Kavita Baisakhi ka Parv

वैसाखी का पर्व सुहाना | Kavita Baisakhi ka Parv

वैसाखी का पर्व सुहाना

( Baisakhi ka Parv Suhana )

 

खेतों में खड़ी फ़सलें पक गई हैं,
सबके घरों में ख़ुशियाँ चहक रही हैं;
आओ, मिलकर छेड़े कोई मधुर तराना
देखो,आ गया वैसाखी का यह पर्व सुहाना ।

मेला घुमने जा रहे हैं सब सज-सँवरकर,
सुंदर बालाएँ चलती ज़रा-सी इठलाकर;
बच्चों की मुस्कान-सा, प्रकृति का खिल जाना
देखो,आ गया वैसाखी का यह पर्व सुहाना ।

मेले में आकाश-छूते बड़े-बड़े झूलें हैं,
ढोल की थाप सुन सब अपने दु:ख भूले हैं;
प्यार-भाईचारे का लाया यह नया फ़साना
देखो, आ गया वैसाखी का यह पर्व सुहाना ।

लगी हुई हैं तरह-तरह की हाठ-दुकानें,
खेल-खिलौने देख बच्चों का दिल ना माने;
इस भीड़ में तुम कहीं गुम ना हो जाना
देखो, आ गया वैसाखी का यह पर्व सुहाना ।

फूल-कली पर मंडराते फिर रहे हैं भँवरे,
आज बहुत दिन बाद मिले यार भूले बिसरे;
नाचने का इन्हें नहीं चाहिए कोई बहाना
देखो,आ गया वैसाखी का यह पर्व सुहाना ।

कवि : संदीप कटारिया

(करनाल ,हरियाणा)

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