और जीवन
और जीवन

और जीवन

ऐषणाओं के सघन घन और जीवन।

आनुषांगिक भी न हो पाया अकिंचन और जीवन।

शांत पानी इतने कंकड़।

अंधड़ो की पकड़ में जड़,

आत्मा ह्रासित हुई बस रह गया तन और जीवन।।

ऐषणाओं..

कहते हैं सबकुछ यहां है,

यहां है तो फिर कहां है

इतनी हरियाली में बसते इतने निर्जन और जीवन।।

ऐषणाओं…

सूर्य तमस मरुत दीप,

मोती बिन ये कैसी सीप

मैं हूं या मटमैला दरपन और जीवन।

ऐषणाओं…

?

लेखक: शेष मणि शर्मा “इलाहाबादी”

प्रा०वि०-बहेरा वि खं-महोली,

जनपद सीतापुर ( उत्तर प्रदेश।)

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