शूद्र को तपस्या करना ?
आपके राज्य में अपराध है?
आप तो भगवान थे,
आपके लिए क्या ब्रह्मण?
क्या शूद्र?
फिर आपने हमें क्यों मारा?
क्या आपके राज्य में,
शूद्रो को त्याग तपस्या करने का कोई अधिकार नहीं होगा?
लाखों वर्षों से आज भी,
शूद्र समाज पूछ रहा है?
मुझे अपने अधिकारों से क्यों वंचित रखा गया?
राम आएंगे तो,
शबरी भी पूछेंगी,
अपने भगवान तो,
मेरे झूठे बेर खाए,
फिर हजारों वर्षों तक ,
अछूत समझ कर दलितों को आपके मंदिर से क्यों दूर रखा गया?
क्या आपके आने से,
छूत अछूत खत्म हो जाएगा ,
क्या भेदभाव की दीवारें ढह जाएंगी।
राम आएंगे तो,
हनुमान,अंगद, सुग्रीव ,जामवंत आदि भी पूछेंगे,
लाखों वर्षों तक बंदर, भालू कहकर,
क्यों अपमानित किया जाता रहा,
मानव रूप में उन्हें क्यों चित्रित कर सम्मान नहीं दिया गया?
कम से कम इतना तो सम्मान देना चाहिए था,
हम सभी मानव थे ,
और मानव ही रहने देना चाहिए था ?
राम आएंगे तो
तुलसीदास जी भी पूछेंगे,
आपने तो
समाज के कल्याण के लिए राजमहल त्याग
वन वन भटके ,
लेकिन आपकी कथा कहने वाले
आपके नाम लेकर,
धर्म को धंधा क्यों बना लिया है?
क्या राम के आने पर?
चीर चीर होती मर्यादा,
पुनः प्रतिष्ठित होगी,
क्या इंच इंच टुकड़ों के लिए,
जान के दुश्मन बने भाइयों में,
पुनः प्रीत का भाव जागेगा,।
राम आएंगे तो,
सोने की लंका बनाने वाले,
उन भ्रष्टाचारी नेताओं, पूंजीपतियों का क्या करेंगे?
जिन्होंने देश की अकूत संपदा को लूटकर,
देश को कंगाल बना दिया,
क्या स्विस बैंकों में जमा धन,
राम को लाने वाले मोदी जी,
अपना वादा निभायेंगे?
राम आएंगे तो क्या?
गरीबी, भुखमरी से जनता को मुक्ति मिल पाएगी।
देश की करोड़ो जनता आज भी,
भूखी-प्यासी सोने को मजबूर हैं,
क्या उन्हें भोजन मिल पाएगा।
क्या युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, बदहाली मिट पायेंगी।
आओ राम आओ,
हर देशवासी आपके स्वागत में,
दीपमाला जलाकर,
दीपावली मना रहा है,
हो सकता है कि आपके आने से,
भारत का वैभव पुनः लौट आए।
परशुराम जी महर्षि
विष्णु का अवतार हुए शिव का परशु पाया था।
ब्राह्मण कुल जन्म लिया परशुराम कहलाया था।
विश्वामित्र के शिष्य त्यागी तपस्वी महर्षि ज्ञानी।
शास्त्र विद्या पारंगत विप्र हितेषी ऋषि महादानी।
मात पिता परम भक्त सहस्त्रबाहु का नाश किया।
इक्कीस बार वसुधा से क्षत्रियों का विनाश किया।
भीष्म द्रोण कर्ण से शिष्य अस्त्र शस्त्र ज्ञान दिया।
तोड़ा धनुष श्रीरामचंद्र ने ईश्वर को पहचान लिया।
अश्वमेध महायज्ञ कर सप्त दीप धरा दे दी दान।
अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए तपस्या को किया प्रस्थान।
दुष्टों का दलन कर देते साधु संतों के हितकारी।
विप्र कुल महा शिरोमणि तत्व ज्ञाता परशुधारी।
ओज भरा भाल दिव्य हाथो में धनुष तुणीर धारे।
सनातन धर्म के रक्षक परशुराम परम पूज्य हमारे।
करते प्रणाम शत-शत शक्ति पुंज दिव्य पुरुष को।
तेजस्वी है त्रिकालदर्शी तपोबल प्रतापी पुण्य को।
हाहाकार करती प्रकृति
क्यों काट रहे हो पेड़ों को क्यों दोहन जारी है।
हाहाकार करती प्रकृति अनिष्ट की तैयारी है।
वृक्ष विहीन धरा हो रही संतुलन गड़बड़ा रहा।
तप्त धूप धरा त़पती जर्रा जर्रा लड़खड़ा रहा।
कहीं सूखा बाढ़ कहीं पर सूख रही फुलवारी है।
हरियाली के दर्शन दुर्लभ कुदरत की लाचारी है।
गर्मी से बेहाल पंछी सब ठौर ठिकाना दूर हुआ।
हसीं नजारा मनभावन सपना चकनाचूर हुआ।
पर्वत काटे खान खोदी सरिता नीर दूषित किया।
कारखानी धुंआ छोड़ वातावरण प्रदूषित किया।
नष्ट हो रही वनस्पतियां औषधि का भंडार जहां।
पशु पक्षी डोल रहे सब छोड़ आसरा जाएं कहां।
जंगल बीच बसी कॉलोनियां गाड़ी मोटर दौड़ रहे।
वृक्षों का कहीं नाम नहीं भावी किस्मत फोड़ रहे।
कहर बरसे कुदरत का वक्त रहते संभल जाओ।
जीना ये दुभर हो ना जाए मिलकर पेड़ लगाओ।
परशुराम जी महर्षि
विष्णु का अवतार हुए शिव का परशु पाया था।
ब्राह्मण कुल जन्म लिया परशुराम कहलाया था।
विश्वामित्र के शिष्य त्यागी तपस्वी महर्षि ज्ञानी।
शास्त्र विद्या पारंगत विप्र हितेषी ऋषि महादानी।
मात पिता परम भक्त सहस्त्रबाहु का नाश किया।
इक्कीस बार वसुधा से क्षत्रियों का विनाश किया।
भीष्म द्रोण कर्ण से शिष्य अस्त्र शस्त्र ज्ञान दिया।
तोड़ा धनुष श्रीरामचंद्र ने ईश्वर को पहचान लिया।
अश्वमेध महायज्ञ कर सप्त दीप धरा दे दी दान।
अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए तपस्या को किया प्रस्थान।
दुष्टों का दलन कर देते साधु संतों के हितकारी।
विप्र कुल महा शिरोमणि तत्व ज्ञाता परशुधारी।
ओज भरा भाल दिव्य हाथो में धनुष तुणीर धारे।
सनातन धर्म के रक्षक परशुराम परम पूज्य हमारे।
करते प्रणाम शत-शत शक्ति पुंज दिव्य पुरुष को।
तेजस्वी है त्रिकालदर्शी तपोबल प्रतापी पुण्य को।
चक्र सुदर्शन चलाना होगा।
विकट समय है धर्मयुद्ध है अब माधव आना होगा।
निर्दोषों की जान बचाने चक्र सुदर्शन चलाना होगा।
आतंकी उत्पात मचाते देखो लहुलुहान कश्मीर पड़ा।
धर्म पूछकर गोली मारे अब भारी संकट आन खड़ा।
शांति नहीं हमें दुश्मन को दो-दो हाथ दिखाना होगा।
कान्हा कृष्ण रूप धरकर चक्र सुदर्शन चलाना होगा।
धर्म ध्वज लहराए निशदिन भक्ति का गुणगान हुआ।
पूजा पाठ जप तप योग शक्ति सनातन संज्ञान हुआ।
सत्य सनातन धर्म हिंदू श्रीराम कृष्ण को आना होगा।
शक्ति प्रदर्शन क्षण आया चक्र सुदर्शन चलाना होगा।
जानों पर जाने लुट जाती रक्त रंजित हो गई है घाटी।
भगवा को ललकार रहा है बैरी दल अब खाकर माटी।
इंसानियत भूल चुका अरि फिर से पाठ पढ़ाना होगा।
धर्म रक्षा को दौड़ो केशव चक्र सुदर्शन उठाना होगा।
वतनपरस्ती वो क्या जाने जिनको है प्यारी खामोशी।
जिनका कोई धर्म नहीं बचा आतंकी हत्यारे हैं दोषी।
देश अगर बचाना हो संगठित वंदे मातरम गाना होगा।
मधुसूदन मनमोहन आओ चक्र सुदर्शन चलाना होगा।
हूंकार भरेगा हिंदुस्तान
शौर्य पराक्रम वीरता का गान करेंगे सीना तान।
जब कोई ललकारेगा हुंकार भरेगा हिंदुस्तान।
हूंकार भरेगा हिंदुस्तान
हल्दीघाटी रहा साक्षी स्वाभिमान बलिदानों का।
शूरमाओं से भरी धरा देश है वीर जवानों का।
आतंकी सिंदूर लूट ले निर्दोषों की ले ले जान।
हाथ पैर धरे कैसे बैठे अपने घर में ही इंसान।
हूंकार भरेगा हिंदुस्तान
जौहर ज्वाला जलती भुजाएं फड़कती वीरों की।
दुश्मन से लोहा लेने तलवार खड़कती वीरों की।
वीर शिवाजी का साहस है शेरों की हम संतान।
जोधा दुर्गादास जबर धरा सपूतों की रही खान।
हूंकार भरेगा हिंदुस्तान
मेहमानों का आदर करते तूफां से टकराते हम।
कोई हमको नैन दिखाएं नाकों धूल चटाते हम।
मातृभूमि को शीश चढ़ाते जयहिंद नारा है गान।
देशभक्ति में झूमते नाचते रहे तिरंगा ऊंची शान।
हूंकार भरेगा हिंदुस्तान
जब भी कोई छंद लिखूंगा
जब भी कोई छंद लिखूंगा रसों का आनंद लिखूंगा।
प्रीत भरा अनुबंध लिखूंगा गीत चाहे चंद लिखूंगा।
मुखड़ा सुंदर बन्ध रचा काव्य सौरभ गन्ध लिखूंगा।
मुस्काती अधरों की वाणी नयनों का द्वंद लिखूंगा।
वादों पर प्रतिबंध रचे सौंदर्य का कटिबंध लिखूंगा।
भावों की बहती गंगा काव्य महक तटबंध लिखूंगा।
तलवारों पर तंज लिखूंगा नैन रसीले कंज लिखूंगा।
टूटी मालाओं के मोती गिरती दीवारें भंज लिखूंगा।
मधुर मधुर रसकंद लिखूंगा हौले हौले मंद लिखूंगा।
लेखनी की ज्योत जला अंधियारा पाबंद लिखूंगा।
गीत कोई लयबद्ध रचना शब्दों को स्वरबद्ध लिखूंगा।
अंतर्मन को दस्तक देती कविता काव्य बद्ध लिखूंगा।
रसधारों को मीत लिखूं मनभावन सा गीत लिखूंगा।
पराक्रमी बलिदानी पथ शूरमाओं की जीत लिखूंगा।
प्रीतम उमड़ती रीत लिखूं अंगारों पर शीत लिखूंगा।
महकती हसीं वादियां महके गुलशन प्रीत लिखूंगा।
फन अभी कुचलना होगा
जातिवादी जहर लाए फन अभी कुचलना होगा।
आंख दिखाए विषैले फौलादी बन मसलना होगा।
कंठी माला संग हाथों में शमशीरें भी रखना होगा।
शौर्य पराक्रम वीरता से रण में कदम रखना होगा।
विषधर बैठे डसने को जो जहर उगलते माटी में।
अमन चैन शांति के दुश्मन जान लूट रहे घाटी में।
आतंकवाद की आग जलाते खून की होली खेले।
मार कुंडली अजगर बैठे भारी गुरु भरकम चेले।
आतंकी सर्प मिटाने तरकश तीर ले चलना होगा।
धरा का काल बने फन को अभी कुचलना होगा।
जिनके दिल बारूदी है आतंक जिन्हें लुभाता है।
वीर वसुंधरा धरती पुत्रों को भी लड़ना आता है।
रणधीरों को बंदूकों बीच समर में अब बढ़ना होगा।
निर्दोषों की रक्षा को फन को अभी कुचलना होगा।
फूलों की केसर क्यारी है कुदरत का वरदान यहां।
कोई दुश्मन बांट रहा नित मौत का फरमान यहां।
दिल्ली के सिंहासन से सिंहों को हुंकार भरना होगा।
सुरक्षा शांति खातिर फन को अभी कुचलना होगा।
मात पिता के चरणों में संसार है
मात पिता के चरणों में संसार है।
सेवा करने वालों का बेड़ा पार है।
झोली भर लो तुम नेह आशीष से।
मिलते जीवन में बस एक बार है।
नैनों से नित झरता स्नेह अपार है।
माता-पिता के चरणों में संसार है।
वरद हाथों में जिनके ही वरदान है।
अनुभव भरा खजाना सारा ज्ञान है।
आंचल की शीतलता ठंडी छांव सी।
आओ कर ले हम उनका सम्मान है।
जिनके हृदय प्रेम भरी रसधार है।
मात पिता के चरणों में संसार है।
जो जीवन की राह हमें बतलाते हैं।
उंगली पकड़कर हमको चलाते हैं।
मिलता हमको स्नेह और दुलार है।
देते हमको शिक्षा और संस्कार है।
खिल जाता सुंदर सा घर बार है।
मात पिता के चरणों में संसार है।
आतंक ने हमें रुलाया
आतंक ने हमें रुलाया रक्त के आंसू भर आंख में।
मानवता को झकझोरा जिंदा बदल गए राख में।
निर्ममता की हदें पार की नाम पूछा है मार डाला।
पापी अधर्मियों ने कितनों का सुहाग छीन डाला।
अभी हाथों मेहंदी लगी अभी ही मांग उजड़ गई।
कुछ का बेटा छिना कुछ की दुनिया बिखर गई।
खेल गए खूनी होली दरिंदे वहशी और नापाक।
पहलगाम शमशान हुआ जली चिताएं हुई राख।
कश्मीर केशर क्यारी में फिर आतंकी हमला है।
पुलवामा जला नहीं आग में सारा देश दहला है।
दुख की घड़ी मौन कलम अब मशाल जला देंगे।
हिंदुस्तान हुंकार भर रहा पाकिस्तान हिला देंगे।
म्यानो से तलवारे निकले दुश्मन मार भगाएंगे।
बंदूकों की गोली कहती आतंकी तुम्हें उड़ाएंगे।
हर हर महादेव गूंजेगा अब केसरिया लहराएगा।
गली-गली हिंदू बोलेगा हर दुश्मन भी थर्रायेगा।
पकड़ो दोषी मारो गोली चौराहे ऊपर लटकाना।
इतनी फौज वहां भेजो ढूंढो सारा पता ठिकाना।
मोक्ष शांति आत्माओं को श्रद्धांजलि है अर्पित।
नैन नीर रक्त आंसू हृदय हुआ है आज द्रवित।
रक्त के आंसू भरे नैन
रक्त के आंसू भरे नैन में खून खोलता वतन का।
लहू मांग रही रणचंडी खप्पर भरकर दुश्मन का।
पहलगाम आतंकी हमला निर्दय हत्याएं जारी है।
मिट गया सिंदूर कहीं भारत की अबला नारी है।
कोई पिता किसी का बेटा कंधों का सहारा था।
आतंकियों ने निर्दोषों को धर्म पूछकर मारा था।
विवाह की वेदी से उठकर सपने नए सजाए थे।
केसर की क्यारी कश्मीर पर्यटन स्थल आए थे।
कहां पता था मौत खड़ी है जल्लादों का डेरा है।
जहां हवाएं जहरीली फैला आतंकों का फेरा है।
हिंदुत्व ललकारा लड़ने महाकाल फिर आएगा।
हर हर महादेव का नारा तांडव नृत्य दिखाएगा।
अरि मुंडो की माला पहने जब कालरात्रि छाएगी।
खड्ग खप्पर त्रिशूल हाथ ले महाकाली आएगी।
डगर डगर से सूरमाओं की निकलेगी टोली सजी।
आतंकवाद का अंत होगा रणभेरी जब से बजी।
देश फिर से जल उठा
देश फिर से जल उठा, आतंकवाद की आग में।
पहलगाम दहक उठा, अब देश के वासी जाग रे।
नापाक ये हरकतें पाकिस्तानी, दुष्कर दुराचारी है।
निर्दोषों की हत्या हुई, लहुलुहान केसर क्यारी है।
धर्म पूछकर मारी गोली, अधर्मी निर्लज्ज कायर।
सरेआम सूली पे लटका, तुरंत करवा दो फायर।
अमन चैन शांति के दुश्मन, देशद्रोही गद्दार है।
आतंकी घटना कारण ही, आतंकवादी करार है।
हंसी-खुशी घर से निकले, कश्मीरी फिजाओं में।
क्या मालूम जहर भरा, उन आतंकी हवाओं में।
चूड़ी टूटी किस्मत फूटी, जान गई है निर्दोषों की।
करतूतें काली आतंकी, जल्लादों की भरोसों की।
सुरक्षा पर सवाल खड़ा, संभलने की है दरकार।
खतरे के बादल मंडराए, सजग हो अब सरकार।
ईश्वर दे उनको शांति, ग्रास हो गए जो काल के।
सरकार दंड दे उनको, जिम्मेदार जो इस हाल के।
पुस्तक
अंतर्मन में दीप ज्ञान का घट घट उजियारा लाती।
पुस्तक प्रगति पथ ले जाती प्रेम का पाठ पढ़ाती।
शिक्षा की धरोहर खजाना प्रज्ञादायिनी शक्ति है।
शारदे का उपहार अनुपम साधना और भक्ति है।
शब्दों का सिंधु विपुल अतुलित ज्ञान भरा भंडार।
कला शिल्प संगीत सुर पावन गुणों का आगार।
धर्मशास्त्र का ज्ञान दे संस्कारों की पावन जननी।
उन्नति शिखर हमें ले जाती विचारों से खूब धनी।
पथ प्रदर्शक रही सदा संयम शील सद्गुण दाता।
विमल विचार हृदय भरती उजियारा मानव पाता।
गुणियों में पूजी जाती धीरज धर्म ध्वजा पुस्तक।
विद्वानों को लुभाती आवरण नया सजा पुस्तक।
पुस्तक में विज्ञान भरा सामाजिकता की बुनियाद।
राजनीति के दाव पेंच आदर्श हम सब करते याद।
जिसने लिया आश्रय पोथी मालामाल खूब हुआ।
यश वैभव संपन्नता पाकर दुनिया में मशहूर हुआ।
वीर वसुंधरा
वीर वसुंधरा धरा,
धरती के लाल वीर।
माटी का कण चंदन,
महक हो हरा भरा।
मात वसुधा हमारी,
धरनी धीरज धारे।
उपजाऊ भूमि उर्वी,
बारिश हो जाए जरा।
रत्नाकर है अवनि,
खनिज भंडार खरा।
पृथ्वी रत्नों की खान है,
स्वर्ण हीरा मोती भरा।
भूधर सुंदर मही,
सरिताएं बल खाए।
निपजे भू फल फूल,
ओढ़े चुनरिया धरा।
मजदूर हूं
मजदूर हूं मेहनत करता लहू पसीना बहता हूं।
दो रोटी की खातिर मैं परदेश कमाने जाता हूं।
धूप छांव परवाह नहीं सर्दी गर्मी सह सकता हूं।
परिवार का पेट भरने खुद भूखा रह सकता हूं।
शिल्प कला पारंगत हूं ऊंची मीनारें गढ़ लेता हूं।
खतरों से खेलता आया ऊंचे शिखर चढ़ लेता हूं।
श्रम की पूजा कर स्वाभिमान का धर्म निभाता।
मिले गर्म तवे की रोटी आंधी तूफां से टकराता।
संघर्षों में सदा रहा हूं मैं मेहनत का पुजारी हूं।
कल की चिंता नहीं करता ईश्वर का आभारी हूं।
दिनभर दौड़ धूप करता पलभर का आराम नहीं।
हुनर के दम पर जीता छल छद्मों का काम नहीं।
मेहनत मेरी रंग लाएगी खुशहाली घर आएगी।
कला का जादू मुंह बोले किस्मत संवर जाएगी।
नीले अंबर नीचे सोता मैं हर हाल में जी लेता हूं।
कड़वे मीठे घूंघट अक्सर हंस करके पी लेता हूं।
भाग्य के खेल निराले
भाग्य के खेल निराले खुल जाए किस्मत के ताले।
बदल जाती उनकी तकदीरें हो लोग नसीबों वाले।
मिल जाए जो हीरे मोती हाथों की रेखाओं से।
चमक उठे किस्मत तारे फूल खिले हो राहों में।
सब अपने नसीब की खाते मेहनत का फल पाए।
भाग्य कब करवट बदले झोपड़ी महल हो जाएं।
माना भाग्य सोता होगा चमत्कार भी होता होगा।
किस्मत सितारे जब जागे उजियारा होता होगा।
ना दोष नसीबों को देना शुभ कर्मों की ओर चलो।
आशाओं का रवि उदय नव उमंगों की भोर चलो।
मेहनत मणी जादुई है किस्मत को चमका देती।
खून पसीने की कमाई मन को सदा सुकून देती।
मनुज धीरज धार हृदय जो लिखा है वो पाएगा।
जो भाग्य में तुम्हारे है इक दिन लौटकर आयेगा।
बहारें फिर से आएगी
फिर से कलियां महकेगी, फिर पंछी गाएंगे।
बहारें फिर से आएगी, तो भंवरे गुनगुनाएंगे।
घटाएं फिर से छाएगी, मौसम फिर लहराएगा।
तराने फिर से गाएंगे, होठों पर गीत आएगा।
हसीं वादियो में गूंजेंगे, दो दिलों के अफसाने।
प्रीत भरे अनमोल मोती, बोल मीठे बड़े सुहाने।
नैन नीर कहे मन की पीर, दुखड़ा कोई ना जाने।
जिस पर बीते व्यथा वही, दुख दर्द को पहचाने।
आशाओं के पंख लगाके, सपने नए सजाएं हम।
बागों में फिर पुष्प खिलेंगे, चमन महकाए हम।
फिर से वाणी अधरों से, यूं प्रेम सुधा बरसाएगी।
फिर से गीत होठों से, हर्ष की घड़ियां आएगी।
फिर होगा अतिथि सत्कार, बुजुर्ग सम्मान यहां।
शौर्य पराक्रम गाथाएं, रणवीरों का गुणगान यहां।
फिर से विश्वगुरु भारत, वेद धर्म का प्रचार यहां।
फिर से ज्ञान गंगा बहे, निपजे नव विचार यहां।
टूटा साहिल से नाता
टूट चुकी है बुनियादें सागर जब उमड़ा आता।
धाराएं अब दूर जा चुकी टूटा साहिल से नाता।
तट सुना है घट खाली ताल तलैया जल थोड़ा।
सरिताओं ने रस्ता मोड़ा साहिल से नाता तोड़ा।
किनारो की भी व्यथा है मन की पीर अंतर्कथा है।
धाराएं आती और जाती साहिल की रामकथा है।
साहिल सबकुछ सहकर चुपचाप वहीं बैठा रहता।
न शिकवा न शिकायत ना किसी से कुछ कहता।
परिवारों की है कहानी कलम कहती हैं जुबानी।
धाराएं करती मनमानी छोड़ जाती निज निशानी।
अगणित धाराओं पे साहिल इतराता मुस्काता था।
दूर-दूर वो दृश्य साहिल सबके मन को भाता था।
कभी लहरें उठकर आती कभी वापस भी जाती।
साहिल पर बैठे अजनबी को मन ही मन लुभाती।
लहरों ने भी साहिल संग यूं टकराना छोड़ दिया।
खड़ा साहिल सोचे कितनों ने रिश्ता तोड़ दिया।
जयति जय जय मां सरस्वती
जयति जय जय मां सरस्वती,
जय जय वीणा पाणी।
सात सुरों की मात् शारदे,
वंदन जग कल्याणी।
बुद्धि विधाता हे जग माता,
हंसवाहिनी वर दो।
साधक शरण आपकी मैया,
शब्दों से झोली भर दो।
विमल विचार तिमिर हारिणी,
धवल ज्योति प्रदाता।
यश वैभव प्रज्ञा दायिनी,
गुण निधियों की दाता।
शब्द सुधा मोती बरसाओ,
वाणी की झंकार करो मां।
काव्य शब्द अर्पण सब तेरे,
सुमन हार स्वीकार करो मां।
गीतों की लय ताल भवानी,
कविता का कमाल भारती।
कलमकार पूजन सब तेरे,
लेखनी ले मां करें आरती।
आती-जाती लहरें
आती-जाती लहरें बहती, सागर की उथल-पुथल।
भावों का सागर उमड़े, बढ़ता जाता अथाह जल।
कभी इधर से कभी उधर से, लहरें उठती जाती।
सागर की लहरें सिंधु में, जाकर विलय हो जाती।
मन में उठती लहरों यूं, भावों का बहता है प्रवाह।
विचारों का सैलाब आए, अगणित मन की चाह।
आती जाती लहरें सिंधु, बढ़ते जाना सबको राही।
दुनिया मौसम सारा जमाना, बदले प्रिय हमराही।
कभी शिखर को छू जाना, गिरना यूं झरना सा।
सागर जल सागर में जा, मिलता यूं सपना सा।
अंतर्मन के अंतर्द्वंद्व को, प्राणी जरा पहचान लो।
भव सिंधु में हिलोरे उठती, लहरों को जान लो।
समझ सको सार छुपा, लहरों का यूं आना जाना।
पानी का बुलबुला जीवन, उठना और मिट जाना।
भव सागर में लहरें उठती, कल कल गाती जाती।
जीवन का संगीत मधुर, लहरें आकर हमें सुनाती।
तुम कभी रुठा न करो
मंद मंद मुस्कुराता चेहरा महकते गुलाब सा।
मदमस्त हंसी अदाएं अंदाज खूब जनाब का।
मिलन का वादा कभी जानम यूं झूठा ना करो।
सारी दुनिया रूठ जाए तुम कभी रुठा ना करो।
नाजो नखरे सहेंगे संग संग हम मिलके रहेंगे।
दिल की बातें तुमको हम प्यार के नगमे कहेंगे।
तिरछी निगाहों से हमको तुम लूटा ना करो।
आओ मनाए तुमको तुम कभी रुठा ना करो।
सजना संवारना तेरा लहराते यूं केश काले।
कजरारे नैनो का जादू कर जाते हैं मतवाले।
आवाज देकर देखो जरा मुंह छोटा ना करो।
आओ घूमाएं तुमको तुम कभी रुठा ना करो।
मोरनी सी चाल तेरी छन छन बाजे पायलिया।
नथली के नखरे न्यारे गोरे गाल रिझाते पिया।
दिल के जुड़े हैं तार अक्सर तुम टूटा ना करो।
हंसकर बुलाओ हमको तुम कभी रुठा ना करो।
मस्त हवा ले हिलोरें
सोंधी सोंधी सुरभित होकर चलने लगी बयार।
महक उठा चमन सारा गुलशन हुआ गुलजार।
मुस्कुराती हो पवन खिली अधरों पर मुस्कान।
झूम उठे भंवरे सारे जब कलियों ने छेड़ी तान।
मस्त हवा ले हिलोरें सुरभित हुई सारी पुरवाई।
मादकता ने रंग बिखेरा चेहरे पर रौनक आई।
रंग-बिरंगे पुष्प खिले कुदरत ने पसारे पांव।
बहारों ने श्रृंगार किया सज रहे ढाणी गांव।
चली हवाएं ठंडी ठंडी सारे तन मन को हर्षाती।
हंसती मुस्काती पून है तबीयत खुश कर जाती।
इठलाती बलखाती आई सन सन कर लहराई।
सरिता तीर पुरवाई मधुर फुहार बनकर छाई।
हसीं वादियो से बहती सागर को छूकर जाती।
अंतर्मन को दस्तक देकर मंद मंद मुस्कुराती।
बहारों का जादू कैसा मदहोश हुआ शायर भी।
बहारों का रुख देखो यूं उमड़ उठा सागर भी।
फिर सुबह होगी सुहानी
नई ताजगी नई उमंगे नई ऊर्जा का संचार होगा।
फिर सुबह होगी हसीं घट घट नव विचार होगा।
भोर की किरणें धरा पर विचरण कर हरसाएगी।
