Nari shakti ki kavita

वो एक अकेली शेरनी | Nari shakti ki kavita

वो एक अकेली शेरनी

( Wo ek akeli sherni ) 

 

 

उस वक्त लगा लेना चाहिए उस नारी का अंदाजा,

निकाह या विवाह हो कितने लोग लेनें को जाता।

अपनें ही व्यवहार से सबकें दिल में जगह बनाती,

वो एक अकेली शेरनी कुटुंब छोड़कर संग आती।।

 

अगर न होती ये पाॅंचो लक्ष्मी रुपणी इस धरा पर,

तो यह दुनियां नहीं चलती और आगें नहीं बढ़ती।

अपनी मेहनत व लगन से घर को स्वर्ग बना देती,

ईश्वर को भी गर्भ में रखने की ताक़त यह रखती।।

 

सबसे बड़ी दौलत समझती वह अपनें सुहाग को,

और सम्पत्ति समझती अपने स्वस्थ परिवार को।

हर-रूपों में नारी एक अनोखी कहानी है तुम्हारी,

दुर्गा सरस्वती बनकर बदल देती है इतिहास को।।

 

तुम्हारे बिना अधूरा रहता जीवन सभी पुरुषों का,

नहीं किसी पुरुष के बस का करना चूल्हा चोका।

पुरुष तो केवल चाबी है उसका ताला आप होती,

बिंदियाॅं सिंदूर लगाती है पत्नी पति के नाम का।।

 

यह मानव जीवन का सार है नारी नर से महान है,

भूत भविष्य वर्तमान है आपसे हमारी पहचान है।

एक घर की राजदुलारी तो दूसरे घर की लक्ष्मी है,

कभी धधकती आग है किचन क़लम तेरे हाथ है।।

 

 

रचनाकार :गणपत लाल उदय
अजमेर ( राजस्थान )

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