बागों में पुष्प खिलेंगे कली-कली खिल जाएगी।
नई चेतना लेकर हम यहां गीत खुशी के गाएंगे।
नया सवेरा आशाओं का स्वागत गान सुनायेंगे।
अधरों पर मुस्कान धरे हंस हंसकर बतलाएंगे।
प्यार भरे अनमोल मोती सबको बांटते जाएंगे।
सुबह का सूरज नई रोशनी नई भोर कर जाएगा।
चेहरों पर रौनक आएगी हर ललाट जगमगाएगा।
पंछियों का कलरव है कल कल सरिता की धारा।
उमंग भरे हिलोरें सिंधु वादियों का दृश्य है प्यारा।
फिर सुबह होगी सुहानी खिलखिलाती सुप्रभात।
अंधियारे का अंत होगा बीत जाएगी काली रात।
उषा का उजियारा फैले घट-घट में आलोक हो।
मन का पंछी भरे उड़ाने व्योम अंतरिक्ष लोक हो।
आपणों नवलगढ़

नानसो दरूजो म्हारो, काळजो घणों चौड़ो है।
बाबो रामदेव बसै, असवार लीलो घोड़ो है।
कुवा रो पाणी है मीठो, बोलियां म मिठास है।
कैलाश काको अठै, सगळा न्योलगढ म खास है।
मंडी गेट मंडी कोन्या, नयो बजार बसां चालै।
बावड़ी गेट बराती डोलै, मिंतर चौक नेता हालै।
मैन बजार शीतळा माई, नगर सेठ है गोपीनाथ।
नाहर सिंह पार्क रस्तो, चालो ब्याहे दोन्यू हाथ।
च्यारूं कान्हा नाज दुकानां, गणेशजी महाराज।
पोदारा रो नाम चालै, पढायां म घणों सरताज।
घूम चक्कर च्यारूं रस्ता, सैलाणी घूमण न आवै।
आठूं हेल्यां च्यारूं हेल्यां, देख देख क हरसावै।
महामाई है सिद्धपीठ, गंगामाई बैठी मुळकावै।
तीज त्यूहारां झांकी निकळै, कुणो कुणो सजावै।
अठै सूर्यमंडल म घणी, खेलां री चालै बहारां।
शेखावाटी मेळो लागै, आपणा नवलगढ़ प्यारा।
सब सीद्धियों की दाता अंबे
सिंह सवार हो आजा भवानी,
दानव दलनी मां वरदानी।
शक्ति स्वरूपा जग कल्याणी,
बुद्धि विधाता वीणापाणि।
सब सीद्धियों की दाता अंबे,
महागौरी हे मां जगदंबे।
दुखड़े दूर करने वाली,
पीर हरो मत करो विलंबे।
यश वैभवता देने वाली,
डूबी नैया मां खेने वाली।
सुंदर सजा दरबार मैया,
ऊंचे पर्वत रहने वाली।
तेरी करूं आराधना माता,
गाऊं आरती वंदना माता।
आओ पधारो द्वार मैया,
अखंड ज्योत जले माता।
उजियारा जीवन में कर दो,
भक्त की मां झोली भर दो।
आसरा तेरा है जग जननी,
खुशियों की बरसात कर दो।
कर भला तो हो भला
हवन करते अंग ना जल जाए हाथ दीजिए।
सोच समझकर औरों का फिर साथ दीजिए।
कर भला तो हो भला भलाई भांप लीजिए।
नेकी कर कुएं में डाल नित इंसाफ कीजिए।
शुभ कर्म जीवन में सदा ही आप कीजिए।
बाधाओं का जोर कितना है माप लीजिए।
भर लो उड़ाने जितनी मंजिलें थाम लीजिए।
मेहनत की रोटी खा थोड़ा आराम कीजिए।
पुण्य सेवा कर्म है किसी का साथ दीजिए।
निर्बल का सहारा संबल दो हाथ दीजिए।
गिरने वाला ही संभलता है भान कीजिए।
नजरों से ना गिरना कभी यूं ध्यान दीजिए।
बढ़ते रहना ही जीवन है हाथ बढ़ा दीजिए।
रोशन चिरागों को जरा सौंधी हवा दीजिए।
मधुरता की बयार यहां थोड़ी बहा दीजिए।
याद करेगी सारी दुनिया कर्म यहां कीजिए।
बहारों का मजा लीजिए
बैठकर बहारों का मजा लीजिए।
रसपान काव्य का किया कीजिए।
मन को लुभाती शब्दों की रसधार।
गीत सुरीले गूंजे वीणा की झंकार।
दिल का हो दर्द कोई सुना दीजिए।
रूठा हो अपना कोई मना लीजिए।
भावों की गंगा है काव्य की फुहार।
मोतियों की माला शिल्प का श्रृंगार।
कानों में रस घोले बोल बहा दीजिए।
कवियों का संगम जरा नहा लीजिए।
दस्तक दिल को भाव सुना दीजिए।
सभा महक जाए नगमा गा दीजिए।
रस बरसे लबों से उन्हें बुला दीजिए।
घड़ियां बैचेन ना हमें सजा दीजिए।
खिल जाते अधर मेरे मुस्कुरा दीजिए।
जादू भरी आंखें हैं जादू गिरा दीजिए।
मैं तो मुक्तक कह दूं गीत सुना दीजिए।
छंदों की बौछार शायरी फना कीजिए।
वैसाखी
समृद्धि परंपरा चेतना का भावन त्यौहार है।
खुशबू सारे देश में फैले बरसे स्नेह दुलार है।
अन्नदाता का सम्मान हर्षित जीवन शैली है।
उमंग उल्लास भर देती बैसाखी अलबेली है।
वैसाखी मेलों और लोकगीतों का त्यौहार है।
खालसा दिवस है पंजाब का पावन प्यार है।
भाईचारा प्रेम समर्पण नव ऊर्जा का संचार है।
आशाओं की ज्योति घट घट का उजियार है।
चेहरों की मुस्कान हसीं दिलों की झंकार है।
धर्म की मर्यादा है गुल गुलशन गुलजार है।
सद्भाव की धारा है संस्कृति और संस्कार है।
राष्ट्र की झांकी मोहक एकता का संचार है।
खुशियों का खजाना है दिलों का इजहार है।
मन मयूरा झूमके नाचे मस्ती भरी बयार है।
रामदूत बजरंगी
राम भक्त हनुमान भक्तों के प्रतिपाल है।
रामदूत बजरंगी लहराए ध्वजा लाल है।
लाल है लंगोटा हनुमत महावीर हनुमान है।
संजीवनी बूटी लाए बचाए लखन प्राण है।
लंका जलाई सोने की मुंदरी दीन्ही डाल है।
राघव दुलारे प्यारे माता अंजनी के लाल है।
अष्ट सिद्धि नवनिधि बल गुणों के निधान है।
राम रसायन रटे श्रीराम कृपालु दयावान है।
हाथ में गदा सोहे बाबा तन पर सिंदूर राजे।
गले में मोतियों की माला घट श्रीराम साजे।
बल बुद्धि के है दाता सब गुणों के भंडार है।
मारुति नंदन प्यारे हो रही जय जयकार है।
संकट मोचक है सबके पवन तनय वीर है।
पूजा करें जो बजरंगी रक्षा करते रघुवीर है।
रामनाम धुन में लागे रोम रोम बसे राम है।
केसरी नंदन मन भाये रामराम बस राम है।
मेरी पूजा कर स्वीकार भवानी
मेरी पूजा कर स्वीकार भवानी, कर दे बेड़ा पार भवानी।
सिंह सवारी करके आजा, भर दे झोली मां वरदानी।
मेरी पूजा कर स्वीकार भवानी
अष्ट भुजाओं वाली अंबे, दानव दलनी मां जगदंबे।
अभयदान वर देने वाली, पीर हरो मत करो विलंबे।
संकट हरने वाली मैया, बल यश वैभव गुण दानी।
तेरी शरण साधक आया, गुण गाते मां सुर ज्ञानी।
मेरी पूजा कर स्वीकार भवानी
दुष्टों का संहार करो मां, भक्तों पर उपकार करो मां।
दिव्य अखंड ज्ञान ज्योति, घट घट से अंधकार हरो मां।
शक्ति स्वरुपा हे मां अंबे, तुमसा जग में ना कोई सानी।
दया दृष्टि बरसाओ माता, सिद्धिदात्री मां रूप भवानी।
मेरी पूजा कर स्वीकार भवानी
हाथों में त्रिशूल मां धारे, चक्र गदा अरू शंख सोहे।
प्यारा सजा दरबार मैया, रूप अनूप मन को मोहे।
कालरात्रि काली मैया, महागौरी मां जग कल्याणी।
दीप जलाए तेरे द्वार पे, रोशन कर दो मां जिंदगानी।
मेरी पूजा कर स्वीकार भवानी
मां के बराबर कोई नहीं
ममता का पावन खजाना मां के बराबर कोई नहीं।
वात्सल्य लुटाती नेह भरा आंँचल बराबर कोई नहीं।
मां के चरणों में स्वर्ग है चारों तीर्थ का है पुण्य धाम।
आंंचल की छांव सुख देती होठों पर हो मां का नाम।
नैनों में स्नेह की धारा मां के त्याग बराबर कोई नहीं।
गोदी में पलकर बड़े हुए अनुराग बराबर कोई नहीं।
बाधाओं से भीड़ जाती है मां तूफान से टकराती है।
संस्कारों की ज्योत भव्य जीवन की राह दिखाती है।
माता तो है शक्ति स्वरूपा दरबार बराबर कोई नहीं।
भर देती है झोली सबकी दातार बराबर कोई नहीं।
जादू भरी है ममता की लोरी मीठी नींद सुला देती।
खुद भूखी सो जाए निवाला बच्चों को खिला देती।
गढ़ लेती कीर्तिमान माता संस्कार बराबर कोई नहीं।
शिवा सरीखे योद्धा जन्मे तलवार बराबर कोई नहीं।
राघव करुणा के सागर
जन-जन के आराध्य रामजी जगत तारणहारे है।
कौशल्या राजदुलारे राघव दशरथ नयन तारे हैं।
राम नाम की महिमा भारी सबके रक्षक धनुर्धारी।
तिर जाते पत्थर पानी में हर लेते प्रभु पीर हमारी।
रामेश्वरम करी शिव पूजा रामसेतु निर्माण किया।
लंका पर जा करी चढ़ाई दंभ दशानन चूर किया।
राम भक्त हनुमान सरीखे भरत लखन प्रिय भाई।
जनकसुता संगिनी सीताजी सुग्रीव सखा मिताई।
राघव करुणा के सागर हैं सारी सृष्टि के करतार।
राम रसायन अमोध औषध सब सुखों के भंडार।
मर्यादा पुरुषोत्तम प्यारे श्रद्धा भक्ति है विश्वास।
जप तप ध्यान धरे योगी राम हर्ष भरा उल्लास।
राम श्रद्धा राम भक्ति राम ही जन जन की शक्ति।
आराधना अर्चना राम त्याग तपस्या लोभ विरक्ति।
अंतर्यामी सब सुखकारी जन हितकारी प्रभु राम।
राम सुमिरन है सच्चा बन जाते बिगड़े सब काम।
अभिनंदन है सनातन वर्ष
सनातन धर्म की जय, भगवा ध्वज की जय हो।
पावन नूतन साल है, श्रद्धा भक्ति की जय हो।
आस्था सिंधु घट घट में, हर हर महादेव का नारा।
जय श्री राम गूंजे व्योम, प्रीत की अविरल धारा।
सुशोभित भाल चंदन से, गले में वैजयंती माला।
जप तप योग भक्ति भजन, गाए भक्त मतवाला।
पूजन थाल सजे घर-घर, महके आंगन फुलवारी।
सुखदायक नया साल, झूमे नाचे नर और नारी।
हिंदुत्व भरे अजेय हुंकार, परचम विश्व में लहराए।
संपन्नता भरे सब भंडार, होठों पर खुशियां छाए।
मनमंदिर में उजियारा, ज्योत संस्कारों की जागे।
उमड़े विश्वास प्रेम की धारा, दुर्गुण दोष सब भागे।
स्वागत नव विचारों का, नूतन वर्ष लेकर आया।
अभिनंदन शुभ वंदन, सनातन शक्ति रूप छाया।
सिंदरी शामें हुई मस्त, भोर की नव किरणें छाई।
जय सनातन वर्ष की, भाव भगीरथी उतर आई।
रंगमंच यह सारी दुनिया
रंगमंच यह सारी दुनिया भांति भांति के किरदार।
कभी सभा सजती भव्य लगता रहता है दरबार।
कोई मंत्री कोई नायक लश्कर लारे लारे चलता।
कोई गुरु कोई चेला दांव पेच मन ही मन पलता।
दृश्य मनोहर नैन लुभाते कब वक्त बीतता जाये।
कब अभिनय पूरा हो जाए कब पर्दा गिर जाये।
कभी करुणा रुला देती कभी क्रोध का पारावार।
कभी खुशी में नर झूमता कभी दुखों की भरमार।
सुख दुख धूप छांव भांति बहती भावन रसधार।
अपने-अपने रोल निभाते मंच माहिर कलाकार।
कोई हंसता कोई गाये साज सुरीले कोई सुनाये।
कोई आकर चला जाता है दर्द भरी यादें दे जाये।
दुनिया के रंगमंच पर है सूरज चांद सितारे सारे।
सागर नदिया हसीं वादियां महकती मस्त बहारें।
साधु लोभी भोगी रोगी योगी संत सयाने जग में।
दो दिन का मेला है किसके कहां ठिकाने पल में।
मेरे बिखरते अल्फाज
महका देंगे महफिल को मेरे बिखरते अल्फाज।
यह शब्दों का जादू है प्यारे होगा तुमको नाज।
मन की पीर कह दूं या भावों की बहती रसधार।
उमड़ती प्रीत की धारा दिलों में बरसता है प्यार।
सुमनहार सजाकर मैं वंदन अभिनंदन करता हूं।
आराधना वाणी की थाल केसर चंदन धरता हूं।
खुशियों के सजल लफ्जों की लिए पुष्प माला।
खड़ा दरबार शारदे मात तेरा भक्त हूं मतवाला।
सुर की देवी शब्दों को मोती माणक वाणी कर दे।
गीतों के तरानों में माते सुरीला ओज स्वर भर दे।
मेरे बिखरते अल्फाज परचम व्योम गगन पाएं।
नभ तलक आवाज धड़कने सब राग बन जाए।
शब्द सुधारस धारा बहती रहे हृदय आंगन में।
वरदायनी हंसवाहिनी खुशियां भर दो दमन में।
चलते रहना ही जीवन है
बढ़ते रहो मुसाफिर प्यारे चलते रहना ही जीवन है।
चलते रहते चांद सितारे खिलते पुष्पों से उपवन है।
कंटक शूल होंगे पथ में बाधाओं का मिलना तय है।
हृदय में साहस भर लेना मुश्किलों का कहां भय है।
साध निशाना बढ़ते जाना मंजिलों की ओर गमन है।
हौसला हिम्मत मत हारो चलते रहना ही जीवन है।
अंधियारा रस्ता रोकेगा घनघोर घटाएं नभ छाएंगी।
कभी दुखों का पहाड़ मिले कभी आंधियां आएंगी।
धीरज धरकर दुर्गम राहों में महकाते रहना चमन है।
गीत गुनगुनाते जाना राहीं चलते रहना ही जीवन है।
रंग बदलते लोग यहां भांति भांति की भाव भंगिमा।
प्रीत भरी रसधार बहाना संस्कारों की रखना गरिमा।
अपनापन अनमोल मोती मानवता का सारा धन है।
मुस्कानों के मोती बांटकर चलते रहना ही जीवन है।
बाजीगर कोई और
बात कुर्सी की होती तो खींचातानी भी चलती है।
कवि की टांग खींचने से कविता ही निकलती है।
कविता भावों के मोती दिल का दर्द सुनाती है।
मंचों पर मुखर हुई अड़चन कहां पर आती है।
मान सम्मान मिले कविता को शीर्ष स्थान मिले।
चले लेखनी उस ओर प्रगति और उत्थान मिले।
शब्दों के मोती चुनकर कलमकार इतराता है।
काव्य की बहती गंगा में गीत सुहाना गाता है।
साहित्य सेवा में तत्पर शारदे साधना करता है।
उजियारे की किरणों में अंधकार को हरता है।
वाणीपुत्र कलम पुजारी शब्द बाण नहीं रखते हैं।
नहीं दुखाते दिल किसी का काव्य रस चखते हैं।
भरी उड़ानें अगर किसी ने पंखों को फैलाने दो।
रचा गीत कोई प्रीत भरा होठों तक आ जाने दो।
कठपुतली सब धरा पर बाजीगर कोई और है।
कविता तो छा जाती रह जाता केवल शोर है।
झूठा जो प्यार जताए
पांव की बेड़ियां बन जाए नैनो के तीर तन जाए।
छोड़ दो उस शख्स को खींचातानी और बढ़ाएं।
राहों में शूल बिछाए जो बेवजह आंख दिखाएं।
कैसे वो साथी सफर में परचम को देखना पाए।
बातों बातों में टांग अड़ाए तिरछी नजर गड़ाए।
कैसे खुश करें उनको खुशियां जो सह ना पाए।
झूठा जो प्यार जताए रंग में जो भंग कर जाए।
कर दे खेल का कबाड़ा रिश्ता हम कैसे निभाएं।
मौके पर बाण चलाए धीरज जो धर ना पाए।
महफिल मुस्कानों की है कोई कैसे समझाएं।
मौसम की भांति बदले बदलती दुनिया सारी।
बदलावों का दौर आया हवाओं की है खुमारी।
आसमां तुम्हारा होगा जुनून सर पे चढ़ा हो।
हौसला मन में भर लो लक्ष्य बहुत बड़ा हो।
जो जलाए पांव को तोड़े प्रीत की पावन डोर।
राहें बदल लेते हैं लोग रह जाता है पीछे शोर।
मात-पिता के चरण छुओ
मात-पिता के चरण छू आशीषों से झोली भर लो।
स्वर्ग बसा हैं कदमों में थोड़ा उनसे मीठा बोलो।
सिर पर साया हो खुशियों का मेघ छाया रहता।
माली खिलती बगिया के चमन मुस्काया रहता।
जो तुम्हारे हितकारी जीवन की कला सिखाते हैं।
बाधाएं रस्ता छोड़ चले जो तूफां से भीड़ जाते हैं।
जो ठंडी छाया बरगद सी शीतलता का झरना है।
जिनकी आंखों में स्नेह आदर सदा ही करना है।
सेवा के अधिकारी है वात्सल्य उमड़ता बढ़कर।
संस्कारों से महकाया जीवन कीर्तिमान गढ़कर।
त्याग समर्पण की मूरत मार्गदर्शक है सलाहकार।
शिक्षा का दीप जलाकर सारा जीवन देते संवार।
जो घर की बुनियाते हैं हंसती खेलती यादें हैं।
तुम बुलंदियों को छुओ उनके अटल इरादे हैं।
परिवार प्रेम का आधार आठों याम बरसता प्यार।
मात पिता का सम्मान यश वैभव खुशी है अपार।
देशभक्ति का जज्बा
देशभक्ति का जज्बा भरा उन फौलादी सीनों में।
राजगुरु सुखदेव भगतसिंह देशप्रेम भरा तीनों में।
क्रांतिकाल में लड़ी जंग फांसी का फंदा झूल गए।
शीश चढ़ाया मातृभूमि को जीना मरना भूल गए।
इंकलाब का नारा देते रणवीर वंदेमातरम गाते थे।
गोला बारूद से खेले जो हंसकर जान लुटाते थे।
आजादी की जंग लड़े रणधीर कूद पड़े अंगारों में।
भारतमाता की जय गूंजे दुश्मन कांपे तलवारों से।
रणभूमि के महा शूरमां सपूत आजादी के दीवाने।
वतन परस्ती जोश जगाते मस्ती में गाते मस्ताने।
राष्ट्रधारा की अलख जगा मशाल जलाते फिरते थे।
बैरी दल थर थर्राते हुंकारों से अरिदल सारे डरते थे।
महांसमर के योद्धा क्रांतिवीर भीड़ जाते तूफानों से।
बाधाएं क्या रस्ता रोके मरना सीखा हो अरमानों से।
बलिदानों की बलिवेदी पर अमर सपूत बढ़ पाते हैं।
देशहित मरने वाले ही सदा सीने पर गोली खाते हैं।
कवि की अनुपम कल्पना
कवि की तनुजा कविता काव्य कृति भुजा कविता।
रचनाकार की रचना कीर्तिमान यश ध्वजा कविता।
कवि की अनुपम कल्पना भावों की मधुर रसधार।
काव्य कलश स्वर्णिम मोती गुल गुलशन गुलजार।
कलम की कृति मनभावन लेखनी की पैनी धार।
शब्द सुधारस बरसाती काव्य मोतियों का भंडार।
तलवारों का जोश कविता रणवीरों की हुंकार बने।
प्रीत का झरना अविरल पीर नैनों की अश्रुधार बने।
देश प्रेम में झूमे नाचे गाए चेतना की लौ बन जाती।
सिंहासन संभाले रखती रण में शमशीरें तन जाती।
सृजन का उपहार पावन शारदे का श्रृंगार कविता।
गीत बन गूंजे धरा पर कवि हृदय के उद्गार कविता।
प्रेम का है संचार कविता वीणा की झंकार कविता।
दिलों में उतर जाती जब वाणी का उपहार कविता।
आन बान है शान कविता वीरों का गुणगान कविता।
अंधकार दूर भगाती देश की उन्नति उत्थान कविता।
हां मैं राजस्थानी हूं
हां मैं राजस्थानी हूं,
वीरों की निशानी हूं।
जौहर की ज्वाला हूं,
राणा का ही भाला हूं।
मैं चंबल का पानी हूं,
भामाशाह हूं दानी हूं।
मैं धोरों की माटी हूं,
पावन हल्दीघाटी हूं।
धोती कुर्ता धारी हूं,
बैरी पर भी भारी हूं।
सोना उगले माटी है,
सौम्य अरावली घाटी है।
स्वाभिमान से जीते हैं,
दिन बड़े शान से बीते हैं।
तीर्थ गलताजी पुष्कर है,
हमसे टकराना दुष्कर है।
मेवाड़ कथा शमशीरों की,
देशभक्तों की रणधीरों की।
रक्त राजपूती रगों में जहा,
बहती सुख की धारा वहां।
बैरी का हम आदर करते,
रण में ना कभी पीछे रहते।
पगड़ी हमारी है आन बान,
हमको प्यारा है राजस्थान।
कविता
कंठो से होकर बहती रसना पर विराजित रहती।
भाव सिंधु से उमड़ती होठों पर सज्जित रहती।
मुस्कानों के मोती है अधर सुधा रसपान कविता।
वीरों की हुंकार भरी है देशभक्ति का गान कविता।
कलम की मशाल से उजियारा रोशन कर जाती।
सद्भावों की धारा से समरसता जनमन में लाती।
कलमकार यश वैभव कीर्तिमान लाती कविता।
रचनाकार की रचना कवि हृदय उद्गार है कविता।
महफिल महका देती आईना दिखलाती कविता।
निर्बल की आवाज शमशीर बन जाती कविता।
मन की पीर बयां करें दिल में उतर जाती कविता।
दिग्गज हिल जाते सारे परिवर्तन लाती कविता।
प्रीत की रसधार कविता सावन की रस फुहार है।
फागुनी रंगों की छटा कविता वीणा की झंकार है।
शब्द शिल्प लय ताल छंद गीत गजल रुबाई है।
वीणावादिनी वरदहस्त हो कविता बहार लाई है।
किताबों के मुसाफिर
किताबों के मुसाफिर आजा पोथी पढ़ने आजा।
ज्ञान का सिंधु बुलाता तू कीर्तिमान गढ़ने आजा।
तुझसे है गहरा नाता राही रस्ता क्यों भूल जाता।
अलमारी में पड़ी किताबें मोबाइल में झूल जाता।
कथा कहानी विज्ञान भी जप तप योग महाज्ञान।
शिक्षा का दीप जलाती है रोशन हो जा सूरज्ञान।
भाग्य बदलती किताबें सफलता की ये कुंजी है।
आलोकित घट घट कर देती जीवन की पूंजी है।
विद्या का अर्जन करके थोड़ी किस्मत संवार ले।
पुस्तक प्रेमी बन जा जीवन भवसागर से तार ले।
किताबों के मुसाफिर कर थोड़ी शब्द सुधा यात्रा।
अल्फाजों के मोती सुंदर गुणों की अगणित मात्रा।
काव्य कला साहित्य सनातन संस्कार है पावन।
शौर्य पराक्रम ओज वीरता की गाथाएं हैं भावन।
दीपक जला ले घट में तू उजियारा अंगीकार कर।
पुस्तक संभाल राही पाठक पुस्तक से प्यार कर।
जय जय महाकाल
तन से मन से शिव भजो, शंकर सबको प्यारा है।
भोलेनाथ महादानी, सिर पर बहती गंगा धारा है।
जय जय महाकाल, जय जय महाकाल
हर हर महादेव शंकर, ओघड़़दानी है लखदातार।
हर लेते पीर सदाशिव, सबका करते हैं बेड़ा पार।
डमरूधारी चंद्रधारी, जटाधर करे नंदी की सवारी।
आदि अनादि शिवशंकर, भूतनाथ बाघाम्बरधारी।
गले लपेटे सर्पों की माला,नटराज तांडव प्यारा है।
त्रिपुरारी त्रिशूल धारी,कैलाशपति हर रखवारा है।
जय जय महाकाल, जय जय महाकाल
नीलकंठ श्रीकंठ विश्वनाथ, शिवाप्रिये शशिशेखर।
कृपा निधि परमात्मा, परमपिता पशुपति महेश्वर।
प्रजापति गणनाथ, भक्त वत्सल सबके भगवान।
व्योमकेश अनंत सर्वेसर्वज्ञ, सब सुखों के निधान।
पाश विमोचन पालनहारा, जग का तारणहारा है।
भूतनाथ कालों का काल है, देवाधिदेव हमारा है।
जय जय महाकाल,जय जय महाकाल
चेहरे पर मुस्कान
बढ़ जाती है चेहरे पर मुस्कान तुम्हारे आने पर।
खिल जाती है ये महफिल तान तुम्हारे गाने पर।
बज उठती है तालियां मधुर गीत तेरे सुनाने पर।
हर कोई अपना सा लगता थोड़ा तेरे मुस्काने पर।
पीर मन की हल्की होती अपनापन जताने पर।
सारी किस्मत खुल जाती पास तेरे आ जाने पर।
हंसी ठिठोली दिल जीते जुबा तेरी खुल जाने पर।
हंसमुख चेहरा मन को भाता मुस्कान फैलाने पर।
महकता समां तुम सारा पहचान नई बनाने पर।
होठों पे खुशियां छा जाती सुधारस बरसाने पर।
शब्द शिल्पी पावन मोती करामात दिखलाने पर।
तुम हस्ती मेरे शहर की नाम रोशन कर जाने पर।
मधुर तराने लगे सुहाने सारी सभा महकाने पर।
तुझसा ना कोई प्यारा हर दिल खिले हर्षाने पर।
तुम जियो हजारों साल हजारों दुआएं पाने पर।
हंसो हंसाओ बधाई हर दिल तक छा जाने पर।
मैं रम जाऊं तेरे रंग में
मैं रम जाऊं तेरे रंग में माधव मेरे रंग रसिया।
मेरे मनमोहन तू आजा आजा रे मन बसिया।
मदन मुरारी ओ बनवारी रंग बरसे गिरधारी।
हे कन्हैया फाग खेले भर भरकर पिचकारी।
रंग अबीर गुलाल उड़ रहे रंग रहे गोरे गाल।
केसर क्यारी महक रही प्रीत के छेड़े धमाल।
झूम रहे नर नार मस्त हो खेल रहे सब होली।
फागुन आया रंग रंगीला फाग गा रही टोली
माधव तेरे रंग में राधा सुध बुध सारी खोई।
तेरा प्रेम जगत में सच्चा जान सके ना कोई।
चंग बांसुरी धुन पर नाचे थिरक थिरक राधा।
तारनहार कुंज बिहारी हर लेते संकट बाधा।
कृष्ण प्रेम का रंग चढ़ा है मीरा हो गई दीवानी।
हंसकर पी गई विष प्याला अमर हुई कहानी।
होळी आई र भोळा भंडारी
होळी आई र भोळा भंडारी, अंग भस्म रमा।
होळी आई र
ब्रह्मा नाचै विष्णु नाचै, डम डम नाचे बम लहरी।
काशी विश्वनाथ संग नाचै, माता पार्वती मेरी।
होळी आई र
भांग पी होरयो मतवाळो,मेरो बाबोभोळो भाळो।
तीन लोक रो नाथ दानी, ओघड़़दानी मतवाळो।
होळी आई र
चमक चांदणी चमचम चमकै, इमरत रस री धारा।
नीलकंठ नटराज शंकर, जटा सूं बहरी गंगधारा।
होळी आई र
फागण की पून मस्तानी, रंग चडयो भगती को।
भूत प्रेत संग म नाचै, चमत्कार सब शक्ति को।
होळी आई र
तांडव तेरो तिरसूळ धारी, नाचै है दुनिया सारी।
तू करतार सारा जग रो, सुध बुध लिज्यो म्हारी।
होळी आई र
होली रंगों की बौछार
रंग रंगीली होली आई उड़ने लगा गुलाल।
चंग बांसुरी ढप सजे रसिया गाए धमाल।
रंगरसिया थिरक नाचे आई होली मस्तानी।
रंग दे रंगीले सांवरिया राधा हो गई दीवानी।
अंग अंग लगा रंग आया होली का त्योहार।
फागुन की मस्ती है बरसे रंगों की रसधार।
होली का हुड़दंग मचा यहां गीतों की फुहार।
आओ मिलकर खेले होली रंगों की बौछार।
फाग रंगीला उड़े अबीर गोरी करे सिणगार।
बलम संग सजनी नाचे उमड़ रहा है प्यार।
सद्भावों की होली आई रंग बरसे मनमोहन।
फूल खिले फागुन हरसे झूम रहा तन मन।
उमंग उल्लास लालिमा रौनक छाई गालों पे।
गीत तराने बांसुरी स्वर लहरी छाई कानों में।
होली होली धूम मची है मस्तानों की टोली।
रंग अबीर उड़े आसमां आओ खेले होली।
नारी तू नारायणी
प्रेम की रसधार बहाती नेह की खुशबू फैलाती।
ममता की मूरत अनुपम वात्सल्य खूब लुटाती।
दया क्षमा धीरज धारती घर परिवार संवारती।
रणचंडी बनकर नारी शक्ति शत्रु को पछाड़ती।
शिक्षा से रोशन होती कला कौशल पारायनी।
नारी तू नारायणी
तुम गुणों की खान अक्षय रचती कीर्तिमान हो।
घर परिवार महकाने वाली नारी तुम महान हो।
संस्कारों की जननी नारी शक्ति दिव्यमान हो।
प्रगति पथगामिनी हो गगन छूती प्रतिमान हो।
श्रद्धा विश्वास मूर्त नारी कुल कुटुंब तारायणी।
नारी तू नारायणी
गुलशन सी बहार हो प्रीत बरसाती फुहार हो।
स्वप्न कोई साकार नारी शक्ति का अवतार हो।
गृहस्थ रथ की धूरी हो उन्नति का आधार हो।
घर की रौनक नारी शक्ति अन्नपूर्णा साकार हो।
सृष्टि की अनुपम कृति चंचल चमक चन्द्रमणी।
नारी तू नारायणी
नारी का सम्मान
युगो युगो से होता रहे हर नारी का सम्मान।
नारी नर की खान सदा नारी शक्ति महान।
धैर्य शील धारण करें दो-दो कुल को तारती।
सृजन की मूरत नारी घर परिवार संवारती।
स्नेह की रसधार बहाती प्रेम सुधा बरसाती।
संस्कार संवारे रखती घर में खुशियां लाती।
रूप अनेक नारी तेरे रिश्तो को बांधे रखती।
दया करुणा ममता से कीर्तिमान नया रचती।
हौसलों की भरें उड़ानें मंजिलों का नभ छुए।
बुलंदिया चरणों में तेरे रोशन हो घर के दीए।
अनसूया सीता सावित्री झांसी रानी लक्ष्मीबाई।
विष का प्याला पीकर नाची भक्ति में मीराबाई।
इतिहास रचा नारी ने कमान संभाले रखती।
संघर्षों में चंडी बनकर रण विजय पीर हरती।
जहां-जहां नारी की पूजा नारी का हो गुणगान।
उन्नति शिखर है दमकता राष्ट्र होता शक्तिवान।
उफ्फ ये परीक्षा
उफ्फ ये परीक्षा आई लाई है प्रश्नों की बौछार।
प्रश्न पत्र हल करते-करते पड़ ना जाए बीमार।
रोज रातदिन करें पढ़ाई अभ्यास भला हो कैसे।
अंग्रेजी अखरती सबको पास कर लें जैसे तैसे।
गणित गोल भूगोल सा विज्ञान प्रयोग सिद्ध करें।
हिंदी की कथा कहानियां राजनीति प्रसिद्ध करें।
परीक्षा केंद्र जाकर मैं तनिक सा ठहर जाता हूं।
प्रवेशपत्र लिए हाथ में प्रश्नपत्र सम्मुख पाता हूं।
उत्तर पुस्तिका खाली सी मैं भरना पूरी चाहता हूं।
सवालों के घेरे में घिरा कहां ज्यादा लिख पाता हूं।
परीक्षक यमराज सा लगे वक्त सांसों की डोर सा।
धक-धक कलेजा करता पल-पल सागर छोर सा।
विषयों की आपाधापी में समीकरण बन जाता हूं।
सागर नदियों सीमाओं में प्रश्नों में भटक जाता हूं।
कितनी कठिन घड़ियां कितनी परीक्षा देनी होती।
वक्त सबको सिखा देता जंग जिंदगी कैसी होती।
फागुन आयो रे
फागुन आयो रंग रंगीलो, रंग उड़े रे गुलाल।
भर पिचकारी कन्हैयो, रंग गयो गोरा गाल।
फागुन आयो रे
चंग धमाल रसिया गावे, मुरली मधुर बजावे रे।
स्वांग धर मस्ताने आवे, मस्ती में झूमे गावे रे।
मदन मुरारी नंद बिहारी, नाचे नौ नौ ताल।
होली आई होली आई, हुड़दंग मचा धमाल।
फागुन आयो रे
गजबन गोरी सज आई, रंग रसिया गावे फाग।
रस बरसे सभा महकती, मन उमड़े अनुराग।
मस्त पवन ले हिलोरें, फागुनिया चले बयार।
रंग लगावे इक दूजे को, आया रंगों का त्योहार।
फागुन आयो रे
बदल गया संसार
अपनापन अनमोल बदला, बदली जीवन धारा।
मतलब के सब संगी साथी, स्वार्थ ने डेरा डारा।
चकाचौंध के कायल हुए, बदले मनुज विचार।
धन के पीछे दौड़ पड़े अब, लुप्त हुए संस्कार।
बदल गया संसार
बस स्वार्थ ने पांव पसारे, क्या रिश्ते क्या नाते।
कैसे उल्लू सीधा कर ले, दाव पेच सबको भाते।
दया प्रेम करुणा खोई, सजा नफरत का बाजार।
लूटमार सीनाजोरी छाई, काम क्रोध है तकरार।
बदल गया संसार
व्यंग्य बाण वाणी के बरसे, नयन उगलते अंगारे।
अधरों की मुस्कानें तरसे, हृदय बरसती रसधारें।
छल छदम दंभ घट में, दिखावे का उमड़ता प्यार।
चांदी के सिक्कों में बिकता, विश्वास प्रेम आचार।
बदल गया संसार
देवों के देव महादेव
कालों के काल महाकाल, शिव भोला भंडारी।
देवों के देव महादेव, शिव तांडव सबसे भारी।
महा भयंकर त्रिपुरारी, प्रियंकर शंभू गंगधारी।
औघड़ दानी वरदानी, कैलाशपति जटाधारी।
गले लपेट सर्पोंं की माला, ओढ़े है मृगछाला।
बाघाम्बरधारी विश्वनाथ, भोलेनाथ मतवाला।
शशिशेखर डमरूधर, त्रिशूलधारी शिव भोले।
अंग भस्म भंग चढ़े देव, भूत प्रेत संग में डोले।
यक्ष रक्ष भैरव मनावें, सकल चराचर ध्यावे।
करें सवारी बैल की, शिव नीलकंठ कहलावे।
हर हर महादेव भोले, सत्यम शिवम सुंदरम।
आस्था दीप जले घट में, लहराए ध्वजा धर्म।
मंदिर में शिवालय, ओमकार गूंजे दिन-रात।
भरते भंडार दानी, हृदय हर्ष की हो बरसात।
भक्तों के प्रतिपालक भोले, संकट हरते सारे।
भाग्य सितारा दमके, मिटे सारे कष्ट अंधियारे।
शिव शंकर डमरू वाले
शिव शंकर डमरू वाले, सदाशिव भोले भंडारी।
चंद्र ललाट सोहे बाबा, शिव नंदी की असवारी।
हर हर महादेव त्रिपुरारी
जटा से बहती गंगाधारा, भस्म रमाए भोला प्यारा।
गले लपेटे सर्पों माला, त्रिशूलधारी शिव है हमारा।
त्रिनेत्र त्रिपुंड सुशोभित, त्रिकालदर्शी ओघड़़ दानी।
सर्वज्ञ सुखदाता शंकर, सब देवों के देव महाज्ञानी।
काशी विश्वनाथ गंगाधर, विनती सुनो प्रभु हमारी।
हाल छिपा नहीं भयंकर, शंकर हर लो पीड़ा सारी।
हर हर महादेव त्रिपुरारी
नटराज कैलाशपति शिव, अगम अगोचर भोले।
भांग धतूरा भाए बाबा, भक्त गाएं बम बम भोले।
भूतनाथ हे नाथ मेरे, महाकाल हे शक्ति स्वरूप।
भूत प्रेत पिशाच पूजे, शिवगण रक्ष यक्ष अवधूत।
ओमकार ब्रह्मांड नाद स्वर, डम डम डमरू बाजे।
तेरी कृपा हो शिवशंकर भोले, भवभय सब भाजे।
इक लोटा जल महाकाल अर्पण, तेरी लीला न्यारी।
नीलकंठ चरणों में तेरे सब, भक्त खड़े है भवतारी।
हर हर महादेव त्रिपुरारी
छत्रपति वीर शिवाजी
हिंदवी स्वराज सितारे पराक्रमी परम प्रतापी।
छत्रपति वीर शिवाजी शौर्यता से सेनाएं कांपी।
दुर्ग गढ़ किले जीते हर हिंदुस्तानी ये दिल जीता।
सनातन संस्कृति पोषक समर विजय वो पाता।
हिंदू सिरमौर हुए सुरमां मुगलों से टक्कर लेते।
स्वाभिमानी भाल ऊंचा हर चालों का उत्तर देते।
युद्ध कला निपुण प्रहरी तलवारों का जोश खरा।
हर-हर महादेव का नारा जयहिंद जय घोष भरा।
जड़ें हिला दी मुगल शासन की भारती लाल ने।
केसरिया ध्वज फहराया रक्षक बन प्रतिपाल ने।
अफजल खां धूर्त था घाट मौत के पहुंचा दिया।
कर्मठ योद्धा शौर्य डंका विश्व क्षितिज को किया।
समर्थ गुरु रामदास सेवक शिवाजी छत्रपति वीर।
तुलजा भवानी के दास महान अधिपति रणधीर।
हिंदू हृदय सम्राट मराठा गौरव के हे महानायक।
वीरता के कीर्तिमान रच विजय श्री अधिनायक।
रंग बसंती हुई धरा
रंग ही रंग बसंत संग व्योम उड़ रही गुलाल है।
बसंत बहार आई होली रसिया गाए धमाल है।
फागुन महीना मदमाता मस्ती छाई गुलजार है।
फागुन खेले मोहन प्यारे राधा रानी कचनार है।
पीली पीली सरसों महकी हर फूलों की क्यारी।
हर दिल में अनुराग उमड़े गुलाल उड़ रहे भारी।
बांसुरी की धुन पर नाच रहे चंग बजाते मस्ताने।
आओ भाई होली खेले निकल पड़े सब दीवाने।
मधुमास मुस्कान बिखेरे हंसी खुशी का मौसम।
फाग प्रीत रस बिखराए छाया मस्ती का आलम।
चौक चौराहे चमके सारे गीतों की आई है बहार।
गजबण गोरी लजवंती गाएं मधुर बरसे रसधार।
रंग जमा दरबार बीच सब सुनो सुरीला तराना।
बसंती रंग में रसिक गाता झूम झूम मधुर गाना।
रंग बसंती हुई धरा सब चेहरों पर रौनक छाई।
सद्भावों की प्रेमधारा लेकर रंगों की होली आई।
कोई तो अपना होगा
भीड़ भरी इस दुनिया में कोई तो अपना होगा।
सुख का सूरज निकलेगा पूरा हर सपना होगा।
ढूंढ रहा हूं उन आंखों को अपनापन से भरी हुई।
प्यार लुटाती इस हस्ती को देख तमन्ना हरी हुई।
जीवन की राह बताकर खुशियों के दीप जलाए।
बुलंदियों के आसमान में मुस्कानों के मोती पायें।
समझ सके मन की बातें दिल का दर्द जाने जो।
कोई तो अपना होगा सारे संसार में पहचाने वो।
मधुर तराने बोल मीठे बरसे स्नेह सुधा रसधार।
दिल के कोने में बसी प्यारी सूरत उनका प्यार।
दस्तक देने वाले राही धड़कन तक रुकना होगा।
दसों दिशाओं कहो तुम्ही कोई तो अपना होगा।
अपनापन सोंधी सौरभ महके पुष्प फुलवारी।
बहती रहे प्रेम गंगा खिल जाए पुष्पित क्यारी।
भव सिंधु में राम मिलेंगे राम नाम जपना होगा।
श्रद्धा और विश्वास जहां कोई तो अपना होगा।
शीश चढ़ाकर चले गए
पुलवामा का हमला दुश्मन की साजिश कोई।
अमन शांति निगले अरिदल की रंजिश कोई।
देश प्रेम के दीवाने थे शीश चढ़ा कर चले गए।
वंदन है उन वीरों को प्राण न्योछावर कर गए।
जिनके उर ज्वाला जलती राष्ट्रप्रेम की धारा है।
कूद पड़े दुश्मन से लड़ने जिन्हें तिरंगा प्यारा है।
बलिदानी पथ के राही शौर्य पराक्रम दिखलाया।
दुश्मन से दो-दो हाथ हो जयहिंद नारा गूंजाया।
हौसलों बलिदानों रणवीरों की ललकारों को।
वंदे मातरम नारों को जांवाजों की हुंकारों को।
मातृभूमि पर मर मिटे उन देशप्रेम मतवालों को।
सम्मान समर्पित मेरा उन देश के नौजवानों को।
भारत मां की रक्षा में जान समर्पित करते जो।
आन बान शान तिरंगा जोश दिलों में भरते वो।
शहीद हुए हैं माटी पर कुर्बान वतन जो हो गए।
वतन के रखवाले सपूत गहरी नींद में सो गए।
प्रेम कोई व्यापार नही
दो दिलों का संगम है ये धड़कनों की राग है।
भावों का उमड़ता सिंधु हृदय का अनुराग है।
प्रीत का पावन रिश्ता जंग जीत या हार नहीं।
महकता फूल गुलाब प्रेम कोई व्यापार नहीं।
जुड़े होते तार दिलों के जन्मों जन्मों का रिश्ता।
बढ़ता जाता दिनोंदिन प्यार शनै शनै आहिस्ता।
प्यार का सागर बहता डूबती हुई पतवार नहीं।
सच्चा स्नेह अनमोल है प्रेम कोई व्यापार नहीं।
इंतजार की वो घड़ियां बेताबी बढ़ती पल-पल।
प्रियतम का प्रेम सलोना नैन नेह झरता सरल।
वादों का बाजार नहीं दो दिलों का करार नहीं।
दूर रह कर पास होता प्रेम कोई व्यापार नहीं।
सुख-दुख का पूर्वाभास चेहरा हसीन खास हो।
मौसम में मधुमास प्रिय अंधियारे में उजास हो।
दीपक की रोशनी है छल छदम अंधकार नहीं।
हृदय की लहरें पावन प्रेम कोई व्यापार नहीं।
इश्क की चांदनी है भीगा भीगा सा चांद मेरा।
प्रेम की इन गलियों में आशाओं ने डाला डेरा।
मुहब्बत के सफर में हमसफ़र साथ निभाना।
दिल की धड़कने गाती प्यार का गीत तराना।
लो आया बसंत सुहाना
लो आया बसंत सुहाना महक गई फुलवारी।
चली चली हवाएं मस्तानी लो बह रही पुरवाई।
बसंत की रातें रंगीन मौसम भी हुआ मस्ताना।
फूल खिले चमन में बहारों का फिर इतराना।
चेहरों पर मुस्काने मधुर गीतों का मधुर तराना।
मनमयूरा झूम के नाचे नजारा हुआ है सुहाना।
बसंती मदमस्त बयारे पुलकित करे तन मन।
फागुनी धुन ढप बाजते रसिया नाचे साजन।
वसंत की रातें चांदनी फागोत्सव सब मनाते।
चंग धमाल बजे बांसुरी स्वांग नए नए रचाते।
गिंदड़ डांडिया खेल प्रिय प्रीत की बहे रसधार।
संगीत सुरों पर थिरकती सजी-धजी घर नार।
हाथी घोड़े ऊंट सजते हदय सद्भावों की धारा।
रंग बसंती दिलों पर छाया मन बोले इकतारा।
आओ बसंत मनायें मिलकर गीत गाए भावन।
उमड़ रही भावों की गंगा बोल मधुर है पावन।
हद है यार
यह कैसी है प्रीत दिलों की यह कैसा है प्यार।
यह कैसा अनुराग उमड़ता जहां नहीं रसधार।
हद है यार
नेह की निर्झर धारा वह अपनापन अनमोल।
दिल से दिल के रिश्ते यहां मधुर सुहाने बोल।
मन को कोई भाता भावों की उमड़ती धार।
खिल जाता गुलाब चेहरे पर आता निखार।
हद है यार
कहां प्रेम की परिभाषा है कहां पुराना प्यार।
प्रियतम बसे परदेस में राहें तकती घर नार।
बस गुलाब के फूल में बिकता देखा है प्यार।
वैलेंटाइन डे हुआ इश्क के मारो का त्योहार।
हद है यार
जन्मों जन्मों का साथ था दुख दर्द सारे बंटते थे।
सुख-दुख के साथी जहां अंधियारे मेघ छंटते थे।
पावन प्रेम की सरिता बहती संगम के उस पार।
खुशियां बरसती आंगन हंसता झूमता परिवार।
हद है यार
जो बीत गई सो बात गई
जो बीत गई सो बात गई,
काली अंधियारी रात गई।
सुख का सूरज निकलेगा,
आशाओं की प्रभात नई।
बुजुर्ग बात कहते थे सही,
बदला जमाना न बात रही।
कैसी आंधी ये बयार बही,
ढहती मर्यादा संस्कार कहीं।
उड़ानें आसमां में उड़ो सही,
मंजिले अब ज्यादा दूर नहीं।
सफलताएं कदमों में होगी,
बुलंदियां भरी झोली में रही।
कुछ सपने नए सजाओ सखे,
जीवन पथ की है राहें नई नई।
कुछ लक्ष्य साध लो जीवन में,
उत्साह उमंगे भर लो नई-नई।
जो चला गया वह जाएगा ही,
रोशन हो जाए हम वही कहीं।
कदम जमाए रखना है हमको,
अब जो बीत गई सो बात गई।
ये जो मोहब्बत है
ये जो मोहब्बत है इश्क है दीवानगी है।
प्यार का एहसास है श्रृंगार सादगी है।
कुदरत का करिश्मा है दिलों का रिश्ता।
धड़कनों का सुर है आहिस्ता आहिस्ता।
चेहरे का निखार भी रूप का श्रृंगार भी।
अधरों की मुस्कान सुंदर सुमनहार भी।
ये जो मोहब्बत दो दिलों का तराना है।
खुशबू प्रेम की प्रीत भरा अफसाना है।
महकता समां खिलता फूल गुलाब सा।
रूठना मनाना हंसना रुतबा नवाब सा।
दिलों में उमड़ती रसधार बहती प्रेम की।
आंखों में इंतजार है जंग हार जीत की।
ये जो मोहब्बत कोई पागल दीवाना है।
बरसती वफा है कोई मौसम सुहाना है।
उनके घर के सामने मेरा आना जाना है।
देखता काली घटाएं मधुर मुस्कुराना है।
नजरों का खेल दिलों की सुहानी बातें।
रंगीन नजारा हो दिलों में वो उतर जाते।
मां शारदे तुम्हें प्रणाम
सात सुरों की देवी सरस्वती हंस वाहिनी वर दे।
वीणा वादिनी कृपा कर शब्दों से झोली भर दे।
कलमकार साधक तेरे दुनिया में पाते सरनाम।
बुद्धिदाता वीणापाणि माला जपते सुबहो शाम।
मां शारदे तुम्हें प्रणाम
शब्द सुमन तेरे चरणों में आराधना सब गाते।
साधक शरण आपकी मां मंगल गान सुनाते।
छंद मुक्तक गीत गजलें मैया सुंदर सजा धाम।
दरबार में मोती बरसे माता शब्द सुधारस राम।
मां शारदे तुम्हें प्रणाम
पावन जोत जले मंदिर घट उजियारा वो पाता।
तेरी कृपा हो जाए मैया गुणवान वही हो जाता।
कंठों से झरे मधु वाणी व्योम गूंजे आठों याम।
वीणा की झंकार हृदय में मां सुरसत तेरा नाम।
मां शारदे तुम्हें प्रणाम
जय शारदे ( विधा पिरामिड )
मां
वाणी
वर दे
वीणापाणि
वरदायनी
कमल शयनी
बुद्धि धात्री शारदे
धवल वस्त्र धारिणी
सुर लय ताल की देवी
वंदन तुझे मां बारंबार
छाया माता घनघोर अंधेरा
आलोकित करो मां जीवन मेरा
घट उजियारा रोशन हृदय हो
हंस वाहिनी मैया शारदे नमन हो।
श्वेत वस्त्र धारिणी
बुद्धिविधाता वरदायिनी आया बसंत मां शारदे।
वीणा पाणी हंसवाहिनी मां अंधकार से तार दे।
कलमकार साधक तेरे शब्दों का भंडार भरो मां।
काव्य कलश में मोती भर रोशन संसार करो मां।
घट दीप आलोक मैया शब्द सुधा बरसा दो मां।
वीणा की झंकार मधुर काव्य पुष्प सजा दो मां।
कविता की कड़ियां में सौरभ छंद गीत महका दो।
बहे प्रेम की अविरल धारा पावन रसधार बहा दो।
शब्द सुमन थाल सजा दीप जलाने आया भारती।
कलमकार शरण तेरी भाव पुष्प ले करूं आरती।
श्वेत वस्त्र धारिणी अनुपम शब्दों का उपहार दो।
कला कौशल गुणों की दाता ज्ञान का भंडार दो।
महफिल महकाने वाली यश वैभव दिलाने वाली।
कीर्ती पताका जग में प्रज्ञादायनी फहराने वाली।
शील संस्कारों से झोली सात सुरों का ज्ञान दो।
कमल विराजे मात शारदे जगजननी वरदान दो।
मात शारदे वंदन तेरा
वीणापाणि जग कल्याणी मात शारदे वरदानी।
हंसवाहिनी पुस्तक धारिणी शरण तेरे मांँ दानी।
विद्या देवी बागेश्वरी मां अंबे शारदा महाश्वेता।
वाग्देवी वाचा वाणी धनेश्वरी हे माता पुनिता।
ललित कला कौशल देवी शब्द सौरभ भारती।
भाव पुष्प अर्पण तेरे वाणी पुत्र करें मां आरती।
शब्द सौम्य काव्य कलश यश कीर्ति की दाता।
मधुर मनोहर सुधारस हर्ष आनंद भर जाता।
सुर संगीत सभा सोहे पुस्तक वीणा धारिणी।
श्वेतवर्णी कमलासना अंधकार मां निवारिणी।
विमल ज्ञान बुद्धि विधाता सौंदर्य सुख दायनी।
स्वर लय ताल की देवी नमन हे मांँ सुरदायनी।
छंद गीत अलंकार सारे आभूषण तेरे है माता।
सिर स्वर्ण मुकुट धारे शब्द पुष्प तुमको भाता।
भव सिंधु रत्नाकर भर काव्य मोती बरसाओं।
पूजन थाल सजा मंदिर झोली मेरी भर जाओ।
देखो ऋतुराज बसंत चले आए
देखो ऋतुराज बसंत चले आए।
फूल खिले हैं उपवन महकाए।
बहने लगी है सुरभित पुरवाई।
उर आनंद उमंग घट घट आई।
पीली पीली सरसों है लहराई।
अधरों पर मधुर मुस्काने छाई।
हंसी वादियां भी लगी चहकने।
फल फूलों से लगे वन महकने।
मदमस्त बहारों ने ली अंगड़ाई।
गीत गूंजने लगे बजी शहनाई।
कुदरत ने नाना श्रृंगार किया है।
धरती ने हरियाली धार लिया है।
मौसम हो गया बड़ा ही सुहावना।
तान छेड़ता साज है नया तराना।
बसंती बयार है बहती मनमोहक।
धड़कनों की राग हुई है धक-धक।
मनमयूरा झूमता डमरू बजता है।
आया वसंत रूप वसंती सजता है।
आ गया ऋतुराज बसंत
आ गया ऋतुराज बसंत अब बहने लगी बहार।
महक उठे उपवन सारे पुष्प खिलने लगे हजार।
चहक उठी वादियां पंछी उड़ने लगे आकाश।
मदमाता बसंत रंगीला भावन आया मधुमास।
हो गया मौसम सुहाना मस्त पवन बहने लगी।
वासंती बयार मोहक अधर मुस्कानें रहने लगी।
पीली सरसों झूम-झूम हरियाली लहराने लगी।
मतवालों की टोली मधुर गीत तराने गाने लगी।
प्रीत उमंगे उठी हृदय में मन मयूरा झूमने लगा।
मादकता ने रंग बिखेरे पुष्प डाली चूमने लगा।
सुरभित सुरभित पुरवाई खिली कलियां सारी।
धरा ने पीली चुनर ओढ़ी महक उठी फुलवारी।
ऋतुओं का राजा बसंत वन उपवन सब हरसाए।
वीणा ने छेड़ी तान मधुर अधर तराने मधुर आए।
मनमौजी मतवाले सारे झूमे मस्ती में नाचे गाए।
गीत गजल छंद उमड़े भावों की लड़ियां सजाए।
आस्था
हरि भजन में मन लग जाए, बोले पत्थर की मूरत।
कण-कण में भगवान बसे, प्यारे मोहन की सूरत।
जब तप योग साधना से, आस्था सिंधु जब उमड़े।
दीन दुखी सुदामा खातिर, मुरलीधर खुद दौड़ पड़े।
हरिनाम की माला जपते, अधरों पर प्रभु का नाम।
ईश्वर चिंतन ध्यान धरे, सुमिरन कर लें आठो याम।
आस्था की लहरों में डूबी, मीरा श्याम दीवानी हुई।
विष प्याला पी गई हंसकर, अमर प्रेम कहानी हुई।
नरसी की भक्ति रंग पर, सेठ सांवरिया रिझ गया।
नानीबाई का भात भरने, मनमोहन खुद आ गया।
द्रोपदी चीर हरण हुआ, प्रबल आस्था थी मन में।
दुशासन भी हार गया, पर चीर हटा नहीं तन से।
साधु संत ऋषि महात्मा, धरे आस्था मन विश्वास।
सच्चे ह्रदय हरि पुकारे, घट उजियारा हो उजास।
पवित्र गंगा धारा से, सात्विक विचार उपजे मन में।
रोम रोम हरि का सुमिरन, प्रभु बसे हो तन मन में।
बुजुर्ग हमारी है धरोहर
वटवृक्ष सी छांव सलोनी मिले बड़ों का प्यार।
बुजुर्ग हमारी है धरोहर उनका करो सत्कार।
बुजुर्ग अनुभवों का खजाना ज्ञान का भंडार।
आशीषों में जीवन है करें हम वंदन बारंबार।
पथ प्रदर्शक हमारे परिवार को संभाले रखते।
सिर पर ठंडी छाया जीवन के अनुभव चखते।
माली बन महकाया है घर परिवार उपवन को।
निज श्रम से सींचा संस्कारों से भरे चमन को।
बुजुर्गों की सेवा करके दुआओं से झोली भरो।
अनमोल है खजाना ये सम्मान मिलकर करो।
बांटते प्रेम के मोती बहाते हैं स्नेह की रसधार।
हमको देखकर खुश होते बुजुर्ग हमारा संसार।
आयोजनों में उनको मुखिया बनाकर रखना।
चार चांद लगाएंगे सीखो रिश्तों को परखना।
बाधाएं थम सी जाती मुश्किलें हवा हो जाती।
जिस घर में बुजुर्ग हो खुशियां वहां पर आती।
कदम से कदम बढ़ाए जा
कदम से कदम बढ़ाए जा, गीत वतन के गाए जा।
हौसलों की भर उड़ानें, घट प्रीत रंग बरसाए जा।
मधुर यूं मुस्काए जा, खुशियों के दीप जलाए जा।
मिले राह दीन दुखी, उनको भी गले लगाए जा।
गीत गजल छंद कविताएं, कलमकार सजाए जा।
भावों की रसधार मधुर, महफिल महकाए जा।
पथ में फूल बिछाए जा, प्रेम के मोती लुटाए जा।
चैन की बंसी बजाओ, सबको अपना बनाए जा।
स्वप्न नए सजाए जा, कुछ राहें नई बनाए जा।
मुस्कानों के मोती थोड़े, हंस हंस बिखराए जा।
प्रेम सुधा बरसाए जा, हिलमिल नेह बरसाए जा।
बुलंदियों के शिखर से, नव कीर्तिमान रचाए जा।
कुछ नए तराने गाए जा, दिल का दर्द सुनाए जा।
मंजिले खड़ी राह निहारें, कदम जरा बढ़ाए जा।
सद्गुण मन अपनाए जा, मन ही मन हर्षाए जा।
खुशियों का खजाना मिले, ठौर वहीं बनाए जा।
बुरा वक्त भी कट जाएगा
दो-दो हाथ दुखों से करें फिर नया सवेरा आएगा।
वक्त वक्त की बात है बुरा वक्त भी कट जाएगा।
बाधाएं मुश्किलें घेरे अब कौन इन्हें समझाएगा।
धीरज अमोध अस्त्र है बिगाड़ भला क्या पाएगा।
हर आंधी तूफानों का रुख जो मोड़ता जाएगा।
सुख टिक सका नहीं तो दुख कहां टिक पाएगा।
बहती रहे समय की धारा बुरा वक्त बह जाएगा।
संयमी विनयशील ही जीवन सुखी कर पाएगा।
बुरे वक्त में रिश्ते नाते अपनापन टूटे अनमोल।
जाने क्या बिगाड़ा है अपनों से मिले कड़वे बोल।
बुरे वक्त में स्वाभिमान को भी परीक्षा देनी होती।
काली घटाएं धुंध में कितनी मुश्किलें सहनी होती।
नई भोर की आशाओं से तिमिर छंटता जाएगा।
बुरा वक्त भी जीवन में एक नया पाठ पढ़ाएगा।
भावों की बहती धारा में वक़्त निकालता जाएगा।
सुख का सूरज निकलेगा ये वक्त भी कट जाएगा।
मिलकर बोझ उठाना होगा
तूफां से टकराना होगा, हौसला हमको दिखलाना होगा।
प्रगति पथ पर चलना है तो, मिलकर बोझ उठाना होगा।
ज्ञान का दीप जलाना होगा, उजियारा घट लाना होगा।
रिश्तो को महकाना है तो, इक दूजे को समझाना होगा।
साज नया सजाना होगा, कोई गीत नया सुनाना होगा।
महफिल को महकाना है तो, मधुर तराना लाना होगा।
प्रेम सुधा बरसाना होगा, स्वाभिमान घट लाना होगा।
अपनापन अनमोल बड़ा, मिलकर बोझ उठाना होगा।
लक्ष्य हमें बनाना होगा, हिम्मत से बढ़ जाना होगा।
आएं लाख मुश्किलें चाहे, बाधा से भीड़ जाना होगा।
दिल का दर्द बताना होगा, मन पीर हमें हर जाना होगा।
मीठे बोल बड़े सुहाने, धीरज हमको भी बंधाना होगा।
मदद को आगे आना होगा, सबसे प्रेम निभाना होगा।
एक अकेला थक जाता है, मिलकर बोझ उठाना होगा।
मौसम बड़ा सुहाना होगा, झूम झूमकर यूं गाना होगा।
सबका साथ मिले तो यारों, हम सबको मुस्काना होगा।
ओढ़ तिरंगा सो गए
ओढ़ तिरंगा जो सो गए, अमर शहीद वो हो गए।
शीश चढ़ाया मातृभूमि को, लाल अमर हो गए।
आजादी के महासमर में, कूद पड़े सेनानी वीर।
शूर वीर पराक्रमी सारे, चल पड़े समर रणबीर।
गोला बारूद से खेले, दुश्मन से लोहा लेते थे।
वतनपरस्ती जोश भरा, समर में आगे रहते थे।
बलिदानी पथ के राही, फांसी तक चढ़ जाते थे।
तलवारों के दम पे वीर, दुश्मन से भीड़ जाते थे।
भारत माता की जयकारों से, वीरों की हुंकारों से।
बैरी दल भी थर थर थर्राता, जय हिंद के नारों से।
सरहद पर सेनानी वीर, गीत वंदे मातरम गाते थे।
देशप्रेम रग रग में भरा, प्राणों की बलि चढ़ाते थे।
प्राण न्योछावर करने वाले, भारती के लाल अमर।
याद करें उनकी कुर्बानी, बढ़ चले बलिदानी डगर।
राष्ट्र प्रेम में ऐसे झूमे नाचे, देशभक्त मतवाले वीर।
ओढ़ तिरंगा सो गए, लाल वतन के रखवाले वीर।
अमर रहे गणतंत्र हमारा
अमर रहे गणतंत्र हमारा।
लहराता रहे तिरंगा प्यारा।
आजादी का जश्न मनाए।
आओ जन गण मन गाएं।
याद करें हम उन वीरों को।
क्रांतिकल के रणधीरों को।
शीश चढ़ाया मातृभूमि को।
देश प्रेमी उन शूरवीरों को।
राष्ट्र प्रेम की अलख जगाते।
जयहिंद का जो नारा गाते।
सरहद खड़े अटल सेनानी।
वंदेमातरम राष्ट्रगीत सुनाते।
झंडा ऊंचा रहे गगन हमारा।
बहती रहे ह्रदय में राष्ट्रधारा।
वतनपरस्ती जोश है रगों में।
अमर रहे ये गणतंत्र हमारा।
राष्ट्र ध्वज
तिरंगा नभ तक लहरा रहा है।
गीत वंदे मातरम सुना रहा है।
आजादी के दीवानों की गाथा।
झलक शौर्य की दिखला रहा।
मातृभूमि पर मिटने वालों की।
बलिदानी पथ चलने वालों की।
शीश चढ़ाते जो भारत मां को।
राष्ट्रधारा की है अनोखी झांकी।
आन बान शान सदा रहा तिरंगा।
कीर्तिमान जो रचता रहा तिरंगा।
हम सबको आगे बढ़ते रहना है।
शांति का संदेश देता रहा तिरंगा।
हरा रंग खुशहाली का प्रतीक है।
केसरिया शोर्य पराक्रम जीत है।
वीरों का गुणगान गाता है तिरंगा।
लहर लहर अंबर लहराता तिरंगा।
कुदरत का वरदान है बेटियां
देश की पहचान होती बेटियां।
कुदरत का वरदान है बेटियां।
पढ़ लिख प्रतिभा दिखलाती।
मातपिता की शान है बेटियां।
घर की रौनक बहार है बेटियां।
लुटाती पावन प्यार है बेटियां।
महकाती घर संसार है बेटियां।
खुशियों का आधार है बेटियां।
सबको घर में खूब भाती बेटियां।
रिश्तो में मधुरता लाती बेटियां।
दीवारें देहरी आंगन है मुस्काता।
नाम रोशन कर जाती है बेटियां।
सपनों की उड़ान भरती बेटियां।
नये कीर्तिमान रचती है बेटियां।
ढलक जाते आंखों में भी आंसू।
जब डोली पर सजती है बेटियां।
तुम मुझे खून दो
तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।
अखंड भारत की हंसती हुई तस्वीर दूंगा।
आजाद हिंद फौज नायक सुभाषचंद्र बोस।
क्रांति कल के रणयोद्धा जयहिंद जयघोष।
हूंकारो से आजादी रण बिगुल बजाया था।
तोड़ गुलामी की जंजीरें देश को जगाया था।
वतन परस्ती का जज्बा जवानों में भर दिया।
शीश चढ़ाने वाले बलिदानी हो अमर जिया।
बलिदानी परिपाटी घट घट उद्घोष भरा था।
अंग्रेजों भारत छोड़ो हमारी भूमि मातृ धरा।
क्रांतिवीर रणवीर सपूत वो क्रांति के दूत बने।
शौर्य साहस भर सबमें आजादी की रुत बने।
ईंट का जवाब अब हमको पत्थर से देना है।
अंग्रेजों से देश हमारा फिर से वापस लेना है।
याद करो दीवानों को
याद करो दीवानों को लौट के घर ना आए।
जंजीरों की चिंता में कितनों ने प्राण गंवाए।
तोड़ गुलामी की जंजीरें आजादी हम पाए।
आन बान शान तिरंगा लहर लहर लहराए।
देशभक्ति में वो झूमे फांसी का फंदा चूम गए।
प्राण न्योछावर धरा पे हंसते-हंसते झूल गए।
कूद पड़े महासमर में योद्धा वंदे मातरम गाए।
जंजीरों की चिंता में कितनों ने प्राण गंवाए।
क्रांतिकाल आजादी की लड़ी लड़ाई वीरों ने।
देशभक्ति मतवाले दौड़े बलिदानी रणधीरों ने।
वतनपरस्ती की अलख जो रग रग में जगाए।
जंजीरों की चिंता में कितनों ने प्राण गंवाए।
भारत मां की जयकारों से गगन गूंजता सारा।
सजग खड़ा सिपाही गाता जय हिंद का नारा।
सरहद के रखवालों ने जब पराक्रम दिखलाए।
जंजीरों की चिंता में कितनों ने प्राण गंवाए।
करते हैं, हम सलाम वर्दी वालों को
करते हैं, हम सलाम, वर्दी वालों को।
देश के रखवाले, उन मतवालों को।
सीमा पर सीना तान, हरदम रहते।
सर्दी गर्मी गोला बारूद, सहते है।
महासमर में शूरवीर, डट लड़ते हैं।
पराक्रमी दुश्मन पे, भारी पड़ते हैं।
देशभक्ति का जज्बा, दिलवालों को।
करते हैं, हम सलाम, वर्दी वालों को।
हौसला भर भिड़ जाते, तूफानों से।
बुलंद इरादे होते हैं, उन दीवानों के।
मातृभूमि पे मर मिटने, का जोश है।
राष्ट्र प्रेम सीने में, जयहिंद घोष है।
सरहद के सेनानी वीर, रखवालों को।
करते हैं, हम सलाम, वर्दी वालों को।
वंदे मातरम गीत, जूबान से गाते हैं।
रणयोद्धा रणवीर, समर में जाते हैं।
भरते हम हूंकार, राष्ट्र की धारा में।
आन बान है शान, तिरंगा प्यारा रे।
भारती के लाल वीरो, बलिदानों को।
करते हैं, हम सलाम, वर्दी वालों को।
दर्द की हसीं दास्तां
ना यूं समझो अक्सर रूठ जाता हूं मैं।
शब्द बाण सुन तीखे टूट जाता हूं मैं।
मिलते धोखे पर धोखे अपनों से हमें।
जमीन पांव से सरके फूट जाता हूं मैं।
जमाने में सीखा नित चलना अकेला।
यह दुनिया है यारों मतलब का मेला।
हौसलों से ही उड़ता हूं उड़ाने जहां में।
सच कह दूं तो खड़ा हो जाता झमेला।
इन आंखों में चमक से आशाएं भरी है।
ये जिंदगी अजब मुश्किलों से घिरी है।
अपनापन को यूं ही तरसता रहा हूं मै।
वो यादें पुरानी घायल दिलों में भरी है।
दर्द की हसीं जब दास्तां सुनाता हूं मैं।
गीतों गजलों में रसधार बहाता हूं मैं।
कविता से शब्दों का सार समझ लेना।
हाल कैसा मेरा कलम को बताता हूं मैं।
वक्त आने दो अपना
वक्त आने दो अपना हम करामात दिखलाएंगे।
मंजिले कदमों में होगी हम शौहरत को पाएंगे।
वक्त आने पर रिश्तो में मिलता आदर सत्कार।
अपनापन अनमोल बरसे बढ़ता रिश्तों में प्यार।
वक्त अपना हो तो खिले चेहरों पर रौनक आती।
खुशियों से दामन भरता सारी दुनिया मुस्काती।
विघ्न बाधाएं टल जाए उन्नति मार्ग खुल जाए।
जहां-जहां नजर घुमाएं आलोक जीवन में पाए।
वक्त अपना हो सब अपने बेगाने प्रीत निभाते।
मानो सारा जहां अपना हंस हंसकर बतलाते।
वक्त वक्त की बात प्यारे समय-समय का फेर।
वक्त अपना हो तो ईश्वर करता कभी नहीं देर।
अपने-अपने वक्त में सबने कुछ दिखलाया है।
कोई ऊंचे ओहदे पर कोई राजा कहलाया है।
हम बादशाह किस्मत के भाग्य की लकीरों के।
वक्त आने दो अपना बदल दे हाल फकीरों के।
महाकुंभ
चली आत्मा कुंभ नहाने जन्म जन्म के पाप मिटाने।
जहां पड़ी अमृत की बूंदे गंगाजल से भाग्य जगाने।
वर्षों बाद यह योग आए जन्म मरण से मुक्ति पाएं।
देव दानव ऋषि मुनि सब कुंभ स्नान लाभ कमाएं।
शास्त्र सम्मत संगम यह धर्म पंथ का समागम हो।
सनातन धर्म पर्व भारी सिद्धि योग शाही स्नान हो।
हर कोई डुबकी लगाना चाहे महाकुंभ पुण्य कमाए।
महासंगम महा सुखदाई पावन गंगा स्नान हो जाए।
बारह वर्ष में महाकुंभ का सौभाग्य सुअवसर आता।
हरिद्वार नासिक उज्जैन प्रयागराज महाकुंभ पाता।
तृप्त आत्माएं सब होती बैकुंठ का मिलता है वास।
लाखों लोग मेले में आती आस्था का जादू खास।
देव दानव युद्ध छिड़ता सागर मंथन अमृत आया।
गिरा सुधारस धरा पर भौम नाम महाकुंभ पाया।
नक्षत्र ज्योतिष गणना शास्त्र सम्मत कुंभ आता।
साधु संत सनातन धर्मी परंपरा से उत्सव मनाता।
चौथ का चांद
चांद कितना भाग्यशाली,
क्या जादू है तुझ में भरा।
तेरे दर्शन को नारियां सारी,
छत पर जाए जहां कंगूरा।
कुछ तो करामात तुझमें,
क्या वशीकरण पाया है।
चेहरा खिल सा जाता है,
जहां पड़ती है चंद्र छाया।
सुहागने सौभाग्य सुख मांगे,
पूजन करें लिए अक्षत थाल।
मधु मिष्ठानों का भोग लगावे,
रोली मोली लेकर पुष्प माल।
चौथ का चांद है बड़ा सयाना,
देर ना करना तू जल्दी आना।
कितना करती हर नारी शृंगार,
चंद्र किरणों से चेहरे पे निखार।
रंग बिरंगी पतंगे
इठलाती बलखाती जाए रंग बिरंगी नभ में छाए।
आसमां में मुस्कुराती पतंगे घर में खुशियां लाए।
चरखी मांझा डोर पकड़े छत पर पतंग उड़ाते हैं।
बंट रही घेवर जलेबी पतंग का त्योहार मनाते हैं।
आसमान में सैर करती ऊंची ऊंची उड़ानें भरती।
बच्चों जवानों सबको उमंग से उल्लासित करती।
सतरंगी मनभावन पतंगे ये अंबर में उड़ती जाए।
सद्भावों का संदेशा देती जन मन जोश जगाए।
हौसलों की उड़ानें भरती उड़ती है गगन के पार।
डोर को संभाले रखना जमीन से जोड़े रखो तार।
पतंगबाजी का आनंद भी अलग मनभावन है।
चलो पतंग उड़ाएं हम मन में उमड़ता सावन है।
ठंडी ठंडी मस्त हवाएं फुर फुर कर उड़ती जाए।
कोई काटे कोई पेच लड़ाएं पतंगे खेल दिखाएं।
मकर संक्रांति त्योहार
सनातन संस्कृति प्रमुख पर्व मकर संक्रांति त्योहार।
दान पुण्य स्नान ध्यान कर पर्व मनाता सारा संसार।
सूर्य देव उत्तरायण को सौभाग्य सुख वैभव वरदाई।
भगवान विष्णु की पूजा होती संकट हरते सुखदाई।
पंजाब पोंगल दक्षिण बिहू उत्तर में खिचड़ी मनाते।
उमंग उल्लास हर्षित होकर छत पर पतंग उड़ाते।
पवित्र नदियों में स्नान कर पुण्य कमाते जन-जन।
दान दक्षिणा दिवस पावन पुलकित होता तन मन।
सुहागिनें सौभाग्य प्रतीक बांटती हर्षित हो घर-घर।
नव ऊर्जा का संचार हो मधुर बहारें बहती दर-दर।
पूजा पाठ जप हवन कर पुण्य कमाते भाग्यशाली।
खुशियों की बरसात होती घर घर आए खुशहाली।
विविध भांति रस्मों रिवाज घरों में निभाई जाती है।
रिश्तो में प्रेम उमड़ता सबको घेवर खिलाई जाती है।
तिल के लड्डू खीर जलेबी मधुरता का होता संचार।
पतंगबाजी का मजा लूटते हर्षित हो घर में नर नार।
भगत के वश में है भगवान
सजा लो पूजन का थाल करेंगे तुमको मालामाल।
ईश्वर हम सबका रखवाला रक्षा करें बनकर ढाल।
दीप आस्था का जला लगा हरि चरणों में ध्यान।
भाव के पुष्प अर्पित कर जप हरिनाम सुरज्ञान।
भगत के वश में है भगवान
ईश घट घट का वासी अगम अगोचर अविनाशी।
प्रभु बस भाव का भूखा अंतर्यामी है सुख राशि।
हो परमेश्वर गुणगान बसे कण-कण में भगवान।
हम सबके तारणहार सब में प्रभु को नर पहचान।
भगत के वश में है भगवान
बरसे खुशियों आंगन में होती वैभव की बरसात।
किस्मत बदल जाएगी कर ले परम प्रभु की बात।
सांसों में है सिमरन सांवरा तेरा नाम जपूं ले तान।
मन का इकतारा बोले सुध बुध लो मेरे भगवान।
भगत के वश में है भगवान
वक्त आने दो अपना
वक्त आने दो अपना हम करामात दिखलाएंगे।
मंजिले कदमों में होगी हम शौहरत को पाएंगे।
वक्त आने पर रिश्तो में मिलता आदर सत्कार।
अपनापन अनमोल बरसे बढ़ता रिश्तों में प्यार।
वक्त अपना हो तो खिले चेहरों पर रौनक आती।
खुशियों से दामन भरता सारी दुनिया मुस्काती।
विघ्न बाधाएं टल जाए उन्नति मार्ग खुल जाए।
जहां-जहां नजर घुमाएं आलोक जीवन में पाए।
वक्त अपना हो सब अपने बेगाने प्रीत निभाते।
मानो सारा जहां अपना हंस हंसकर बतलाते।
वक्त वक्त की बात प्यारे समय-समय का फेर।
वक्त अपना हो तो ईश्वर करता कभी नहीं देर।
अपने-अपने वक्त में सबने कुछ दिखलाया है।
कोई ऊंचे ओहदे पर कोई राजा कहलाया है।
हम बादशाह किस्मत के भाग्य की लकीरों के।
वक्त आने दो अपना बदल दे हाल फकीरों के।
मेरे दिल की बस्ती में
फुर्सत हो तो आ जाना तुम मेरे दिल की बस्ती में।
मैं राही हूं बहारों का तुम बैठ जाना मेरी कश्ती में।
मेरे दिल की बस्ती में
मधुर तराने गीत सुहाने जो कर देंगे मदहोश तुझे।
छंदों की बौछारें बरसे दिला देंगे नया जोश तुझे।
कलम का जादू छा जाए तेरी खूबसूरत हस्ती पे।
दखल ना पड़ जाए कहीं ऊंची शान परस्ती में।
मेरे दिल की बस्ती में
मस्त-मस्त बहारें बहती है भावों की बहती धारा।
काव्य की फुहारें भावन बजे गीतो का इकतारा।
भावों की लहरें उठती है मन में हंसती हंसती रे।
आओ हाल सुनाएं तुमको मनमयूरा की मस्ती रे।
मेरे दिल की बस्ती में
खूब महकते पुष्प खिलेंगे प्रीत की रसधार मिले।
खिले-खिले पुष्प यहां पर सुंदर सा संसार मिले।
ख्वाब सजीले मनभावन तमन्नाएं मिले सस्ती में।
राजमहल सा दिल हमारा आकर देखो बस्ती में।
मेरे दिल की बस्ती में
नया कब तक नया
नया कब तक नया रहेगा वर्तमान में आएगा।
भविष्य की आहट देता भूतकाल हो जाएगा।
नए का स्वागत होता खुशियां बांटी जाती है।
नई नई आशाएं लेकर यूं रातें काटी जाती है।
नव भोर के नए तराने उमगों का संचार नया।
नव सितारों के संग होता मंचों का श्रृंगार नया।
नया कब तक नया रहता शनै शनै घुल जाता।
वक़्त के सांचे में ढलकर धीरे-धीरे धुल जाता।
नई चेतना नई रोशनी नित नए-नए अफसाने।
नई उमंगो से हमको भी अब नए साल मनाने।
खट्टी मीठी यादें हमको देकर चला पुराना साल।
नई सोच रखकर हमको अब होना मालामाल।
गीत गजल कविता से आज मिलायें हम ताल।
नववर्ष का स्वागत कर लें खुश होकर हर हाल।
अनुभवों से झोली भरकर हम बांटे प्रेम सलोना।
मुस्कानों के मोती लेकर खुशहाल हमको होना।
बीते कल की बिसरी बातें
बीते कल की बिसरी बातें बीत गया यह साल।
खट्टी मीठी यादें देकर ये कर गया हमें निहाल।
शनै शनै यूं गुजर गए कई दिन पखवाड़े माह।
नव वर्ष का आगमन हृदय नूतन हो हर चाह।
भूल जाए उन पलों को जो नैनों का नीर हुए।
यादों में समेट लेना जिनसे हम यूं अधीर हुए।
कुछ पाया कुछ खोया है बीते हुए हर हाल में।
कुछ हमको करके दिखलाना है नए साल में।
अनुभवों का भरा पिटारा है प्रेरणा का भंडार।
जीने की राहें दिखलाता आशाओं का संसार।
जो रूठे है उन्हें मना लो थोड़ा सा मुस्कुरा लो।
नए सपने नए हौसले नर मन में जरा बना लो।
बीते कल से सीखो थोड़ा ठानों कुछ करने की।
तैयारी ऐसी करो खुशियों से झोली भरने की।
नई सोच नई उमंग से भर लो फिर तनमन को।
विदा करें इस साल को नववर्ष का आगमन हो।
अंधेरे का अंत भोर निकलने पर होता है।
घनघोर अंधेरी रातों में सन्नाटा छाया होता है।
सुनसान इन राहों में अंधकार छाया होता है।
चहुंओर उजियारा दीपक जलने पर होता है।
अंधेरे का अंत भी भोर निकलने पर होता है।
मन का अंधियारा भी मिटना बहुत जरूरी है।
अभिमानी पारा घट से घटना बहुत जरूरी है
अंतर्मन आलोकित ज्ञान मिलने पर होता है।
अंधेरे का अंत भी भोर निकलने पर होता है।
दिल में प्रेमदीप जले खुशियों की वर्षा होती।
सुख शांति आनंद बरसे एकता खुशी होती।
चमन हरा भरा भी पुष्प खिलने पर होता है।
अंधेरे का अंत भी भोर निकलने पर होता है।
सत्य सादगी सदाचार विनय जहां मिलते हैं।
यश वैभव संपन्नता के फूल वहां खिलते हैं।
विकास संस्कारों को बल मिलने पर होता है।
अंधेरे का अंत भी भोर निकलने पर होता है।
डर का भूत भगाना होगा
डर का भूत भगाना होगा किस्मत को चमकाना होगा।
मेहनत रंग दिखाती अपना खून पसीना बहाना होगा।
भाग्य भरोसे नहीं बैठना सपना सच कर जाना होगा।
कड़ी परीक्षा संघर्षों में हमें विजय हमेशा पाना होगा।
डर का भूत बिठाये रहते वो आफत गले लगाए रहते।
जो डरपोक बने है दुनिया में ठोकर खूब खाए रहते।
खूब डराता उसे जमाना जिसने सीखा बस डर जाना।
जाने कैसा खौफ उनका भीगी बिल्ली सा बन जाना।
डर का भूत भगाओ सब मेहनत को अपनाओ लोगों।
हिम्मत हौसलों के दम पर बुलंदियों को पाओ लोगों।
साहस सीने में भर लो सफलता की ओर बढ़ चलो।
बाधाओ को पार कर लो विजय की ओर बढ़ चलो।
डर डरकर जीने वालों को दुनिया कायर कहती है।
शब्दों का रस पीने वालों को दुनिया शायर कहती है।
स्वाभिमानी मनुज संसार में निर्भय होकर जीते हैं।
यश कीर्ति वैभव को पाते वो प्रेम सुधारस पीते हैं।
एक झलक मिल जाए
एक झलक मिल जाए तेरी, मन वृंदावन हो जाए।
हर पल देखूं नाम जपूं, हृदय यह पावन हो जाए।
मोर मुकुट धारी माधव, मुरलिया मोहन रंग लाई।
थिरक-थिरक नाचे सब, गोकुल में खुशियां छाई।
मनमंदिर में मूरत तेरी, सांसों में बसे सिमरन तेरा।
कृष्ण कन्हैया मुरली वाले, आओ हरो संकट मेरा।
तरस रहे नयना मेरे, देखूं कान्हा एक झलक तेरी।
पलक बिछाए बैठे हम, आस करो सब पूरी मेरी।
हे केशव कान्हा गिरधारी, नटवर नागर बनवारी।
जग के करतार सुनो प्रभु, थोड़ी अरदास हमारी।
घट-घट के वासी हे मोहन, दर्शन देने आ जाओ।
पूजन थाल सजा मंदिर, मन मंदिर में बस जाओ।
मुस्कान धरे हो होठों पे, गले में वैजयंती माला है।
चक्र सुदर्शनधारी माधव, हम सबका रखवाला है।
मुरली की तान गिरधारी, मोह लेती है मन हमारा।
हम तेरे दर्शन के प्यासे, तेरा ही हमको है सहारा।
उजला मन
उजले मन में श्रद्धा होगी, भाव भक्ति संचार सखे।
धर्म आस्था प्रेम मोती, विश्वास का विस्तार सखे।
ना शंका न संशय होगा, विनयशीलता धार सखे।
उजले मन में राम बसे, सारे जग के करतार सखे।
सुख शांति समृद्धि का, वैभवता बढ़ती भंडार सखे।
खुशहाली घर आती, अपनापन बढ़ता प्यार सखे।
धन्य हो जाता जीवन, घट उजियारा साकार सखे।
दिव्य ज्ञान ज्योत जगे, मिटे सकल विकार सखे।
अधरों से अनमोल मोती, झरती है रसधार सखे।
मिश्री सी वाणी मीठी, कहती बातों का सार सखे।
उजले मन से उजाला हो, घर परिवार संसार सखे।
हर्ष खुशी आनंद बरसता, हृदय में हर बार सखे।
उजले उजले भाव उमड़े, सुधारस की धार सखे।
भाग्य सितारे सारे दमके, किस्मत रेखा पार सखे।
सत्य समर्पण त्याग की, तब पड़ती दरकार सखे।
उजले मन झलकती, शुभ कर्मों की बौछार सखे।
तुम धड़कन हो दिल की
तुम धड़कन हो दिल की, तुम ही प्रेम तराना हो।
तुम हो स्वप्न सुंदरी, जीवन का हंसी फसाना हो।
गीतो का गजरा प्यारा, मौसम कोई सुहाना हो।
राजमहल की रानी हो, मनमीत कोई पूराना हो।
तुम ही प्रेम तराना हो
सपनों में बसने वाली हो, आशाओं की ज्योति हो।
अधरों की मुस्कान मोहिनी, तुम नैनो का मोती हो।
चंद्रमा की धवल चांदनी, प्रीत भरा अफसाना हो।
कविता की रसधार मधुर सी, गीत कोई पुराना हो।
तुम ही प्रेम तराना हो
हमसफर हो हमारी, मुश्किल राहों का सहारा हो।
प्यार का बहता झरना हो, भावों का किनारा हो।
दिल से दिल का रिश्ता हो, दिलकश याराना हो।
खुशियों का जलता दीप, लबों का मुस्कुराना हो।
तुम ही प्रेम तराना हो
जब भी कोई गीत लिखूंगा
जब भी कोई गीत लिखूंगा।
भाव भरी मनप्रीत लिखूंगा।
शब्द शब्द अधरों पे गूंजते।
रोशन हो हृदय रीत लिखूंगा।
कलमकार की शक्ति लेखनी।
निर्बल की हिम्मत सहारा भी।
सुखनवर की गजल मधुर सी।
कवि का गीत कोई प्यारा भी।
काव्य कलश से रसधारो की।
प्रीत उमड़ता गीत लिखूंगा।
रचनाकार रचता कोई रचना।
लेखक का सुंदर सा लेख भी।
सृजनकार सृजित करता है।
वृतचित्र मधुरम आलेख भी।
सांसों का स्वर मीत लिखूंगा।
जब भी कोई गीत लिखूंगा।
अनुपम रचना सृष्टिकार की।
कृति है भावन कृतिकार की।
मन के तारों को जब छू जाती।
कविताएं वीणा के झंकार सी।
छंदों की भाषा में भाव रखूंगा।
मैं जब भी कोई गीत लिखूंगा।
झुकने से कभी छोटा नहीं होता
विनयशीलता आभूषण नर ज्ञान का टोटा नहीं होता।
बड़ों के आगे झुकने से मनुज कभी छोटा नहीं होता।
मधुर वाणी बोल मीठे विनम्रता जो धारण करते हैं।
सफलता के स्वर्णिम शिखर पर वही चरण धरते हैं।
बड़ी-बड़ी आंधी तूफान में अक्सर वो झुक जाते हैं।
खड़े रहते जो अटल राह में वह विनाश को पाते हैं।
माता-पिता गुरु सन्मुख झुकना बढ़ जाता मान सदा।
जिनके सिर पर वरदहस्त हो मिलते हैं सम्मान सदा।
झुक झुक नतमस्तक हो धरकर हरि चरणों में ध्यान।
आस्था विश्वास जागते जब ईश्वर का करते गुणगान।
अमन चैन शांति घर घर इसको महामूल मंत्र मानो।
सुख की धाराए बहती नर गुण जरा इसके पहचानो।
झगड़ा कलह मिट जाते झुकने से घाटा नहीं होता।
आदर भाव रख झुकने से कभी छोटा नहीं होता।
झुकते नहीं जो अड़ जाते हैं छोटी-छोटी बातों पर।
टूट जाती डोर रिश्तो की बढंती मुक्का लातों पर।
हमने समझदार सहनशील हो झुकना सीख लिया।
मान सम्मान जहां दो पल वहां रुकना सीख लिया।
ना कुछ तेरा ना कुछ मेरा
ना कुछ तेरा ना कुछ मेरा ये दुनिया एक फसाना है।
सबकुछ छोड़कर प्यारे खाली हाथ सबको जाना है।
चंद सांसों की डोर जिंदगी पल का भी नहीं भरोसा।
रिश्ते नाते भी जब तक हमारे क्या मामा क्या मौसा।
धन दौलत ये ज़मीं दुकानें भरे पूरे सारे लख भंडार।
साथ नहीं जाता कुछ भी बंदे जीवन का है मूल सार।
ना कुछ तेरा ना कुछ मेरा जीवन का बड़ा झमेला है।
इस दुनिया से एक दिन साथी जाना हंस अकेला है।
भाई बंधु कुटुम्ब कबीला मतलब की सब यारी है।
जब तक सांसे चलती है बंदे तब तक रिश्तेदारी है।
भव सागर में कर्म यहां हम सबको करके जाना है।
शुभ कर्मों की सौरभ से इस जीवन को महकाना है।
यह दुनिया है बहुत बड़ी किसका कहां ठिकाना है।
ढाई आखर प्रेम जगत में एक सच्चा अफसाना है।
यह संसार सराय समझो छोड़ आगे भी जाना है।
हिल मिल सबसे प्रीत निभा गाना नया तराना है।
मत कर अभिमान रे बंदे बस किरदार निभाना है।
कब पर्दा गिर जाए बंदे फिर नया नाटक आना है।
सर्द हवाओं का आलिंगन
सर्द हवाओं का आलिंगन हो कोहरे के साथ।
ओस की ठंडी बूंदें गिरती जब हो नव प्रभात।
ठंडी ठंडी मस्त हवाएं सन सन करती आती।
कहीं धुंध पाला पड़ता कहीं बर्फ पड़ जाती।
जब चलती बर्फीली हवाएं हो ठंड का प्रकोप।
सूनसान सी राहें होती फैलता शीत का कोप।
शीत लहर ठंडा कर जाती सर्दी हमें सताती।
गरम रजाई कोट कंबल हम सबको है भाती।
गर्मा गरम चाय मिल जाए इन सर्द हवाओं में।
बर्फ जमी रहती है घाटियों हंसी फिजाओं में।
कंपकंपी तन बदन में सिहरन सी दौड़ जाती।
तीर सी सर्द हवाएं तन को जब छूकर जाती।
ठंडे मौसम में सब रखना अपना जरा ख्याल।
नए तराने नई उमंगें फिर लाया है नया साल।
आंचल में छुपा के रखती
ममता की मूरत मां दिल रखती दरिया सा।
वात्सल्य उमड़ता प्रेम बरसता झरना सा।
आंचल में छुपा के रखती नैनो का तारा भी।
लाड़ दुलार नेह मां रखती ख्याल हमारा भी।
दिल धड़कता मां का औलाद के खातिर ही।
हर शौक पूरे करती हमारी चिंता फिकर भी।
रह लेती भूखी प्यासी हाथों से वो खिलाती।
रूठ जाते हम कभी मां आकर हमें मनाती।
हर दुख दर्द की पूछे मां पीड़ा को पहचानती।
लाख छुपाए मां से हम आंखों से वो जानती।
अंतर्यामी सी है मैया दिल में क्या वो जानती।
एक छोटी सी चोट पर मां भागी दौड़ी आती।
मां का दिल नाजुक सा संतान सुख वो चाहे।
पढ़ लेती हमारा चेहरा मां की गहरी निगाहें।
मां के दिल में मोती मिले नेह भरे संस्कार के।
मिले हमें छत्रछाया मां खुशियों के संसार से।
राम राम जब गाएंगे
सच्चे मन से अधरों से राम राम जब गाएंगे।
राम कृपा से भक्त तेरे महल खड़े हो जाएंगे।
जब अपनों के होंठ तुझे देख देख मुस्कुराएंगे।
राम नाम की माला पूजन सब मिलकर गाएंगे।
निर्धन की कुटिया में भी हम दर्शन कर पाएंगे।
शुभ कर्म करके देखो भाग्य तेरे खुल जाएंगे।
मुस्कानों के मोती जब दुनिया में बिखराएंगे।
सबके हृदय राम बिराजे काम तेरे भी आएंगे।
राम रसायन बांटो सबको रोग दोष मिट जाएंगे।
रग-रग में राम बसा लो जीवन सफल बनाएंगे।
सांस सांस में राम सिमरन कर लो राम की पूजा।
अंतर्यामी है राम हमारे स्वामी राम सिवा ना दूजा।
दीन हीन साधु संतों की जो सेवा करते जाएंगे।
मनोरथ सारे सिद्ध हो गुणगान राम का जाएंगे।
सुख समृद्धि भंडार वैभव यश दिनों दिन पाएंगे।
खुशियां बरसेगी आंगन में दिन तेरे फिर जाएंगे।
तराने बहुत है
गीतों की बहारें मधुर तराने बहुत है।
बोल भावन से लोग मस्ताने बहुत हैं।
सुर लय ताल अफसाने ये जिंदगी के।
बहती रसधार सावन सुहाने बहुत है।
खुशियां बहारें बादल आने बहुत है।
बहती बयारे अधर मुस्कानें बहुत है।
दिल का तराना धड़कने गीत गाती।
भावों की लहरें यहां दीवाने बहुत है।
मौसम सुहाना पुष्प खिलाने बहुत है।
महफिल में हमें गीत सुनाने बहुत है।
महक जाएगा समां सारा गुलशन सा।
मेहमान अभी हमको बुलाने बहुत है।
वादे ये कसमें हमको निभाने बहुत है।
मंच पे हमको भी शेर सुनाने बहुत है।
कविता का जादू इस कदर है जमाना।
शायरों की गजलें गीत तराने बहुत है।
दिल एक मंदिर है
दिल एक मंदिर जहां, भावों की धारा बहती है।
धड़कनें गीत सुनाती है, प्रभु की मूरत रहती है।
हृदय में होता उजियारा, ज्ञान दीप जलता हो।
प्रेम के मोती दमकते, पूजन थाल सजता हो।
शब्दों के सुमन हार बुन लो, मनमंदिर में प्यारे।
सुख की धाराएं अगणित, दमके भाग्य सितारे।
सद्भावों के पुष्प खिला, महकाओ आंगन को।
दिल का कोना-कोना हर्षित, मधुरम पावन हो।
श्रद्धा भक्ति भाव आस्था, मन का हो विश्वास।
घट के भीतर बैठी आत्मा, ईश्वर अंश है खास ।
कहां ढूंढता फिरता प्यारे, दिल एक मंदिर प्यारा।
दिल की सुनो आवाज तुम, दिल हमदम तुम्हारा।
दिल में बजते साज सुरीले, मधुर मधुर झंकार।
दिल के तारों से बहती रहती, भावों की रसधार।
दिल तक दस्तक दे पाए, दिल में वही उतरते।
जो दिल की सुनते हैं, दुनिया में वही निखरते।
सत्य का दीप जलता रहता
सत्य का दीप जलता रहता पारखी कसौटी पे।
उजियारा घट घट होता ईमानदारी की रोटी से।
शिक्षा संस्कार श्रृंगार है सच्चाई अलंकार है।
सत्य की जीत संभव है सच का बेड़ा पार है।
सच की राह चलने वाले विजय वरण करते हैं।
लाख कठिनाई आए प्रगति पथ चरण धरते हैं।
सत्य शील अनुशासन ही सफलता की राहें हैं।
सच का पथ कठिन है मुश्किलों की निगाहें हैं।
घट घट आलोक जगा सत्य का दीप जलाओ।
रोशन हो जाए जीवन ये सुख की गंगा बहाओ।
तमस हरता रहता सत्य का दीप जलता रहता।
प्रेम भाव पलता रहता सच अटल चलता रहता।
सत्य सादगी सदाचार ही पुरुषार्थ को दमकाते।
सच के मोती अनमोल है हर पथ को चमकाते।
सत्य स्वर्ण समान है तप तपकर खूब निखरता।
सच का उजाला जग में पावन होकर बिखरता।
वो भी दौर था मस्ताना
अस्सी नब्बे का दशक था
नन्हा बालक में बेशक था
पीपल तले पाठशाला थी
धोती वाला भी शिक्षक था
घर में लालटेन चिमनी थी
बुनियादी मजबूत बनी थी
दादाजी भी दबंग रहते थे
थोड़े में वे ज्यादा कहते थे
साइकिल सवारी थी प्यारी
मिट जाती थकान हमारी
घर-घर में प्रेम पलता था
एक ही चूल्हा जलता था
दही बिलौटी दादी नानी
चंपक चंदा बाल कहानी
उस दौर की यादें आती
हमको लगती थी सुहानी
नित रामायण पाठ होते
घर-घर में सब ठाठ होते
ऊंट गाड़ी बैलगाड़ी थी
चारपाई घर में खाट होते
सावन के झूले थे भावन
फागुन हरसाता था मन
दिवाली उमंग भर जाती
होठों पर खुशियां आती
मदमाता बसंत जब आता
बहारों से फागुन हरसाता
वो भी दौर था मस्ताना
इठलाता और बल खाता
भर दे नाथ झोली मेरी
तेरे नाम लिखूं जीवन ये लिख दूं सारी सांसे।
ढूंढ रहा हूं तुझको भोले शुरू करूं कहां से।
तेरा ध्यान धरूं निशदिन जपता तेरी माला।
डमरू वाले औघड़दानी नीलकंठ मतवाला।
तेरे भजन मन को भाते मंदिर जाता महादेव।
महाकाल शिव जग पालक सब देवों के देव।
तेरी पूजा भक्ति में शिव भव भय जाते भाग।
किस्मत खुल जाती है भाग्य तारे जाते जग।
हर हर भोले किरपा तेरी पाकर होऊं निहाल।
भर दे नाथ झोली मेरी शिव करदे मालामाल।
तुझसे जुड़ा नाता मेरा मैं तेरे चरणों की धूल।
सृष्टि का करतार शंकर मत जाना बाबा भूल।
एक लोटा जल तुझको अर्पण श्रद्धा है विश्वास ।
सारी दुनिया रूठ जाए शिवशंकर तुझसे आस।
तेरे भरोसे मनमौजी मतवाला होकर फिरता।
शिवशंकर का नाम जपूं तेरे चरणों में गिरता।
जहां शिवालय शिवशंकर मन वहां रम जाता।
तेरा नाम लेकर चलूं कारवां वहां बन जाता।
मनमंदिर
मन मंदिर में दीप जलाओ पूजन थाल सजा लो।
मीठी मीठी वाणी जुबां से सबको अपना बनालो।
सत्य सादगी शिष्टाचार के भाव सुमन खिला दो।
मन का कोना कोना महके सौरभ को फैला दो।
मन मंदिर में उजियारा हो प्रेम का मधुर तराना।
श्रद्धा और विश्वास का हो जीवन में अफसाना।
जोश जज्बा भर लो घट घट में उमंगे हो हृदय में।
मन मंदिर में पुष्प सजा लो हर्ष खुशी आनंद के।
विषय विकार मिट जाए सारे मन मंदिर हो जाए।
पावन गंगा धारा बहती मन भावों में बहती जाए।
मन का मेल मिटे सारा मानव मन मंदिर हो जाता।
ह्रदय हिलोरें ले सुख की धारा जीवन में नर पाता।
मनमंदिर में बसे भगवन मानव जरा पहचान लो।
ईश्वर का साकार रूप हर जीव जीव में जान लो।
मन काशी मथुरा वृंदावन सारे तीर्थो का धाम है।
मनमंदिर में झांककर देखो बैठे राम घनश्याम है।
भारती के लाडले अटल जी
मशहूर राजनेता थे भारत के सजता था दरबार सदा।
भारती के लाडले अटल जी धरा से करते प्यार सदा।
कारगिल युद्ध में जीत दिलाई राजनीति भी चमकाई।
कुशल वक्ता लेखक कवि हो कविता की धूम मचाई।
राजनीति का ध्रुव तारा पूर्व प्रधानमंत्री थे राष्ट्र सितारा।
अटल बिहारी वाजपेई हस्ती अटल इरादा नाम प्यारा।
भारत रत्न पद्म विभूषण बेस्ट सांसद सम्मान मिला।
शुभ कर्मों से सम्मानों का चलता निरंतर सिलसिला।
पोकरण परमाणु परीक्षण सफल कार्यकाल रहा।
शिक्षक कृष्ण बिहारी घर अटल प्रिय लाल रहा।
जीवन सारा राष्ट्र समर्पित तन मन धन वार दिया।
सच्चे सपूत भारत मां के सपनों को साकार किया।
दिया संदेश जनता को कदम मिलाकर चलना होगा।
संघर्षों की परिभाषा में आंधियों में भी पलना होगा।
आओ फिर से दीप जलाए हम अटल जी की याद में।
गीत नहीं गाता हूं श्रद्धा सुमन समर्पित है फरियाद में।
हमने जब अपना हक मांगा
हमने जब भी अपना हक मांगा तो हैरानी हो गई।
बोल पड़े तो परिवार में तगड़ी खींचातानी हो गई।
मुंह फेर लिया अपनों ने रिश्तेदार भी रूठ गए।
बड़े जतन से बांध रखा वो प्रेम के मोती टूट गए।
घर में दीवारें खिंच गई मकान बिकाऊ हो गया।
समझदार थे उनका अब पुत्र कमाऊ हो गया।
कैसे बांध सके वो डोरी जलन पड़ी थी पांवों में।
तुच्छ स्वार्थ से शूल बिछाए सूनी सी इन राहों में।
संभल संभलके चलते फिर भी धोखा मिलता है।
पांव से जमी खिसकती कभी फैसला हिलता है।
जिसका पलड़ा भारी होता लोग उधर हो जाते हैं।
सलाह मशवरे आकर हमको रोज देकर जाते हैं।
रिश्तेदारों को भी जाने क्यों ये परेशानी हो गई।
हमने जब अपना हक मांगा तो हैरानी हो गई।
अपनी मेहनत हक का खाना बेईमानी हो गई।
न्याय की खातिर टूट पड़े तो खींचातानी हो गई।
याद बहुत आती है हमको
वो हंसना मुस्काना, वो भी कितना इठलाती है।
जी करता है बातें करूं, मेरे दिल को भाती है।
दिल से दिल के तार जुड़े, गीत मधुर सुनाते है।
याद बहुत आती है हमको, वो अधूरी सी बातें।
वो आंखों की बेचैनी, वो दिल से दिल का करार।
अधरों से बरसती है, जब प्रीत की मधुर फुहार।
धड़कनें संगीत सुर, लब सुरीले साज बन जाते।
याद बहुत आती है हमको, वो अधूरी सी बातें।
छुप-छुपकर मिलना शर्माना, इशारे दिखाती है।
कोरे कागज में दिल का, सारा हाल सुनाती है।
नैन ताकते रस्ता देखे, हम भी कैसे उन्हें बताते।
याद बहुत आती है हमको, वह अधूरी सी बातें।
रह रहकर ख्वाबों में आती, वो मुस्कानों की बातें।
भोली भाली सूरत में वो, खूबसूरती दिख जाती।
सात जनमों का जुड़ा रिश्ता, हम भी जान जाते।
याद बहुत आती है हमको, वो अधूरी सी बातें।
बसंत अब दूर नहीं
चली गई बरसात अब तो पतझड़ भरपूर नहीं।
महक उठेगा उपवन सारा बसंत अब दूर नहीं।
भांति भांति के पुष्प खिलेंगे मस्त बहारें भावन।
रंग बिरंगे हो गीत तराने अधरों से सुरीले पावन।
फगुनिया धुन गूंजेगी मुरलिया की वो मधुर तान।
चेहरों पर रौनक आएगी लबों पर मीठी मुस्कान।
मनमयूरा झूम उठेगा हरियाली फिर से आएगी।
काली कोयलिया डाली पर बैठ राग सुनायेगी।
मस्त पवन के झोंके तनमन पुलकित कर जाएंगे।
झूम झूमकर नर और नारी फाग उत्सव मनाएंगे।
अलमस्ती का आलम होगा मौसम रंग दिखाएगा।
प्रीत रंग में मोहन गिरधारी मुरली मधुर बजाएगा।
पीली सरसों ओढ़ चुनरिया धरती जब लहराएगी।
उर उमंगें खुशियों की घर-घर में रौनक आएगी।
वासंती बहार मधुरम सी छूकर तन महकायेगी।
रोम रोम खिल जाएगा मस्त बहारें गीत गाएगी।
दोन्यू हाथां म लाडू राखै
( राजस्थानी भाषा )
दोन्यू हाथां म लाडू राखै कद पलटी खा ज्यावै।
बिन पिंदा को लोटो ज्याणी गुड़तो गुड़तो ज्यावै।
जद चालै तलवारां दुधारू दोन्यू कान्या सूं काटै।
होय दोगला मिनख धरां प आपसरी न बै बांटै।
कदे आपणा बणै हेतुला भेद लेण र हिवड़ा रो।
कदे स्यामी हो ज्या ईस्या माण्ड लेव बै पाळो।
किरकांट भी रंग बदळतो थोड़ी टैम घड़ी लगावै।
नकटां को के नाक कटै है बै अपणो रंग दिखावै।
ओलो छानो आवै घणों घर घर म फूट करा दे।
भला भला न चोखी तरियां म्हारा मोटा मरा दे।
करै दोगळी बातां मिनख सूं रहणो थोड़ो संभळकै।
च्यार कोस दूर बसै ज्याणो बात लेणो ना हळकै।
चित भी म्हारी पट भी म्हारी बिलड़ी सी राखै सोच।
खीर खांड मिलै तो थारा नाही पड़ज्या आं कै मोच।
मनमीत मेरे तू आजा
मनमीत मेरे तू आजा, दिल का हाल बता जा।
नयनों को चैन मिले, झलक जरा दिखला जा।
मनमीत मेरे तू आजा
ढूंढ रही है तुझको निगाहें, ताक रही है रस्ता राहें।
अपने दिल के राजमहल में, दे दो थोड़ी हमें पनाहें।
कह रही है धड़कने तुमसे, प्रीत के गीत सुना जा।
नैन बिछाए बैठे हम भी, प्रेम सुधा रस बरसा जा।
मनमीत मेरे तू आजा
तेरी बातें तेरे वादे, मन को लुभाते हसीं इरादे।
तुम कितने भोले भाले हो, मीत मेरे सीधे-साधे।
मन मयूरा झूम रहा, धड़कनों की राग सुना जा।
भावों का सागर उमड़े, शब्द सिंधु गोते लगा जा।
मनमीत मेरे तू आजा
हंसी चेहरा मन लुभाता, प्रेम का सावन बरसाता।
मनमौजी मतवाली अदा, दस्तक दिल पर दे जाता।
कविता की इन कड़ियां में, पुष्प प्रेम के खिला जा।
गीतों गजलों छंदों की,आकर मस्त बहार बहा जा।
मनमीत मेरे तू आजा
हर चौखट पे जड़े पत्थर
हर चौखट पे जड़े पत्थर आशियाना आलीशान।
जमी मकान महंगे हो गये सस्ता हो गया इंसान।
घर के आगे गाड़ी दिखती चौखट खड़ा दरबान।
दरवाजे पे ताले मिलते विलायती मिलेंगे श्वान।
ना बुजुर्गों का बोलबाला ना चौखट पर वो रौनक।
जहां चहकता था आंगन प्यार की मीठी महक।
सिमट गई है चौखट अब तो सिकुड़ हुए दिलों सी।
लिपट गई स्वार्थ की डोरी शिकवा और गीलो सी।
होती थी चौखट पर रौनक विवाह मंडप सजता।
बाराते दूल्हा और बाराती बैंड बाजा फिर बजता।
गेस्ट हाउस मैरिज गार्डन शानो शौकत हुए भारी।
घर की चौखट सूनी रह गई लो शादी हो गई सारी।
हर चौखट पर सुख दुख के मिल जाते अफसाने।
कभी नैन में नीर बरसता कभी खुशियों के तराने।
हर चौखट पर मारा मारा दर-दर ना कभी भटकना।
घोड़ा बिकता ठांव पे साथी अधर झूल ना लटकना।
विदा चाहते अब
बीत गई अंधियारी रात विदा चाहते हैं अब।
ना रही वो सुहानी बात विदा चाहते हैं अब।
तिनका तिनका जोड़ बनाया घर सुंदर सा।
सपनों का महल सजाया वृक्ष हुआ बड़ सा।
घर के कितने मालिक है घर रहा ना घर सा।
सबको रोटी देने वाला आज ग्रास को तरसा।
आंगन में दीवारें खिंची विदा चाहते हैं अब।
तानों से कान पक गए विदा चाहते हैं अब।
उमर हुई आंखों से धुंधला धुंधला दिखता।
बहुत कमाया हमने देखा सबकुछ बिकता।
बांट लिया औलादों ने हमको बांट ना पाए।
काल चक्र की तीव्र चाल हम काट ना पाए।
सब देखा हाथों से जाते विदा चाहते अब।
परिवार में प्रेम का सिलसिला चाहते अब।
शिक्षा और संस्कार दिए हमने भी भरपूर।
अपने दम पर दुनिया में हुए बहुत मशहूर।
जाने कैसी हवा लगी मतलबी हो गए सारे।
संघर्षों से बढ़ जाते पर अपनों से हम हारे।
जीर्ण शीर्ण काया ले अलविदा चाहते अब।
जब तक सांसे जीने की विधा चाहते अब।
नीम की ठंडी छांव यूं मिलती नहीं
नीम की ठंडी छांव यूं मिलती नहीं।
चेहरों की रवानी अब खिलती नहीं।
अपनापन प्रेम को तरसते लोग यहां।
मस्त बहारें मनभावन बहती है कहां।
नीम के नीचे पाठशाला मिलती नहीं।
मजबूत थी बुनियादें जो हिलती नहीं।
गांव की हवाएं अब बदलने लगी है।
स्वार्थ की आंधियां यूं चलने लगी है।
नीम तले गोरी अब झूला-झूलती नहीं।
दिलों की खिड़कियां भी खुलती नहीं।
हो गया प्रेम अब दिखावे का बाजार।
प्रीत की कहां बरसती मधुर रसधार।
नीम की निंबोली नीचे झुकती नहीं।
खुशियों की घटा आके रुकती नहीं।
उमड़ती नेह धारा अब सबके दिलों में।
वक्त निकला जाता शिकवा गिलो में।
निशानी छोड़ जाएंगे
कलम की हम रवानी छोड़ जाएंगे।
हम रहे ना रहे कहानी छोड़ जाएंगे।
लेखनी की धार निशानी छोड़ जाएंगे।
यादों भरा नयनों में पानी छोड़ जाएंगे।
गीत ग़ज़लें सबकी जुबानी छोड़ जाएंगे।
कविता की दुनिया दीवानी छोड़ जाएंगे।
शब्दों का जादू कविता गानी छोड़ जाएंगे।
भाव की रसधार हम सुहानी छोड़ जाएंगे।
किताबें न सही कागज पन्नी छोड़ जाएंगे।
हर जुबान पे अपनी कहानी छोड़ जाएंगे।
प्रीत की बहती धारा शैतानी छोड़ जाएंगे।
याद करेगी दुनिया निशानी छोड़ जाएंगे।
महकता समां बयार सुहानी छोड़ जाएंगे।
छाप छोड़ती बहार मस्तानी छोड़ जाएंगे।
तुम डाल डाल
तुम डाल डाल हम पात पात क्या करतब दिखाओगे।
तुम उछल कूद कर लो पूरी औंधे मुंह ठोकर खाओगे।
तुम खेलो मनमर्जी की चालें सतरंजी चाहे हो जितनी।
तुम हद पार कर जाओ कूटनीति भरी मन में कितनी।
तुम नयन तीर चलाकर देखो अंगारे बरसा लो चाहे।
मुस्कान अधरों पर ही होगी रसधार बरसती निगाहें।
ईर्ष्या द्वेषता नफरतों की तुम कैसी मूरत बन गये हो।
बेईमानी की राहे चुनकर क्यों अकड़ में तन गये हो।
खुद काली करतूतों की इमारत खड़ी क्यों करते हो।
बारूद के ढेर पर बैठे फिर चिंगारी से क्यों डरते हो।
तुम जहां-जहां भी जाओगे हमको यूं भूल ना पाओगे।
हमसे जो तुम टकराओगे फिर लाख बार पछताओगे।
तुम कांटों के बाग लगाते हो हम प्रीत पुष्प बरसाते हैं।
तुमसे दुनिया दूर रहती हम प्रेम भरी रसधार बहाते हैं।
तुम चाहे जितने जतन करो बराबरी कहां कर पाओगे।
तुम डाल डाल हम पात पात बचके कहां तक जाओगे।
शिव साकार ढूंढता हूं
तू है निराकार मै आकार ढूंढता हूं।
तू अंतर्यामी रूप साकार ढूंढता हूं।
शिव साकार ढूंढता हूं
घट-घट का वासी अगम अविनाशी।
पार ब्रह्म परमेश्वर महादेव कैलाशी।
दर्शन का हे शंकर आधार ढूंढता हूं।
औघड़ दानी भोले करतार ढूंढता हूं।
शिव साकार ढूंढता हूं
तेरी जटा में गंगा चंद्र ललाट पे सोहे।
गले में सर्प माला नीलकंठ मन मोहे।
विश्वनाथ वरदानी दातार ढूंढता हूं।
पार लगा दो नैया किनार ढूंढता हूं।
शिव साकार ढूंढता हूं
भांग धतूरा बाबा भस्म तन पे राजे।
नटराज नृत्य प्यारा डम डमरू बाजे।
हर हर तेरी भक्ति का भंडार ढूंढता हूं।
तू अगम अगोचर सुख सार ढूंढता हूं।
शिव साकार ढूंढता हूं
देवाधिदेव भोला करे नंदी की सवारी।
दुखों को हर लेते हो शिव त्रिशूलधारी।
तेरी कृपा शिव शंकर भंडार ढूंढता हूं।
भोलेनाथ दयानिधि साकार ढूंढता हूं।
शिव साकार ढूंढता हूं
बाबुल कहे बेटी तू है पराई।
तू घर की फुलवारी है, तुझसे घर में खुशियां आई।
तू आंखों का तारा बेटी, सुख दुख में तू ही सहाई।
दुनिया की रीत हमने निभाई, बाप ने बेटी परणाई।
खुश रहना तू सदा ही, बाबुल कहे बेटी तू है पराई।
बाबुल कहे बेटी तू है पराई।
सजी घर की देहरी आंगन, बाजा ले बारात आई।
मंगल गीत सब गावे, द्वार पर बज उठी शहनाई।
तोरण द्वार रोशन सारे, सखियों ने मेहंदी लगाई।
घर तेरा आबाद रहे, बाबुल कहे बेटी तू है पराई।
बाबुल कहे बेटी तू है पराई।
अरमानों से डोली सजाई, दुआएं दी गोद भराई।
मां की आंखें भर आई, कैसे करूं मैं तेरी विदाई।
लाडो से पाला गले लगाऊं, गोद में बिटिया आई।
खुशियां मिले अपार, बाबुल कहे बेटी तू है पराई
बाबुल कहे बेटी तू है पराई।
राम रस प्याला
राम धुन रमता हनुमत राम नाम मतवाला।
आठो याम जपो रघुनंदन राम रस प्याला।
राम राम श्रीराम हमारे अंतर्यामी प्रभु राम।
तिर जाते पत्थर पानी में लिखा राम नाम।
रोम रोम में राम बसे सीना चीर दिखा देते।
रामनाम रस प्याला पी श्रीराम दर्शन पाते।
राम रसायन औषध राम कृपा है सुखकारी।
रामनाम माला फेरो मिट जाए विपदा सारी।
राम जगत तारनहारे आराध्य है प्रभु हमारे।
करुणासागर रामजी सबकी आंखों के तारे।
राम यज्ञ राम पूजा राम सिवा ना कोई दूजा।
पियो रामरस प्याला राम ही भक्ति राम पूजा।
रघुवर राम गुण गा सुख संपति कीर्ति पाओ।
राम नाम जपो झूमो राम शरण में हो जाओ।
पीकर रामरस प्याला झूम रहा बजरंग बाला।
रक्षक राम गुसाई बाल बांका ना होने वाला।
एक नई परीक्षा जिंदगी की
जिंदगी के मोड़ भी कैसे बदल बदलकर आते हैं।
हरेक मोड़ पर एक नई परीक्षा जिंदगी की पाते हैं।
हर मुकाम पर हौसलों की हमको भारी जरूरत है।
जोश जज्बा उमंग उत्साह लगन ही शुभ मुहूर्त है।
सुख-दुख खुशियां मिले कभी गमों का चलता दौर।
कभी नयन नीर बरसाते कभी नाचता मन का मोर।
टूट जाते रिश्ते नाते अपने भी हमको लगते बेगाने ।
कभी रात भर महफिलें हो कभी चलते अफसाने ।
खिल जाते हैं ख्वाब सुनहरे महके हुए चमन से।
संघर्षों से ही दमकते है मोती अनमोल सृजन से।
जीवन की जंग में हमको हिम्मत खूब दिखलानी।
एक नई परीक्षा जिंदगी की सबको देकर जानी।
प्रश्न पत्र समय के पन्ने जीवन का होता इतिहास।
कर्म हमारे यश वैभव को बना देते स्वर्णिम खास।
परीक्षक खुद कुदरत होती हाथ ना कॉपी ना पेन।
कड़ी परीक्षा होती है तब मिलता कहीं नहीं चैन।
रुक जाना नहीं कहीं तू हार के
चलते जाना सृष्टि का नियम रहा।
चांद ठहरा कहां पे बता दो कहां।
गीत रचना स्नेह भरी रसधार के।
रुक जाना नहीं कहीं तू हार के।
समझो ना अकेला इस संसार में।
बदलेगा ये मौसम मस्त बहार में।
पथरीली राहें पथिक करो पार रे।
रुक जाना नहीं तू कहीं हार के।
मंजिले सुहानी हमें मिल जाएगी।
बढ़ते रहना सफलता भी आएगी।
आंधियों से भीड़ जाना हर बार रे।
रुक जाना नहीं तू कहीं हार के।
हजारों बाधाएं आती है राहों में।
सपना सुनहरा रखना निगाहों में।
बांटो जग में मोती जरा प्यार के।
रुक जाना नहीं तू कहीं हार के।
क्या अमृत भी
विष क्या अमृत भी पाएगा सेवा से संस्कार से ।
टूट रही रिश्तो की डोरी आपस की तकरार से।
जहर घोलने वाले घोले तुम अमृत रस बरसाओ।
बरस रहे अंगार जहां तुम प्रेम सरिता बन जाओ।
मीठे बोल मधुर वाणी की सौरभ महका दो सारी।
ईर्ष्या द्वेष कटुता कम हो स्नेह सुधा सबसे भारी।
शिव ने विष का पान किया अमृत बांटा देवन को।
सत्य सनातन सदाचार से हर्षित सारा तन मन हो।
विष क्या अमृत मिलता है सकल इस संसार में।
तीखी वाणी विष उगले अमृत बरसता प्यार में।
छल छद्म बैर भाव मानस गरल उगलते भावों में।
मन चंगा तो बहती गंगा खुशहाली होती गांवों में।
रिश्तों में सदा प्रेम ही पालो वाणी की रसधार से।
सुख शांति समृद्धि आती अपनापन और प्यार से।
पावन शब्दों को गीतों को उन भावों को चुन लेना।
काव्य की सरिता रस बरसे कविता ऐसी बुन लेना।
जिस चेहरे पर गुमान था
जिस चेहरे पे गुमान था विश्वास नेह अभिमान था।
हद से ज्यादा चाहा जिसको दिल का अरमान था।
जिसको देख हसीं चेहरे पर मुस्कानें छा जाती थी।
हंसी-खुशी रौनक मुस्कानें होठों पर आ जाती थी।
भोर सुहानी खिल जाती थी शामें रंगीन नजारा थी।
जिसकी हर अदाएं भावन सी जो संसार हमारा थी।
मन का कोना-कोना सूना वीरान जमाना लगता था।
जो ना आया तो दिन खाली खारा खाना लगता था।
मीठी बातों से रस घुलता महफिलें सज जाती थी।
दिल के तार बज उठते धड़कने प्रीत राग गाती थी।
उनके आ जाने से मन को मिल जाता करार कभी।
जाने कैसे बदल गए वो बरसती प्रीत रसधार कभी।
वक्त बदला मौसम बदला कितना हसीं चेहरा भी।
जिस चेहरे पर गुमान था धुंधला हुआ सुनहरा भी।
भावों ने करवट बदली अपनी डफली अपनी राग।
वो बहारे कहां रही उपवन में उमड़ता था अनुराग।
रिश्तो के बीच धुंध
रिश्तो के बीच धुंध ये कैसी छाने लगी है।
दूरियां अपनों में भी देखो यूं आने लगी है।
नफरतों का दौर स्वार्थ का जहर घोलता।
अपनापन अनमोल हृदय तराजू तोलता।
ईर्ष्या द्वेषता कटुता घर-घर आने लगी है।
घर की दीवारें अब घर को खाने लगी है।
कुलदीपक ही आग का दरिया बनने लगा।
चांद सा टुकड़ा सुखद शांति निगलने लगा।
भाई-भाई के झगड़े आम बात होने लगी है।
बंट रहे घर जमीनें आबरू भी खोने लगी है।
झूठ चालाकियां नस-नस में समाने लगी है।
दिखावे में दुनिया है चकाचौंध छाने लगी है।
गिरना यूं गिराना नियत बिगड़ जाने लगी है।
धोखा जालसाजी बहुत रंग दिखाने लगी है।
रिश्तो में मर्यादाएं भी सारी ढह जाने लगी है।
कपट की बुनियादें कैसा रंग दिखाने लगी है।
निराकार में आकार हूं
निराकार में आकार हूं सत्यमेव ओंकार हूं।
सत्य सनातन सदाचार सृष्टि शिल्पकार हूं।
आस्था श्रद्धा विश्वास दीपों में उजास हूं।
मन मंदिर का उजाला देवों में मैं खास हूं।
प्रलय हूं विनाश हूं उन्नति और विकास हूं।
काल महाकाल शिव कारण हूं समास हूं।
परिवर्तन का पांव हूं भूत वर्तमान काल हूं।
हरियाली भरा गांव हूं पार लगा दे नाव हूं।
खुशियों का खजाना हूं नूतन जमाना हूं।
गीतों का तराना हूं मैं कोई अफसाना हूं।
शब्द संगीत ताल हूं मैं बड़ा बेमिसाल हूं।
याद करके देखो जरा मिलता हर हाल हूं।
कर दूं मालामाल हूं जैसे कोई कमाल हूं।
हिला दूं सारी दुनिया कोई माया जाल हूं।
सभ्यता भी संस्कार हूं सहमति प्रतिकार हूं।
जीवन का आधार खुशियों भरा उपहार हूं।
कभी-कभी हम हारे हैं
हारकर भी जीते हम, रिश्तो की तकरार में।
कभी-कभी हम हारे हैं, जानम तेरे प्यार में।
कोई रूठा कोई टूटा, मुंह फिराकर चल दिया।
कोई दिखा बेरुखी सी, दर्दे दिल हमको दिया।
अपने बेगाने होकर, अपनापन को छोड़ चले।
खून का रिश्ता पुराना, अपने रिश्ता तोड़ चले।
हमने भी प्रेम कमाया है, रिश्तो के बाजार में।
कभी-कभी हम हारे हैं, जानम तेरे प्यार में।
दिलों दीवारें टूटी, दिल के टुकड़े हुए हजार।
वर्षों पूराना प्रेम हमारा, हो गया तार तार।
अपनी डफली थामें, अपने रस्ते चल दिए।
किसको दोष कहां, कान किसी ने भर दिए।
वक्त की आंधी में, खुद को संभाला हार के।
कभी-कभी हम हारे हैं, जानम तेरे प्यार में।
कहीं खो ना जाए हम
सपनों की दुनिया में कहीं खो ना जाए हम।
भागदौड़ भरी जिंदगी यंत्र हो ना जाए हम।
चकाचौंध के कायल हो धन के पीछे दौड़े।
सच का करो सामना थामो मर्जी के घोड़े।
बेबुनियाद ख्वाहिशों के वशीभूत ना होना।
मेहनत के दम पे बढ़ना सपनों में ना खोना।
भीड़ भरी दुनिया में कहीं खो ना जाए हम।
अपनी भी पहचान बना लो चीज क्या हम।
शुभ कर्मणा सौरभ से महका दो जीवन को।
मधुर वाणी से रसधार तर सारा तन मन हो।
सबसे मिलो मुस्कुराकर जोश भरा दम हो।
तुम दुनिया के हीरो नहीं किसी से कम हो।
भावों की बहे सरिता कहीं खो ना जाए हम।
शब्दों से खुशियां बरसे आंखे हो जाती नम।
लेखनी की धार से कविता की कड़ियां बुनो।
मोतियों की माला गुंथे शब्द कुछ ऐसे चुनो।
बचपन से दूर होता बचपन
ना रहे वो खेल खिलौने अब बदल गए हालात।
बचपन से दूर होता बचपन मोबाइल पर बात।
भारी भरकम बस्ता अब तो पढ़ें पढ़ाई अंग्रेजी।
वीडियो गेम मोबाइल चैटिंग मार्केटिंग में तेजी।
शतरंज कैरम बोर्ड खेलना अब किसको भाता।
खो खो कबड्डी कहो भला अब किसको आता।
सतोलिया मारधड़ी चोर सिपाही अब खेले कौन।
बचपन से दूर होता बचपन मात पिता बैठे मौन।
कंप्यूटर की शिक्षा हुई किताबें भी अब पूछे कौन।
मैदान में खिलाड़ी कहां खेल कूद क्रीडा हुई गौण।
वो अल्हड़पन भोलापन वो बचपन भी कहां गया।
साथियों संग उधम मचाना बालपन भी कहां गया।
नन्हे-नन्हे बाल चेहरों की मुस्काने ना खो जाए।
नन्हे-नन्हे हाथों की मधुर करामाते ना खो जाए।
बचपन को मिट्टी के घरोंदे भी बनाने होंगे लोगों।
बच्चों को हाथों से सितारे चमकाने होंगे लोगों।
दिन सलोने बचपन के
कहां गए वो मधुर मधुर दिन सलोने बचपन के।
याद बहुत आते हमको बीते पल वो बचपन के।
खेल खिलौने हंसना मुस्काना रूठना और मनाना।
सैर सपाटा स्कूल जाना टोली संग उधम मचाना।
वो भोलापन और नादानी शरारतें सारी मस्तानी।
वो पगडंडी बड़े हुए हम खाकर खूब दाना पानी।
अठखेलियां याद आती वो आंँगन दीवारें भाती।
बैठ पिता के कंधों पर फरमाइशें पूरी हो जाती।
वो पीपल की छांव सुहानी जहां चलती मनमानी।
कबड्डी खो खो साथी संग खाते गुड़ और धानी।
वो बचपन का प्यार सलोना वो हंसना मुस्काना।
मां की डांट फटकार फिर आंचल में छुप जाना।
मौज मस्ती मस्तानों की मोहल्ले में जमती धाक।
शौक सारे पूरे हमारे हम इठलाते पहन पोशाक।
कैसे भूले जा सकते हैं वो दिन सलोंने बचपन के।
आनंदित कर जाते हमको पल सुहाने बचपन के।
देवभूमि उत्तराखंड
देवभूमि उत्तराखंड खूबसूरत राज्य है भारत का।
हसीं वादियां दर्शनीय मोहक नजारा कुदरत का।
हिमालय की तलहटी बसा दुनिया भर में मशहूर।
देहरादून मसूरी घूमो प्रकृति का है आनंद भरपूर।
हरिद्वार ऋषिकेश पावन गंगा तट है मन भावन।
भव्य मंदिर आश्रम बरसता है श्रद्धा का सावन।
हिमालय पर्वतमाला खूबसूरत मस्त सारा नजारा।
केदारनाथ शिव मंदिर महाकाल भक्तों का प्यारा।
चार धाम बदरीनाथ विष्णुजी का मंदिर मनभावन।
धर्म आस्था सत्य सनातन पुनीत हृदय भरा पावन।
प्राकृतिक सुंदरता सुखदायक दिव्य विरासत भारी।
बर्फ लदी पहाड़िया घाटियां सुंदर सी लगती सारी।
धरती का स्वर्ग जहां धरती हरियाली से है भरपूर।
संस्कृति सभ्यता समाए उत्तराखंड बहुत मशहूर।
नैनीताल भीमताल चलो उत्तर काशी बड़ी कमाल।
मुक्तेश्वर बागेश्वर देख लो फूलों की घाटी हर हाल।
झीलों सुरम्य वादियों भरा सुंदर प्यारा उत्तराखंड।
ईश्वर प्रेम धर्म का दीप जलता जहां सदा अखंड।
महकते ख्वाब
महकते ख्वाब है मेरे सुनहरे सपनों का संसार।
हसीं वादियां दिल की प्रेम की बरसती रसधार।
मगन हो नाचता है मौजी मन में उठ रही लहरें।
सुरीले सपनों में खोया अंतर्मन भाव बहे गहरे।
मन में भाव खुशियों के स्वप्न पुष्प खिले खिले।
उत्साह उमंगे उर उठ रही मोतियों से हमें मिले।
सपनों का संसार निराला ख्वाबों का गुलदस्ता।
हकीकत की दुनिया से हटकर पावन सा रस्ता।
महकते ख्वाब मन में पालो सुंदर करो प्रयास।
सच हो जाएंगे सपने सारे मन में रखो विश्वास।
महक जाए जीवन सारा महकते ख्वाबों सा।
चेहरे पर मुस्काने छाए रुतबा रहे नवाबों सा।
हर्ष आनंद की बरसाते प्रीत से जनमन हरसे।
घर में खुशियों भरी हो हर हृदय में प्रीत बरसे।
आशाओं की डोर
आशाओं की डोर सजीली थामें रखना मन में।
महक उठेगा जीवन सारा उमंग भरे जीवन में।
आशाएं उत्साह जगाती हिम्मत हौसला बढ़ाती।
चिंताएं हर लेती सारी खुशियों के दीप जलाती।
हंसी खुशी वैभव सुखी आशावादी नर हो जाता।
मुश्किलें खुद रस्ता देती सफलता चरणों में पाता।
कड़ी मेहनत पक्का इरादा प्रगति पथ की राहें।
जिंदगी की उलझने सारी हल कर देती आशाएं।
बदले मौसम और जमाना बदलावों की है धारा।
आशाओं की डोर संभालो जीवन में उजियारा।
आंधी तूफान विघ्न बाधाएं आती है और जाती।
आशाएं वो दीपक है मन में जोश नया जगाती।
अंधियारे में नई रोशनी हमको आशाएं दे जाती।
मन मंदिर में दिव्य ज्योत सी आशाएं बन जाती।
विश्वास प्रेम के पुष्प खिले चेहरे पर हो मुस्कान।
आशाओं के दम पर ही नजर चलता सीना तान।
सांसों का क्या ठिकाना
दो दिन की जिंदगी प्यारे सांसों का क्या ठिकाना।
छोड़कर सब कुछ यहां से एक दिन सबको जाना।
क्या लाया क्या ले जाएगा क्या तेरे साथ जाएगा।
कर भलाई दुनिया में शुभ कर्म बस काम आएगा।
चंद सांसों की डोर है प्यारे पल का नहीं भरोसा।
सेवा कर ले मात-पिता की जिसने पाला पोसा।
क्या खोया क्या पाया तूने जीवन यूं ही खोया।
परहित सेवा धर्म त्याग बस स्वार्थ को ही रोया।
माटी के पुतले को इक दिन माटी में मिल जाना।
जब तक सांसे जिंदा है सांसों का क्या ठिकाना।
सांसों की सरगम बोले जीवन का संगीत सुनाती।
हर पल को जी ले हंसी खुशी धड़कने राग गाती।
दुख दर्द बांट लो थोड़ा हंस लो मुस्कुरा लो थोड़ा।
कल को किसने देखा खुशियों को पा लो थोड़ा।
ठगा ठगा सा चांद गगन का
ठगा ठगा सा चांद गगन का,
आज हो गया बड़ा उदास।
कविराज न्याय करो अब,
शिकायत ले आया मेरे पास।
कभी ईद का चांद बनाते,
मुझे देख हंसते मुस्कुराते।
इक दूजे को वो गले लगाते,
ईद मिलन की रस्म निभाते।
करवाचौथ पर पूजा जाता हूं,
चपल चांदनी बिखरता हूं।
सुहागनों का सिरमौर होकर,
इठलाता हूं मैं बल खाता हूं।
धरती वाली भी कैसे हैं,
बड़े यहां केवल पैसे हैं।
काम हुआ आगे चल देते,
दुख तकलीफें हर पल देते।
चंदा मामा कह मुझे बुलाते,
खीर मलाई खुद खा जाते।
पूनम की चांदनी में नहाते,
प्रियतम को चांद कह जाते।
कहानी लिख रहा हूं
जीवन की अजब कहानी लिख रहा हूं।
लेखनी ले कागज जुबानी लिख रहा हूं ।
कहानी लिख रहा हूं
हमने लिखी है गीतों में रसधार औज की।
मनमौजी मतवाला सा ये जिंदगी मौज सी।
बस सीधा-साधा सा सबको दिख रहा हूं।
कहां है जौहरी मैं बिन भाव बिक रहा हूं।
कहानी लिख रहा हूं
वो भावों की गंगा सजी मोतियों की माला
शब्दों को पिरोया गूंथा इक गजरा निराला।
कविता की कड़ियों में खड़ा दिख रहा हूं।
मंचों पर गाता हूं कुछ नया लिख रहा हूं।
कहानी लिख रहा हूं
टूटे हैं सपने रूठे अपने अपनापन अनमोल।
दुनिया दीवानी चली वहां मिलते-मीठे बोल।
मैं अकेला ही कारवां सा बनकर दिख रहा हूं।
रोशनी हो जहां सुदर्शन रोशनी लिख रहा हूं।
कहानी लिख रहा हूं
भाई बहन का प्यार
इस दुनिया में सबसे प्यारा भाई बहन का प्यार।
खुशियां बरसाती आंगन में महकता घर संसार।
विश्वास प्रेम सद्भाव दिलों में होंठों पर मुस्कान।
इक दूजे पर जान लुटाते ये रिश्ता बड़ा महान।
लंबी उम्र जीएं मेरा भाई बहन मंगलाचार करें।
भरा रहे भंडार बहना शुभ कामना तिलक करें।
मुश्किलों में खड़ा रहूंगा फर्ज निभाता सदा रहूंगा।
बहना खुश रहे सदा तू खुशियों से झोली भरूंगा।
लाड प्यार स्नेह की धारा रिश्ता है अनमोल प्यारा।
पावन रिश्ता बहन भाई का यश गाता संसार सारा।
वो रूठना और मनाना संग संग हंसना और गाना।
बिना बताए समझ सके जो रिश्ता है बहुत पुराना।
दिल का दर्द जानती बहना भ्राता प्रेम मानती बहना।
दुआओं में खुशहाली की शुभकामना मांगती बहना।
चहल पहल रौनक रहती हर्ष खुशी उमंगे बहती।
अविरल प्रीत का झरना घर आंगन दीवारें कहती।
रिश्तो की अटूट डोर है प्रेम सदा यह सिरमौर है।
भावों का सागर उमड़ता मुस्कानों की ये ठौर है।
धन की देवी लक्ष्मी
धन की देवी लक्ष्मी, यश वैभव की दाता।
भर दो भंडार मेरे, वरदान दीजिए।
दीपों की सजी कतारें, सज रहे घर द्वारे।
धन बरसाने वाली, धन वर्षा कीजिए।
पूजन थाल दीपक, ले चंदन और बाती।
सुख समृद्धि खुशियां, झोली भर दीजिए।
पावन त्यौहार तेरा, खुशहाली है दिवाली।
घर घर में रोशनी, आगमन कीजिए।
रमाकांत सोनी सुदर्शन
नवलगढ़ जिला झुंझुनू राजस्थान
रचना स्व रचित व मौलिक है
धनवंतरि देव
धनतेरस को धनवंतरि, अवतरण दिवस आया।
प्रादुर्भाव आयुर्वेद का, आरोग्य सुख जन पाया।
जिनकी चार भुजाएं हैं, शंख चक्र धारण किए।
विष्णु का अवतार रूप है, आयुर्वेद हमको दिए।
क्षीरसागर मंथन से जब, निकला हलाहल भारी।
शिव शंकर ने विषपान किया, जटा में गंगाधारी।
अमृत कलश ले धनवंतरि, जगत की झोली भरी।
आरोग्य प्रदाता आदिदेव आयुर्वेद रच कृपा करी।
आरोग्य आयु बल दाता, सुख संपदा वैभव पाता।
काशी कालजयी नगरी है, सुधारस इंद्रदेव वर्षाता।
जो हाथों में शंख धरकर, देते हम सबको संदेश।
सकारात्मक ऊर्जा से, हृदय श्वास दमा हो शेष।
सुख समृद्धि सदाचरण के, देव धन्वंतरि भगवान।
जड़ी बूटी नित्य नियम, आयुर्वेद में है रोग निदान।
साधु संत ऋषि मुनि ज्ञानी, बड़े बड़े हुए सुर ज्ञान।
जीवनदायिनी शक्ति देते, पूजन करें हम धर ध्यान।
आई है दिवाली
आई है दिवाली मनभावन, हम दीप सजाने वाले हैं।
चंदन अक्षत रोली मोली, सुंदर पुष्प चढ़ाने वाले हैं।
रोशन घर का कोना कोना, वंदनवार लगाने वाले हैं।
धन की देवी लक्ष्मीजी को, हम आज मनाने वाले हैं।
आई है दिवाली मनभावन
दीपों की सजी कतारों में, खुशियों चांद सितारों में।
गुलशन और बहारों में, महकाते हसीन नजारों में।
प्रीत की लेकर फुलझड़ियां, सबको हंसाने वाले हैं।
काव्य कलश अमृत रस बूंदे, गीत सुनाने वाले हैं।
आई है दिवाली मनभावन
सद्भाव प्रेम अनुराग उर, आलोकमय हो दीप जले।
धन वैभव यश की दाता, नर सन्मार्ग अविराम चले।
सुख संपदा बुद्धि विधाता, गणपति मनाने वाले हैं।
आओ मिलकर मनाएं दिवाली, दीप जलाने वाले हैं।
आई है दिवाली मनभावन
मुस्कुराने की वजह क्या
मुस्कुराने की वजह क्या बता दो जरा।
प्यार कितना है दिल में जता दो जरा।
हमने देखा चेहरा हसीन गुलशन सा।
पास आकर हमको भी हंसा दो जरा।
पलके राहों में हम कब से बिछाए हुए।
चमन में पुष्प हम कब से खिलाएं हुए।
खुशबुओं से महका दो महफिलें जरा।
गीत यादों में तेरी कब से सजाए हुए।
रोशन ये जमाना जवां दिल हमारा है।
तेरा नाम प्यारा लब पे एक सितारा है।
प्रीत के नगमे हमे आकर सुनाओ जरा।
दिल का राजमहल खाली आओ जरा।
तुम कहो तो चले हम भी हसीं वादियां।
तुम दिल की हो रानी हम तुम्हारे पिया।
खुशियों के दीप घट में जलाओ जरा।
खिल जाए समां तुम मुस्कुराओ जरा।
कैसे मनाऊं दिवाली
राग है रंग है मन में भरी उमंग है।
कैसे मनाऊं दिवाली हाल तंग है।
सजे बाजार है दीपों का त्यौहार है।
कैसे जलाऊं दीपक दिल बेजार है।
हंसी मुस्कान है लबों पे प्यारी तान है।
गीत कैसे लिखूं मैं मन मेरा बेकरार है।
अपना है सपना है रिश्तो का बाजार है।
कैसे संभालू भला हर भरोसे किनार है।
हसीन फिजाएं हैं चली मस्त हवाएं हैं।
कैसे बह जाऊं मैं हवाओं में खुमार है।
रोशनी उजाला है पैसे का बोलबाला है।
कैसे घर से निकलूं महंगाई की मार है।
गहने है कपड़े है वेशभूषा का अंबार है।
कैसे सजा लूं थाल पंडाल जो तैयार है।
सूरदास महाकवि
सूरदास महाकवि श्रेष्ठ कृष्ण भक्ति मे रहते लीन।
वात्सल्य रस में पद रचे सारस्वत वंश है कुलीन।
सूर सागर सूर सांवली साहित्य लहरी सुंदर ग्रंथ।
कृष्ण कृपा से दिव्य दृष्टि मोहन माधव माने पंथ।
सहज प्रेम माधुर्य रस बृज बिहारी लाल बखान।
गोपियां नंदलाल ग्वाल सुंदर चित्रण है सुरज्ञान।
कृष्ण लीला कृष्ण भक्ति केशव माधव गोपाल।
सूरदास शरण कन्हैया जय मुरलीधर नंदलाल।
माखनचोर मदनमुरारी मुरलीवाला नंदबिहारी।
सूरदास सुख पाते पल देख देख लीलाएं न्यारी।
भक्तिकाल अवतरित हुए सरस कवि सूरदास।
कृष्ण सुदामा प्रेम रस में रचा काव्य अनुप्रास।
बाल लीलाएं श्रीकृष्ण की गोपियों संग रास।
वृंदावन की कुंज गलियां पद पद में विश्वास।
घट द्वारिकाधीश बसे रोम रोम बसे श्री श्याम।
सूरदास नैनन बसे अधर मुरलीधर घनश्याम।
मेरा चांद मुझे आया है नजर
आज धरा पर धवल चांदनी उतर आई है निखर।
महक उठा मन ये मेरा चांद मुझे आया है नजर।
आया है त्यौहार पावन करवा चौथ सुहागन का।
चांद सा मुखड़ा दमकता आज मेरे साजन का।
पूजन का लेकर थाल गोरी चांद को मनाने चली।
प्रियतम प्रेम धारा में गौरी चांदनी में नहाने चली।
चंद्रमा की धवल चांदनी उर उमंग जगाने लगी।
ठंडी ठंडी पुरवाई सी हर्षित हो मन लुभाने लगी।
कर सोलह सिनगार सुंदरी चांद को मनाने लगी।
प्रीत की झड़ी निर्झर पिया मन को हरसाने लगी।
जुग जुग जिए जुगल जोड़ी नेह बांटते हम रहे।
खुशियों के दीप जलते रहे प्यार का झरना बहे।
बज उठे जब तार दिल के चांदनी में नहाया शहर।
मंगलगीत गाए गौरी मेरा चांद मुझे आया है नजर।
सुहागन सुधाकर पूजती प्रियतम छवि निहारती।
सौभाग्य सुखदाई व्रत पावन नारी रूप संवारती।
अजमीढ़ जी महाराज
नवसृजन आदिदेव सृजक,
अजमीढ़जी महाराज।
स्वर्ण औजार कल पूजा साधक,
करते पूर्ण काज।
स्वर्णकार करे ध्यान नित्य,
झोली विद्या से भरते।
स्वर्ण कला कौशल हुनर से,
नित्य साधना करते।
स्वर्ण आभूषणों में जड़े,
हीरे मोती जवाहरात।
मुंह बोले मीना कारीगरी की,
हो अनोखी बात।
सोनी साधक शरण आपकी,
देव सदा मनाते हैं।
आदि पुरुष अजमीढ़ देव,
यशगान तुम्हारा गाते हैं।
कृति, रचना, शब्दशिल्प,
बेजोड़ बने सुर लय ताल।
अजमीढ़ देव की कृपा से मिले,
यश,वैभव,उन्नति हर साल।।
कलम कहती है तुम्हे
कलम कहती है तुम्हें प्रेम के दीपक जलाओ।
राग द्वेष सारे मिटा अंधकार को दूर भगाओ।
कलम कहती है तुम्हें
अपनापन अनमोल बांटो सत्य की राहें चलो।
आंधी तूफान जो आए गुलिस्तां में तुम पलों।
नेह की खुशबू फैला दो समां महकाते चलो।
गीत कुछ ऐसे रचो तुम सच के सांचे में ढलो।
कलम कहती है तुम्हें
शब्दों का गजरा सजा काव्य के मोती चुनो।
साहित्य सिरमौर जग में कड़िया ऐसी बुनो।
लेखनी की धार ऐसी दमकती रहे संसार में।
कीर्ति हो व्योम में खुशियां बरसे त्यौहार में।
कलम कहती है तुम्हें
देशहित जज्बा दिखा दो लेखनी की धार हो।
दिग्गज सारे हिल जाए हिम्मत भरा वार हो।
रोशनी की बात हरदम दूर बस अंधकार हो।
नफरतें नहीं यहां बस हर दिलों में प्यार हो।
कलम कहती है तुम्हे
जीण भवानी भंवरा वाली
लाल चुनरिया वाली मैया जीण जगदंबा भवानी।
ऊंचे पर्वत मंदिर सुंदर तेरा ध्यान धरे सुर ज्ञानी।
भंवरा वाली जीण माता रानी चंडी मां भवानी।
सर्व सिद्धियां देने वाली जग जननी कल्याणी।
जोत अखंड नैवेद्य आरती बाजे नौबत बाजा।
खीर चूरमा भरे भंडारा भवानी भोग लगा जा।
शक्ति दायिनी सिद्धि दायनी वरदानी महारानी।
दानव दलनी संकट हरनी सौम्य रुप हे भवानी।
सिंह चड़ी जय मां दुर्गा चक्र त्रिशूल कर में धारे।
तेरी शरण जो भी आया करती माता वारे न्यारे।
भक्तों की रक्षक महाशक्ति दिव्य अलौकिक माया।
चैत्र आसोज लगे मेला भारी जन जन दर्शन पाया।
जात जड़ूला मैया दर पे तेरे भक्तों का लगता डेरा।
तेरी शरण का लिया आसरा संकट सब हरना मेरा।
रणविजय दिलाने वाली खुशियां बरसाने वाली।
सजा दरबार निराला जीण भवानी भंवरा वाली।
उठो राम जी धनुष बाण ले
उठो राम जी धनुष बाण ले रणभूमि में आओ।
दशानन दंभ भर रहा रावण घट घट से मिटाओ।
कलयुग ने अब पांव पसारे कलुष हुई मोह माया।
घर घर में अब रावण बैठा सुख चैन सारा खाया।
कहीं मंथरा कान भर रही खींच रही लक्ष्मण रेखा।
भाई-भाई के झगड़े होते कोर्ट में हो लेखा-जोखा।
सूर्पनखा अब स्वप्न सुंदरी मायाजाल रचती भारी।
ढोंगी बाबाओं ने हद करके मर्यादा ढहा दी सारी।
दल के दल स्वार्थ में खोए अंधकार का राज हुआ।
रघुनंदन कटक अब सुना माया भ्रमित काज हुआ।
पूज्य गुरु मात पिता का होता बड़ा निरादर अब।
ढोंगी पाखंडियों का मंचों पर होता आदर अब।
कर रहा अट्टहास रावण दसों दिशाएं कांप रही।
धर्म ध्वजा श्रीराम संभालो गौ गंगा विलाप रही।
आओ राम अंत कर दो मन विकार मिटे सारा।
रामनाम धुन से होता है घट घट में उजियारा।
जगदंबा जगदंबा
जगदंबा जगदंबा, आओ महर करो मां अंबा।
तेरी शरण में तेरे चरण में, आया मां जगदम्बा।
जगदंबा जगदंबा
यश वैभव शक्ति दायनी, बल बुद्धि विधाता।
सिंह सवार चंडी भवानी, सब सिद्धियों की दाता।
रणचंडी सिद्धी दात्री, महाकाली गौरी अंबा।
ऊंचे पर्वत मंदिर मैया, ज्वाला जोत अचंभा।
जगदंबा जगदंबा
सात सुरों की मात शारदे, तुम शब्दों की दाता।
विमल मति बुद्धि दायनी, शक्ति स्वरूपा माता।
सबकी झोली भरने वाली, जग जननी जगदंबा।
सती साध्वी सुरसुंदरी, विष्णु प्रिया मां अंबा।
जगदंबा जगदंबा
ब्रह्मा वादिनी देवमाता, अनंता भव्या भवानी।
रत्नप्रिया जया दुर्गा, गुण गाते सुर मुनी ज्ञानी।
भक्त वत्सला भद्रकाली, मां मत करो विलंबा।
कालरात्रि काली कराली, संकट हरनी अंबा।
जगदंबा जगदंबा
ब्रह्मचारिणी
ब्रह्मचारिणी बुद्धि विधाता,
बल यश वैभव धारणी।
शक्ति स्वरुपा हे जग जननी,
वरदायिनी दुख निवारिणी।
ब्रह्म स्वरूपा मात भवानी,
कर कमंडल सुंदर साजे।
माला पुस्तक धारणी मैया,
द्वारे ढोल शंख मृदंग बाजे।
त्याग तपस्या मूर्त देवी,
सदाचार सिखलाती है।
ज्योतिर्मय रूप अनुपम,
सुख सरिता बह आती है।
हिमालय सुता शिव प्रिये,
सौम्य स्वरूप मां जगदंबे।
सौभाग्य वैभव सुखदाता,
कृपा करो भवानी मां अंबे।
भावों की फुलझड़ियो में
यूं ही बैठे-बैठे लिखता हृदय में उमड़ते भावों को।
दिल का दर्द कागज पर लिखता मन के घावो को।
मैं कविता की लड़ियों में गीतों की भावन कड़ियों में।
भावों की फुलझड़ियो में रसधार बरसती घड़ियों में।
शब्दों के सुमनहार लिए गुलजार सजाया करता हूं।
काव्य रस से सराबोर मैं फनकार सुनाया करता है।
शब्दों के मोती चुन चुनकर बहार बहाया करता हूं।
गीत गजल छंदों की भाषा बयार मैं गाया करता हूं।
लेखनी की लौ में जगमग दीप सजाता हूं मनमंदिर।
पूजन का नित थाल लिए शारदे मनाया मैं फिर फिर।
काव्य कलश में शब्द सुधा के मोती अगणित झरते।
वीणावादिनी हंस वाहिनी शारदे सुवन झोली भरते।
कलम पुजारी पूजन थाल सजाता शब्द सुमन से।
भावो की सरिता बहती हाल सुनाता हूं कलम से।
ज्ञान का दीप जलाता रहूं गुणगान वरदायिनी गाउं।
लेखनी की जोत जलती रहे घट में उजियारा पाऊं।
कागज कलम हाथ ले नित स्वप्न सजाया करता हूं।
तूफानों से टक्कर लेती शब्द धार चलाया करता हूं।
असल की पहचान
असल की पहचान अनूठी असल मुंह बोलता है।
कसौटी पर कस लो चाहे सच तराजू तोलता है।
खरा सोना तप तपकर भी कुंदन बन चमकता है।
असली हो किरदार जग में हीरा बन चमकता है।
असली की सौरभ महके नकली टिक कहां पाता।
हीरा मुख से ना कहे जौहरी ही कीमत कह जाता।
लाख छुपाए असलियत सच्चाई छुप नहीं सकती।
लाख दबाएं कोई कभी अच्छाई रुक नहीं सकती।
असली हीरा असली मोती सद्गुणों की पूजा होती।
सत्य राह चलने वालों की जय जयकार सदा होती।
जीते जो असल जिंदगी सत्य सादगी मन में धार।
ईश्वर भी मदद करते हैं तूफानों में करते बेड़ा पार।
छल कपट झूठ पाखंड की असलियत खुल जाती।
सच का परचम लहराता है अनीति सारी ढह जाती।
मायाजाल रच रावण ने मायामृग बन मारीच आया।
ढोंगी बना भिखारी रावण सीता जी को हर लाया।
हुई सत्य की जीत राम की दशानन का अंत हुआ।
सच्चे ह्रदय से हरि को पुकारे जग में वही संत हुआ।
यदि मैं शिक्षक होता
यदि मैं शिक्षक होता हाथ में मेरे डंडा होता।
छात्र अनुशासन का मेरे पास हथकंडा होता।
विनय सादगी सदाचार का पाठ पढ़ाता होता।
भूगोल गणित अंग्रेजी व्याख्यान सुनाता होता।
शालीनता की प्रतिमूर्ति शिष्टाचार दिखाता होता।
आचरण ज्ञान गंगा शब्दों की धार बहाता होता।
कक्षा में तीखे तेवर से फिर हो जाता मशहूर मैं।
विद्यालय नियम कायदों से हो जाता भरपूर मै।
बच्चों के भविष्य की होती हाथों में मेरे कमान।
खेलकूद संगीत कला में प्रवीणता पाते नादान।
सर्वांगीण विकास की धारा हृदय लेकर चलता हूं।
संवार सकूं भावी पीढ़ी सोचके घर से निकलता हूं।
विरहन बाट निहारती
विरहन बाट निहारती, पिया गए हैं परदेस।
पतझड़ सा सावन लगे, बिखरे बिखरे केश।
जियरा मोरा डोले, बुझे ना मन की प्यास।
प्रियतम कब आओगे, कब होगी पूरी आस।
ओढ़ चुनरिया गौरी, करती सोलह श्रृंगार।
हाथों में मेहंदी सजी, बिंदिया मस्तक धार।
प्रिय मिलन की बेला, नयन ताकते बाट।
हाथों का चूड़ा कहे, साजन हैं सब ठाठ।
राह निहारे मरवण, नयन सुध बुध खोई।
प्रिय बिन श्रंगार की, कब सराहना होई।
शीघ्र पधारो हे साहिबा, गौरी मन अकुलाय।
सावन हरियाला सनम, कही ना सूखा जाय।
तेरी बंसी की धुन पर
गोकुल में मुरली बजावे कन्हैया नंदकिशोर।
वृंदावन गाय चरावे मदनमोहन माखन चोर।
लीलाधारी तेरी लीला माधव मदन मुरारी।
तू जग करतार कन्हैया गोवर्धन गिरधारी।
पीतांबर सोहे तन पर अधर मुरलिया भावे।
तेरी बंसी की धुन पर राधा जी दौड़ी आवे।
नंदकिशोर यशोदा लाला द्वारिका के नाथ।
चक्र सुदर्शन धारी केशव माधव देना साथ।
सखा सुदामा की गाथा नटवर दुनिया गावे।
जय गिरधर गोपाल भक्त तेरा ध्यान लगावे।
वृंदावन बिहारी लाल मचा हुआ चहुं शोर।
मुरली मनोहर माधव कन्हैया है चितचोर।
गोवर्धनधारी कान्हा नटवरनागर किशोर।
केशव माधव बनवारी नाचे मन का मोर।
गोभक्त गौरक्षक प्यारे कर देते हो वारे न्यारे।
सच्चे मनसे जो पुकारे दौड़े आते प्रभु हमारे।
शब्दाक्षर की स्वर्ण सुशोभित
शब्दाक्षर से अल्फाजों में जोश जगाया करता हूं।
शब्द सुमन हाथ ले पूजन थाल सजाया करता हूं।
मैं कविता की हुंकारों से जगदीप जलाया करता हूं।
अंधकार में उजियारे की किरण दिखाया करता हूं।
शब्दाक्षर की स्वर्ण सुशोभित रीत निभाया करता हूं।
साहित्य की सरिता मधुरम मैं गीत सुनाया करता हूं।
शब्दाक्षर की गरिमा उपमा सम्मान जताया करता हूं।
काव्य कुंभ साहित्य उत्सव बढ़-चढ़ जाया करता हूं।
शारदे साधक सुदर्शन नित परचम लहराया करता हूं।
कविता गीत गज़लो से महफिल महकाया करता हूं।
मैं कलम का बना पुजारी शब्द हार सजाया करता हूं।
वीरों रणधीरों में साहस रण में जोश जगाया करता हूं।
शब्दाक्षर का सजग प्रहरी रसधार बहाया करता हूं।
ध्वज पताका हाथों में ले यश कीर्ति पाया करता हूं।
रवि आलोक विमल जग रोशन हो जाया करता हूं।
आन बान शान से जीता राष्ट्र गौरव गाया करता हूं।
अपनों का साथ
अपनों का साथ मिल जाए, नीलगगन छू जाऊंगा।
मन मुदित आनंद की घड़ियां, फूला नहीं समाऊंगा।
अपनों की महफिल में महके, रिश्तो के पुष्प प्यारे।
सुख की सरिता बहती, रहती हर्षित चलती पतवारें।
अपनेपन का भाव भर दे, मिले अपनों का संसार।
हर काम संभव हो जाए, यश कीर्ति वैभव अपार।
अपनों से ही खुशियां मिलती, अपनों से ही अनुराग।
अपनापन अनमोल जग में, नर जाग सके तो जाग।
दुख दर्द की दवा बन जाती, संकट में जो देते साथ।
मुश्किलों में तैयार खड़े हो, सिर पर हो बड़ों का हाथ।
प्रेम प्यार की सरिता बहती, बरसे मुस्कानों के मोती।
घर आंगन हरा भरा महके, मीठी मीठी सी बातें होती।
सुख समृद्धि के द्वार कई, संपन्नता से झोली भरती।
मिट जाते हैं क्लेश मन से, दुआएं सब संकट हरती।
तीन रंग में सजा तिरंगा
हर घर तिरंगा हो घर घर तिरंगा।
शान है तिरंगा अभिमान तिरंगा।
तीन रंग में सजा तिरंगा मान है।
गर्व हमें ये भारत की पहचान है।
वीरता शौर्य पराक्रम बलिदानी।
वीर शहीदों की रही है निशानी।
खुशहाली का पावन है प्रतीक।
अमन शांति की है गहरी लीक।
उन्नति का रहा है निशान तिरंगा।
प्रगति की हमारी पहचान तिरंगा।
सुख वैभव तिरंगा सम्मान तिरंगा।
राष्ट्र स्वर तिरंगा हो घर घर तिरंगा।
एकता की डोर है सद्भावों की धारा।
हरा भरा लहराए भारत देश हमारा।
क्रांतिकाल आजादी का भान तिरंगा
हम सबका गर्व है स्वाभिमान तिरंगा।
जो लक्ष्मण रेखा तोड़ेगा
पंचवटी में सोने का मृग, देख सिया जी हरसाई।
नंदनवन में चहल मची थी, मायामृग की चतुराई।
बोली राघव स्वर्ण मृग का, शिकार कर प्रभु लाओ।
कनक कुटी की सजा को, स्वर्ण चर्म से सजवाओ।
बोले राम प्राण प्रिए सीते, स्वर्ण मृग जग ना होते।
होनी तो होकर रहती, क्यों राम लखन निर्जन सोते।
मायाजाल रचा रावण ने, खुद रामचंद्र अवतारी नर।
चल पड़े पीछे मृग के तब, बीत चुका था तीन प्रहर।
अंधकार में असुर शक्ति, प्रबल प्रभावी हो जाती।
लक्ष्मण बचाओ प्राण मेरे, पंचवटी में ध्वनि आती।
जाओ लक्ष्मण प्राण प्रिय, रघुनंदन स्वामी मेरे हैं।
भाई की रक्षा करना, कर्तव्य लखन अब तेरे हैं।
मेरी चिंता छोड़ो लखन, स्वामी के प्राण बचाने है।
मेरी आज्ञा को मानो, अब तुमको फर्ज निभाने है।
ईश्वर यह कैसी माया है, रघुवर से कौन टकराएगा।
जो लक्ष्मण रेखा तोड़ेगा, तत्काल भस्म हो जाएगा।
जय हो तेरी गिरधारी
हर दिल में बसे कान्हा, सांवरी मूरत तेरी प्यारी।
दीवाना है ये जग सारा, झूमती ये दुनिया सारी।
जय हो तेरी गिरधारी
पांव में पैंजनिया बाजे, अधर मुरलिया साजे।
गले में वैजयंती माला, पीतांबर तन पर राजे।
सुदर्शन धारी श्री कृष्णा, तेरी लीला है न्यारी।
जय हो तेरी गोविंदा, अर्जी सुनो नाथ हमारी।
जय हो तेरी गिरधारी
राधा के प्यारे मोहन, मीरा के तुम ही घनश्याम।
केशव करो कृपा हम पर, संवारो बिगड़े काम।
नटखट कृष्ण कन्हैया, मन मोहन लीलाधारी।
सुदामा के सखा प्रिय, गोपियों के हो गिरधारी।
जय हो तेरी गिरधारी
यशोदा नंदन प्यारे, जग के तुम ही रखवारे।
माखन चोर तुम्ही कान्हा, तुम ही नंद दुलारे।
गीता ज्ञान के दाता, द्वारिकाधीश बनवारी।
विपद हर लेते हो कान्हा, हे गोवर्धन धारी।
जय हो तेरी गिरधारी
क्रांतिवीर रणभूमि के
चंदन तिलक लगा माथे पे बढ़ चले महावीर जहां।
क्रांतिवीर वो रणभूमि के हाथों में ले शमशीर यहां।
आजादी के दीवानों को शीश चढ़ाना आता था।
वंदे मातरम नारों से आकाश गुंजाना भाता था।
बुलंद हौसलों से बढ़ते वो दुश्मन से लोहा लेते थे।
बलिदानी पथ के राही प्राण न्योछावर कर देते थे।
सरहद के रखवाले भारतमाता के वो प्यारे लाल।
शौर्य पराक्रम वीरता से ऊंचा रखते शूरमां भाल।
ओज भरी हुंकार वीरों की बैरी सेनाएं थर्राती थी।
दुश्मन की छाती फटती हाहाकार मच जाती थी।
रणभेरी बजती रणभूमि महा भयंकर समर होता।
हर हर महादेव का नारा शूरवीर महा प्रबल होता।
माटी का कण कण चंदन वीरों की अमर कहानी है।
अमर सपूत भारत माता के लुटा गये जिंदगानी है।
देशप्रेमी मतवाले रणयोद्धा जो राष्ट्र प्रेम की धारा है।
शत शत वंदन है रणधीरों को जिन्हें तिरंगा प्यारा है।
भीगे भीगे मौसम में
भीगे भीगे मौसम में इन मस्त बहारों में।
दिन के उजालों में हसीं चांद सितारों में।
सावन की पुरवाई मेरे मन को लुभा गई।
दिल ने पुकारा तुझको याद तेरी आ गई।
भीगे भीगे मौसम में
सावन सुहाना आया मस्त बहार आई।
अंबर मेघा छाए रिमझिम फुहार आई।
खिली मन की बगिया पुष्प हजार लाई।
महफ़िल महकी अप्सरा उतरकर आई।
भीगे भीगे मौसम में
तन मन भीगा सारा मन में उमंगें छाई।
सुरीले गीतों की लड़ियां बह धार आई।
पायल की झंकार संगीत सुहाना लाई।
प्रीत बरसने लगी चेहरे पर रौनक छाई।
भीगे भीगे मौसम में
हम शीश नहीं झुकने देंगे
तीरों पर चाहे तीर चले तोप चले या कोई तलवार।
हम नैन नहीं चलने देंगे हम शीश नहीं झुकने देंगे।
गद्दारों को मार भगाओ अमन चैन शांति लाओ।
राष्ट्रभक्ति भाव फैलाओ दीनों को गले लगाओ।
जहर उगलती जो हवाएं वो बयार नहीं बहने देंगे।
राष्ट्रद्रोह चलने वालों को एक पल नहीं रहने देंगे।
फन फैलाए बैठे द्रोही हम हरदम नहीं टिकने देंगे।
शीश कट जाए भले ही हम शीश नहीं झुकने देंगे।
हम अलख जगाते राष्ट्रप्रेम की वंदे मातरम गाते हैं।
भारतमाता के चरणों में वंदन झुक शीश नवाते हैं।
चेतना की मशाल जला अंधकार मिटाया करते हैं।
घट घट हम सब देशप्रेम के भाव जगाया करते हैं।
जहरीले कांटों को राहों में कभी नहीं दिखने देंगे।
भारती के लाल दीवाने हम शीश नहीं झुकने देंगे।
देशप्रेम मतवाले है हम एक प्रलयंकारी ज्वाला है।
सारी दुनिया हिल जाए राणा का अभय भाला हैं।
हम दुश्मन के काले मंसूबे कभी पूरे नहीं होने देंगे।
जनता को वतन आन खून के आंसू नहीं रोने देंगे।
देशभक्ति का जज्बा जन मन से नहीं डिगने देंगे।
आन बान शान वतन हम शीश नहीं झुकने देंगे।
कर कर सोलह श्रृंगार
कर कर सोलह श्रृंगार मनाओ तीज का त्योहार।
उमड़े प्रीत की रसधार सावन आई मधुर फुहार।
बहती मंद मंद बयार चमन भी हो रहा गुलजार।
आंगन सजे घर द्वार आया है झूलों का त्यौहार।
कर कर सोलह श्रृंगार
हाथों में मेहंदी रच गौरी गले में नौलख हार।
बाजूबंद बोरला नथली नखराली है घर नार।
पांवों की पायलिया बाजे घुंघरू की झंकार।
कानों में झूमके सुनाते गोरे मुखड़े की बहार।
कर कर सोलह श्रृंगार
रिमझिम रिमझिम झड़ी बूंदें बरसे पुष्पहार।
हरियाली से गुलशन हुआ दिलों का संसार।
प्रेम भरा सावन बरसता उमड़े हृदय अपार।
तन मन भींगे प्रिये आया तीज का त्योहार।
कर कर सोलह श्रृंगार
वक्त थोड़ा थम जा जरा
खुशियों के बादल लहराए, मन का कोना कोना भरा।
आ रहा मस्त सावन सुहाना, वक्त थोड़ा थम जा जरा।
वक्त थोड़ा थम जा जरा
महक उठी हसीन वादियां, फैल रही अब हरियाली।
रिमझिम रिमझिम झड़ी बरसे, अंबर से बरसे पानी।
ओढ़ ली धरा चुनरिया, चमन लहराए होके हरा भरा।
मस्त पवन ले रहा हिलोरें, झूमा सावन ये मन मयूरा।
वक्त थोड़ा थम जा जरा
अपनों से समां महके, गीतों की लड़ियां लिख पाऊं।
हर दिल में अनुराग जगाता, संगीत सुरीला मैं गांऊ।
प्रेम के मोती बांट लू, खुशियों के दीप जला लूं जरा।
घूम लूं सारी दुनिया, पा लूं मंजिल का ठिकाना जरा।
वक्त थोड़ा थम जा जरा
भावना के बांध को फिर, थाम लूं हंस कर यहां।
महकती वादियां सुंदर, प्यारा लगे ये सारा जहां।
घट के पट खोलूं जरा मैं, देख लूं ये दुनिया जरा।
अंतर्मन की उथल-पुथल में, प्रेम का सागर भरा।
वक्त थोड़ा थम जा जरा
कावड़िया बोल बम बम भोले
गंगाजल से लोटा भरकर, शिव द्वारे चल पड़ होले होले।
कावड़िया बोल बम बम भोले, कावड़िया बोल बम बम भोले।
औघड़ दानी शंकर भोला, महादेव मतवाला।
भस्म रमाए डमरूधारी, गले सर्प की माला।
नटराज का नृत्य निराला, सकल चराचर डोले।
कैलाशपति सदाशिव शंभू, जय जय शंकर भोले।
कावड़िया बोल बम बम भोले
जटा में गंगा चंद्र शोभित, रूण्ड मुण्ड की माला।
बाघाम्बर धारी शिव भोले, ओढ़े मृग की छाला।
त्रिनेत्र त्रिशूलधारी, त्रिभुवन स्वामी हर हर भोले।
सच्चे मन से ध्यान लगा लो, मन की अंखियां खोले।
कावड़िया बोल बम बम भोले
डगर डगर कंकड़ कंकड़, हर हर महादेव शंकर।
पार्वती के प्यारे भोले, नीलकंठ शिव महा भयंकर।
सबकी झोली भर देते शिव, भक्त महाकाल का होले।
सुख का सावन आएगा, भक्त जप ले शिव शंभू भोले।
कावड़िया बोल बम बम भोले
बात कहने का अंदाज खूबसूरत रखें
अधरों पर मुस्कान लिए शुभ कामों का मुहूर्त रखें।
अपनी बात कहने का अंदाज जरा खूबसूरत रखें।
मधुर वाणी मन को भाती अपनापन अनमोल रखें।
मीठे शब्दों की माला दिल का दरवाजा खोल रखे।
हाव भाव भाव मन भावन नयन बरसता नेह रखें।
सत्य सादगी शिष्टाचार धर मनुज सबसे स्नेह रखें।
अभिवादन संबोधन सौम्य मान सम्मान पूर्ण रखें।
शब्दों के अनमोल मोती चुन चुन कर संपूर्ण रखे।
विषय वहीं हो खुली चर्चा सबके मन को भा जाए।
कथन हमारा ऐसा हो जो लब तक बार-बार आए।
समां महकता है वाणी से शब्दों की रसधार बहे।
महफिलें सज जाती प्यारे सुरीली से अंदाज रहे।
कलम दिखा दुनिया को दर्पण
सत्य शील सादगी संस्कार, राष्ट्र हित हो भाव समर्पण।
कलमकार की लेखनी, कलम दिखा दुनिया को दर्पण।
कलम दिखा दुनिया को दर्पण
राजनीति के हथकंडे सब, झूठे वादों की भरमार।
संस्कारों का हनन हो रहा, मर्यादा ढह हुई लाचार।
शिक्षा के मंदिर में होता, केवल धन का ही अर्पण।
पुरखों की सौगात भूल हम, भूल गए सब तर्पण।
कलम दिखा दुनिया को दर्पण
औरों की कविता लेकर कवि, क्यों मंचों पर चढ़ जाते।
साहित्य का ठप्पा लेकर, सम्मानित खुद को करवाते ।
युवाओं को आगे लाते तो, मिलता तुमको भी बड़प्पन।
रचनाकार रचो कुछ ऐसा, बुलंदियां छूए नित सृजन।
कलम दिखा दुनिया को दर्पण
उठा लेखनी सच की राहें, मन ज्ञान दीप जलाओ।
समाज की विसंगतियों पर, काव्य रसधार बहाओ।
ओजस्वी हुंकार भर लो, बोले माटी का कण कण।
आन बान शान वतन की, तन मन धन सब अर्पण।
कलम दिखा दुनिया को दर्पण
गरल समाया हृदय में
गरल समाया है हृदय भीतर, अब सुधारस रहा कहां है।
छल छद्मो की चालें चलती, कहो सुधाकर प्रेम कहां है।
ईर्ष्या द्वेष स्वार्थ ने घेरा मन, अपनापन वो मेल कहां है।
चहक उठता कोना-कोना, बचपन के वो खेल कहां है।
झर झर झरता नेह सलोना, नैनों में अब स्नेह कहां है।
घर आंगन में झड़ी प्रेम की, हृदय बरसता मेह कहां है।
अतिथि का आदर होता, संस्कार भरा वो गेह कहां है।
वज्र बनाया अस्थियों से, दानी दधीचि सी देह कहां है।
मान और मनुहार मानव, दिलों में वो जगह कहां है।
इंतजार मे राहें तकती, प्रीत भरी वो वजह कहां है।
चौपालें पीपल की छायां, दर्द बांटता गांव कहां है।
पक्की दीवारें है सबकी, प्रेम समाया ठांव कहां है।
हंसी खुशी आनंद के पल, भीनी सुबहें शाम कहां है।
इक दूजे पर जान लुटाते, प्यार भरे वो धाम कहां है।
दीप जलाते मन मंदिर में, शबरी के श्रीराम कहां है।
मजदूरी कर पेट भरते, मजदूरों को आराम कहां है।
अंत ही आरंभ है
भोर हुई सुबह का सूरज शाम ढले छिप जाता।
घनघोर अंधेरी रात ढले नया सवेरा फिर आता।
अंत ही आरंभ प्रिय नव सृजन नव प्रभात का।
जब उजाला हो जग में अंधियारा मिटे रात का।
उत्पत्ति विनाश चक्र सृष्टि में फिर चलता रहता।
वृद्धि और विकास क्रम कुदरत में पलता रहता।
जीवन सत्य मृत्यु है फिर किस बात का दंभ है।
बनना बिगड़ना चलता रहता अंत ही आरंभ है।
बचपन बीता आई जवानी बाद बुढ़ापा है तैयार।
भोर बाद दोपहर हुई शाम ढले छाया अंधकार।
रजनी रूप धरे निरंतर भोर का प्रकाश प्रारंभ है।
सूर्यदेव करें आलोक जगत में अंत ही आरंभ है।
नदिया पर्वत पवन घटाएं मस्त बहारें मन को भाए।
हंसी वादियां मन लुभाती कुदरत भी खुद पे इतराए।
जीवन चक्र चलता जाए बीज से तरु का प्रारंभ है।
समंदर समाती सरिताएं कहती अंत ही आरंभ है।
माहौल में घुल नहीं पाया
माहौल में घुल नहीं पाया,
विचारों से खुल नहीं पाया।
कैसे सो जाऊं भला नींद में,
कर्तव्यों को भूल नहीं पाया।
श्वेत मतंग नैनों से ओझल,
व्यर्थ प्रपंच लगते बोझल।
कैसे छल छद्म सह जाऊं,
सच की कसौटी मेरा बल।
स्नेह सुधा रस बरसाया,
अपनों से मिल हरसाया।
स्वार्थ से बचकर मैं रहता,
महफ़िल में अकेला पाया।
दर्द पीर नित सहता आया,
मैं औरों के हित दौड़ा धाया।
जब-जब काम पड़ा खुद का,
कोई मदद को नजर न आया।
वाणी नर का आभूषण
वाणी खूबसूरत आभूषण कंठों का श्रृंगार ।
अधरों से होकर बहती है शब्दों की रसधार।
भावों की धारा होठों से मधुर मिठास घोलती।
वाणी ही नर का आभूषण जुबा मधुर बोलती।
मीठी बोली मन भाती दिल जीत लेती सबका।
हंसी खुशी माहौल हो श्रेष्ठ परिवार घर तबका।
हंसमुख चेहरा प्यारा मधुर मुस्कान हो होठों पे।
खूबसूरती वाणी से खुशी मिलती नहीं नोटों से।
वाणी चरित्र का दर्पण है जीवन का सब सार।
ऐसी वाणी बोलिए नर झलके मधुर व्यवहार।
वाणी दिल को जीत ले है शीतलता की छांव।
हृदय में बसते वही गौरव करता है सारा गांव।
रिश्तो में रस घोल दे वाणी वो सुंदर उपहार।
सुख का सावन बरसे मधुर प्रेम की रसधार।
जबान तले जहर
मृदुभाषी मिलनसार भी जानता सारा शहर है।
विचारों में विष घोल रखा जबान तले जहर है।
माना मधु वाणी बोले जब महफिल में आते हैं।
तीखे तीर दिल तक लगते तिरछे बाण चलाते हैं।
औरों से हंस बदलाते तेवर पल में बदल जाते हैं
जाने क्या बिगाड़ा है हमने जहर उगलते जाते हैं।
अपनेपन का ढोंग रचा वो चालें नई चलाते हैं।
सभ्य सादगी दिखलाकर भीतर से घात लगते हैं।
कभी-कभी फन फैलाए विषधर वो बन जाते हैं।
क्या चलता है अंतर्मन में समझ नहीं हम पाते हैं।
पलकों की छांव तले
पलकों की छांव तले है नाजुक सा दिल ये मेरा।
धड़कनों का स्पंदन मधुर अहसास कराता तेरा।
ये झील सी आंखें मुझको पल पल पास बुलाती।
जाने कैसा जादू भरा है तू मुझको दिल से भाती ।
कारे कजरारे नैना तेरे घनघोर घटा बनके बरसे।
पलकों के साए में भी सावन क्यों प्यासा तरसे।
प्रीत भरी ये आंखें मुझको बार-बार बुलाती है।
झुकी झुकी ये नजरे तेरी जादू नया चलाती है।
इन नैनों में इन पलकों में सपनों का संसार पले।
कितने ख्वाब सुनहरे जाने भावो का अंबार चले।
मदहोशी की छाई रहती है पलकों की छांव तले।
खिला-खिला सा चेहरा मन में कितने ख्वाब पले।
खुशियां बांटने से बढ़ती है
चेहरे पर तब रौनक छा जाए,
काम किसी के हम आ जाए।
खुशियां चार गुनी हो जाती,
खुशी बांट मन प्रसन्न हो जाए।
देख किसी का खिलता चेहरा,
थोड़ा मंद मंद सा हम मुस्काए।
खुश रखे सबको खुशियों बांटे,
खुशी बांटे तो यह बढ़ती जाए।
हंस हंसकर प्यारे मिलो सबसे,
हंस कर सबसे मधुर बात करो।
प्रेम के अनमोल मोती लुटाकर,
जग में खुशियों से झोली भरो।
काव्य रस कलश कविता
भावो की अभिव्यक्ति है वाणी का उपहार है।
कलमकार की लेखनी कविता की फुहार है।
शब्दों की जयमाला गीतों की छटा बहार है।
सरिता बहती सी मनो भावों की रसधार है।
चेतना की ज्योति घट घट उमड़ता प्यार है।
दिलों तक दस्तक देती कविता सदाबहार है।
फूलों की खुशबू सी खुशियों का अंबार है।
महक उठती महफिलें गुलशन गुलज़ार है।
निर्बल की आवाज भी करूण की पुकार है।
ओज भरी महाशक्ति भी मंचों का श्रृंगार है।
धड़कनों का गीत सुंदर जीवन का सार है।
काव्य रस कलश भरा सुधा का भंडार है।
आनंद की अनुभूति सृजन का आधार है।
शब्दों के मोती दमकते विधाएं हजार है।
बोल सुरीले प्यारे जब भी गाता फनकार है।
झूम उठे साज सारे बजे वीणा की झंकार है।
सावन बरसता काव्य मोतियों की कतार है।
उर बहता निर्झर झरना लेखनी की धार है।
हम सब एक कश्ती के मुसाफिर
दुनिया के इस भवसागर में,
जीवन नैया में होकर सवार।
सब एक कश्ती के मुसाफिर,
हम सबको जाना है उस पार।
बंधी हुई है सांसों की डोर,
सिंधु का नहीं दिखता छोर।
मिल जाएगा जहां ठिकाना,
बीती शामें हुई कितनी भोर।
कुछ पलों का संग साथ है,
डोर बस ईश्वर के हाथ है।
हम कठपूतली वो बाजीगर,
आए बुलावा दिन हो रात है।
मुसाफिर को चलते जाना,
जग सराय है एक ठिकाना।
दुनिया छोड़ चले फिर जाना,
अब ना चले यहां कोई बहाना।
चार दिन की है ये जिंदगानी,
यह दुनिया बस आनी जानी।
किरदार हमारा ऐसा हो जाए,
हम सबको भूमिका निभानी।
चले गए वो दुनिया से,
लुटाकर मोती प्यार भरे।
सांसों की सरगम कहती,
आओ इक दूजे से प्रेम करें।
काम किसी के आते
रस्ता बतलाया था तुमको सही राह चलते जाते।
जीवन चंद सांसों का तुम काम किसी के आते।
काम किसी के आते
मद लोभ मोह के चक्कर में मंझधार में अटक गए।
सत्य सादगी स्वाभिमान तज राही क्यों भटक गए।
जीवन में आनंद भरा है तुम बैठ प्रेम से बतलाते।
दीन-दुखी निर्बल की सेवा हाथों से भी कर पाते।
काम किसी के आते
मृगतृष्णा के पीछे भागे चकाचौंध के कायल हो।
स्वार्थ में अंधे होकर क्यों धन के पीछे घायल हो।
वक्त बदलता मौसम बदले थोड़ा गर बदल जाते।
अपनापन अनमोल जरा सा जग में प्यार लुटाते।
काम किसी के आते
खुशियों के बादल छाए प्रेम भरा सावन बरसाए।
मीठे बोल लगे सुहावने चेहरे पर रौनक छा जाए।
आशीषो से झोली भर मानवता का धर्म निभाते।
भावों का सागर उमड़े शब्द सुमन थाल सजाते।
काम किसी के आते
मुझको ले डूबी कविता (2)
तुलसी डूबा रामचरित में मीरा मोहन दीवानी।
मोबाइल में दुनिया डूबी पढ़े लिखे सभ्य ज्ञानी।
डूब गया वो भर जाता है कभी नहीं रहता रीता।
श्याम रंग में राधा डूबी राम रंग में माता सीता।
मुझको ले डूबी कविता
आंधियों में कश्तियां गर्व में हस्तियां डूब जाती है।
डूब डुबकर ही कलम रोशनी का दीप जलाती है।
परिवर्तन सृष्टि का नियम कहती है ये पावन गीता।
परहित सेवा में जो डूबा सच्चे मन से दिल जीता।
मुझको ले डूबी कविता
कोई जप में कोई तप में कोई ध्यान में है डूबा।
कोई धन में कोई मद में कोई ज्ञान में भर डूबा।
गहराई में जो उतरा मोती माणक उसको मिलता।
हरि भजन में जो डूबा सुखी सुरभित हो खिलता।
मुझको ले डूबी कविता
मुझको ले डूबी कविता (1)
भावों में बहता रहता हूं, मन की पीर दर्द कहता हूं।
शब्दों की माला बुनता हूं, प्रीत भरे शब्द चुनता हूं।
काव्य कलश सुधारस बरसे, अमृत धारा रस पीता।
मनमौजी मतवाला फिरता, मुझको ले डूबी कविता।
मुझको ले डूबी कविता
लिख लेता हूं गीत गजल, लेखनी की धार लिए।
काव्य के मोती सजाता, मधुर मधुर रसधार लिए।
साहित्य सेवा में तत्पर, स्वाभिमान भरकर जीता।
एक अकेला काफिला हूं, मुझको ले डूबी कविता।
मुझको ले डूबी कविता
महक जाए समां सारा, दिल से दिल के है तार जुड़े।
महफिले रोशन हो गई, फिर कल्पनाओं में हम उड़े।
कागज कलम के दम पर ही, कलमकार नित जीता।
शब्द सुमन थाल सजा लूं, हंस वाहिनीं शरण रहता।
मुझको ले डूबी कविता
पापा के जाने के बाद
वीरानी सी छाई रहती दिल को सुकून नहीं मिलता।
पापा के जाने के बाद अब कोई हुकुम नहीं चलता।
घर आंगन चौखट सूने शीतल छांव कहां से लाऊं।
उंगली थामे चलना सिखाया वो पांव कहां से लाऊं।
छत्रछाया सर पर रहती ठंडी पीपल की छांव सी।
प्रेम का झरना बहता था मस्त पुरवाई थी गांव की।
चिंता फिकर छोड़ फिरता मनमौजी मतवाला सा।
संघर्षों में रहकर भी खुशियों से हमको पाला था।
जिम्मेदारियां सर पर लादे रोज काम पर जाता हूं।
पापा के जाने के बाद सुख चैन कभी नहीं पाता हूं।
यादों में रह-रहकर चेहरा आ जाता है याद मुझे।
संस्कार शिक्षा मर्यादा आशीष करें आबाद मुझे।
पूज्य पिता का स्नेह आशीष बगिया को महकाएगा।
घर आंगन फुलवारी में खुशियों के पुष्प खिलाएगा।
सिंधु मिलन चली नदियां
लहराती बलखाती आई।
मंद मंद मुस्कुराती आई।
सरिताएं आतुर सी बहती।
जलधाराएं चली पुरवाई।
कल कल मीठा राग सुनाती।
नदी पर्वतों से होकर जाती।
मैदाने में जब उतरे सरिताएं।
खलिहानों को तर कर जाती।
इठलाती सी आई जलधारा।
हर्षित मगन हुआ किनारा।
नदियों ने स्वर संगीत सुनाया।
मन को मोहित करता प्यारा।
शीतल नीर अविरल बहता।
देखो कल कल बहती धारा।
सिंधु मिलन को चली नदियां।
दृश्य मनोरम लगता है प्यारा।
खिल जाता फूलों सा दिल
शूल की हर चुभन से जागी चेतना।
दर्द जब दिल के उस पार हो गया।
खिल जाता फूलों सा दिल ये मेरा।
नाजुक सा दिल तो प्यार हो गया।
कांटों में रहकर भी मुस्कुराया सदा।
खुशबूओं से चमन महकाया सदा।
शूल चुभते रहे दर्दे दिल सहता रहा।
धड़कनों ने दर्दे संगीत सुनाया सदा।
उनके आने से आहत हुई थी कहीं।
मन के आंगन को भी सजाया सदा।
आंधियों ने हमें रूलाकर रख दिया।
पीर सहकर प्रीत रस बरसाया सदा।
नियति के खिलौने हम
नियति के खिलौने हम किरदार निभाना है।
कब पर्दा गिर जाए अभिनय कर जाना है।
यह रंगमंच दुनिया का परिधान बदलते हैं।
नियति के नियम यहां सदियों से चलते हैं।
कभी बोल बदलते हैं कभी रोल बदलते हैं।
मूखौटो पर मूखौटे धारे कई रोज बदलते हैं।
नियति खेल गजब क्या-क्या रंग दिखाती।
सुख का सिंधु उमड़े दुखों का पहाड़ लाती।
सांसों की सरगम है दो दिन का ठिकाना।
डोर उसके हाथों में फिर लौट वही जाना।
नियति ईश्वर माया जहां सारा खेल रचाया।
वही जीवन देने वाला वही रक्षक बन आया।
लक्ष्मण रेखा
टूट रही अब लक्ष्मण रेखा, मर्यादाएं ढहती सारी।
भेष बदलकर रावण बैठे, दहलीज लांघ रही नारी।
हद पार कर फैशन फैली, संस्कारों का हनन हुआ।
डूब रही है संस्कृति हमारी, सभ्यता का पतन हुआ।
अलबेला जोगी आया, झोपड़ी द्वारे अलख जगाई।
ज्यों ही रावण कदम बढ़ाता, पावन लपटे घिर आई।
लक्ष्मण रेखा भीतर माता, ताजा फल लेकर आई।
साधु भूखा ना जाए द्वार से, रक्षक जिसके रघुराई।
रघुकुल धर्म आन बान को, माता ने कदम बढ़ाया है।
मायावी मायाजाल रचकर, सीताहरण कर पाया है।
जब-जब लक्ष्मण रेखा टूटी, रावण की लंका दहकी है।
विनाश के बादल मंडराए, श्रीराम की बगिया महकी है।
मानवीय मूल्यों को जानो ,संस्कारों को महकाओ।
आदर्शों की लक्ष्मण रेखा, तोड़कर ना तुम जाओ।
मंचों का किरदार हूं
कलम का पुजारी, मनमौजी फनकार हूं।
साधक हूं शारदे का, वाणी की झंकार हूं।
शब्दों की माला बुनता, कोई कलमकार हूं।
गीतों की लड़ियों में, सुर छेड़ती सितार हूं।
कविता के बोल मीठे, बहती सी रसधार हूं।
आशाओं का दीपक हूं, ओज भरी हुंकार हूं।
चेतना की अलख जगे, कलम का सिपाही हूं।
मनमानस छाये कविता, लेखनी की स्याही हूं।
दिलों तक दस्तक देती, वो भावों की गहराई हूं।
महक उठता मन का कोना, मधुर सी पुरवाई हूं।
शब्दों का गुलदस्ता हूं, प्यारे गीतो की बहार हूं।
काव्य छलकता कलश सुधारस की फुहार हूं।
मनमौजी मतवाला सा, कोई सृजनकार हूं।
मन को छू जाए, वो ठंडी बहती सी बयार हूं।
जागरण की ज्योत जलाऊं, कोई रचनाकार हूं।
दुनिया को दर्पण दिखाता, मंचों का किरदार हूं।
जिंदगी की किताब में
जिंदगी की किताब में भरा प्यार का दुलार है।
सुख दुख धूप छांव सा अनुभवों का सार है।
हिम्मत हौसला श्रद्धा भक्ति आस्था विश्वास है।
ठोकरो की सीख है महकता हुआ मधुमास है।
प्रीत का बरसता सा सावन पतझड़ बहार है।
जीवन के रंग बदलते खुशियों का अंबार है।
जंग भी है जीत भी दुनिया की हर रीत भी।
संघर्षों की परिभाषा संबल है मन मीत भी।
सपने सुहाने बसे गीतों के सुरीले तराने है।
जीवन की धारा में प्यार भरे अफसाने है।
उमंगों की लहरें उठती भावों का सागर है।
बाधाएं मुश्किलें हैं आशाओं का भी घर है।
त्योहारों की रौनक दीपों की मस्त बहार है।
रंगों की छटा मनभावन अपनों का प्यार है।
साथ निभाए वही मीत है
जीवन की यही रीत है, साथ निभाए वही मीत है।
नैनों से नेह बरसे, दिल से दिल की यही प्रीत है।
साथ निभाए वही मीत है
जीवन पथ पर संग चले, सुख-दुख में साथी हो।
हर आंधी तूफानों में, प्रेम पाले दीपक बाती सो।
डगर डगर पे गुनगुनाते जाए, प्यार भरा गीत है।
जिंदगी की डगर सुहानी, धड़कने सुर संगीत है।
साथ निभाए वही मीत है
नैनों की भाषा जाने, दिल की धड़कनें पहचाने।
अधरो पर आने से पहले, शब्दों का संसार जाने।
संघर्षों में संबल हो, मिल जाती हर बार जीत है।
राहों में बढ़ते रहना, पथिक पथ की यही रीत है।
साथ निभाए वही मीत है
हौसलों की ढाल बन, हिम्मत हमको दे अपार।
हर मुश्किल बाधाओं में, प्रेरणा का हो भंडार।
बुलंदियों तक पहुंचाए, सुनहरा कर दे अतीत है।
खुशियों की रसधार बहा दे, संग चले मनमीत है।
साथ निभाए वही मीत है
जख्म कहीं नासूर ना बन जाए
मन की पीर कहीं चूर ना कर जाए।
दर्दे जख्म कहीं नासूर ना बन जाए।
कह दो मन की बातें गांठे पड़ जाएगी।
कर देगी बवाल बात जो अड़ जाएगी।
व्यथा व्यर्थ कर देगी हर सुख और चैन।
घुटन भरा माहौल मन तब होगा बेचैन।
दिल का दर्द सुनाने से हल्का हो जाए।
प्यार भरे दो बोल मीठे मरहम हो जाए।
खुली हवा में आकर देखो चैन आ जाए।
मंद मंद मुस्कुरा कर देखो रैन भा जाए।
अंतर्मन की ये उथल-पुथल दूर हो जाए।
दबी हुई पीड़ा कही बढ़ नासूर हो जाए।
पीपल की ठंडी छांव में
बैठकर थोड़ा सुस्ता लो, पीपल की ठंडी छांव में।
बहती मधुर सी पुरवाई, आकर देखो मेरे गांव में।
दूर-दूर से तोते आते, डाल-डाल पर वो गीत गाते।
मोर नाचता मन को भाता, राहगीर उधर से जाते।
तपस्वी सा अचल खड़ा, लोग कहते बहुत बड़ा है।
पंछियों का आश्रय स्थल, तूफानों से खूब लड़ा है।
सुकून मिल जाता यहां, पीपल की ठंडी छांव में।
चौपालें रोज चलती यहां पे, हरे भरे मेरे गांव में।
वो चिड़िया का चहकना, पखेरू बैठते हैं डाल पे।
वो बच्चों का खेलना, रौनक रहती नन्हे गाल पे।
पीपल बड़े प्यार से, आसरा जहां सबको देता है।
सुख दुख की कहानी सारी, मौन रह सुन लेता है।
गर्मी से व्याकुल हो, ठौर ठिकाना नजर ना आए।
पीपल का पेड़ अडिग, हमें बहारों से पास बुलाए।
पांच साल बाद रौनक
आए आज गली में मेरे जब हाथ जोड़ते नेता।
श्वेत वस्त्र छवि मनमोहक पूरे लगते अभिनेता।
मैं प्रत्याशी खड़ा हुआ हूं वोट अमूल्य दे देना।
बहां दूंगा विकास की गंगा वोटर देख लेना।
लोकतंत्र में लोकहित जनादेश बड़ा जरूरी।
सत्ता सुख पाने को नेता शक्ति लगा दे पूरी।
पांच साल बाद यूं रौनक सड़कों पर आई।
शतरंजी मोहरों की देखो चुनावी रंगत छाई।
जनहित में जनता को भी वोट डालना होता।
चुनावी दंगल में उतरे हैं भांति भांति के नेता।
चुनावी समर का देखो शंखनाद हुआ भारी।
सियासी पारा गर्म हुआ चली चुनावी तैयारी।
राजनीति का बाजार सजा कुर्सी की चाहत में।
रणभेरी बिगुल बज रहा है वोटो की आहट में।
शीतल जल सा मन मेरा
शीतल जल सा तर हो जाऊं बहती हुई बयार सा।
झोंका मस्त पवन बन जाऊं मांझी की पतवार का।
शीतल जल सा शिव चरणों में वारि-वारि जाऊं।
श्रद्धा भक्ति भाव गीत की ज्योत बनूं जल जाऊं।
शीतल जल सा मन मेरा गंगा धारा बन जाए।
प्रीत के छेड़े तराने ये दिल दीवाना बन गाए।
वाणी की शीतलता से रिश्तों को महकाता जाऊं।
गीतों गजलो छंदों में प्यारे शब्दों के फूल खिलाऊं।
मेरे होठों पर मुस्काने हो हंसी तेरे लब पे पाऊं।
रौनक आ जाए चेहरे पे मौसम ऐसा बन जाऊं।
मृदुल विचारों का संगम मुस्कानों के मोती बांटू।
मैं बनजारा मनमौजी बन पल सुहाने से छांटू।
हंसी खुशी के प्रीत तराने गाऊं गलियों मैदाने में।
मस्त बहारें नगमे सुनाऊं गीतों गजलों गानों में।
ठंडी ठंडी मस्त हवाएं छूकर जाए तन मन को।
बन जाए रसधार कविता गुंजे व्योम गगन वो।
ओ मैया शेरांवाली
कुछ भी छुपा नहीं है माता हाल मेरा तू जाने।
तु शक्ति की दाता अंबे, आजा कष्ट मिटाने।
ओ मैया शेरांवाली
अपनों में हुआ अकेला, भक्त तेरा अलबेला।
झोली मेरी भर दे माता दरबार सजा है मेला।
अष्ट भुजाओं वाली सुन ले, लाल चुनरिया धारी।
आठों याम ध्यान धरूं, आओ करके सिंह सवारी।
ओ मैया शेरांवाली
हाथों में त्रिशूल विराजे, हे शक्ति स्वरूपा माता।
विद्या बुद्धि यश दाता, हम सबकी भाग्य विधाता।
बल वैभव भंडार भरे, दिव्य अलौकिक वरदानी।
तेरा ध्यान धरे निशदिन, मां ऋषि मुनि नर ग्यानी।
ओ मैया शेरांवाली
शंख चक्र त्रिशूल हाथ ले, अभय दान वर देती।
भक्तों की प्रतिपाली मैया, दुखड़े सारे हर लेती।
तेरी शरण में सुख की गंगा, मन की पीर तू जाने।
सुंदर सजा दरबार निराला, मां भाए भजन सुहाने।
ओ मैया शेरांवाली
दुनिया के मेले में हर शख्स अकेला
अकेले ही चलना बंदे दुनिया का झमेला है।
दुनिया के मेले में यहां हर शख्स अकेला है।
आंधी और तूफानों से बाधाओं से लड़ना है।
संघर्षों से लोहा लेकर बुलंदियों पर चढ़ता है।
हिम्मत हौसला जुटा लो धीरज भी धरना है।
रंग बदलती दुनिया में संभल कर चलना है।
मुश्किलों भरा सफर है हर हाल में ढलना है।
रोशन हो जाए जमाना दीपक बन जलना है।
दो दिन की जिंदगानी चंद सांसों का रेला है।
दुनिया के मेले में यहां हर शख्स अकेला है।
प्यार के मोती लूटा लो संग ना जाए धेला है।
कारवां जुड़ता जाए जहां का हसीन मेला है।

कवि : रमाकांत सोनी
नवलगढ़ जिला झुंझुनू
( राजस्थान )
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